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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 261, कुल 530 में से

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प्रथमोऽंशः १५९
निरोधिका की कलायें निम्न हैं—
रुन्धनी रोधनी रौद्री ज्ञानबोधा तमोपहा ।
निरोधका कला, ह्येताः सर्व देव निरोधिकाः ॥
'ब्रह्मादिपरमेशानां पर प्राप्ति निरोधनात् ।
‘निरोधिनीतिसा प्रोक्ता'—निरोधिनी का यही अर्थ है । १. रुन्धनी २. रोधनी
३. रौद्री ४. ज्ञानबोधा ५. तमोपहा—यही हैं निरोधिका की कलाएँ ॥ २२ ॥
‘व्यापिनी' के विषय में 'नेत्रतन्त्र' में कहा गया है—सूक्ष्मा चैव सुसूक्ष्मा च
ह्यमृतामृतसंभवाः ॥ ४२ ॥ व्यापिनी चैव विख्याता शक्तितत्व समाश्रिताः । अलुप्त
शक्ति संबंधच्चिच्छक्तिसधिष्ठिताः ॥ ४३ ॥ शक्तितत्त्वे स्थिता ह्येताश्चिन्मात्रा डिप-
लक्षिताः । व्यापिनी व्योमरूपा च ह्यनन्तानाथ संज्ञिता । अनाश्रिता महेशानि
व्यापिकान्यास्तु कलाः स्मृताः ॥”
'समनाशक्ति'—सर्वज्ञा सर्वगा दुर्गा सवना स्पृहणा धृतिः। समना चेति विख्याता
एताः शिवकलाः स्मृताः । इच्छाशक्तिसमधिष्ठाय इच्छा सिद्धि प्रदायिकाः ॥ ४६ ॥
शिवतत्त्व समाश्रित्य सुसम्पूर्णार्णवप्रभाः । अनन्तशक्ति संस्थानाः सूक्ष्माश्चात्यन्त-
निर्मलाः ॥ समनान्तं वरारोहे पाश जालमनेन्तकम् । वट्कारणा पदाक्रान्तं स्थूलसूक्ष्म
प्रभेदतः ॥ शक्त्यादि समनान्तं हि सूक्ष्मविज्ञान गोचरम् । तदूर्ध्वं तु परं शान्तम-
प्रमेयमनामयम् ॥ ४९ ॥
समनान्तं वरारोहे पाशजालमनन्तकम् (स्व० ४।४२९) मस्तक में इन्दु है
उसके ऊपर है बोधिनी और उसके ऊपर है 'नाद' और उसके ऊपर है 'महानाद'
उसके ऊपर है 'कला' (आञ्जी) और उसके ऊपर है 'उन्मनी' । 'अर्धमात्रा' =
बोधिनी ॥ 'बिन्दु' बोधिनी और नाद—बिन्दुमयी परा प्रकृति के पृथक् पृथक् पक्ष
हैं । 'भूतशुद्धितन्त्र' में 'बोधिनी' के नीचे 'बिन्दु' माना गया है ।
कुण्डलिनी एवं नाद—वर्ण रूप १०० कुण्डलों को धारण करने से =
'कुण्डलिनी'—ॐकार—५२ मातृकायें—(१) ५० अक्षरमय (२) ५१वीं मातृका
प्रकाशरूपा (३) ५२वीं मातृका—प्रकाश—प्रवाह : १७ वीं ५० मातृकायें जीवन
कला = लोम + विलोम से १००/१०० मातृकायें = १०० कुण्डल
(१) 'चतुष्पदी नाद'—(१) परा (२) पश्यन्ती (३) मध्यमा (४) वैखरी —
पाद 'चत्वारि वाक् परिमिता पदानि । तानि विदुर्ब्राह्मणे ये मनीषिणः ॥'
(२) 'पञ्चपदी नाद'—नाद—(१) सूक्ष्मा (२) परा (३) पश्यन्ती (४)
मध्यमा (५) वैखरी ।² आचार्यपद्मपाद
(३) 'सप्तपदी नाद'—(१) शून्य (२) संवित् (३) सूक्ष्मा (४) परा (५)
पश्यन्ती (६) मध्यमा (७) वैखरी—आचार्य पद्मपाद ।


१. सम्मोहनतन्त्र २. प्रपञ्चसारतन्त्र विवरण-पद्मपादाचार्य