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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 273, कुल 530 में से

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प्रथमोऽंशः १७१
(ख) भ्रूमध्य से समारब्ध एवं वहाँ से उठने वाला 'नाद'—सर्वसौभाग्य दायक,
सर्वार्थसाधक, सर्वरक्षाकर चक्रत्रय के त्रिविध स्थिति रूप का अपर रूप है ।१
(ग) बिन्दुस्थान से समारब्ध एवं वहाँ से उठने वाला 'नाद'—सर्वरोगहर-
सर्वसिद्धिप्रद-सर्वानन्दमय चक्रत्रय के संहतित्रय का अपर रूप है ।२ श्रीविद्या के
चतुर्थखण्ड में १५ कलाओं का अन्तर्भाव है । इन सभी का निवास ह्रीङ्कार में है
क्योंकि—
श्री विद्यात्मके चतुर्थे खण्डे पञ्चदशकलानां अन्तर्भावं निश्चित्य भुवनेश्वरी
प्रभृतीनां योगिनीविद्यानां नवानां त्रिकस्य त्रिकस्य एकैक ह्रीङ्कारेण अन्तर्भावं अङ्गीकृत्य,
सर्वभूतात्मकं, सर्वमन्त्रात्मकं, सर्वतत्त्वात्मकं, सर्वावस्थात्मकं, सर्वदेवात्मकं, सर्ववेदार्था-
त्मकं, सर्वशब्दात्मकं, सर्वशक्त्यात्मकं, त्रिगुणात्मकं, त्रिखण्डं, त्रिगुणातीतं, सादाख्या