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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

१४ वरिवस्यारहस्ये
१३. यह 'विमर्श' ही उसकी अपने महेश्वरता की पूर्ण प्रतीति है—'स एव
विमृशत्वेन नियतेन महेश्वरः ।।'१
१४. प्रकाश एवं विमर्श अभिन्न होते हुए भी 'प्रकाश' शिवरूप है एवं 'विमर्श'
शक्तिरूपा है । शिव एवं शक्ति का यह नित्य सामरस्य ही 'परमशिव' है ।
१५. शिव के बिना शक्ति का अपना कोई अस्तित्व नहीं और शक्ति के बिना
शिव स्कटिक आदि की भाँति जड़ हो जाएगा क्योंकि स्फटिक एवं मणि आदि
प्रकाशरूप होते हुए भी अपनी सत्ता का विमर्शन (प्रतीति) नहीं कर सकते ।
इसीलिए कहा गया है—
'न शिवः शक्तिरहितो न शक्तिर्व्यतिरेकिणी । शिवशक्तस्तथाभावानिच्छया
कर्तुमीहते । शक्तिशक्तिमतोर्भेदः शैवे जातु न वर्ण्यते ।।'२ शक्तिस्वभाव से शक्त होने
पर ही शिव कर्ता बन पाता है अन्यथा नहीं ।
१६. शक्ति ही आत्मारूप परमशिव का 'विमर्श' है । इसी 'विमर्श' के बल पर
शिव 'कर्तुं' 'अकर्तुं' एवं अन्यथाकर्तुं में समर्थ हैं क्योंकि 'विमर्शोहि सर्वसहः परमपि
आत्मीकरोति, आत्मानं च परीकरोति, उभयम् एकीकरोति एकीकृतं द्वयमपि
न्यग्भावयति इत्येवं स्वभावः ।।'३
१७. शिव से लेकर पृथिवीपर्यन्त ३६ तत्त्वों में अभेदरूप से स्फुरित आत्मा का
इच्छाप्रसार ही उस विश्वोत्तीर्ण परम शिव का विश्वात्मक रूप है । इसे, शैव तन्त्रों
में 'विमर्श' कहा गया है । 'विमर्श' विश्वात्मक है । विमर्श परमशिव की शक्ति है।
विमर्शा (शक्ति) का स्फार ही यह समस्त प्रपञ्च है—क्रियाशक्तिरेऽव (स्वातंत्र्या!मर्श-
रूपायाः) अयं सर्वोविस्फारः ।।'४
१८. 'विमर्श' चिदात्मा के प्रकाश स्वरूप की प्रतीति है । यह 'विमर्श' ही
उसका 'स्वातंत्र्य' है । इसके द्वारा परमशिव परनिरपेक्ष होकर स्वात्ममात्र की पूर्णता
में विश्रान्त रहता है उसकी पर-निरपेक्ष आत्मपूर्णता की प्रतीति ही उसका आनन्द
है.... 'स एव परानपेक्षः पूर्णत्वादानन्दरूपो' क्योंकि 'अन्यनिरपेक्षतैव परमार्थतः
आनन्दः'५ चित्अंश शिवभाव है और आनन्दांश शक्तिभाव है अतः परमशिव का
जो आनन्द है उसका भी अधिष्ठान 'विमर्श' है । एक ही शिव प्रकाशस्वरूप के
प्राधान्य की दृष्टि से 'विश्वोत्तीर्ण' है और विमर्शस्वरूप के प्राधान्य से विश्वमय है
अतः परमशिव की विश्वमयता का आधार भी 'विमर्श' ही है । विमर्श ही उसकी
स्वातंत्र्य शक्ति है ।
१९. परमेश्वर प्रकाशात्मा है और प्रकाश विमर्शस्वभाव है—'परमेश्वरः
प्रकाशात्मा प्रकाशश्च विमर्शस्वभावः ।।'६
१. ईश्वरप्रत्यभिज्ञा (१-१।८।११) २. शिवदृष्टि (३।२-३)
३-४. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (भाग-२, पृ० ५, ४२)
५. ई०विम० (भाग-१, पृ० २०७) ६. पराप्रावेशिका

प्रथमोऽंशः १५
'विमर्श'—प्रकाशात्म शिवरूपी दीपक की प्रभा ही 'विमर्श शक्ति' कही गई
है—'शिवस्य प्रकाशात्मनो दीपस्य शक्तिर्विमर्शाख्यैव प्रभा ।'१
'विमर्श' उस नित्य शक्ति को कहते हैं जो शिव के भीतर पूर्वस्थित पदार्थों के
अवभासन में सहायता करती है । परमात्मा का आनन्दरूपांश ही 'स्फुरत्ता'
'पराअहंता', 'पराललिता भट्टारिका' 'त्रिपुरसुन्दरी' एवं 'विमर्श' आदि पदों द्वारा
अभिहित किया जाता है—'तस्य चानन्दरूपांश एवं स्फुरणं परा अहंता, विमर्शः,
पराललिता भट्टारिका, त्रिपुरसुन्दरी, इत्यादि पदैः व्यवह्रियते ।'२ 'विमर्श' शिव का
स्वभाव है । तत्त्व प्रकाशात्मा है और विमर्श ही उसका स्वभाव है । 'सृष्टि' अवस्था
में विश्वाकार होने से, 'स्थिति' अवस्था में विश्व को प्रकाशन द्वारा तथा 'संहार'
अवस्था में आत्मसात् करने से शिव में पूर्ण जो अकृत्रिम अह॑भाव है उसी को
'विमर्श' शक्ति कहते हैं ।३ यदि शिव में 'विमर्श' शक्ति न होती तो वे अनीश्वर
एवं जड़ हो जाएंगे । चित, चैतन्य, परावाक, परमात्मा का ऐश्वर्य, कर्तृत्व, स्फुरत्ता
आदि 'विमर्श' के ही पर्यायवाची शब्द हैं ।
व्युत्पत्ति की दृष्टि से 'विमर्श' शब्द 'वि' उपसर्ग सहित 'मृश' धातु से घञ्
प्रत्यय लगाकर निष्पन्न हुआ है और उसका अर्थ है—किसी तथ्य का अनुसंधान,
किसी विषय का विवेचन या समीक्षा । दार्शनिक दृष्टि से 'विमर्शतत्त्व' इस अर्थ से
पृथक् एक पारिभाषिक पद के रूप में व्यवहृत होकर परम शिव की समवायिनी
पराशक्ति के अर्थ में व्यवहृत होता है ।
परमेश्वर के हृदय में सिसृक्षा उत्पन्न होते ही उनके जो दो रूप हो जाते हैं
उनमें से शिवरूप 'प्रकाश' है एवं शक्तिरूप 'विमर्श' है । 'विमर्श' का अर्थ है
अकृत्रिम एवं पूर्णतम अहं की स्फूर्ति । विमर्शस्वरूपा स्फूर्ति सृष्टिकाल में विश्वाकार
में रूपायित होने एवं प्रलयकाल में विश्वसंहरण (विश्व को अन्तर्विलीन करने) के
रूप में प्रस्तुत होती है । 'विमर्शो नाम विश्वाकारेण विश्वप्रकाशेन विश्वसंहरेण च
अकृत्रिमाहमिति स्फुरणम्' ।।४ विमर्श के द्वारा प्रकाश का अनुभव होता है और
प्रकाश की स्थिति में विमर्श की कल्पना सङ्गत होती है । जिस प्रकार दर्पण के
बिना मुख का प्रत्यक्षीकरण संभव नहीं हो पाता उसी प्रकार विमर्श के बिना प्रकाश
का स्वरूप पूर्ण नहीं हो पाता । जिस प्रकार शर्करा में माधुर्य एवं सुरा में मादकता
होते हुए भी उन्हें इनका ज्ञान नहीं होता उसी प्रकार शक्ति के बिना शिव को
अपने प्रकाशस्वरूप का ज्ञान नहीं हो पाता। शिव में अपने चैतन्य का ज्ञान 'शक्ति'
के माध्यम से होता है । यदि शक्ति नहीं तो शिव मात्र शव रह जाता है—
'शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं ।
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि ।।'५
१. दीपिका (अमृतानन्द) २. भास्करराय (व०र०)
३-४. पराप्रावेशिका (पृ० १-२)
५. शङ्कराचार्य 'सौन्दर्यलहरी' । 'तस्य देवादिदेवस्य परबोध स्वरूपिणः । विमर्शः
परमा शक्तिः सर्वज्ञा ज्ञानशालिनी' ।। (श्री कालीकुल)

१६ वरिवस्यारहस्ये
'पराशक्तिरूपा चितिः एव भगवती स्वतन्त्रा अनुत्तर विमर्शमयी शिव
भट्टारिकाभिन्ना ॥'१
शिवस्य प्रकाशमयस्य प्रथा विमर्शशक्तिः ॥ (अमृतानन्द योगी) शिवस्य
प्रकाशात्मनो दीपस्य शक्तिर्विमर्शाख्यैव प्रभा, सा निर्विकल्पात्मना विश्वाकारा
मेयमातृप्रमाप्रमाणभेदैः सङ्कुचरूपा ॥'२ विश्वाकारप्रथा षट्त्रिंशत्तत्वात्मना परिणता
विमर्शशक्तिः ॥३
'विश्वस्य शिवादेर्भूभ्यन्तस्य प्रकाशामर्शने प्रस्फुटस्य स्फुटीकारः प्रकाशः ।
इदन्तया हृदयङ्गमीभावो विमर्श एवामर्शनम् ॥'४ 'प्रकाश' परमशिव एवं 'विमर्श'
पराशक्ति का वाचक है—'दिव्यं प्रकाशविमर्शात्मक परमशिवपराशक्तिप्रतिपादनं ।'५
अमृतानन्द योगी ने कहा है कि विश्वगुरु की शक्ति का नाम 'विमर्श' है जो
कि एक होते हुए भी अनेक भावार्थ रूप में व्यक्त होती है—'विमर्शरूपिणी
शक्तिरस्य विश्वगुरोः सदा । परिस्फुरति सैकापि नाना भावार्थरूपिणी ॥'
प्रकाशात्मक परशिव 'अहमेव' के अनुसंधान के साथ परापश्यन्ती
मध्यमा-वैखरी के क्रम से विमर्शाश के द्वारा प्रकट हुआ करते हैं—'प्रकाशात्मकः
परशिवोऽहमेव विश्वानुग्रहपरः परा पश्यन्ती मध्यमा वैखरीक्रमेण व्यापृत्य विमर्शाशेन
प्रकटो भूत्वा प्रकाशेन प्रतिवचनदातापि सन् तन्त्रं समवतारयामि ।'६
'परम तत्व' क्या है? 'प्रकाश' उसका रूप है—उसका स्वभाव है अर्थात् वह
महाप्रकाशस्वरूप है । वह निराकाङ्क्ष है । स्फटिक मणि, दर्पण आदि पदार्थ
निराकाङ्क्ष होने पर भी जड़ हैं किन्तु परमतत्व निराकाङ्क्ष होकर भी महाचेतन है और
स्वात्मविश्रान्ति के कारण 'महानन्द' कहा गया है । स्वात्मा (स्वभाव) अखण्ड
अहंता चमत्कार के रस में विश्राम करने के कारण परमशिव परमनिर्वृति एवं
महानन्दस्वरूप है । स्फटिकादिक प्रकाश ग्रहण करने में समर्थ तो हैं किन्तु केवल
प्रकाश्य है किन्तु परमात्मा स्वप्रकाश है—प्रकाशात्म—प्रकाशक एवं प्रकाशस्वरूप
है । 'अहं' विमर्श में 'अ' प्रकाशात्मक परमशिव रूप परमतत्व है तथा 'ह'
पराशक्ति विमर्श ।७
प्रकाशस्वरूप परमेश्वर का स्वभाव ही 'विमर्श' है । जो विश्वाकार,
विश्वप्रकाश, विश्वसंहार रूप से अकृत्रिम अहमाकार का स्फुरण है वही 'विमर्श' है ।
यदि वह प्रकाश निर्विमर्श हो जाय तो वह अनीश्वर और जड़ हो जाएगा । वह
विमर्श विश्वाकार से सृष्टि में और विश्व प्रकाश से स्थिति में और स्वात्मसाक्षात्कार
रूप के द्वारा संहरण से संहार में पूर्णाहन्ता चमत्कारस्वरूप है । इसी 'विमर्श' को
चित, चैतन्य, स्वाभाविक रूप से प्रकाशित होने वाली 'परावाक्', स्वातन्त्र्य,
१. प्रत्यभिज्ञाहृदयम् २-५. दीपिका (अमृतानन्दनाथ)
६. अमृतानन्द
७. 'अ' प्रकाशस्वरूप परमशिव है तथा 'ह' शक्तिस्वरूप 'विमर्श' ।

प्रथमोऽंशः १७
परमात्मा का मुख्य ऐश्वर्य, कर्तृत्व, स्फुरत्ता, सार, हृदय, स्पन्द इत्यादि शब्दों द्वारा
आगमों में कहा गया है । संवित्प्रकाश रूप का विमर्श-प्राधान्य ही शैव शासन में
प्रतिपादित है । चैतन्य विमर्श ही आत्मा का मुख्य स्वभाव है ।¹ इस विमर्श शक्ति
के विभिन्न नामान्तर हैं—
'चितिः प्रत्यवमर्शात्मा परावाक् स्वरसोदिता ।
स्वातन्त्र्यमेतन्मुख्यं तदैश्वर्यं परमात्मनः ।।
सा स्फुरत्ता महासत्ता देशकालविशेषिणी ।
सैषा सारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः ।।'
शक्तिः—'शक्ति' शब्द शक् धातु से क्तिन् प्रत्यय लगाकर बनता है । शक्ति
का अर्थ है सामर्थ्य या क्षमता । शिव की विश्वसिसृक्षा शक्ति ही 'शक्तितत्त्व' के
नाम से प्रसिद्ध है—शिवस्य विश्वसिसृक्षा शक्तिः शक्तित्वमिति नाम्ना ख्याता ।।'²
रामेश्वर ने 'परशुरामकल्प सूत्रटीका' में कहा है कि निर्गुण शिव ही 'बहुस्यां
प्रजायेय'—इस इच्छाशक्ति से युक्त होकर तथा सृष्ट्युन्मुख हो कर 'शक्तितत्व'
कहलाने लगता है । शिव की सिसृक्षा ही 'शक्ति' है ।
त्रिकसिद्धान्त मत के अनुसार परमशिव परमेश्वर के हृदय में सिसृक्षाविर्भाव
मात्र से ही उनके दो रूप हो जाते हैं—(१) शिवरूप (२) शक्तिरूप । शिव
प्रकाशरूपी है और शक्ति विमर्शरूपिणी ।
प्रपञ्च-वासना की दृष्टि से शिव एवं शक्ति में निम्न भेद हैं—
'प्रपञ्चवासणारूपा शक्तिरित्यभिधीयते ।
निष्प्रपञ्चचिदेकात्मा शिवतत्त्वं समीरितम् ।।'³
'शक्ति' का 'श' अक्षर ऐश्वर्य का एवं 'क्ति' अक्षर पराक्रम का वाचक है
अतः 'शक्ति' शब्द ऐश्वर्य एवं पराक्रम प्रदान करने वाली देवी का वाचक है ।⁴
'या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता' कहकर दुर्गासप्तशती में भगवती के उस
स्वरूप को, जो समस्त प्राणियों में शक्ति के रूप में स्थित रहता है, नमस्कार
किया गया है और उसे शक्तिस्वरूप कहा गया है । 'शक्ति' शब्दकोशीय दृष्टि से
निम्न अर्थों का वाचक है—(१) कासूसामर्थ्ययोश्शक्तिः (२) शक्तिः पराक्रमः प्राणौ
(३) षड्गुणाश्शक्तयस्तिस्रः ।⁵
'शक्लृ शक्तौ' धातु से क्तिन् प्रत्यय लगाने पर 'शक्ति' शब्द निष्पन्न होता
है । उत्साह, गौरी, बल एवं पराक्रम के अर्थ में ही 'शक्ति' शब्द व्यवहार में
अधिक प्रयुक्त होता है—
'शक्तिरस्तान्तरे गौर्यामुत्साहादौ बलेस्त्रियाम् ।।'⁶
१. 'षट्त्रिंशत् तत्व संदोह' २-३. शाक्तदर्शनम् (पृ० ९०)
४. देवीभागवत पुराण ५. अमरकोश
६. मेदिनीकोश
२ वरि.

१८ वरिवस्यारहस्ये
शक्ति को प्रकार त्रयात्मक बताया गया है—शक्तयस्तिस्रः प्रभावोत्साह-
मन्त्रजाः ॥' (शक्यते जेतुमनया । 'स्त्रियां क्तिन्' ३।३।९४) हैमकोश के अनुसार
'शक्ति' शब्द का अर्थ निम्नानुसार है—'शक्तिरायुधभेदे स्यादादुत्साहादौ बले-
स्त्रियाम् ॥'१ विश्वकोश के अनुसार—'शक्ति' शब्द निम्न अर्थों का वाचक है—
'कासूर्विकलवाचि स्यात्कासूः शक्त्यायुधेऽपि च ॥'२
विमर्श शक्ति तत्त्व—शिव प्रकाशरूप है तो शक्ति विमर्शरूपिणी । 'विमर्श'
का अर्थ है—'मै पूर्ण हूँ, मै अकृत्रिम हूँ'—इसकी स्फूर्ति । यह स्फूर्ति (या
स्फुरत्ता) (१) सृष्टिकाल में—विश्वाकारा (२) स्थितिकाल में—विश्वप्रकाशा एवं (३)
प्रलयकाल में—विश्वसंहरणरूपा बन जाती है । अतः 'विमर्शो नाम विश्वाकारेण,
विश्वप्रकाशेन, विश्वसंहारेण चाकृत्रिममाहमिति स्फुरणम् ।'३ 'विमर्शशक्ति' के अन्य
पर्याय निम्न हैं—चित्, चैतन्य, संवित, स्वरमोदिता, परावाक्, स्वातन्त्र्यामुख्यैश्वर्या,
कर्तृत्व, स्फुरत्ता, सारा एवं स्पन्द आदि ।
'प्रभा' के दो रूप है—(१) 'अहमंश' (२) 'इदमंश' । अहमंशग्राहक, तो
शिव या 'प्रकाश' हैं, तथा इदमंशग्राहक शक्ति या 'विमर्श' है । 'विमर्श' के द्वारा
ही 'प्रकाश' का स्वानुभव हो पाता है । प्रकाश की सत्ता के बिना 'विमर्श' की
कल्पना भी नहीं की जा सकती । जिस प्रकार दर्पण के बिना मुखमण्डल का रूप
प्रत्यक्षीकृत नहीं हो पाता उसी प्रकार विमर्श के बिना प्रकाश के स्वरूप की
संभावना नहीं हो सकती । शक्ति की सहायता के बिना शिव को अपने स्वरूप की
प्रतीति नहीं हो सकती । इसीलिए कहा गया है—'शिवा' शिव का मुख है—
'शैवीमुखमिहोच्यते ।'
पुण्यानन्दनाथ ने 'कामकलाविलास' में कहा है कि जिस प्रकार कोई नृपति
निर्मल दर्पण में अपने प्रतिबिम्ब को देखकर अपने मुख की सुन्दरता को भलीभाँति
जान लेता है उसी प्रकार भगवान् शिव भी अपनी स्वाधीनभूतात्म शक्ति को देखकर
स्वीय परिपूर्णाहन्तामय स्वरूप को जान लेते हैं ।
'सा जयति शक्तिराद्या निजसुखमय नित्यनिरूपमाकारा ।
भाविचराचरबीजं शिवरूपविमर्शनिर्मलादर्शः ॥'४
यह विमर्श शक्ति परमशिव में नित्य अन्तर्लीन है—
'सकल भुवनोदयस्थितिलयमय लीलाविनोदनोद्युक्तः ।
अन्तर्लीनविमर्शः पातु महेशः प्रकाशमात्रतनुः ॥'५
'प्रकाश' विमर्शात्मक है और 'विमर्श' प्रकाशात्मक है । सांराश यह है कि—
'न शिवेन विना देवी न देव्या च विना शिवः ।
ना नयोरन्तरं किंचिच्चन्द्रचन्द्रिकयोरिव ॥'
१. हैमकोश २. विश्वकोश
३. पराप्रवेशिका ४-५. पुण्यानन्दनाथ-कामकला विलास

प्रथमोऽंशः १९
यथा चन्द्रिका चन्द्रमा से पृथक् नहीं हो सकती और न तो चन्द्रमा चन्द्रिका
से उसी प्रकार शिव शिवा से एवं शिवा शिव से (प्रकाश विमर्श से एवं विमर्श
प्रकाश से) पृथक् नहीं हो सकते ।
'शक्ति' एवं शक्तिमान में अभेद—आचार्य सोमानन्दपाद ने 'शिवदृष्टि' में कहा
है कि भगवान् शिव तभी तक शक्तिमान कहलाते हैं जब तक कि शक्ति उनके
साथ है क्योंकि—
न शिवः शक्तिरहितो न शक्तिर्व्यतिरेकिणी ।
शिवः शक्तस्तथा भगवानिच्छया कर्तुमीहते ॥१
इसीलिए कहा गया है कि शक्ति एवं शक्तिमान् में अभेद है—
'शक्तिशक्तिमतोर्भेदः शैवे जातु न वर्ण्यते ॥'२
'सौन्दर्यलहरी' में आचार्य शङ्कर कहते हैं कि—यदि 'शिव' शक्ति से समन्वित
न रहें तो वे हिल भी नहीं सकते—
'शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं ।
नो चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि ॥'३
'शक्ति' के विभिन्न रूप—'शक्ति' के अनन्त रूप हैं किन्तु उनमें से पाँच
रूप प्रधान हैं—(१) चितशक्ति (२) आनन्दशक्ति (३) इच्छाशक्ति (४) ज्ञानशक्ति
(५) क्रियाशक्ति ।
(क) 'चित शक्ति'—यह प्रकाशात्मक रूप है । इसीके द्वारा शिव अपने
को 'प्रकाश' (स्वप्रकाश) समझते हैं ।
(ख) 'आनन्द शक्ति'—इसके द्वारा शिव आनन्दमय हैं और इस शक्ति की
सहायता से ही वे अपने में 'आनन्द' का साक्षात्कार कर पाते हैं ।
(ग) 'इच्छा शक्ति'—इसके द्वारा ही शिव प्रपञ्च का सृजन, पालन एवं
संहार करते हैं ।
(घ) 'ज्ञान शक्ति'—इसके द्वारा ही शिव ज्ञानस्वरूप हैं ।
(ङ) 'क्रिया शक्ति'—इसके द्वारा ही शिव सभी स्वरूपों को धारण कर
पाते हैं ।
इन्हीं शक्तियों की सहायता से शिव अपने में 'अहं' का बोधकर पाते हैं, एवं
विश्व की अभिव्यक्ति कर पाते हैं, जगत् शिव की शक्ति का ही अपना विराट रूप
है । इसे परमशिव अपने में ('स्वभित्तौ' = अपने हृदय की दीवार में) स्वेच्छया
अभिव्यक्त करते हैं । शक्ति के बिना शिव जड़वत हैं ।
१. सोमानन्द 'शिवदृष्टि' २. शिवदृष्टि
३. सौन्दर्यलहरी

२० वरिवस्यारहस्ये
'विमर्श' शिव का स्वभाव है । सृष्टि अवस्था में विश्वाकार होने से स्थिति में
विश्व को प्रकाशन के द्वारा, एवं संहार के समय विश्व को आत्मसात करने से
शिव में जो पूर्ण अकृत्रिम अहंभाव है उसी को 'विमर्श शक्ति' कहते हैं ।१
पुण्यनन्द ने इसी आद्या शक्ति को 'शिवरूपविमर्श निर्मलादर्श:' कहा है ।२ शक्ति
विमर्शरूपिणी है । 'विमर्श' है—पूर्ण अकृत्रिम अहंभाव की स्फूर्ति । बिना शक्ति के
शिव को अपने प्रकाशरूप का ज्ञान नहीं होता । शक्ति के बिना शिव शव हैं—
विभिन्न विमर्शों का स्वरूप निम्नानुसार है—
(क) 'शिवतत्त्व' में— 'अहं' विमर्श होता है ।
(ख) 'सदाशिवतत्त्व' में— 'अहमिदं' विमर्श होता है ।
(ग) 'ईश्वरतत्त्व' में—'इदमहं' विमर्श होता है ।
शैव-शाक्त तन्त्रों में तत्त्वों को निम्न रूप से वर्गीकृत किया गया है— (१)
शिवतत्त्व (२) विद्यातत्त्व (३) आत्मतत्त्व । इसी 'शिवतत्त्व' के दो रूप हैं— (क)
'शिवतत्त्व' (ख) 'शक्तितत्त्व' ।
'शक्ति' को प्रथम 'स्पन्द' भी कहा गया है । जगत् की रचना करने वाले
परमेश्वर की जो प्रथम स्पन्दरूप इच्छा है वही 'शक्ति' है ।३
'यदयमनुत्तरमूर्ति- र्निजेच्छयाऽखिलमिदं जगत्स्रष्टुम ।
पस्पन्दे स स्पन्दः प्रथमः शिवतत्त्वमुच्यते तज्ज्ञैः ।।४
शिव— 'शिवो जगदुत्पादयति पाति संहरति ।।' स्पन्दसूत्रों में कहा गया है कि
जिसके उन्मेष एवं निमेष से जगत् की सृष्टि एवं प्रलय होते हैं उस 'शक्तिचक्र
विभवप्रभव' शङ्कर की हम स्तुति करते हैं—
'यस्योन्मेष निमेषाभ्यां जगत्ः प्रलयोदयौ ।
तं शक्तिचक्रविभवप्रभवं शङ्कर स्तुमः ।।'
अर्थात् शङ्कर या शिव उस परासत्ता का अभिधान है जो जगत् की सृष्टि एवं
प्रलय का सूत्रधार है । 'शिव' के अन्य पर्याय निम्नांकित हैं—
'शंभुरीशः पशुपतिः शिवः शूली महेश्वरः ।
ईश्वरः सर्व ईशानः शङ्करश्चन्द्रशेखरः ।।' आदि ।।५
'भगवान् शिव जगत् को उत्पन्न करते हैं, उसका पालन एवं संहार करते
हैं ।।' (शिवो जगदुत्पादयति पाति संहरति ।।') 'शिव' शब्द अनेकार्थवाची है—
'शिवो मोक्षे महादेवे कीलकग्रहयोगयोः । बालके गुग्गुलौ वेदे पुण्डरीकद्रुमेऽपि च ।
सुखे क्षेमे जले क्लीबं ।।'६
१. पराप्रावेशिका (पृ० १-२) २. कामकलाविलास
३. पराप्रावेशिका ४. षट्त्रिंशत्तत्वसन्दोह
५-६. अमरकोश

प्रथमोऽंशः २१
त्रिपुरासिद्धान्तर्गत 'परशुरामकल्पसूत्र' (१।४) की टीका में श्रीरामेश्वर ने ३६
तत्त्वों का विवरण दिया है और इसी प्रकार मृगेन्द्रसंहिता एवं 'षट्त्रिंशत्तत्व- संदोह'
में भी इसका सविस्तार विवरण दिया गया है। 'परशुरामकल्पसूत्र' (१।४) की
टीका में कहा गया है कि सृष्टि के आदि में स्वकीयस्वरूपमात्र में अवस्थित
परमशिव में जो 'एकोऽह बहुस्याम' के रूप में इच्छा उत्पन्न हुई वही 'इच्छाशक्ति'
है और उसी से 'ज्ञानशक्ति' एवं ज्ञानशक्ति से क्रियाशक्ति उत्पन्न हुई। इस शक्तित्रय
के सहयोग से शब्द सृष्टि एवं अर्थसृष्टि प्रारब्ध हुई। इस सृजनेच्छाशक्ति से विशिष्ट
परमशिव ही 'शिवतत्त्व' है। वैसे तो परमशिवं 'निर्गुण' हैं किन्तु सिसृक्षा के उदित
होते ही वे 'सगुण' एवं शक्तियुक्त हो जाते हैं।
'सौभाग्यभास्कर' में श्रीभास्करराय कहते हैं—प्रलयकाल में सूक्ष्मावस्थापन्न
जगत् को गर्भीकृत करके शक्ति शिव में विलीन हो जाती है। ऐसी स्थिति में
क्रियाशक्ति भी नहीं रहती। इस अवस्था में स्थित शिव ही निर्गुण ब्रह्मस्वरूप
'परमशिव' कहलाते हैं। सृष्टि की उन्मुखावस्था में परमशिव के 'ईक्षण', 'काम',
'तप', 'विचिकीर्षा' आदि के रूप में प्रथम स्पन्दन होता है। और इसी से शक्ति
का विकास होता है। इस शक्ति से युक्त परमशिव ही प्रथम तत्त्व 'शिव' कहलाते
हैं। इसी तथ्य को 'षट्त्रिंशत्तत्वसन्दोह' में इस प्रकार कहा गया है—
'यदयनुत्तरमूर्तिर्निजेच्छयाऽखिलमिदं जगत्स्रष्टुम् ।
स्पन्दते स स्पन्दः प्रथमः शिवतत्त्वमुच्यते तज्ज्ञैः ॥१
जब अनुत्तरमूर्ति परमशिव स्वेच्छावश जगत् की सृष्टि करने के लिए स्पन्दित
हुए तब सृष्टि की इस उन्मुखावस्था में उनका जो प्रथम स्पन्दन हुआ वही
'शिवतत्त्व' है।२
प्रत्येक जीव में स्थित शिवतत्त्व ही आत्मतत्त्व है। यह चैतन्यरूप है।
'चैतन्यमात्मा'३ इसे ही 'परासंवित्' परमेश्वर 'शिव' या 'परमशिव' कहते हैं। यह
जड़ाजड़ सभी सत्ताओं में व्यष्टि-समष्टि रूप में स्थित है। यह देशकालातीत होते
हुए भी सभी देशों एवं कालों में, एक होते हुए भी अनन्त रूपों में स्थित है।
अद्वैत होते हुए भी द्वैत रूप से भासमान है। यह विश्वरूप होते हुए भी
विश्वातीत है। समस्त जगत् इसी तत्त्व का अभिन्नरूप है। 'परमशिव' स्वयं ३६
तत्त्वों के रूप में जगत् में भासित होता है। इस विश्वोत्तीर्ण, विश्वात्मक,
परमानन्दरूप एवं प्रकाशैकघन 'शिव तत्त्व' का ही (अपने से लेकर पृथ्वीपर्यन्त)
३६ तत्त्व अपना अभिन्न स्फुरण है यही परमशिव भट्टारक नाना वैचित्र्यों के रूप में
स्वयं स्फुरित होते हैं।४ क्षेमराज कहते हैं—'अखिलम् अभेदेनैव स्फुरति ॥'
'श्रीमत्परमशिवस्य पुनः विश्वोत्तीर्ण विश्वात्मक परमानन्दमय प्रकाशैकघनस्य एवं
विधमेव शिवादिधरण्यन्तं अखिलं अभेदेनैव स्फुरति, न तु वस्तुतः अन्यत्
१. आचार्य क्षेमराज—ष०त्रिं०त०सं० २. शाक्तदर्शनम्
३. शिवसूत्र (१।१) ४. प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (पृ० ३,८)

२२ वरिवस्यारहस्ये
किंचित ग्राह्यं ग्राहकं वा; अपितु श्रीपरमशिवभट्टारक एवं इत्थं नानावैचित्र्यसहस्रैः
स्फुरति ।।' 'एवं भगवान् विश्वशरीरः ।' 'चिदात्मा शिवभट्टारक एव एक आत्मा न
तु अन्यः किंचित् ।।'१ इसीलिए कहा गया है—'तेन शब्दार्थचिन्तासु न सावस्था न
यः शिवः ।।'२
'परमशिव' और 'शिवतत्त्व'—'परमशिव' शुद्ध अद्वैत की तत्त्वातीत स्थिति
है। इसे न 'शिव' कहा जा सकता है और न तो 'शक्ति' न इसे विश्वोत्तीर्ण कहा
जा सकता है और न तो विश्वमय। उसकी भावना एवं उसका उपदेश दोनों संभव
नहीं है—
'अप्रमेयेऽपरिच्छिन्ने स्वतन्त्रे भाव्यता कुतः ।' (तन्त्रालोक)
शैव-शाक्त दर्शनो में छत्तीस तत्त्व स्वीकार किए गए हैं, 'परमशिव' इनमें से
कोई भी तत्त्व नहीं है क्योंकि वह 'तत्त्वातीत' है।
अप्रतिहतशक्ति परमशिव अपने स्वातन्त्र्यस्वभाव के कारण प्रमातृप्रमेयादि
अनन्तरूपों में आत्मावभासन करने की इच्छा से जगल्लीला के लिए नानारूप
धारण करने के कारण 'विश्वमय' हैं किन्तु स्वरूपतः 'विश्वोत्तीर्ण' हैं। इसी कारण
श्रीक्षेमराज इसे 'विश्वमय' एवं 'विश्वातीत' दोनों एक साथ कहते हैं—
'श्रीमत्परमशिवस्य' पुनः 'विश्वोत्तीर्णविश्वात्मकः'३ 'परमशिव' है तो विश्वोत्तीर्ण किन्तु
वह विश्वशरीरी भी है—'भगवान् विश्वशरीरः'४ विश्व उसकी आत्मा के साथ अभिन्न
रूप में स्थित है—'श्रीपरमशिवः स्वात्मैक्येन स्थितं विश्वं'५ इसीलिए
'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' में कहा गया है—चितिसङ्कोचात्मा चेतनोऽपि सङ्कुचित विश्वमयः'६
'चिदैकात्म्येन विश्वशरीरः शिवभट्टारक एव'७ श्रीपरमशिवभट्टारक एवं इत्थं
नानावैचित्र्यसहस्रैः स्फुरति'८ 'जगतः प्रकाशैकात्म्येन अवस्थानम् उक्तम्'९ 'ननु जगदपि
चितो भिन्नं नैव किञ्चित् ।'१०
'परमशिव' विश्वमय है या विश्वातीत ?—इस प्रश्न पर अपना मत प्रस्तुत
करते हुए आचार्य क्षेमराज कहते हैं कि—
(१) विश्वोत्तीर्णमात्मतत्त्वम् इति तांत्रिकाः ।
(२) विश्वमयम् इति कुलाद्याम्नायनिष्ठाः ।
(३) विश्वोत्तीर्णं विश्वमयं च इति त्रिकादिदर्शनविदः ।
एक ही चिदात्मा भगवान् परमशिव स्वातन्त्र्यावभासित विभिन्न भूमिकाओं में
आत्मा के रूप में अवस्थित हैं तथापि वे मूलतः निष्क्रिय, निर्गुण एवं निराकार हैं।
चिदात्मा परमेश्वर अपनी स्वातन्त्र्यशक्ति के बल से अभेद व्याप्ति का विमज्जन
करके भेद-व्याप्ति का अवलम्बन ग्रहण करते हैं—'चिदात्मा परमेश्वरः स्वातन्त्र्यात्
अभेदव्याप्तिं निमज्य भेदव्याप्तिं अवलम्बते ।।'११ सामरस्य एक ऐसी अवाङ्मन-
सगोचर परम स्थिति है जिसमें शक्ति एवं शक्तिमान् जैसे शब्दों की कल्पना करना
१-११. आचार्य क्षेमराज—प्रत्यभिज्ञाहृदयम्

प्रथमोऽंशः २३
भी संभव नहीं है । इसी तत्त्वातीत अवस्था को शैवागम में 'अकथ्या' एवं
'अन्तःस्वानन्दगोचरा' कहा गया है ।
'विज्ञानभैरव' में कहा गया है कि यह न तो नवात्मा है, न तत्त्वरूप है, न
शब्दराशि है, न त्रिशिराभैरव है, न शक्तित्रयात्मक है, न नादबिन्दुम flag? नहीं: नादबिन्दुमय है, न
चन्द्रार्धनिरोधिका है, न वर्णचक्र में स्थित अहंस्वभाव या षट्चक्रात्मक ही है और न
तो शक्तिस्वरूप ही है प्रत्युत् वह दिक्कालकलनोन्मुक्त, अव्यपदेश्य, अकथ्य,
अन्तःस्वानुभवानन्द एवं विकल्पोन्मुक्तगोचर है—
'तत्त्वतो न नवात्माऽसौ शब्दराशिन भैरवः ।
न चासौ त्रिशिरा देवो न च शक्तित्रयात्मकः ।
नादबिन्दुमयो वापि न चन्द्रार्धनिरोधिकाः ।
न चक्रक्रमसंभिन्नो न च शक्तिस्वरूपकः ।
दिक्कालकलनोन्मुक्ता देशोदेशाविशेषिणी ।
[L1

२४ वरिवस्यारहस्ये
शक्तिस्वभाव परमशिव असंख्य शक्तियों से समन्वित है तथापि शक्तिपञ्चक ही
उसकी मुख्य शक्तियाँ हैं जो निम्न हैं—चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान और क्रिया।
सगुण शिव—'परमशिव' का शिवतत्त्व के रूप में अवभासन ही उसके सगुण
स्वरूप की अभिव्यक्ति है और इस रूप में वह शिव 'पञ्चकृत्यकारी' हैं—
सृष्टिसंहारकर्तारं विलयस्थितिकारकम् ।
अनुग्रहकरं देवं प्रणतार्तिविनाशनम् ॥१
१. आभासन, २. रक्ति, ३. विमर्शन, ४. बीजावस्थापन, ५. विलापन।२
आचार्य क्षेमराज ने भी शिव को पञ्चकृत्यविधायी कहा है—
'नमः शिवायसततं पञ्चकृत्यविधायिने ।
चिदानन्दघनस्वात्म परमार्थविभासिने ॥३
तथापि तद्वत पञ्चकृत्यानि करोति ॥'४ 'पञ्चविधकृत्यकारित्वंचिदात्मनो
भगवतः ॥'५ परमशिव की विश्वोत्तीर्णता एवं विश्वमयता में विरोध नहीं है इसीलिए
उसे विश्वोत्तीर्ण कहकर भी विश्वमय (सगुण शिव) कहा गया है—'इह खलु
निखिलजगदात्मा सर्वोत्तीर्णश्च सर्वमयश्च विकल्पासङ्कुचितसंवित्प्रकाशरूपः, अनवच्छिन्न-
चिदानन्दविश्रान्तः प्रसरदविरल विचित्रपञ्चवाहवाहवाहिनीमहोदधिः । निरतिशयस्वातन्त्र्य-
सीमनि प्रगलभमानः सर्वशक्तिखचित एक एव अस्ति संविदात्मा महेश्वरः ॥६
उसकी शक्तियों का स्वरूप निम्नानुसार है—
(१) 'चिच्छक्तिः'—तस्य प्रकाशरूपता चिच्छक्तिः ।
(२) 'आनन्द शक्तिः'—स्वातन्त्र्यम् आनन्दशक्तिः ।
(३) 'इच्छा शक्तिः'—तच्चमत्कारः इच्छाशक्तिः ।
(४) 'ज्ञान शक्तिः'—आमर्शात्मकता ज्ञानशक्तिः ।
(५) 'क्रिया शक्तिः'—सर्वाकारयोगित्वं क्रियाशक्ति ॥७
'उत्पादयति पाति संहरति'—अर्थात् “शिव जगत् की सृष्टि करते हैं, उसकी
रक्षा करते हैं और उसका संहार करते हैं ।” शिव को इन कार्यों से विशिष्ट क्यों
दिखाया गया है?
'शान्त ब्रह्मवाद' एवं 'ईश्वराद्वयवाद'—त्रिकदर्शन के आचार्यों ने निर्विशेष,
निष्क्रिय एवं निर्गुण ब्रह्म को 'शान्तब्रह्म' कहा है तथा उसको परासत्ता से प्रतिपादित


१. स्वच्छन्दतन्त्र (१ पटल) २-५. प्रत्यभिज्ञाहृदयम्
६. जन्म-मरण विचार
७. पाँच शक्तियाँ ही नहीं हैं प्रत्युत् अनन्त शक्तियाँ हैं तथापि पाँच शक्तियाँ प्रमुख
हैं—'इत्थं सर्वशक्तियोगेऽपि आभिर्मुख्याभिः शक्तिभीरुपचर्यते ।।
—'जन्म-मरण विचार'

प्रथमोऽंशः २५
करनेवाले आचार्य शङ्कर एवं उनके केवलाद्वैतवादी अनुयायियों को शान्तब्रह्मवादी
कहा है । सांख्यानुयायी भी शान्तब्रह्मवादी कहे गए हैं—‘शान्तब्रह्म- वादिभिः सांख्यैः
पुरुषस्य परमात्मनोऽधिष्ठेयं कर्मानुरूपं सुखदुःखभोक्तृतया व्यपदिश्यते’ १ चूँकि आचार्य
भास्करराय शान्त ब्रह्मवादी नहीं हैं और उनका परमशिव शङ्कराचार्य के निर्गुण ब्रह्म
की भाँति निष्क्रिय एवं निर्गुण नहीं है अतः अपने मत को शाङ्कर मत से पृथक्
रूप में प्रतिपादित करने के लिए ही उन्होंने शिव की सक्रियता का भी उल्लेख
किया है ।
‘ईश्वराद्वयवाद’ में शिव पञ्चकृत्यकारी है—जबकि शान्तब्रह्मवाद का निर्गुण
ब्रह्म निष्क्रिय है ।
| ‘शान्तब्रह्मवाद’ २ | ‘ईश्वराद्वयवाद’ |
| १. ब्रह्म निर्गुण, निराकार एवं निष्क्रिय | १. शिव पञ्चकृत्यकारी है । |
| है । | |
| २. विश्व मिथ्या है । | २. विश्व सत्य है, शिवस्वरूप है । |
| ३. माया शक्ति मिथ्या एवं | ३. शक्ति सत्य है और चिदात्मक है । |
| अनिर्वचनीय है । | |
| ४. आत्मा जीवदशा में भी निष्क्रिय है | ४. शिव अपनी सकल या जीव दशा |
| और औपचारिक कर्तृत्व या सुख | में भी पञ्चकृत्यकारी है । |
| दुःखादिभौक्तृत्व से युक्त है | |
| ५. अज्ञान या माया आकस्मिक नहीं है | ५. माया एवं अज्ञान अध्यास एवं |
| प्रत्युत् आत्मा का स्वातंत्र्यमूलक, | अध्यारोपजन्य भ्रान्ति है तथा |
| स्वेच्छा परिगृहीत रूप है यथा नट | आत्मा का आवरक होने से उसका |
| द्वारा अभिनय के समय स्वेच्छा- | विरोधी है । |
| गृहीत रूप । शिव अपने स्वरूप | |
| को आच्छादित एवं अनाच्छादित | |
| करने में स्वतन्त्र हैं । ‘प्रज्ञान’ शिव | |
| की स्वातंत्र्यशक्ति का विजृंभणमात्र | |
| है । प्रज्ञान आत्मा की शक्ति है । | |
| ६. आत्मा कर्तृत्वपूर्ण नित्य पञ्चकृत्य- | ६. आत्मा में कर्तृत्व नहीं है । |
| कारी है । इसका स्वभाव ही विमर्श | |
| है । उसके लिए ज्ञान एवं क्रिया | |
| एक से हैं । उसकी क्रिया ही ज्ञान | |
| है और उसका ज्ञान ही क्रिया है । | |
| ज्ञान-क्रिया की उन्मुखता ही ‘इच्छा’ | |
| है । | |
१. भोजराज—‘योगसूत्रवृत्ति’
२. ‘परमार्थचर्चाविवरण’ (पृ०६) अभिनवगुप्तपाद—‘तन्त्रालोक’

२६ | वरिवस्यारहस्ये
७. परमशिव इच्छामय है क्योंकि ज्ञान- | ७. ब्रह्म इच्छाविहीन एवं निरीह है।
क्रिया का औन्मुख्य ही इच्छा है। |
पञ्चकृत्य उसका स्वभाव है। |
८. दो का नित्य सामरस्य ही वास्तविक | ८. द्वैत अज्ञान है । अद्वैत द्वैताभाव
अद्वैत है । अद्वैत द्वैताभाव का | का वाचक है ।
वाचक नहीं है । |
९. शिव स्वयं का आवरक एवं स्वयं | ९. विक्षेप एवं आवरण शक्तियाँ ही
का उन्मीलक है । उसने लीला हेतु | जीव में उसकी इच्छा के विरुद्ध
आत्मप्रच्छादन कर रखा है । | अज्ञान एवं भ्रान्ति उत्पन्न करती हैं।
आच्छादन उसकी विवशता नहीं |
उसकी क्रीड़ा या लीला है । |
१०. ब्रह्म भी सत्य है और जगत् भी | १०. ‘ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या' ।
सत्य है । जीव और जगत् दोनों |
सत्य हैं । |
११. भेद-अभेद का ही आत्मप्रकाश है | ११. भेद मिथ्या है ।
अतः मिथ्या हो ही नहीं सकता । |
१२. शिव एवं शक्ति दोनो तत्वतः एक | १२. ब्रह्म एवं माया भिन्न-भिन्न हैं ।
ही हैं । दोनों में अभिन्नता है । |
१३. भेद एवं अभेद में, व्युत्थान एवं | १३. जब तक भेद है, द्वैत है, बंधन
निरोध में बन्धन एवं मुक्ति में, सुख | है, माया है, तब तक मुक्ति कहाँ?
एवं दुःख में, ब्रह्म एवं माया में |
द्वैत एवं अद्वैत में, तथा भेद एवं |
अभेद के भीतर सम्यग्दर्शन होने |
पर चिदानन्द की (शिवशक्ति के |
सामरस्य की) प्राप्ति होती है । |
१४. ब्रह्म, जीव एवं जगत् सभी चिन्मय | १४. ब्रह्म एवं जीव चिन्मय है जबकि
हैं । जगत् जब चैतन्य की सृष्टि है | जगत् जड़ है और जड़ वस्तु
तब अचैतन्य आयेगा कहाँ से ? | अचित् है अतः अनात्मक है ।
सर्वचिन्मयवाद ही सत्य है । जड़ता |
भी चैतन्य का एक रूप है, चैतन्य |
से पृथक् नहीं है अतः आत्मा का |
ही अवभास है । |
१५. ‘अद्वैत' द्वय का नित्य सामरस्य है। | १५. ‘अद्वैत' द्वय का अभाव है
१६. यह वसुगुप्त, उत्पल, सोमानन्द, | १६. यह शङ्कराचार्य द्वारा प्रतिपादित
अभिनवगुप्त एवं क्षेमराज आदि द्वारा | अद्वैत दर्शन है ।
प्रतिपादित द्वयात्मक अद्वयवाद का |
दर्शन है । |

प्रथमोऽंशः २७
१७. जगत् शक्ति का आत्मस्फार है, यह
शिव का विजृंभण है, शिव की
आनन्दक्रीड़ा है, परमशिव स्वनिर्मित
चित्र है, शिव के आनन्दस्वभाव का
विकास है, परमशिव निर्मित एक
लीला-नाट्य है, शक्ति का व्यक्त
रूप है, आत्मा है अतः शिव और
शक्ति से अभिन्न है, भगवान् का
शरीर है, चिद्विलास एवं शिवात्मक
है, प्रकाश एवं प्रकाश की लीला
है, शिव की एक क्रीड़ा है,
सत्यात्मक है, शक्ति द्वारा स्वनिष्ठ
स्फुरत्ता का दर्शन है, चिच्छक्ति का
परिणाम है, शक्ति का आकार है,
शक्ति का आत्मविकास है,
स्वातंत्र्यशक्ति की आत्मक्रीड़ा है,
शिव का हृदय बीज है, प्रकाश के
साथ एकात्मरूप है, शिवशक्तिरूप
है, चैतन्यस्वभाव है—(‘चैतन्यं
विश्वस्य स्वभावः शिवसूत्र
विमर्शिनी’) एक चित्र है—आत्म
प्रच्छादन की क्रीड़ा है । (‘जगच्चित्रं
समालिख्य स्वेच्छातूलिकयात्मनि ।
स्वयमेव समालोक्य प्रीणाति भगवान्
शिवः’, ‘जगच्चित्रं नमस्तस्मै कला-
श्लाध्याय शूलिने’, ‘आत्मप्रच्छादन-
क्रीड़ां कुर्वतो वा कथंचन’
(शिवदृष्टि)
१८. जगत् आनन्दरूप है । ‘सर्वं जगत्
स्वदेहं वा स्वानन्दभरितं स्मरेत् ।।’
(वि०भै०)
१७. ‘जगत’ मिथ्यात्व का दूसरा पर्याय
है ।
१८. जगत् दुःखरूप है ।
सावश्यं विज्ञेया यत्परिणामादभूदेषा ।
अर्थमयी शब्दमयी चक्रमयी देहमय्यापि च सृष्टिः१ ॥ ५ ॥
१. ‘सृष्टि’ का स्वरूप क्या है? ‘तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय’, ‘एकोऽहं बहुस्याम्’—
एक से बहुत होने की कामना ही सृष्टि है ।

२८ वरिवस्यारहस्ये
('परिणामवाद' एवं चतुर्विधा सृष्टि)
उस 'विमर्शरूपिणी' शक्ति को सम्यक रूप से (एवं) अवश्य जानना चाहिए
जिसके परिणामस्वरूप (यह) अर्थमयी, शब्दमयी, चक्रमयी एवं देहमयी सृष्टि (हुई)
है ॥ ५ ॥

  • प्रकाश *
    अवश्यम्, सर्वविज्ञानसाधनत्वान्मोक्षादिपुरुषार्थप्रदत्वाच्च । अर्थमयी शिवादि-
    क्षित्यन्तषट्त्रिंशत्तत्त्वरूपा । शब्दमयी परादिवैखर्यन्ता । चक्रमयी बिन्द्वादिभूगृहान्ता ।
    देहमयी सूक्ष्मादिस्थूलान्ता ॥ ५ ॥
  • सरोजिनी *
    आचार्य भास्कर कहते हैं कि—विमर्शरूपिणी शक्ति को इसलिए अवश्यमेव
    जानना चाहिए क्योंकि वह समस्त विज्ञानों का साधन है एवं धर्म, अर्थ, काम एवं
    मोक्ष प्रदान करती है—'अवश्यम्, सर्वविज्ञान साधनत्वान्मोक्षादिपुरुषार्थप्रदत्वाच्च ।।'
    अर्थमयी—शिवादि क्षित्यन्तषट्त्रिंशत तत्त्वरूपा । अर्थात् समस्ततत्त्वमय ।
    'परशुराम कल्पसूत्र' में कहा गया है कि तत्त्व छत्तीस हैं—'षट्त्रिंशत्तत्वानिविश्व' ।
    ये तत्त्व तीन भागों में विभक्त है—(१) 'आत्मतत्त्व' (२) 'विद्यातत्त्व' (३) एवं
    'शिवतत्त्व' । ये ३६ तत्त्व निम्न हैं—(१) शिव (२) शक्ति (३) सदाशिव (४)
    ईश्वर (५) शुद्धविद्या (६) माया (७) अविद्या (८) कला (९) राग (१०) काल
    (११) नियति (१२) पुरुष/जीव (१३) प्रकृति (१४) मन (१५) बुद्धि (१६)
    अहङ्कार (१७-२१) श्रोत्रादि पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ (२२-२६) वागादि पञ्चकर्मेन्द्रियाँ (२७-
    ३१)—रूपादि पञ्चमहाविषय (३२-३६)—आकाशादिक पञ्चभूत । भगवती समस्त
    विश्व को जन्म देने में स्वतन्त्र हैं ।
    'चितिः स्वतन्त्रा विश्वसिद्धि हेतुः ॥'१ क्षेमराज कहते हैं—'विश्वस्य'
    सदाशिवादेः भूम्यन्तस्य 'सिद्धौ' निष्पत्तौ, प्रकाशने स्थित्यात्मनि, पर प्रमातृ-
    विश्रान्त्यात्मनि च संहारे, पराशक्तिरूपा 'चितिः' एव भगवती 'स्वतन्त्रा' अनुत्तर
    विमर्शमयी शिवभट्टारकाभिन्ना 'हेतु' कारणम् !'
    'ननु जगदपि चितो भिन्नं नैव किंचित् ॥'२
    शब्दमयी—शब्द की चार वृत्तियाँ हैं—(१) 'परा' (२) 'पश्यन्ती' (३)
    'मध्यमा' (४) 'वैखरी' ।। भगवती इन रूपों में भी परिणत होती हैं क्योंकि वे
    शब्दरूपा हैं—वे परा-पश्यन्ती-मध्यमा-वैखरीरूपा हैं—'परा प्रत्यक्चितीरूपा पश्यन्ती
    पर देवता । मध्यमा वैखरीरूपा भक्त मानस हंसिका ॥'३ वेदों में वाक्चतुष्टय का
    उल्लेख है 'चत्वारि वाक् परिमिता पदानि । तानिविदुर्ब्राह्मणो ये मनीषिणः । गुहा
    त्रीणि निहिता नेंगयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति ॥'
    १-२. क्षेमराज—'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' ३. श्रीललितासहस्रनाम

प्रथमोऽंशः २९
'चक्रमयी'—बिन्दु से लेकर भूगृहान्त समस्त चक्र । चक्र नवयोन्यात्मक है—
'नवयोन्यात्मकं चक्रं चिदानन्दघनं महत् । चक्रं नवात्मकमिदं नवधा भिन्न
मन्त्रकम् ।।'१ देवी चक्ररूपा है—'एवंविश्वप्रकारा च चक्ररूपा महेश्वरी ।।'२
त्रैलोक्यमोहन, सर्वशापरिपूरण, सर्वसङ्क्षोभण, सौभाग्यदायक, सर्वार्थसाधक,
सर्वरक्षाकर, सर्वरोगहर एवं सर्वसिद्धिप्रद चक्र ।।
'देहमयी'—(१) स्थूल देह (२) सूक्ष्म देह (३) कारणदेह आदि देह ॥३
'यत्परिणामात्'—जिसके परिणमन से—
परिणामवाद—एक रूप का तिरोभाव और रूपान्तर का आविर्भाव ही
'परिणाम' है । यथा 'दही' दूध का परिणाम या विक्रिया है—'परिणामे तु
रूपान्तरं तिरोभवति, रूपान्तरं च प्रादुर्भवति । 'परिणाम' उपादान के समान सत्ता
वाला होता है ।४
'परिणामवाद' का प्राचीन रूप—भर्तृहरि ने 'वाक्यपदीय' में 'परिणाम' एवं
'विवर्त' दोनों को समानार्थक माना है । वे कहते हैं—'यह 'विश्व' शब्द का ही
परिणाम है ऐसा आम्नाय वेत्ताओं का कथन है, सर्वप्रथम यह जगत् छन्दों से ही
विवृत अथवा परिणत हुआ ।'
'शब्दस्य परिणामोऽयमित्याम्नायविदो विदुः ।
छन्दोभ्य एव प्रथममेतद्विश्वं व्यवर्तत ।।' (वा०प०, प्र०का०)
शान्तरक्षित ने 'तत्त्वसंग्रह' के आगम काण्ड में कहा गया है कि—
'विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः । इस प्रथम कारिका के 'विवर्त' शब्द का
'परिणाम' शब्द के द्वारा ही अनुवाद किया है—'नाशोत्पादसमालीढं ब्रह्म शब्दमयं च
यत् । यत्तस्य परिणामोऽयं भावग्रामः प्रतीयते ॥'
भवभूति को भी, 'परिणाम' एवं 'विवर्त' में कोई भेदक रेखा है—यह ज्ञात
नहीं था इसीलिए उन्होंने दोनों शब्दों को समान अर्थ में व्यवहृत किया है—
'एको रसः करुण एव निमित्तभेदाद्
भिन्न पृथक् पृथगिवाश्रयते विवर्तान् ।
आवर्तबुद्बुदतरङ्गमयान्विकारा
नंभो यथा सलिलमेव हितत्समस्तम् ।।'
'विवर्त' अधिष्ठान से विषम सत्ता रखता है ।
शङ्कराचार्य विवर्तवादी थे कि परिणामवादी?—ब्रह्मसूत्र के भाष्यकार वेदान्ती
शङ्कराचार्य को सभी 'विवर्तवादी' मानते हैं और वे 'विवर्तवादी' के रूप में प्रसिद्ध
भी हैं किन्तु 'सौन्दर्यलहरी' के तांत्रिक स्तोत्र में वे परिणामवाद का समर्थन करते
हैं—
१-२. योगिनीहृदय ३. 'प्रकाश' (भास्करराय)
४. 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा विवृति विमर्शिनी' (पृ० ८, अ० १, वि० १)

३० वरिवस्यारहस्ये
'मनस्त्वं व्योमस्त्वं मरुदसि मरुत्सारथिरसि,
त्वमापस्त्वं भूमिस्त्वयि परिणतायां नहि परम् ।
त्वमेव त्वामात्मानं परिणमयितुं विश्ववपुषा,
चिदानन्दाकारं शिवयुवति भावेन विभृषे ॥ ३५ ॥'
आचार्य शङ्कर 'सौन्दर्यलहरी' के इस श्लोक द्वारा स्वाभीष्ट 'परिणामवाद' की
पुष्टि करते हैं ।१
आचार्य भास्करराय का परिणामवाद—योगिराज भास्करराय सृष्टि के सन्दर्भ
में 'परिणामवाद' के प्रतिपादक हैं । किन्तु यह 'परिणाम' सामान्य परिणाम से भिन्न
है । जिस प्रकार मिट्टी एवं उसके परिणाम रूप घट में कोई भेद नहीं हैं उसी
प्रकार ब्रह्म एवं जगत् में कोई भिन्न नहीं है । ब्रह्म सत्य है तो जगत् भी सत्य है।
भेद मात्र ही मिथ्या है—वस्तुतस्तु जगतो ब्रह्मपरिणामकत्वं स्वीकुर्वतां तांत्रिकाणां मते
जगतः सत्यत्वमेव मृद्घटयोरिव ब्रह्मजगतोरत्यन्तभेदेन ब्रह्मणः सत्यत्वेन जगतोऽपि
सत्यत्वावश्यम्भावात् भेदमात्रस्य मिथ्यात्व स्वीकारेण अद्वैतश्रुती नामखिलानां
निर्वाहः ।'२
आचार्य भास्करराय ने 'वाचारंभणंविकारः'—(छा०उ०) 'आत्मकृतेः परिणामात्'
(ब्रह्मसूत्र) को उद्धृत करके 'वरिवस्यारहस्यम्' में परिणामवाद की पुष्टि ही नहीं की
प्रत्युत यह भी कहा कि वेदों की एवं ब्रह्मसूत्रकार की भी यही दृष्टि थी ।
'श्रीकण्ठभाष्य' में भी परिणामवाद का समर्थन किया गया है—
'कारणविकाररूपोहि परिणाम पूर्वरूपपरित्यागेन रूपात्तरापत्तिः परिणामः ॥'
वल्लभाचार्य ने 'परिणामवादएवाभिप्रेतः'३ कहकर, निम्बार्काचार्य ने 'सर्वज्ञं
सर्वशक्ति ब्रह्म स्वशक्तिविक्षेपेण जगदाकारं स्वात्मानं परिणामय्य अव्या कृतेन स्वरूपेण
शक्तिमता कृतिमत्ता परिणतमेव भवति ।'४ भास्कराचार्य ने 'परमात्मा स्वयमात्मानं
कार्यत्वेन परिणामयामासेत्यर्थः ।'५ कहकर एवं श्रीपति पण्डित ने 'चेतना चेतनात्मक
प्रपञ्चाकारेण परिणामात् । ननुदधि-क्षीर न्यायवत् स्वस्वरूप परित्यागपूर्वक रूपान्तर
प्राप्तिरेव परिणामः ।'६ कहकर 'परिणामवाद' का प्रतिपादन किया है ।
किन्तु यह 'परिणामवाद' रामानुजाचार्य (श्रीभाष्य में) के परिणामवाद से भिन्न
है ।
१. लक्ष्मीधर—'लक्ष्मीधरा' व्याख्या—"परिणमयितुं परिणाम वन्तं कर्तुं"
'डिण्डिमभाष्य'—"तदाकार परिणामनम् । त्वमेवाष्टमर्तिरूपेण परिणतासि'
'अष्टमूर्तिरूपेण परिणतायाम्', 'आभ्यां परिणामाभ्यामेव जगच्चक्रं उन्मूलयति' ।
'गोपालसुन्दरी टीका'—'परिणमयितुं परिणामं प्रापयितुं ।
२. 'सौभाग्यभास्करः' (पृ० १५१) ३. अणुभाष्य
४. 'वेदान्त पारिजात' (१।४।६) ५. भास्कराचार्य
६. श्रीपतिपण्डित 'श्रीकरभाष्य'

प्रथमोऽंशः ३१
उपर्युक्त परिणामवाद ‘अविकृत परिणामवाद’ है। ‘अपूर्व परिणामवाद’ है। जो
ब्रह्म अभिन्ननिमित्तोपादान कारण है वह विश्वरूप में परिणत होने पर भी विकृत नहीं
होता।
‘वामकेश्वर तन्त्र’ में ‘तस्यां परिणतायां तु न कश्चित्पर इष्यते’१ ‘तस्य दृश्यं
तत्परिणम एवं, तस्यां परिणतायां’२ वाक्यों द्वारा ‘परिणामवाद’ ही तो उसका अभीष्ट
प्रतीत होता है। यद्यपि इन वाक्यों में आए ‘परिणतायां’ का अर्थ जयरथ ने
‘विद्यमानायां’ किया है किन्तु तन्त्राचार्य भास्करराय ने इसका वास्तविक अर्थ
‘परिणत होने पर’ ही किया है। ‘चतुश्शती’ में भी इसी दृष्टि को प्रतिपादित किया
गया है—
‘त्रिपुरा परमाशक्तिराद्यजाता महेश्वरी।
स्थूलसूक्ष्मस्वभावेन त्रैलोक्योत्पत्तिमातृका॥
कवलीकृत निःशेष तत्त्वग्रामस्वरूपिणी।
यस्यां परिणतायान्तु न किञ्चित्परमिष्यते॥’
‘परिणामवाद’ में त्रुटि यह है कि ‘परिणाम’ में रूपान्तर का आविर्भाव एवं
पदार्थ के पूर्व रूप का तिरोभाव हो जाता है। ‘परमशिव’ प्रकाश है। प्रकाश के
रूपान्तर का अभाव संभव नहीं है क्योंकि तब तो (तिरोधान की स्थिति में)
अंधकार छा जाएगा। ऐसी स्थिति में ‘अप्रकाश’ प्रकाश में कैसे आएगा? इस
प्रकार ‘विवर्त’ एवं ‘परिणाम’ दोनों ही स्थितियों में जगत् के प्रकाश में आने की
व्याख्या संभव नहीं है—‘परिणामे तु रूपान्तरं तिरोभवति। रूपान्तर च प्रादुर्भवति।
प्रकाशस्य तु रूपान्तर भावात् तत्तिरोधाने स्यादान्ध्यम्। अप्रकाशश्च प्रादुर्भवन् नैव
प्रकाशेत् इति उभयथापि सुप्तं जगत् स्यात्॥’३
इसी प्रकार ‘प्रतिबिम्बवाद’ भी सदोष है क्योंकि—‘प्रतिबिम्ब’ में संवेदन की
स्वच्छता मात्र होती है—प्रतिबिम्ब में स्वातन्त्र्य नहीं है—
प्रकाशविमर्शात्मा संवित्स्वभाव परमशिव स्वातन्त्र्य द्वारा रुद्र से स्थावर पर्यन्त,
प्रमातृरूप में, नील सुखादि प्रमेय रूप में, अनतिरिक्त होते हुए भी अतिरिक्त की
भाँति एवं स्वरूप को अनावृत किए हुए भी संवित् रूप में, अपनी स्वातन्त्र्य शक्ति
की महिमा से प्रकाशित होता है।४
भास्करराय की दृष्टि में शङ्कराचार्य—भास्करराय मखिन की दृष्टि में
शङ्कराचार्य परिणामवादी थे। वे कहते हैं कि ‘मनस्त्वं व्योमस्त्वम्’ इति श्लोके
‘त्वयिपरिणतायाम्’ इति स्वाभिमतः ‘परिणामवाद’ एव स्फुटीकृतः॥५ ‘विवर्तवाद’
वेदान्ति संमतं परिणामवादी तांत्रिको दूषयति’ ‘परिणामवाद एवाभिप्रेतः’६ ‘श्रुतेरपि
१-२. वामकेश्वर तन्त्र,
३-४. ‘ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृति विमर्शिनी’ (अ. १; २०, वि. १, पृ. ८९)
५. वरिवस्यारहस्य—‘प्रकाश’ टीका (१।३) ६. तत्रैव

३२ वरिवस्यारहस्ये
परिणामवाद एव संमतः सिध्यति 'आत्मकृतेः परिणामात्'
अर्थमयी—जगत् 'विमर्श शक्ति' का परिणाम है । 'विमर्श शक्ति' शब्द अर्थ,
चक्र एवं देह के रूप में परिणत होकर जगत् बन जाती है । विमर्श 'विश्वरूपिणी'
है—
'यदा सा परमा शक्तिः स्वेच्छया विश्वरूपिणी ॥'१
"सैव परा शक्तिर्विमर्शरूपिणी स्वेच्छया विश्वरूपिणी विश्वं सृजति ॥"२
'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' में कहा गया है कि शक्ति अपने अन्तःस्थित विश्व को ही
प्रकट करती है—'अन्तःस्थितवतामेव घटते बहिरात्मना ।'
अभिनवगुप्त भी कहते हैं—'यस्यामन्तर्विश्वमेतद्विभाति बाह्याभासं भासमानं
विसृष्टौ' विश्व परासत्ता से पृथक् कोई अन्य स्वतन्त्र सत्ता नहीं है—'इदं... विश्वं वा
परस्यां पारमेश्वर्यां भैरवसंविदि अविभागेन बोधात्मकेन रूपेणास्ते ॥' 'चितिः स्वतन्त्रा
विश्वसिद्धि हेतुः ॥' (प्र०ह०) कहकर क्षेमराज ने भी जगत् को चितिशक्ति से
अभिन्न स्वीकार किया है क्योंकि वह स्वेच्छापूर्वक स्वभित्ति पर विश्व का उन्मीलन
करती है—
'स्वेच्छया स्वभित्तौ विश्वमुन्मीलयति । (प्र०ह०२)
(१) 'जगतः प्रकाशैकात्म्येन अवस्थानम् ।'३
(२) ननुं जगदपि चितो भिन्नं नैव किंचित् ॥४
(३) चिदेव भगवती स्वच्छस्वतन्त्ररूपा तत्तदनन्त जगदात्मना स्फुरति ।५
(४) परमानन्दमयप्रकाशैकघनस्य एवंविधमेव शिवादिधण्यन्तं अखिलं अभेदेनैव
स्फुरति । न तु वस्तुतः अन्यत किंचित् ग्राह्यं ग्राहकं वा । श्रीपरमशिव-
भट्टारक एव इत्थं नानावैचित्र्यसहस्रैः स्फुरति ।६
(५) श्रीपरमशिवः स्वात्मैक्येन स्थितं विश्वं ।
(६) विश्वशरीर शिवैकरूप एव । 'विश्वशरीरः शिवभट्टारक एव ॥ 'न साऽवस्था
न यः शिवः ॥'७
(७) शरीरमेव घटाद्यपि वा ये षट्त्रिंशत्तत्त्वमयं शिवरूपतां पश्यन्ति ॥८

१. योगिनीहृदय २. दीपिका
३-७. प्र० ह०
८. एक 'मायाण्ड' में असंख्य प्रकृत्यण्ड हैं । एक एक प्रकृत्यण्ड में असंख्य
'ब्रह्माण्ड' हैं । 'मायाण्ड'—पुरुष से षट्कंचुक पर्यन्त तत्त्वों द्वारा निर्मित है ।
'शाक्ताण्ड' माया से ऊपर है । यह ज्योतिर्मय एवं शुद्ध सत्वात्मक हैं ।
इसका उपादान शुद्धविद्या, ईश्वर एवं सदाशिव हैं ।

प्रथमोऽंशः ३३
—वाक्यों द्वारा आचार्य क्षेमराज ने 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' में यह प्रतिपादित किया
है कि सारे अर्थ, समस्त अर्थमयी सृष्टि, समस्त विश्व एवं समस्त तत्त्व (३६
तत्त्व) भगवती चिति या विमर्श शक्ति के ही अपने परिणाम या रूपान्तर हैं ।
पृथिवी से शक्तितत्त्वपर्यन्त यह समस्त सृष्टि पाँच अण्डों में विभक्त है जो
निम्नांकित हैं—(१) पिण्ड (२) ब्रह्माण्ड (३) प्रकृत्यण्ड (४) मायाण्ड (५)
शाक्ताण्ड
ये पाँचों अण्ड 'विश्व' हैं । शिव तत्त्व 'विश्वातीत' एवं शून्य है ।
(i) 'शाक्ताण्ड' में शान्तिकला है । इसके अधिष्ठाता सदाशिव हैं ।
(ii) 'मायाण्ड' में विद्या कला है । इसके अधिष्ठाता रुद्र हैं ।
(iii) 'प्रकृत्यण्ड' में प्रतिष्ठा कला है । इसके अधिष्ठाता विष्णु हैं ।
(iv) 'ब्रह्माण्ड' में निवृत्ति कला है । इसके अधिष्ठाता ब्रह्मा हैं ।
[चित्र-विवरण:]
शान्त्यतीत कला } विश्वातीत
विश्व ↓
शाक्ताण्ड (अधिष्ठाता : सदाशिव) — शान्ति कला
मायाण्ड (अधिष्ठाता : रुद्र) — विद्या कला
प्रकृत्यण्ड (अधिष्ठाता : विष्णु) — प्रतिष्ठा कला
ब्रह्माण्ड (अधिष्ठाता : ब्रह्मा) — निवृत्ति कला
[मण्डल चक्र के अन्तर्गत:]
बाह्य वृत्त: विश्वातीत — शिव तत्त्व
द्वितीय वृत्त: सदाशिव, ईश्वर, सद्विद्या, शुद्धविद्या
तृतीय वृत्त: विद्या कला
चतुर्थ वृत्त: प्रतिष्ठा कला
केन्द्र: १४ भुवन, ब्रह्माण्ड, ब्रह्मा
अधोभाग: रुद्र मायाण्ड, विष्णु प्रकृत्यण्ड
ब्रह्माण्ड में
१. ७ ऊर्ध्वलोक (भूलोक से सत्यलोक)
२. ७ अधोलोक (तल, वितल, सुतल,
तलातल, पाताल आदि ७ लोक)
३ वरि.