वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽंशः २७
१७. जगत् शक्ति का आत्मस्फार है, यह
शिव का विजृंभण है, शिव की
आनन्दक्रीड़ा है, परमशिव स्वनिर्मित
चित्र है, शिव के आनन्दस्वभाव का
विकास है, परमशिव निर्मित एक
लीला-नाट्य है, शक्ति का व्यक्त
रूप है, आत्मा है अतः शिव और
शक्ति से अभिन्न है, भगवान् का
शरीर है, चिद्विलास एवं शिवात्मक
है, प्रकाश एवं प्रकाश की लीला
है, शिव की एक क्रीड़ा है,
सत्यात्मक है, शक्ति द्वारा स्वनिष्ठ
स्फुरत्ता का दर्शन है, चिच्छक्ति का
परिणाम है, शक्ति का आकार है,
शक्ति का आत्मविकास है,
स्वातंत्र्यशक्ति की आत्मक्रीड़ा है,
शिव का हृदय बीज है, प्रकाश के
साथ एकात्मरूप है, शिवशक्तिरूप
है, चैतन्यस्वभाव है—(‘चैतन्यं
विश्वस्य स्वभावः शिवसूत्र
विमर्शिनी’) एक चित्र है—आत्म
प्रच्छादन की क्रीड़ा है । (‘जगच्चित्रं
समालिख्य स्वेच्छातूलिकयात्मनि ।
स्वयमेव समालोक्य प्रीणाति भगवान्
शिवः’, ‘जगच्चित्रं नमस्तस्मै कला-
श्लाध्याय शूलिने’, ‘आत्मप्रच्छादन-
क्रीड़ां कुर्वतो वा कथंचन’
(शिवदृष्टि)
१८. जगत् आनन्दरूप है । ‘सर्वं जगत्
स्वदेहं वा स्वानन्दभरितं स्मरेत् ।।’
(वि०भै०)
१७. ‘जगत’ मिथ्यात्व का दूसरा पर्याय
है ।
१८. जगत् दुःखरूप है ।
सावश्यं विज्ञेया यत्परिणामादभूदेषा ।
अर्थमयी शब्दमयी चक्रमयी देहमय्यापि च सृष्टिः१ ॥ ५ ॥
१. ‘सृष्टि’ का स्वरूप क्या है? ‘तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय’, ‘एकोऽहं बहुस्याम्’—
एक से बहुत होने की कामना ही सृष्टि है ।