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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

३४ वरिवस्यारहस्ये
(v) शिव तत्त्व में शान्त्यतीत कला है ।
(vi) परमशिव निष्फल परमपद है । यह विश्वात्मक एवं विश्वातीक दोनों है ।
अर्थमयी—शिवादिक्षित्यन्तषट्त्रिंशत्तत्त्वरूपा ॥ सृष्टि मुख्यतः द्विरूपा है । (१)
शब्दमयी (२) अर्थमयी । यह अर्थमयी सृष्टि त्रिस्तरीया है—
(१) अभेद भूमि—परमशिव = 'अहमस्मि'
(२) भेदाभेदभूमि—शिव, शक्ति से शुद्धविद्याः = 'अहमिदम्' ।
(३) 'भेदभूमि' = माया से पृथ्वी = 'इदमहम्' । इस त्रिस्तरीय सृष्टि को—
(१) ऐं = 'आत्म तत्त्व' (२) ह्रीं = 'विद्या तत्त्व' (३) क्लीं = 'शिव तत्त्व' के
रूप में भी निरूपित किया गया है ।
(क) शिव तत्त्व = (१) शिवतत्त्व, (२) शक्तितत्त्व ।
(ख) विद्या तत्त्व = (३) सदाशिव, (४) ईश्वर, (५) शुद्ध विद्या
(ग) आत्म तत्त्व = (६) माया, (७) कला, (८) विद्या, (९) राग, (१०)
काल, (११) नियति, (१२) पुरुष, (१३) प्रकृति, (१४) बुद्धि, (१५) अहङ्कार,
(१६) मन, (१७-२१) श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा, घ्राण (पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ)
(२२-२६) वाक्, पाणि, पाद, पाय, उपस्थ (पञ्च कर्मेन्द्रियाँ); (२२-३१) शब्द,
स्पर्श, रूप, रस, गन्ध (पञ्च विषय), (३२-३६) आकाश, वायु, वह्नि, सलिल,
भूमि (पञ्चभूत) ॥
परमेश्वर के हृदय में सिसृक्षा के उदय होते ही उसके दो रूप हो जाते हैं—
(१) शिवरूप .(२) शक्तिरूप । 'शिव' = प्रकाशरूप । 'शक्ति' = विमर्शरूप ।
विमर्श = पूर्ण अकृत्रिम अहं की स्फूर्ति । यह स्फूर्ति—
(१) सृष्टिकाल में विश्वाकार रूप में
(२) स्थिति काल में—विश्वप्रकाश रूप में
(३) संहारकाल में—विश्वसंहरण के रूप में प्रस्तुत होती है । इसी विमर्श
शक्ति के ही नामान्तर हैं—स्फुरत्ता, स्पन्द, महासत्ता, परावाक् आदि ।
प्रमा के दो रूप हैं—(क) अहमंश = ग्राहक शिव (ख) इदमंश = ग्राह्य
शक्ति । शिवतत्त्व में—अहं विमर्श, सदाशिवतत्त्व में अहमिदं विमर्श एवं ईश्वरतत्त्व
में इदमिदं विमर्श होता है । सद्विद्या में—अहं एवं इदं दोनों की समभावेन प्रधानता
रहती है । मायाशक्ति'→अहं एवं इदं में पार्थक्य→अहमंश हो जाता है—'पुरुष' ।
इदमंश हो जाता है—'प्रकृति' ।
'परशुरामकल्पसूत्र' में कहा गया है—'षट्त्रिंशत्तत्वानिविश्व' यह समस्त जगत्
षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मक है । इसका स्वरूप निम्नानुसार है—

प्रथमोऽंशः ३५
┌──────────┐
│ परा संवित् │
└──────────┘
[ शिवतत्त्व ]
शिवतत्त्व | शक्तितत्त्व
( उन्मनी शक्ति ) | ( समनी शक्ति )
[ विद्यातत्त्व ] [ शुद्ध तत्त्व ]
अहं — (अहं इदं) — इदं
मन्त्र महेश्वर | सादाख्य तत्त्व ( नादशक्ति )
अहं — (अहं इदं) — इदं (ईश्वर तत्त्व)
मन्त्रेश्वर | ( बिन्दुशक्ति )
सद्विद्या से नीचे एवं
माया
से ऊपर विज्ञानाकल : (अहं इदं) सद्विद्यातत्त्व
मन्त्र और ८ विद्येश्वर
[ आत्मतत्त्व ] [ शुद्धाशुद्ध तत्त्व ]
माया में प्रलयाकल
पुरुष | प्रकृति
ब्रह्मा से सब (अहं) (इदं)
बद्ध जीवों =
सकल
[ अशुद्धतत्त्व ]
बुद्धि से
पृथ्वी तत्त्व
पर्यन्त
इ द म ह म्
अ ह मि द म्
अहमस्मि ← ┌───────────┐
(पूर्णाहन्ता) │ मूल तात्विक │
│ सृष्टिस्तर │
└───────────┘

३६ वरिवस्यारहस्ये
अर्थमयी सृष्टि अर्थमयी है । ३६ तत्त्व ही मूल अर्थ हैं और समस्त जगत्
इन्हीं अर्थों का विकसित एवं विराट् रूप है ।
३६ तत्त्व निम्नांकित है—

वर्गकलातत्त्वभुवन संख्याभुवनों के नाम
(अ) शुद्ध तत्त्व१. शान्त्यतीता कला(क) शुद्धतत्त्व<br>१. शिव१०अनाश्रित, अनाथ, अनन्त, व्योम-रूपिणी, व्यापिनी, ऊर्ध्वगामिनी, मोचिका, रोचिका, दीपिका, इन्धिका । (इनमें ५ शाक्त भुवन हैं । ५ नादोर्ध्व भुवन हैं ।)
२. शक्ति०५शान्त्यतीता, शान्ति, विद्या, प्रतिष्ठा, निवृत्ति । ये बैन्दवपुर कहलाते हैं ।
१५
२. शान्ति कलाशुद्ध तत्त्व<br>३. सदाशिव तत्त्व०१सदाशिव भुवन ।
४. ईश्वरतत्त्व०८शिखण्डी, श्रीकण्ठ, त्रिमूर्ति, एक नेत्र, एक रुद्र, शिवोत्तम, सूक्ष्म, अनन्त ॥
५. शुद्ध विद्यातत्त्व०९मनोन्मनी, सर्वभूतदमनी, बल-प्रमथिनी, बलविकरणी, कल-विकरणी, काली, रौद्री, ज्येष्ठा, वामा ॥
१८
(आ) शुद्धाशुद्ध तत्त्व३. विद्या कला(ख) शुद्धाशुद्ध तत्त्व<br>६. माया०८अङ्गुष्ठ मात्र, ईशान, एकेक्षण, एक पिङ्गल, उद्भव, भव, वामदेव, महाधुति ।
७. काल०२शिखेश, एकवीर ।
८. कला०२पञ्चान्तक, शूर ।
९. विद्या०२पिङ्ग, ज्योति ।
१०. नियति०२संवर्त, क्रोध ।
११. राग०५एकशिव, अनन्त, अज, उमापति, प्रचण्ड ।

प्रथमोऽंशः ३७
१२. पुरुष ०६ एकवीर, ईशान, भव, ईश, उग्र, भीम, वामा ।
२७
(इ) अशुद्ध तत्त्व ४. प्रतिष्ठा कला (ग) अशुद्ध तत्त्व १३. प्रकृति ०८ श्रीकण्ठ, औम, कौमार, वैष्णव, ब्रह्म, भैरव, कृत, अकृत ।
१४. बुद्धि ०८ ब्राह्म, प्रजेश, सौम्य, ऐन्द्र, गंधर्व, यक्ष, राक्षस, पिशाच ।
१५. अहङ्कार ०१ स्थलेश्वर एक भुवन है ।
१६. मन ०१ स्थूलेश्वर एक भुवन है ।
१७. श्रोत्र
१८. त्वक
१९. चक्षु
२०. जिह्वा
२१. नासा
२२. वाक ०१ शङ्कुकर्ण एक भुवन है ।
२३. पर्णि
२४. पाद
२५. पायु
२६. उपस्थ
२७. शब्द ०५ कालञ्जर, मण्डलेश्वर, माकोट, द्राविड, छगलान्ड—५ भुवन ।
२८. स्पर्श
२९. रूप
३०. रस
३१. गंध
३२. आकाश ०८ स्थाणु, स्वर्णाक्ष, भद्रकर्ण, गोकर्ण, महालय, अविमुक्त, रुद्रकोटि, वस्त्रपाद ।
३३. वायु ०८ भीमेश्वर, महेन्द्र, अट्टहास, विमलेश, नल, नाकल, कुरुक्षेत्र, गया ।
३४. तेजस् ०८ भैरव, केदार, महाकाल, मध्यमेश, अम्रातक, जल्पेश, श्रीशैल, हरिश्चन्द्र ।
३५. जल ०८ लकुलीश, पारभूति, डिण्डी, मुण्डी, विधि, पुष्कर, नैमिष, प्रभास, अमरेश ।
५६

३८ वरिवस्यारहस्ये
शब्दमयी—परा-पश्यन्ती-मध्यमा-वैखरी रूपा । भास्करराय के मतानुसार—(१)
शब्दब्रह्मरूप बीज की उच्छूनतावस्था ही 'परावाक' है । (२) शब्दब्रह्मरूप इस बीज
की स्फुटितावस्था 'पश्यन्तीवाक्' है । (३) इस बीज की मुकुलित, अव्यक्त किन्तु
दलद्वयावस्था 'मध्यमा वाक्' है । (४) और इस बीज की सम्यक् विकसितावस्था
'वैखरीवाक्' है । “तत्र शब्दब्रह्मरूपस्य बीजस्योच्छूनतावस्था 'परा' स्फुटितावस्था
'पश्यन्ती', मुकुलिताव्यक्तं दलद्वयं 'मध्यमा' । सम्यग् विकासेन प्रसृतं मिथः
संसृष्टमूल दलद्वयं 'वैखरी' ।।”१
आचार्य शङ्कर कहते हैं कि विचिकीर्षु घनीभूता चित् शक्ति 'बिन्दु' बन जाती
है—'विचिकीर्षुर्घनीभूता सा चिदभ्येति बिन्दुताम् ।।२
बिन्दु—कारणबिन्दु→कार्यबिन्दु→नाद→बीज । (यही त्रिक क्रमशः 'पर'
'सूक्ष्म' एवं 'स्थूल' कहा जाता है । 'कारणबिन्दु' 'कर्मबिन्दु' 'नाद' एवं 'बीज' के
अधिदेवता अव्यक्त, ईश्वर, हिरण्यगर्भ एवं विराट, शान्ता, वामा, ज्येष्ठा, रौद्री,
अम्बिका, इच्छा, ज्ञान एवं क्रिया है । निम्न पीठ ही अधिभूत है—'कामरूप'
'पूर्णगिरि', 'जालन्धर' एवं उड्डयाण पीठ । 'कारणबिन्दु'—त्रिकोत्पत्ति द्वारा
भेदात्मकता का उदय→अव्यक्त शब्दब्रह्मात्मक 'ख'→'बिन्दोस्तस्माद भिद्यमानाद्-
व्यक्तात्मा रवोऽभवत् । स रवः श्रुतिसम्पन्नैः शब्दब्रह्मेति गीयते ।।'३ 'रव' =
'कारण-बिन्दु' । 'कारणबिन्दु' से तादात्म्यापन्न 'ख' मूलाधार में व्यक्त—'देहेऽपि
मूलाधारेऽस्मिन् समुदेति समीरणः । विवक्षोरिच्छयोत्थेन प्रयत्नेन सुसंस्कृतः । स
व्यञ्जयति तत्रैव शब्दब्रह्माणि सर्वगम् ।।'४ कारणबिन्दुरूप यह अभिव्यक्त शब्दब्रह्म
निस्पन्द रहता है और यही है 'परावाक्'—'कारण बिन्द्रात्मकमभिव्यक्तं शब्दब्रह्म
स्वप्रतिष्ठतया निस्पन्दं चदेव च परावागित्युच्यते ।।'५ 'बिन्दु' = पश्यन्ती । 'नाद' =
मध्यमा । 'बीज' = बैखरी । कारणात्मक बिन्दु—अव्यक्तात्मक 'ख' (शब्दब्रह्म) ।
कारणबिन्द्रात्मक यह शब्दब्रह्म निस्पन्द 'परावाक्' है ।
परतत्त्व → प्रकृति (परा प्रकृति) → घनीभूत ब्रह्म
घनीभाव के लिए जो व्यापार होता है वही है 'विचिकीर्षा' (इच्छा-ज्ञान क्रिया
रूप विचिकीर्षा) । प्रकृति की घनावस्था उच्छूनावस्था है जिसमें प्रकृति कर्मों की
अपूर्वावस्था को छोड़कर परिपक्व दशा में अविभक्त रूप से स्थित हो । पक्व कर्मों
से सम्बद्धरूपता ही घनीभाव है । कर्माभिन्नरूपं ही 'बिन्दु' है । कारण बिन्दु
(प्रकृति) का विभाजन→(१) पर (२) सूक्ष्म (३) स्थूल (बिन्दु । कार्यबिन्दु) नाद
एवं बीज—
कालेन भिद्यमानस्तु स बिन्दुर्भवति त्रिधा ।
स्थूल सूक्ष्म परत्वेन तस्य त्रैविध्यमिष्यते ।
स बिन्दु नाद बीजत्वभेदेन च निगद्यते ।।६
१. सौभाग्यभास्कर (पृ० ३३) २-४. प्रपञ्चसार तन्त्र (प्रथम पटल)
५. सौभाग्यभास्कर ६. प्रपञ्चसार तन्त्र

प्रथमोऽंशः ३९
'कार्य बिन्दु' ही 'पश्यन्ती' है, नाद ही 'मध्यमा' है एवं बीज ही वैखरी' है ।
तान्त्रिकों की 'प्रकृति' सांख्य की प्रकृति से भिन्न है क्योंकि यह चिद्रूप है । यह
निश्चल, परावाक्रूप, प्रणवात्मक कुण्डलिनी शक्ति है—'प्रकृतिः निश्चला परावाग्रूपिणी
पर प्रणवात्मिका कुण्डलिनी शक्तिः' ।।१
'परावाक्'—जो निःस्पन्द चित् शक्ति है वही पर शब्द या परावाक् है । एक
ही परावाक् गतिशील होने पर सामान्य स्पन्द के रूप में 'पश्यन्ती', विशेष स्पन्द
के रूप में 'मध्यमा' एवं स्पष्टतः उच्चरित होने के रूप में 'वैखरी' कहा जाता है ।
एक ही चित् (चैतन्यशक्ति) या परावाक् गतिशील होने पर 'शब्द' एवं 'अर्थ' के
रूप में रूपान्तरित हो उठता है । परावाक् आत्मस्फुरण की अवस्था है । वामकेश्वर
तन्त्र के मतानुसार 'प्रकाश' के निम्न चार अंश हैं—१. अम्बिका २. वामा ३.
ज्येष्ठा एवं ४. रौद्री । 'विमर्श' के निम्न चार अंश हैं—१. शान्ता २. इच्छा ३.
ज्ञान और ४. क्रिया । प्रकाशांश 'अम्बिका' एवं विमर्शांश 'शान्ता' की समरसावस्था
में शान्ताभावसमापन्न पराशक्ति ही 'परावाक्' कहलाती है—
'आत्मनः स्फुरणं पश्येद्यदा सा परमा कला ।
अम्बिका रूपमापन्ना परावाक् समुदीरिता ।।' (योगिनीहृदय)
आत्मस्फुरण की अवस्था में समग्र विश्व बीजात्मना (अस्फुट रूप में)
आत्मसत्ता में विद्यमान रहता है । तदनन्तर 'शान्ता' से इच्छा का उदय होने पर
वह अव्यक्त विश्वशक्ति के गर्भ से निःसृत होता है । उस समय इच्छा शक्ति वामा
शक्ति से तादात्म्य अधिगत करती है और 'पश्यन्ती' की आख्या प्राप्त करती है ।
तदनन्तर ज्ञानशक्ति का उन्मेष होता है । ज्ञानशक्ति 'ज्येष्ठा' से अभिन्न है और
'मध्यमा' कहलाती है । ज्ञानानन्तर क्रियाशक्ति 'रौद्री' के साथ एकीभूत होकर
'वैखरी' कहलाती है । विश्व वैखरी का ही विस्तार है । शान्ता एवं अम्बिका का
सामरस्य ही परावाक् है । यह वाक् चतुष्टय परस्पर मिलकर मूल त्रिकोण
(महायोनि) के रूप में रूपान्तरित हो जाता है । 'परावाक्' इस त्रिकोण का केन्द्र है
जो नित्यस्पन्दमय है । 'पश्यन्ती' इसकी वामरेखा, वैखरी इसकी दक्षिण रेखा एवं
मध्यमा अग्ररेखा है । मध्य में स्थित महाबिन्दु शिव-शक्ति का स्थान है ।
वैयाकरणों के मत में पश्यन्ती ही वाणी का परा रूप है । अक्षर, 'शब्दब्रह्म',
परब्रह्म या परावाक् इसके विभिन्न नाम हैं । वैयाकरणों की दृष्टि में शब्दब्रह्म एवं
परब्रह्म अभिन्न है । आगमों में 'शब्दब्रह्म' ही परावाक् के नाम से प्रसिद्ध है ।
अद्वैतवादी परावाक् को परमेश्वर की स्वाभाविक या माहेश्वरी शक्ति मानते हैं ।
'परावाक्' स्वाभाविक है—'परावाक् स्वरसोदिता' परावाक् के दो कार्य हैं—(१)
स्वरूपाच्छादन (२) विकल्पप्रकटीकरण (विक्षेपोद्भावन)
परावाक् ही शुद्ध ज्ञान में विकल्पानुगत होकर निर्विकल्पक शुद्ध ज्ञान को
सविकल्पक अशुद्ध ज्ञान के रूप में परिणत कर देती है । ज्ञानी लोग ज्ञान के इस
१. प्रपञ्चसार तन्त्र विवरण (पटल ३०)

४० वरिवस्यारहस्ये

विकल्पांश की अपसारणा करके विशुद्ध निर्विकल्पक ज्ञान में अवस्थित हुआ करते
हैं । यह निर्विकल्पक शुद्ध ज्ञान परावाक् से भी अतीत है अतः परावाक् का
अतिक्रमण करने के पूर्व निर्विकल्प अवस्था प्राप्त करना संभव नहीं है । अद्वैतवादी
‘परावाक्’ को परमात्मा की माहेश्वरी शक्ति (स्वाभाविक शक्ति) मानते हैं । इसलिए
कहा गया है—‘परावाक् स्वरसोदिता’ । यह आगुन्तक शक्ति नहीं प्रत्युत् परमात्मा
का विमर्श भाव है । परमात्मा से परावाक् कभी पृथक् नहीं होती । जब परमेश्वर
विश्व-लीला करना चाहते हैं तब अपनी अनुत्तरा ‘स्वातन्त्र्यशक्ति’ द्वारा अपने को
परिच्छिन्न करके ‘आणव मल’ ग्रहण करते हैं और परिणामस्वरूप ग्राह्यग्राहक भाव
प्रकट हो उठता है । जो पूर्णस्थिति है वह परप्रमातृरूप है और वहाँ ग्राह्यग्राहक
भाव का अभाव है अतः वहाँ प्रमाता-प्रमेय-प्रमाण का भेद नहीं है किन्तु परमेश्वर
अपनी ‘स्वातंत्र्य’ नाम्नी शक्ति द्वारा अद्वैतस्थिति में द्वैतभाव आविर्भूत करके
ग्राह्यग्राहक ग्रहण भाव की त्रिपुरी को प्रकट करते हैं । चित्तरूपी ग्राहक के समक्ष
विकल्प रूप अर्थ ही विषय के रूप में प्रस्तुत होते हैं । इस आविर्भाव क्रम का
कारण भी परमेश्वर की पराशक्ति परावाक् ही है ।
रसात्मक स्वरस में आविर्भूत शक्ति का नामान्तर ही परावाक् है—‘परावाक्
स्वरसोदिता’ ।। प्रपञ्च का स्वरस वैखरी है क्योंकि प्रपञ्च में वैखरी का ही स्वरस
प्रवाहित हो रहा है । वैखरी में मध्यमा का, मध्यमा में पश्यन्ती का एवं पश्यन्ती
में परावाक् का स्वरस तरंगित हो रहा है किन्तु परावाक् में किसी का भी नहीं
प्रत्युत् अपना ही रस (स्वरस) तरंगित हो रहा है इसीलिए तो शास्त्रकारों ने कहा
है कि—‘परावाक् स्वरसोदिता’ । यदि यह कहा जाय कि परावाक् में परमेश्वर का
स्वरस प्रवाहित हो रहा है तो अनुचित होगा क्योंकि यद्यपि परावाक् परमेश्वर की
अपनी शक्ति है किन्तु ‘शक्ति’ शक्तिमान से भिन्न नहीं है । इस प्रकार भी तो कहा
जा सकता है कि परमेश्वर परावाक्रूपी रसात्मक ‘स्व’ के कारण ही शक्तिमान एवं
परम ईश्वर है ।
प्रत्यभिज्ञा में भी कहा गया है कि—‘प्रत्यवमर्शात्मा चिति ही सरस परावाक्
है। परमात्मा का यह स्वातंत्र्य ही उनका मुख्य ऐश्वर्य है । वह सर्वदेश काल में
स्फुरण करती हुई महासत्ता सबका अधिष्ठान है और परमेश्वर का हृदय है।’
उसका रूप है अंतः सङ्कल्प । उसमें शब्द एवं अर्थ दोनों एक साथ स्फुरित होते
हैं अतः दोनों में अभेद है । जिस प्रकार निजात्मा संवित् से सम्पूर्ण जगत्
अनुविद्ध है तद्वत संवित् से सम्पूर्ण वाणी अनुविद्ध है । योगिनाथ ने ठीक ही
कहा है कि परतत्व में किसी भी वस्तु की सिद्धि के लिए वाणी को स्वीकार करना
पड़ता है । वह शक्ति शब्द का रूप धारण करके अर्थ को प्रकट करती है ।
संवित्रसूत वाणी के बिना किसी भी अर्थ का अवधारण नहीं हो सकता ।
सर्वप्रकारक संवित्स्वरूप की प्रभा के समान प्रकाशन शक्ति अंतस्सङ्कल्पतारूपा वाणी
बनकर फिर वर्ण, पद, वाक्य को जीवन-दान करती है और पदार्थ के रूप में
बाहर दिखती है ।

प्रथमोऽंशः ४१
'अम्बिका' में 'शान्ता' का साम्य होने पर 'मूलबिन्दु' का उदय होता है ।
इसीका नाम है 'परावाक्' । परमात्मा या सदाशिव इसी 'मूलबिन्दु' की अवस्था
विशेष का नाम है । पौष्कर में परावाक् को 'सूक्ष्मा' अभिधान देकर इसका इस
प्रकार निरुपण किया गया है—'सूक्ष्माचिदेकशरणा निवृत्ताशेषशक्तिका ।'१
शैवपरिभाषाकार योगीन्द्रज्ञान शिवाचार्य इसका स्वरूप इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं—
'तत्र ज्ञानैकाश्रया अर्थसामान्य प्रकाशिका वाणी सूक्ष्मा ।।'२ विभिन्न वाणियों की
कारण-कार्य-परम्परा निम्नानुसार है—
'वैखर्याः कारणं मध्या, पश्यन्ती मध्यमां प्रति ।
पश्यन्त्याः कारणं सूक्ष्मा निर्विकल्प स्वरूपिणी ।।'२
तत्त्व की दृष्टि से 'सूक्ष्मा' का सम्बन्ध शिवतत्त्व से है—'तत्र शिवतत्त्वे
सूक्ष्माभिधानावाग्वृत्तिः ।।' इसी वाक्तत्त्व में शान्त्यतीत भुवनों का अवस्थान भी है ।
'विकल्पबोधायाणूनां तत्त्वानां स्थितये कलाः ।
पञ्च तत्त्वानि लोकांश्च मन्त्रा दीन सृजिक्षिवः ।
शान्त्यतीता पुराधारं शिवतत्त्वं पुराभवत् ।।'
'परावाक्' या 'सूक्ष्मा शब्दवृत्ति' शिवात्मक है—'अस्य शिवाधिष्ठितत्वेन
शिवतत्त्वव्यपदेशः ।।'३ 'तत्र शिवतत्त्वे सूक्ष्माभिधाना वाग्वृत्तिः । अत्रैव
शान्त्यतीतभुवनाना वस्थितिः ।'४
'परावाक्'—सभी शास्त्रों को अपने में निहित रखता है । इसमें बीजात्मना
(Germinally) सभी शास्त्र निहित रहते हैं । यही परावाक् धीरे-धीरे भौतिक स्तरों
में उतरता हुआ अक्षरों के रूप में (Syllables, vocables) वर्णमाला का सृजन
करता है । इस स्तर पर चैतन्य के दो स्तर परस्पर अभिन्न है तथा शब्द एवं अर्थ
एक दूसरे से अपृथक हैं । परा की उत्तरावस्था में (परवर्ती स्थितियों में) शब्द एवं
उसके अर्थ परस्पर भिन्न हो जाते हैं और वैखरी की अवस्था में तो विभिन्न
उच्चारणावयवों के माध्यम से पृथक् शब्द पृथक् अर्थों के साथ उच्चरित होने लगते
हैं । 'परावाक्' समस्त शास्त्रों का उद्गम या स्रोत है । ये शास्त्र सर्वोच्च सत्ता
(Supreme being) के पाँचों मुखों से, जो उसकी पाँच शक्तियों (चित, आनन्द,
इच्छा, ज्ञान एवं क्रिया) के प्रतीक हैं, निःसृत होते हैं । पञ्चविध शैव शासनाम्नाय
शिव के पञ्चमुखों से प्रकट होता है और तन्त्र के ९२ सम्प्रदायों का प्रवर्तन करता
है जो कि निम्न ३ भागों में वर्गीकृत हैं—(१) शिव तन्त्र = द्वैतपरक : १० (२)
रुद्रतन्त्र = द्वैताद्वैतवादी : १८ (३) भैरव तन्त्र = अद्वैतवादी : ६४ ।।
'परावाक्' विश्व-सृष्टि का मूलाधार है—वामकेश्वर तन्त्र में
(नित्याषोडशिकार्णव) में कहा गया है कि 'परमाशक्ति' (त्रिपुरा या परावाक्) जब
१. शैवपरिभाषा २. पौ०बिन्दु०प०
३-४. शैवपरिभाषा

४२ वरिवस्यारहस्ये
स्वनिष्ठ स्फुरत्ता का साक्षात्कार करती है तभी विश्व का उदय होता है—'यथा सा
परमा शक्तिः स्वेच्छया विश्वरूपिणी । स्फुरत्तामात्मनः पश्येत्तदा चक्रस्य संभवः ॥'
परमाशक्ति के ईक्षण-व्यापार में इच्छा के साथ ही साथ ज्ञान एवं क्रिया भी
सूक्ष्मात्मना विद्यमान रहते हैं । भास्करराय मखिन् ने 'सेतुबंध' में कहा है कि
'तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय' इस वाक्य में 'बहुस्यां' के ईक्षण के आकारित होने के
पूर्व (उठी हुई प्राथमिकी वृत्ति) इच्छा एवं ज्ञान दोनों शक्तियों से युक्त थी । इतना
ही नहीं 'स्वाभाविकी ज्ञान बल क्रिया च' आदि श्रुति-वाक्यों से यह भी प्रमाणित है
कि उक्त प्राथमिक इच्छा-ज्ञान शक्ति के साथ क्रियाशक्ति भी समवेत थी ।
पद्मपादाचार्य प्रपञ्चसार तन्त्र की टीका में परावाक् की व्याख्या करते हुए
कहते हैं कि—मूलाधार से उत्पन्न चैतन्याभास और माया शक्त्यात्मक भाव परावाक्
है—'तस्मात् प्रथममुदितः चैतन्याभासः भावश्च यः जगद्भावयतीति माया शक्तिर्भावः स
पराख्यः ॥' 'चैतन्याभासविशिष्टतया प्रकाशिका माया निष्पन्दा परावागित्यर्थः ॥'
'मूलाधार' में मूल का अर्थ है जगत् की मूलभूतात्मिका परिणामिनी माया शक्ति एवं
उसका अधिष्ठानभूत चिदात्मा । शरीरगत मूलाधार भी चिदात्मा की अभिव्यक्ति का
स्थान है । इसी स्थान से उत्पन्न मायाशक्त्यात्मक चैतन्याभास एवं निष्पन्दा वाक्
को 'परा' आख्या दी गई है । शङ्कराचार्य ने मूलाधार से प्रथमोदित वाक् को 'परा'
कहा है—'मूलाधारात् प्रथममुदितो यश्च भावः पराख्यः ॥'१ शङ्कराचार्य की व्याख्या
के अनुसार 'परावाक्' मूलाधारोत्पन्न प्राथमिक 'भाव' है ।
परावाक् की 'परा' संज्ञा इसलिए है क्योंकि यह 'पूर्ण' है—'पूर्णत्वात् परा ॥'२
परावाक् वाणी की पराकाष्ठा है—यही शब्दब्रह्म है । इसे 'वाक्' इसलिए कहा गया
है क्योंकि यह प्रत्यवमर्श द्वारा कथन करती है—'वक्ति' विश्वं अपलपति प्रत्यवमर्शेन
इति च वाक् ॥'
'परावाक्', चिदात्मक, स्वात्मविश्रान्त 'अहं' के रूप में नित्योदित परमात्मा की
स्वातंत्र्यशक्ति के रूप में अवस्थित है तथा सदा निरपेक्ष रूप से रहती है ।
संसार का साररूप एवं मालिनी शक्ति 'परावाक्' है । यही समस्त मन्त्रों की
जननी है । यही तुरीय पद 'अव्यक्त' भी कहा गया है । 'परावाक्' में
इच्छा-ज्ञान-क्रिया समष्टि रूप से अवस्थित रहती है । इसे 'कारणबिन्दु' भी कहा
गया है क्योंकि यह जगदाङ्कुर के लिए कन्दस्वरूपा है । शब्दब्रह्मरूपात्मिका का यह
परावाक् आत्मप्रतिष्ठ होने के कारण निःस्पन्द है ।
अपने मूल स्वरूप में परावाक् चित्शक्ति का ही अपर पर्याय है । 'अथवा
चिच्छक्तिरेव पराख्या चैतन्याभास विशिष्टतया प्रकाशिका माया निष्पन्दा परा-
वगित्यर्थः ॥'३ चैतन्याभासविशिष्ट होने के फलस्वरूप प्रकाशिका माया ही स्पन्दहीन
'परावाक्' है ।
१. प्रपञ्चसार तन्त्र २. ई०प्र० विमर्शिनी
३. पदार्थदर्श

प्रथमोऽंशः ४३
शाक्ताद्वैत, ईश्वराद्वयवाद मे तो 'माया' 'प्रकृति' आदि 'परावाक्' से
निम्नस्तरीय तत्त्व माने गये हैं । 'महामाया' को द्वैतवादी तन्त्र में शिव की
परिग्रहरूपा बिन्दु शक्ति या 'परावाक्' स्वीकार किया गया है ।
लक्ष्मीधर की दृष्टि में 'परा' सतोगुणरजोगुण एवं तमोगुण की साम्यावस्था का
अभिधान है । 'एका परेति सत्वरजस्तमोगुण साम्यरूपा ।।'१
'परावाक्'—'प्रकृति' एवं 'प्रतिभा'—आचार्य लक्ष्मीधर ने सौन्दर्यलहरी की
अपनी टीका में परावाक् से प्रकृति का सम्बन्ध बताते हुए उसे प्रकृतिरूपात्मक
स्वीकार किया है । प्रकृति में निहित गुणत्रय 'ज्ञान', 'इच्छा', एवं 'क्रिया' के ही
प्रतीक हैं । ईश्वरप्रत्यभिज्ञाकार का कथन है कि 'पशुपति' की अवस्था में जो
'ज्ञान' 'क्रिया' एवं 'माया' शक्ति है वही 'पशु' दशा में 'सत्व' 'रज' एवं 'तम'
है—'स्वाङ्गरूपेषु भावेषु पत्युर्ज्ञानं क्रिया च या । मायातृतीये ते एव पशोः सत्वं
रजस्तमः ॥२ इच्छा आदि शक्तियाँ ही सङ्कुचित होकर सत्व-रज-तम (गुणमय) का
रूप धारण करती हैं ।
सांख्य, वैशेषिक, न्याय, मीमांसा आदि में निरूपित प्रकृति का स्वरूप अशुद्ध
प्रकृति का स्वरूप है जबकि तन्त्रोक्त प्रकृति शुद्धा प्रकृति है और इसमें इच्छा, ज्ञान
एवं क्रिया शक्ति तत्त्व के रूप में विद्यमान है—'इच्छादित्रिसमष्टिः शक्तिः शान्तास्य
सङ्कुचद्रूपा । सङ्कलितेच्छाद्यात्मक सत्त्वादिकसाम्य रूपिणी सती । बुद्ध्यादिसामरस्य-
स्वरूप चित्तात्मिका मता प्रकृतिः ॥'३ 'मूल प्रकृति' परावाक् है । इसी से
विश्ववैचित्र्य का आविर्भाव होता है । आचार्य व्यास ने 'गुणानांपरमं रूपं न
दृष्टिपथमृच्छति । यत्

४४ वरिवस्यारहस्ये
परा ।।'१ यही स्वरसोदित परावाक् समस्त वर्णसमुदाय, नादसमुदाय, प्रमेय समुदाय
समग्र जगत् एवं मन्त्रसमुदाय का मूल स्रोत है ।
'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' में कहा गया है—'चित्प्रकाश से अभिन्न, नित्य उदित,
महामन्त्ररूप, पूर्ण अहं विमर्शात्मक जो यह 'परावाक् शक्ति' है, जिसके गर्भ में
'अ' से 'क्ष' पर्यन्त (वर्णात्मक) समग्र शक्तिचक्र विद्यमान रहता है, वही पश्यन्ती
और मध्यमा के क्रम से ग्राहकभूमिका को आभासित करती है ।' प्रत्यवमर्शात्मक,
अमायीय वर्णजनित, अन्तर शब्दन्स्वभाव चिति को नित्योदित 'परावाक्' कहते हैं ।
यही 'परावाक्' परमात्मा की शक्ति एवं मुख्य ऐश्वर्य है । पूर्ण होने के कारण इसे
'परा' तथा प्रत्यवमर्श द्वारा विश्व का अभिलाप करने से इसे 'वाक्' कहते हैं ।
चितिः प्रत्यवमर्शात्मा परावाक् स्वरसोदिता ।
स्वातन्त्र्यमेतन्मुख्यं तदैश्वर्यं परमात्मनः ।।२
'पूर्णत्वात् परा वक्ति विश्वं अभिलपति प्रत्यवमर्शेन इति च वाक् ।।'३
'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' के प्रणेता क्षेमराज का कथन है कि चित्प्रकाश से अव्यतिरिक्त,
नित्योदित, महामन्त्ररूप, पूर्णांहंविमर्शमयी वाक् ही 'परावाक् शक्ति' (चित्प्रकाशात्
अव्यतिरिक्ता नित्योदितमहामन्त्ररूपा पूर्णांहंविमर्शमयी या इयं परावाक् शक्तिः ॥) विभु
की माया शक्ति द्वारा भिन्न-भिन्न बाह्य और आभ्यन्तर वस्तुसमूह का विश्रान्तिस्थान,
वही प्रत्यवमर्शात्मक परावाक् रूप चिति, ज्ञान, सङ्कल्प, अध्यवसाय, स्मृति और
संशय के नाम से कही गई है—
'माया शक्ता विभोः सैव भिन्न संवेद्यगोचरा ।
कथिता ज्ञानसङ्कल्पाध्यवसायादिनामभिः ।।'
इस धरातल पर वाच्य एवं वाचक शब्दों का अस्तित्व नहीं रहता । इस भूमि
में वाच्य अर्थ की भी सत्ता नहीं रहती । यहाँ अतीत, अनागत एवं वर्तमान का
भेद नहीं रहता । यहाँ पर भेद अपनी आत्मा से अभिन्न या आत्मरूप होकर
भासमान होता है ।
महाज्ञान सर्वप्रथम 'अहंज्ञान' का रूप धारण करके परमशिव के अन्तर में
स्फुरित होता है । इस अवस्था में वाच्य-वाचक भाव एवं शब्द-अर्थ का पृथकत्व
विद्यमान नहीं रहता । वाच्य 'इदं' रूप में भासमान नहीं होता ।
'नाद' एवं परापश्यन्ती आदि वाक्चतुष्टय—आचार्य भास्करराय ने 'मातृका'
'पश्यन्ती' 'मध्यमा' की व्याख्या इस प्रकार की है—
(१) 'मातृका'—'माति तरति कायतीति च व्युत्पत्या मातृकेत्युच्यते । तस्यां
च निर्विकारायामप्यनादि सिद्धप्राण्यदृष्टवशात् स्वान्तःसंहतं विश्वसिसृक्षोत्पद्यते ।।' ततः
स्रष्टव्यपदार्थनालोचयति 'तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय ।।' इति ।।४
१. भर्तृहरि—'स्वोपज्ञ' (ब्रह्मकाण्ड) । २. ई०प्र०का०
३. ई०प्र० विमर्शिनी ४. वरिवस्यारहस्यम्

प्रथमोऽंशः ४५
(२) 'पश्यन्ती' —परमात्मा 'बहुस्यां प्रजायेय' का जो ईक्षण करता है उसी की
परिणति पश्यन्ती है १—'तादृशमीक्षणमेव प्रवृत्तिनिमित्तीकृत्य तस्यां पश्यन्तीति पदं
प्रवर्तते ।'
(३) 'उत्तीर्णा' — यहीं 'पश्यन्ती' ही उत्तीर्णा भी कही जाती है ।२ 'सैव च
पश्यन्त्याख्यामातृका करणसरणित उत्तीर्णत्वा दुत्तीर्णोत्युच्यते ।।' उसके अवयव
वामादिक ८ शक्तियाँ है—तदवयवाश्च वामादयोऽष्टौ शक्तयोऽन्यत्र प्रपञ्चिताः ।।
(४) 'नौ नाद' — यही पश्यन्ती व्यष्टि-समष्टि रूप से ९ प्रकार की है—
'अतःसैव व्यष्टि-समष्टि वेषेण नवविधा ततो नव नादा अविकृत शून्यादयो जाताः ।।३
(५) उसकी समष्टि—नाद, ध्वनि आदि कही जाती है—(तत्समष्टिश्च नाद
ध्वन्यादि पद वाच्या) ।।
'मध्यमा वाक्'—परा की भाँति अतिसूक्ष्म एवं वैखरी की भाँति अति स्थूल—
इन दोनों कोटियों से परे मध्य स्तर पर व्यक्त वाक् 'मध्यमा' है । ('नातिसूक्ष्मा
परावन्नातिस्थूला वैखरीवद अतो मध्यमाख्या ।।) इसीलिए उसे 'मध्यमा' कहते भी
हैं । मध्यमा की स्थिति 'मध्यमाख्या मातृका मध्यमावयवरूपमविकृत शून्य स्पर्श नाद
ध्वनि बिन्दु शक्ति बीजाक्षराख्यं नादनवकं मूलाधारादिषट्के नादे नादान्ते ब्रह्मरन्ध्रे च
स्थितम् ।।'४
नव नाद एवं वर्णमाला—(नव नाद—वर्णमाला की उत्पत्ति इन्हीं ९ नादों से
होती है—'नवभिर्नादैरक च ट त प य श ला ख्य वर्ग नवकवती वैखर्याख्या
मातृका जाता ।'५)—९ नादों से वैखरी वाक् उत्पन्न होता है । 'वैखरी' नामकरण
क्यों ?६—
'स्पष्टतरत्वात् खं कर्णविवरवर्ति नभोरूप श्रोत्रेन्द्रियं राति गच्छति, तज्जन्य ज्ञान
विषयो भवति इति ।
'ख' आकाश का नाम है । आकाश का सम्बन्ध श्रोत्रेन्द्रिय से है अतः
आकाश की इन्द्रिय स्रोत में जो (राति) जाता है, प्रवेश करता है (राति = गच्छति)
वह 'वैखरी' है ।६
प्रणवात्मक निश्चल कुण्डलिनी ही 'परावाक्' है । पश्यन्ती आदि परावाक् की
ही विकृतियाँ हैं । 'प्रणव' उच्चारण से पूर्व संविदात्मक 'पर प्रणव' में स्थित रहता
है फिर यह ज्वाला-प्रवाह रूप शब्दभेदों को पार करता हुआ—यह ज्योतिलिङ्गाकार
चिदग्निरूप प्रणव भ्रमर के समान गुञ्जन करता हुआ मूलाधार से सुषुम्णा मार्ग में
प्रवेश करता है । और द्वादशान्त में स्थित हो जाता है ।
'परावाक्' अव्यक्त विश्वबीज है—भारतीय ऋषियों ने मानव जीवन के जो
चार लक्ष्य निर्धारित किये हैं उन्हें ही शब्दान्तर में 'पुरुषार्थ चतुष्टय' कहा गया है ।
१-६. वरिवस्यारहस्यम्

४६ वरिवस्यारहस्ये
पुरुषार्थ चतुष्टय में प्रथम पुरुषार्थ 'धर्म' है । जिन्होंने धर्म का साक्षात्कार किया
उन्होंने अनुभव किया कि चराचर समस्त जगत् का मूलाधारभूत तत्त्व सूक्ष्म वाक् है
और जो धर्मतत्त्व का साक्षात्कार नहीं कर पाये वे जगदाधिष्ठान रूप में स्थित इस
सूक्ष्म वाक् तत्त्व का संधान नहीं कर सकते—
'यां सूक्ष्मां नित्यामतीन्द्रियां वाचम् ऋषयः साक्षात्कृतधर्माणो मन्त्रदृशः पश्यन्ति,
ताम् असाक्षात्कृतधर्मेभ्यः परेभ्यः आदि ।।'१
यह सूक्ष्म वाक् 'परावाक्' का पर्याय है । सूक्ष्म वाक् के विषय में दो दृष्टियाँ
हैं । शब्दब्रह्मवादी आचार्यों की दृष्टि के अनुसार सूक्ष्म वाक् पुरुष की समवायिनी
शक्ति तथा अमृत कला है । सिद्धान्त शैव मत के अनुसार सूक्ष्म वाक् 'बिन्दु' का
कार्य है । शैव दृष्टि के अनुसार सूक्ष्म वाक् पुरुष भी समवायिनी शक्ति नहीं है
प्रत्युत् यह आत्मा में अविभक्त रूप में स्थित रहती है । यह सूक्ष्म वाक् (परावाक्)
नित्य भी नहीं है । प्रत्युत् यह कार्यरूप एवं अनित्य है । इसी का नामान्तर
शब्दब्रह्म, रवि, या सूर्य है । इसका भेदन करने से विवेक ज्ञान का उदय होता है
और शब्दब्रह्म का भेदन करने से मुक्ति होती है । शब्दब्रह्मवादी सूक्ष्म वाक् से
'पश्यन्ती' को अभिन्न स्वीकार करते हैं जबकि शाक्त आचार्य इसे आत्मा या
परमशिव की पराशक्ति मानते हैं । जब आत्मस्वरूप में आत्मस्वरूप की दिदृक्षा
होती है तब प्रकाशांश एवं विमर्शांश (शान्ता एवं अम्बिका शक्तियाँ) दोनों में
सामरस्यागम होता है । इसी सामरस्य का अभिधान है 'परावाक्' या परमातृका' ।
इसी में जगत् के मूल तत्त्व (३६ .तत्त्व) विश्वबीज के रूप में अव्यक्तावस्था में
विद्यमान रहते हैं और सृष्टिबेला में अभिव्यक्त हुआ करते हैं । 'परावाक्' अद्वैतात्मक
अखण्ड ज्ञान, समस्त भावों की पूर्णता, पर बोध, एवं 'परम परामर्श' है ।
जगद्रचना के प्रारम्भ में परावाक् में स्थित वेदशास्त्रादिक निम्नभूमिका में अवतीर्ण
होते हैं और सर्वप्रथम हृदय के अन्दर परम बोध के रूप में अस्फुट अहंसंज्ञान के
उस स्वरूप का आविर्भाव होता है जिसके विमर्श से वाच्य-वाचकभाव विद्यमान नहीं
रहता ।
तन्त्र का मूलस्वरूप भी परावाक् रूप है क्योंकि 'परावाक्' परमात्मा की
'पराशक्ति' है । यह आत्मबोध की परावस्था है । 'परमाकला' द्वारा आत्मस्फुरण के
साक्षात्कार की परिणति ही 'परावाक्' है ।'
आत्मनः स्फुरणं पश्येद्यदा सा परमा कला ।
अम्बिकारूपमापन्ना परावाक् समुदीरिता ।।'२
अमृतानन्द 'दीपिका' में कहते हैं कि 'वह सर्ववर्णाशिभूत विमर्शरूपा ('परमा')
विमर्शशक्ति ('कला') अपने अर्थात् परशिव के ('आत्मनः') पश्यन्ती आदि के क्रम
से वैखरीपर्यन्त, विमर्शन ('स्फुरण') का जब दर्शन करना चाहती है तब
परमाशान्तात्मिका होकर प्रकाशांशस्वरूपा अम्बिका के साथ सामरस्य प्राप्त करके
१. पुराकल्प २. योगिनीहृदय

प्रथमोऽंशः ४७
(‘अम्बिका रूपमापन्ना’) जिस स्वरूप में प्रकट होती हैं उसे ‘परावाक्’ कहते हैं—
‘सा परमा सर्ववर्णांशभूतविमर्शरूपा, कला विमर्शशक्ति, आत्मनः परशिवस्य, स्फुरणं
पश्यन्त्यादि क्रमेण वैखरीपर्यन्तं विमर्शनम्, पश्येद्, द्रष्टुमिच्छेत् तदा परमा
शान्तात्मिका भूत्वा अम्बिका रूपमापन्ना प्रकाशांशमात्राया अम्बिकायाः सामरस्यमापन्ना
‘परावाक्’ समुदीरिता ।।' यही परावाक् ‘परामातृका’ भी कही जाती है ।१
वाक् तत्व के - चारों रूपों का परमात्मा की संविदात्मक आत्म शक्तियों के
साथ सम्बन्ध है, यथा—
इच्छाशक्ति—पश्यन्ती वाक् = इच्छाशक्ति + वामाशक्ति—पश्यन्ती
ज्ञानशक्ति—मध्यमा वाक् = ज्ञानशक्ति + ज्येष्ठाशक्ति—मध्यमा
क्रियाशक्ति—वैखरी वाक् = क्रियाशक्ति + रौद्रीशक्ति—वैखरी२
शक्तिचक्र के चार प्रकार हैं—(१) खेचरी (२) गोचरी (३) दिक्चरी (४)
भूचरी । इन्हें ही परा, पश्यन्ती, मध्यमा एवं वैखरी भी कहते हैं । इन्हीं में
आनन्द, इच्छा, ज्ञान, एवं क्रिया भी निवास करती है । ये समस्त शक्तियाँ
आत्मसंवित से अभिन्न हैं ।३ इन समस्त शक्तियों के मूलकारण स्पन्दरूप भगवान्
ही है ।४
'शारदातिलक' में शब्दब्रह्ममयी कुण्डलिनी से 'शक्ति' के आविर्भाव का
उल्लेख हैं । यह क्रम इस प्रकार है—कुण्डलिनी—शक्ति—ध्वनि—नाद—निरोधिका
—अर्द्धेन्दु । बिन्दु—परा—पश्यन्ती—मध्यमा—वैखरी ।।
सा प्रसूते कुण्डलिनी शब्दब्रह्ममयी विभुः ।
शक्ति ततो ध्वनिस्तस्मान्नादस्तस्मान्निरोधिका ।।
ततोऽर्द्धेन्दुस्ततो बिन्दुस्तस्मादासीत् परा ततः ।
पश्यन्ती मध्यमा वाचि वैखरी शब्द जन्मभूः ।।
इच्छाज्ञान क्रियात्मासौ तेजोरूपा गुणात्मिका ।
क्रमेणानेन सृजति कुण्डली वर्णमालिकाम् ।।५
'मातृका' के चार रूप हैं—
मातृका
↓
┌─────────────┬─────────────┬─────────────┐
परा पश्यन्ती मध्यमा वैखरी
'अनेन मातृकायाः परा पश्यन्ती मध्यमा वैखरी इति चत्वारिरूपाणि ।।'६
१. 'परामातृकोच्यते' (दीपिका) २. योगिनीहृदय, सेतुबन्ध, दीपिका
३-४. स्पन्दप्रदीपिका ५. शारदातिलक (त०प्र० पटल)
६. लक्ष्मीधरा

४८ वरिवस्यारहस्ये
'परा' क्या है?—'परा' नाम सान्तरोहरूपा ।' 'अन्तरे अन्तःकरणे ऊहेन
तर्केण सहितं रूपं यस्याः सा सान्तरोहरूपा ।' 'कामकला विलास' में भी इसीलिए
कहा गया है—'या सान्तरोहरूपा परा महेशी परा नाम ।।'
'पश्यन्ती' क्या है?—'स्पष्टा पश्यन्त्याख्या त्रिमातृका चक्रतां याता ।।'
'त्रिमातृका त्रिखण्डयुक्ता मातृका पञ्चदशाक्षरी, तदात्मिका । सा च चक्रतां चक्रत्वं.
याता । त्रिखण्डात्मक चक्रैक्यं त्रिखण्डात्मकमातृकाया इति रहस्यम् । 'स्पष्टा'
युक्तावस्थायां अतिसूक्ष्मतया प्रतीता ।।२
'मध्यमा' क्या है?—'मध्यमा नाम परापश्यन्त्योः उच्चानुच्चावस्थात्मिका ।'
इसके दो रूप हैं—(१) वामादि व्यष्टिरूपा (२) वामादि समष्टिरूपा । वामादि
शक्तियाँ निम्न हैं—(१) वामा (२) ज्येष्ठा (३) रौद्री (४) अम्बिका । ये चारों
शक्तियाँ श्रीचक्र के अन्तर्गत अधोमुख हैं और चतुर्योन्यात्मक हैं । (१) इच्छा (२)
ज्ञान (३) क्रिया (४) शान्ता (५) परा—ये ५ शक्तियाँ श्रीचक्र के अन्तर्गत
ऊर्ध्वमुख एवं शक्तियोन्यात्मक हैं । इसीलिए कहा गया है—'एका परात्तदन्या
वामादिव्यष्टि मातृसृष्ट्यात्मा । तेन नवात्मा माता जाता सा मध्यमाऽभिधानाभ्याम् ।
द्विविधा हि मध्यमा सा सूक्ष्मा स्थूलाकृतिः स्थिरा सूक्ष्मा । नवनादमयी स्थूला
नववर्गात्मा तु भूतलिपियाख्या ।'२
'परा' क्या है?—'एक परेति सत्त्वरजस्तमोगुणसाम्यरूपा ।' 'पश्यन्ती' क्या
है?—'पश्यन्ती अन्यतरगुण वैषम्यरूपा ।' 'मध्यमा' क्या है?—'मध्यमा वामादि-
व्यष्टिरूपा स्थूलात्मिका ।'३
'मध्यमा'—सूक्ष्मा स्थूला : नव नादमयी, नववर्गात्मा, भूतलिपव्याख्या । (नव
नाद = अ, क, च, ट, त, प, य, श, क्ष ।)
(१) 'आद्या सूक्ष्मरूपा मध्यमा'—स्थूलरूपा (नव वर्गात्मिका) मध्यमा ।४
'पश्यन्ती' के ३ रूप हैं—(१) 'पश्यन्ती' (२) 'महापश्यन्ती' (३) 'परम
महापश्यन्ती ।'५ आचार्य सोमानन्द—'पश्यन्ती' को 'ज्ञानशक्ति' कहते हैं ।
सृष्टि—'अर्थमयी शब्दमयी चक्रमयी देहमय्यापि च सृष्टिः ।।' आचार्य
भास्करराय जिसे 'सृष्टि' कहते हैं उसका स्वरूप क्या है? (१) स्पन्दकारिकाकार का
मत—जगत् की सृष्टि नहीं होती प्रत्युत् प्रकटीकरण होता है क्योंकि प्रलय में जगत्
का ध्वंस होने पर भी मूलतः उसका ध्वंस नहीं होता क्योंकि उस स्थिति में जगत्
शक्ति में उपसंहृत होकर स्थित हो जाता है किन्तु सांसारिक प्राणी उसे प्रलय
महाध्वंस या विनाश कहने लग जाते हैं । 'जगत' का 'उदय' और अस्त होता है ।
इसे ही स्पन्दकारिका में—'उन्मेष' एवं 'निमेष' कहा गया है—'यस्योन्मेष निमेषाभ्यां
जगत्ः प्रलयो दयौ । तं शक्तिचक्रविभवप्रभवं शङ्करं स्तुमः ।।६
१-४. लक्ष्मीधरा ५. ई०प्र०वि० (अभिनवगुप्त)
६. स्पन्दकारिका

प्रथमोऽंशः ४९
(२) ‘सृष्टि’ ईक्षणमात्र है—‘तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय ।’
(३) योगिनीहृदय का मत—‘सृष्टि’ शक्ति द्वारा स्फुरत्ता का दर्शन है ।१
‘शब्दमयी’—शब्द का वाक् तत्त्व से सम्बन्ध है । वाक् क्या है?
वाक् तत्त्व—समस्त सृष्टि वाक्तत्त्वात्मक या शब्दमयी है । जगत् ‘शब्द’ या
वाक्तत्त्व का परिणाम है ‘अनादि निधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदुच्यते । विवर्ततेऽर्थभावेन
प्रक्रिया जगतो यतः ।।’२
(१) समस्त शक्तियाँ वाक्तत्त्वात्मक या वर्णात्मक है—स्पन्दप्रदीपिकाकार ने
कहा है—‘समस्त शक्तियाँ वर्णात्मक हैं ।’
(२) वाक् तत्त्व ‘पशुपति’ को ‘पशु’ भी बना देता है—कल्लट इस सिद्धान्त
की पुष्टि करते हुए कहते हैं—
‘शब्द राशि समुत्थस्य शक्ति वर्गस्य भोग्यताम् ।
कलाविलुप्त विभवो गतः सन् स पशुः स्मृतः ।।'
स्पन्द प्रदीपिकाकार उत्पल ने ठीक ही कहा है कि पुरुष जिन शक्तियों का
स्वामी है उन्हीं का भोग्य बनकर (पुरुष के स्थान पर) ‘पशु’ बन जाता है । कादि
रूप या ब्रह्मादि शक्तिरूप चक्र की कलाओं से (ककारादि अक्षरों के श्रवण और
उच्चारण द्वारा) पुरुष अपने वैभव एवं अपनी महाव्याप्ति खोकर स्वभावच्युत हो
जाता है और फलतः पशु बन जाता है ।
(३) समस्त ज्ञान शब्दानुविद्ध हुआ करते हैं—आचार्य भट्टकल्लट इस
सिद्धान्त की पुष्टि करते हुए ‘स्पन्दकारिका’ में कहते हैं—
‘यतः शब्दानुवेधेन न बिना प्रत्ययोद्भवः ।।'
(४) शब्द शक्तियाँ पर तत्त्व के स्वरूप की आच्छादिका हैं—आचार्य
भट्टकल्लट ने ‘स्पन्दकारिका’ में कहा है—‘स्वस्वरूपावरणे चास्य शक्तयः सततोद्यता’
अर्थात् पुरुष के स्वस्वरूप को आच्छादित करने के लिए ये शब्दरूप शक्तियाँ
सर्वदा उद्यत रहती हैं अर्थात् क्रियाशक्ति के द्वारा ये पुरुष रूप को सदैव ढकना
चाहती हैं ।
(५) बिना वर्णानुगम (शब्दानुवेध) के किसी ज्ञानसंवेदनरूप प्रत्यय का उदय
ही नहीं होता—‘यतः शब्दानुवेधेनं न बिना प्रत्ययोद्भवः ।।' (स्पन्दकारिका)
‘वाक्यपदीय’ में ठीक ही कहा गया है कि ‘ऐसा कोई प्रत्यय नहीं होता
जिसमें शब्द का अनुगम न हो । सभी ज्ञान शब्द से अनुविद्ध देखे जाते हैं ।’
(६) समस्त विश्व-व्यवहार का आधार भी वाक् तत्त्व ही है—
१. ‘यदा सा परमा शक्तिः.......स्फुरन्तात्मनः पश्येतदा चक्रस्य संभवः'
२. ‘वाक्यपदीय’
४ वरि.

५० वरिवस्यारहस्ये
स्पन्दप्रदीपिकाकार उत्पलदेव ने कहा है कि समस्त विश्व-व्यवहार का कारण वाक्
तत्त्व ही है ।
(७) चित् तत्त्व की उन्मुखता में बाधक तत्त्व के रूप में भी वाक् तत्त्व ही
है । स्पन्दप्रदीपिका में कहा गया है कि वाक् शक्ति ही प्रत्यवमर्शिनी शक्ति भी है
और साथ ही वही चित् शक्ति की उन्मुखता में बाधक भी है ।
वाक् तत्त्व—अपनी मूल प्रकृति में चितिशक्ति मात्र है । शास्त्रों में इसके चार
प्रकार बताये गये हैं—
'चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानिविदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः ।
गुहा त्रीणि निहिता नेंगयन्ति तुरीय वाचो मनुष्या वदन्ति ॥'
'बिन्दु' की शब्दात्मिका वृत्ति चतुष्टयात्मिका है जो निम्न है—(१) वैखरी (२)
मध्यमा (३) पश्यन्ती (४) परा । बिन्दुरूपी रत्नाकर में उठती हुई तरङ्गें बाह्यात्मना
'नाद' एवं 'ज्योति' के रूप में उदित होती है । 'नाद' वाक् के रूप में एवं ज्योति
अर्थ के रूप में प्रकट होती है । वाक् एवं अर्थ परस्पर 'वागर्थाविव संपृक्तौ' परस्पर
संश्लिष्ट रहते हैं । इनमें प्रत्येक अवस्थात्रयात्मक होता है—(१) परम (२) सूक्ष्म
एवं (३) स्थूल । इसे ही अवरोह क्रम कहते हैं । इस प्रकार बिन्दु से वाक् की
यात्रा में निम्न पड़ाव आते हैं—(१) परा (२) पश्यन्ती (३) मध्यमा एवं (४)
वैखरी ॥
वाक् तत्त्व का मूल स्वरूप—वाक् तत्त्व अपने मूल में चिति शक्ति है और
इस प्रकार वाक् तत्त्व चितिशक्ति का ही रूपान्तरण है । 'स्पन्दप्रदीपिका' में कहा
गया है कि संविद् ही प्राणों के द्वारा वाग् रूप धारण करती है । वही वैखरी,
मध्यमा, पश्यन्ती एवं परा है । संविद् के आरोहण से ही परा, पश्यन्ती आदि
वाणियों का उदय होता है । संविद् सर्वमय है और वाक् का मूल संविद् है ।
वाक्यपदीयकार भर्तृहरि ने वाक् तत्व को 'शब्द' के रूप में ग्रहण करके शब्द
को ब्रह्मस्वरूप स्वीकार किया है—
'अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्वं यदक्षरम् ।
विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः ॥'
उन्होंने जगत् को शब्द का विवर्त मानकर समस्त स्थूल-सूक्ष्म जगत्, जागतिक
प्रपञ्च एवं उसके मूलभूत उपादानों को शब्द की परिणति स्वीकार किया है और
इस प्रकार वास्तविक सत्ता शब्द या वाक् तत्त्व को स्वीकार करते हुए जगत् को
उसकी प्रतिच्छाया, विवर्त, या परिणाम मानते हुए शब्द तत्व (वाक् तत्त्व) को ही
विश्व का मूल स्वीकार किया है । इस प्रकार वैयाकरणों की दृष्टि में जगत् का मूल
शब्द है, जगत् की स्थिति शब्द में है और अन्ततः जगत् का लय भी शब्द में ही
होगा । 'शब्द' ही निगुर्ण-सगुण, मूर्त-अमूर्त, स्थूल-सूक्ष्म, भौतिक-अभौतिक,
ऐन्द्रिय-इन्द्रियातीत, प्रकृत्यात्मक-प्रकृत्यातीत, आत्मिक-अनात्मिक, द्रष्टा-दृश्य-दर्शन
आदि सभी में अनुस्यूत है और सभी का मूलाधिष्ठान है ।

प्रथमोऽंशः ५१
'भाव' या ध्वनियों के विभिन्न स्तरों में जो प्रथम स्तर है वह 'परा' कहलाता
है और मूलाधार नामक निम्नतम चक्र में उदित होता है । ऊर्ध्ववर्ती स्तर पर
पहुँचने पर यही भाव (वाक्) 'पश्यन्ती' कहलाने लगता है । जब यह और दूर
तक यात्रा करता हुआ हृदय में पहुँचता है और 'बुद्धि' के साथ संयुक्त हो जाता है
तब यह 'मध्यमा' कहलाने लगता है । जब यही भाव और आगे जाकर मुख में
पहुँचता है और विवक्षा से युक्त होकर व्यक्त हो उठता है तब 'वैखरी' कहलाने
लगता है । इनमें से 'सूक्ष्मा' द्वारा 'पश्यन्ती' पश्यन्ती द्वारा 'मध्यमा' एवं मध्यमा
द्वारा 'वैखरी' वाक् का प्रादुर्भाव हुआ करता है—'तत्र सूक्ष्मा पश्यन्त्याः, पश्यन्ती
मध्यमायाः, मध्यमा वैखर्याश्च कारणं द्रष्टव्यम् ॥'१ ये ही शब्द (१) शुद्ध अध्वा में
सूक्ष्म (२) अशुद्ध अध्वा में स्थूलतर एवं (३) मिश्र अध्वा में स्थूल है । इस
प्रकार शब्दों की सूक्ष्मता का क्रम इस प्रकार है—(क) शब्द : शुद्ध अध्वा में सूक्ष्म
(ख) शब्द : मिश्र अध्वा में स्थूल (ग) शब्द : अशुद्ध अध्वा में स्थूलतर ।
तत्त्व की दृष्टि से वाग्विभाजन एवं विवरण—
(क) विद्यातत्त्व—(१) वैखरी = श्रोत्रविषया, स्थूल वर्णपरिग्रहा, वायु- संगिनी,
प्रयोगार्हा । 'विद्यातत्त्व' से सम्बद्ध । कारणभूत सप्तकोटि मन्त्रों, विद्या राज्ञी एवं
उनके भुवनों से सम्बद्ध । प्राणवृत्याभिव्यक्ता, श्रोत्रग्राह्यार्थविशेषबोधनक्षमा ।
(ख) सदाशिव तत्त्व—(२) 'मध्यमा' = बुध्युपारूढ़वर्ण, तत्क्रमविशेषोपेता,
प्राणवृत्त्यगोचरीभूता ॥ 'सदाशिवतत्त्व' ही मध्यमा वाक् का अधिष्ठान है । कामिक
आदि तन्त्र भेद के कारणों, प्रणवादिकों, सामीप्यादिकमुक्तिप्राप्त सिद्धों एवं उनके
भुवनों का कारण ।
(ग) शक्तितत्त्व—(३) 'पश्यन्ती' = मयूराण्डरसवत् अविभक्त वर्णार्थाविशेष-
बोधनाक्षमा । वर्णरूपानुसंधानविरहान्त, समुज्वल, मयूराण्डरसवत् निर्विशेषाथर्धारिका ।
'शक्तितत्त्व' ही पश्यन्ती वाक् का अधिष्ठान है । शिव शक्त्यधिष्ठानत्वेन इसे
शक्तितत्त्वपदवाच्यता प्राप्त हुई है ।
(घ) शिवतत्त्व—(४) 'परावाक्' = ज्ञानेकाश्रया अर्थसामान्यप्रकाशिका वाणी ॥
परावाक् 'शिवतत्त्व' में स्थित है । यही शान्त्यतीत भुवनों की भी अवस्थिति है ।
यह चिदेकशरणा एवं निर्विकल्पस्वरूपिणी है ।२ इसी वाक् को शैवपरिभाषा में
'सूक्ष्मा' के नाम से उल्लिखित किया गया है ।
वाणी का मूल स्रोत—जहाँ वाणी अपने मूल रूप में बीजात्मना अव्यक्तभाव
से (पराशक्ति के रूप में) स्थित है वह स्थान है—'मूलाधार चक्र ।' 'पश्यन्ती'
अवस्था में, यह मूलाधारस्थ अव्यक्त 'परावाक्' विकसित होकर अङ्कुरोन्मुख हो
उठता है । 'मध्यमा' अवस्था में अङ्कुरोन्मुख यह वाणी का बीज, और अधिक
१. शिवाग्रयोगीन्द्र ज्ञान शिवाचार्यः 'शैवपरिभाषा' (परि० चतुर्थ)
२. शैवपरिभाषा

५२ वरिवस्यारहस्ये
विकसित होकर परस्पर संयुक्त दो पत्तियों के रूप में प्रकट होता है । ‘वैखरी वाक्’
वाणी की वह अवस्था है जिसमें पृथक्-पृथक् रूप में अभिव्यक्त पत्तियों की भाँति
वाणी मुख (एवं उसके उच्चारण स्थानों) द्वारा स्पष्ट रूप से प्रकट होती है ।
‘नित्यतन्त्र’ के अनुसार—
(१) वायु के द्वारा सर्वप्रथम मूलाधार चक्र में वाक् का अव्यक्त आद्यस्वरूप
‘परावाक्’ जागृत होता है ।
(२) तदुपरान्त यह वायु और अधिक ऊपर उठकर स्वाधिष्ठान चक्र में व्यक्त
होती है और वाणी के अभिव्यक्ति की इस अवस्था को ‘पश्यन्तीवाक्’
कहते हैं ।
(३) यह वायु अनाहतचक्र में पहुँच कर एवं बुद्धि के साथ मिलकर वाणी को
अभिव्यक्ति की जो अवस्था प्रदान करता है उसे ‘मध्यमावाक्’ कहते हैं ।
(४) इसके उपरान्त मध्यमावाक् और अधिक प्रस्फुट अभिव्यक्ति के स्तर पर
आरूढ़ होने पर एवं विशुद्ध चक्र में व्यक्त होकर जो अवस्था प्राप्त
करता है उसे वैखरीवाक् कहते हैं । सारांश निम्नानुसार है—
(१) मूलाधार चक्र—परावाक् (क) अव्यक्तवाक् (ख) स्वाधिष्ठान चक्र (२)
पश्यन्तीवाक्—वाक् की अङ्कुरोन्मुखावस्था । (३) अनाहत चक्र—बुद्धि के साथ
संयोग : मध्यमा वाक् : प्रकट किन्तु संयुक्त पत्तों वाली । (४) विशुद्ध चक्र—
कण्ठ से व्यक्त : वैखरी वाक् ॥ पूर्ण प्रस्फुट ॥
‘पश्यन्ती’ = अ, सृष्टि, वामा, इच्छा । ‘मध्यमा’ = इ, रक्षा, ज्येष्ठा,
ज्ञाना । ‘वैखरी’ = ‘म’ ओम् । विनाशा रौद्री । क्रिया ॥
अम्बिका शक्ति + शान्ता शक्ति का सामरस्य—वामा (इच्छा), ज्येष्ठा (ज्ञान),
रौद्री (क्रिया) का विकास (= पूर्ण गिरि, जालंधर एवं उड्डीयान पीठ का विकास)
= ‘पश्यन्ती’ ‘मध्यमा’ एवं वैखरी वाक् । भगवान् शङ्कराचार्यजी ने ‘प्रपञ्चसारतन्त्र’
में वाक् चतुष्टय की उत्पत्ति एवं उनके स्वरूप का निम्नानुसार विवेचन किया है—
‘मूलाधारात प्रथममुदितो यस्तु भावः पराख्यः ।
पश्चात् पश्यन्त्यथ हृदयगो बुद्धियुङ्मध्यमाख्यः ।
वक्त्रे वैखर्यथ रुरुदिषोरस्य जन्तोः सुषुम्ना ।
बद्धस्तस्माद्भवति पवनप्रेरितो वर्णसङ्घः ॥’
आचार्य पद्मपाद-कृत वाणी-विभाग—आचार्य पद्मपाद ने प्रपञ्चसारतन्त्र की
टीका में वाक् तत्त्व के ५ एवं ७ भेद किये हैं जो निम्न हैं—(१) शून्य (२)
संवित् (३) सूक्ष्मा (४) परा (५) पश्यन्ती (६) मध्यमा (७) वैखरी ।
(१) सूक्ष्मा (२) परा (३) पश्यन्ती (४) मध्यमा (५) वैखरी । इनमें ‘शून्य’
वह है जो स्पन्दशून्य वाक् के रूप में स्थित है । ‘संवित्’ का अर्थ है—सिसृक्षु ।
‘सूक्ष्मा’ का अर्थ है—उत्पत्ति की अवस्था । ‘परा’ का अर्थ है—मूलाधार में

प्रथमोऽंशः ५३
प्रथमोदित । (अथवा सूक्ष्मा, परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरीति पञ्चपदीं वाचमाश्रित्याह
मूलाधारादिति । सप्तपद्यपि वागनेनैव सूचिता । शून्य-संवित्सूक्ष्मादीनि सप्तपदानि ।
तत्रानुत्पन्ना निष्पन्दा 'शून्या' ।। वागुत्पित्सुः 'संवित्' । उत्पत्यवस्था 'सूक्ष्मा' ।
मूलाधारात् प्रथममुदिता परेति विभागः ।।'१
स्वच्छन्दागम एवं वाग्विभाग—
'तस्माच्छून्यं समुत्पन्नं शून्यात्स्पर्शसमुद्भवः ।
तस्मान्नादः समुत्पन्नः पूर्वं वै कथितस्तव ।।'
—इस श्लोक द्वारा 'स्वच्छन्दतन्त्र' में शून्य (व्यापिनी) स्पर्श (शक्ति) आदि
की ओर सङ्केत करके वाणी के ७ भेदों की ओर सङ्केत किया गया है ।
'शब्दब्रह्मणि निष्णातः परब्रह्माधिगच्छति ।।'
'शब्दब्रह्म' = परावाक् = कुण्डलिनी = प्रणव = ओंकार 'परब्रह्म ।।'
'शब्दब्रह्म' ➔ 'परब्रह्म'
वैखरी वाक्
(कोई प्रकाशन नहीं है।)
मध्यमा वाक्
(चेतन । प्रकाशित)
पश्यन्ती वाक्
(चेतन । प्रकाशित)
परा वाक्
(शब्दब्रह्म)
शब्दातीत 'परब्रह्म'
शब्द-सोपान ➔
४. सूक्ष्मतम | परा वाक्
३. सूक्ष्मतर | पश्यन्ती वाक्
२. सूक्ष्म | मध्यमा वाक्
१. स्थूल | वैखरी वाक्
१. प्रपञ्चसार टीका