वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० वरिवस्यारहस्ये
'विमर्श' शिव का स्वभाव है । सृष्टि अवस्था में विश्वाकार होने से स्थिति में
विश्व को प्रकाशन के द्वारा, एवं संहार के समय विश्व को आत्मसात करने से
शिव में जो पूर्ण अकृत्रिम अहंभाव है उसी को 'विमर्श शक्ति' कहते हैं ।१
पुण्यनन्द ने इसी आद्या शक्ति को 'शिवरूपविमर्श निर्मलादर्श:' कहा है ।२ शक्ति
विमर्शरूपिणी है । 'विमर्श' है—पूर्ण अकृत्रिम अहंभाव की स्फूर्ति । बिना शक्ति के
शिव को अपने प्रकाशरूप का ज्ञान नहीं होता । शक्ति के बिना शिव शव हैं—
विभिन्न विमर्शों का स्वरूप निम्नानुसार है—
(क) 'शिवतत्त्व' में— 'अहं' विमर्श होता है ।
(ख) 'सदाशिवतत्त्व' में— 'अहमिदं' विमर्श होता है ।
(ग) 'ईश्वरतत्त्व' में—'इदमहं' विमर्श होता है ।
शैव-शाक्त तन्त्रों में तत्त्वों को निम्न रूप से वर्गीकृत किया गया है— (१)
शिवतत्त्व (२) विद्यातत्त्व (३) आत्मतत्त्व । इसी 'शिवतत्त्व' के दो रूप हैं— (क)
'शिवतत्त्व' (ख) 'शक्तितत्त्व' ।
'शक्ति' को प्रथम 'स्पन्द' भी कहा गया है । जगत् की रचना करने वाले
परमेश्वर की जो प्रथम स्पन्दरूप इच्छा है वही 'शक्ति' है ।३
'यदयमनुत्तरमूर्ति- र्निजेच्छयाऽखिलमिदं जगत्स्रष्टुम ।
पस्पन्दे स स्पन्दः प्रथमः शिवतत्त्वमुच्यते तज्ज्ञैः ।।४
शिव— 'शिवो जगदुत्पादयति पाति संहरति ।।' स्पन्दसूत्रों में कहा गया है कि
जिसके उन्मेष एवं निमेष से जगत् की सृष्टि एवं प्रलय होते हैं उस 'शक्तिचक्र
विभवप्रभव' शङ्कर की हम स्तुति करते हैं—
'यस्योन्मेष निमेषाभ्यां जगत्ः प्रलयोदयौ ।
तं शक्तिचक्रविभवप्रभवं शङ्कर स्तुमः ।।'
अर्थात् शङ्कर या शिव उस परासत्ता का अभिधान है जो जगत् की सृष्टि एवं
प्रलय का सूत्रधार है । 'शिव' के अन्य पर्याय निम्नांकित हैं—
'शंभुरीशः पशुपतिः शिवः शूली महेश्वरः ।
ईश्वरः सर्व ईशानः शङ्करश्चन्द्रशेखरः ।।' आदि ।।५
'भगवान् शिव जगत् को उत्पन्न करते हैं, उसका पालन एवं संहार करते
हैं ।।' (शिवो जगदुत्पादयति पाति संहरति ।।') 'शिव' शब्द अनेकार्थवाची है—
'शिवो मोक्षे महादेवे कीलकग्रहयोगयोः । बालके गुग्गुलौ वेदे पुण्डरीकद्रुमेऽपि च ।
सुखे क्षेमे जले क्लीबं ।।'६
१. पराप्रावेशिका (पृ० १-२) २. कामकलाविलास
३. पराप्रावेशिका ४. षट्त्रिंशत्तत्वसन्दोह
५-६. अमरकोश