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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 126, कुल 530 में से

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पृष्ठ 126

२४ वरिवस्यारहस्ये
शक्तिस्वभाव परमशिव असंख्य शक्तियों से समन्वित है तथापि शक्तिपञ्चक ही
उसकी मुख्य शक्तियाँ हैं जो निम्न हैं—चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान और क्रिया।
सगुण शिव—'परमशिव' का शिवतत्त्व के रूप में अवभासन ही उसके सगुण
स्वरूप की अभिव्यक्ति है और इस रूप में वह शिव 'पञ्चकृत्यकारी' हैं—
सृष्टिसंहारकर्तारं विलयस्थितिकारकम् ।
अनुग्रहकरं देवं प्रणतार्तिविनाशनम् ॥१
१. आभासन, २. रक्ति, ३. विमर्शन, ४. बीजावस्थापन, ५. विलापन।२
आचार्य क्षेमराज ने भी शिव को पञ्चकृत्यविधायी कहा है—
'नमः शिवायसततं पञ्चकृत्यविधायिने ।
चिदानन्दघनस्वात्म परमार्थविभासिने ॥३
तथापि तद्वत पञ्चकृत्यानि करोति ॥'४ 'पञ्चविधकृत्यकारित्वंचिदात्मनो
भगवतः ॥'५ परमशिव की विश्वोत्तीर्णता एवं विश्वमयता में विरोध नहीं है इसीलिए
उसे विश्वोत्तीर्ण कहकर भी विश्वमय (सगुण शिव) कहा गया है—'इह खलु
निखिलजगदात्मा सर्वोत्तीर्णश्च सर्वमयश्च विकल्पासङ्कुचितसंवित्प्रकाशरूपः, अनवच्छिन्न-
चिदानन्दविश्रान्तः प्रसरदविरल विचित्रपञ्चवाहवाहवाहिनीमहोदधिः । निरतिशयस्वातन्त्र्य-
सीमनि प्रगलभमानः सर्वशक्तिखचित एक एव अस्ति संविदात्मा महेश्वरः ॥६
उसकी शक्तियों का स्वरूप निम्नानुसार है—
(१) 'चिच्छक्तिः'—तस्य प्रकाशरूपता चिच्छक्तिः ।
(२) 'आनन्द शक्तिः'—स्वातन्त्र्यम् आनन्दशक्तिः ।
(३) 'इच्छा शक्तिः'—तच्चमत्कारः इच्छाशक्तिः ।
(४) 'ज्ञान शक्तिः'—आमर्शात्मकता ज्ञानशक्तिः ।
(५) 'क्रिया शक्तिः'—सर्वाकारयोगित्वं क्रियाशक्ति ॥७
'उत्पादयति पाति संहरति'—अर्थात् “शिव जगत् की सृष्टि करते हैं, उसकी
रक्षा करते हैं और उसका संहार करते हैं ।” शिव को इन कार्यों से विशिष्ट क्यों
दिखाया गया है?
'शान्त ब्रह्मवाद' एवं 'ईश्वराद्वयवाद'—त्रिकदर्शन के आचार्यों ने निर्विशेष,
निष्क्रिय एवं निर्गुण ब्रह्म को 'शान्तब्रह्म' कहा है तथा उसको परासत्ता से प्रतिपादित


१. स्वच्छन्दतन्त्र (१ पटल) २-५. प्रत्यभिज्ञाहृदयम्
६. जन्म-मरण विचार
७. पाँच शक्तियाँ ही नहीं हैं प्रत्युत् अनन्त शक्तियाँ हैं तथापि पाँच शक्तियाँ प्रमुख
हैं—'इत्थं सर्वशक्तियोगेऽपि आभिर्मुख्याभिः शक्तिभीरुपचर्यते ।।
—'जन्म-मरण विचार'