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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 120, कुल 530 में से

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१८ वरिवस्यारहस्ये
शक्ति को प्रकार त्रयात्मक बताया गया है—शक्तयस्तिस्रः प्रभावोत्साह-
मन्त्रजाः ॥' (शक्यते जेतुमनया । 'स्त्रियां क्तिन्' ३।३।९४) हैमकोश के अनुसार
'शक्ति' शब्द का अर्थ निम्नानुसार है—'शक्तिरायुधभेदे स्यादादुत्साहादौ बले-
स्त्रियाम् ॥'१ विश्वकोश के अनुसार—'शक्ति' शब्द निम्न अर्थों का वाचक है—
'कासूर्विकलवाचि स्यात्कासूः शक्त्यायुधेऽपि च ॥'२
विमर्श शक्ति तत्त्व—शिव प्रकाशरूप है तो शक्ति विमर्शरूपिणी । 'विमर्श'
का अर्थ है—'मै पूर्ण हूँ, मै अकृत्रिम हूँ'—इसकी स्फूर्ति । यह स्फूर्ति (या
स्फुरत्ता) (१) सृष्टिकाल में—विश्वाकारा (२) स्थितिकाल में—विश्वप्रकाशा एवं (३)
प्रलयकाल में—विश्वसंहरणरूपा बन जाती है । अतः 'विमर्शो नाम विश्वाकारेण,
विश्वप्रकाशेन, विश्वसंहारेण चाकृत्रिममाहमिति स्फुरणम् ।'३ 'विमर्शशक्ति' के अन्य
पर्याय निम्न हैं—चित्, चैतन्य, संवित, स्वरमोदिता, परावाक्, स्वातन्त्र्यामुख्यैश्वर्या,
कर्तृत्व, स्फुरत्ता, सारा एवं स्पन्द आदि ।
'प्रभा' के दो रूप है—(१) 'अहमंश' (२) 'इदमंश' । अहमंशग्राहक, तो
शिव या 'प्रकाश' हैं, तथा इदमंशग्राहक शक्ति या 'विमर्श' है । 'विमर्श' के द्वारा
ही 'प्रकाश' का स्वानुभव हो पाता है । प्रकाश की सत्ता के बिना 'विमर्श' की
कल्पना भी नहीं की जा सकती । जिस प्रकार दर्पण के बिना मुखमण्डल का रूप
प्रत्यक्षीकृत नहीं हो पाता उसी प्रकार विमर्श के बिना प्रकाश के स्वरूप की
संभावना नहीं हो सकती । शक्ति की सहायता के बिना शिव को अपने स्वरूप की
प्रतीति नहीं हो सकती । इसीलिए कहा गया है—'शिवा' शिव का मुख है—
'शैवीमुखमिहोच्यते ।'
पुण्यानन्दनाथ ने 'कामकलाविलास' में कहा है कि जिस प्रकार कोई नृपति
निर्मल दर्पण में अपने प्रतिबिम्ब को देखकर अपने मुख की सुन्दरता को भलीभाँति
जान लेता है उसी प्रकार भगवान् शिव भी अपनी स्वाधीनभूतात्म शक्ति को देखकर
स्वीय परिपूर्णाहन्तामय स्वरूप को जान लेते हैं ।
'सा जयति शक्तिराद्या निजसुखमय नित्यनिरूपमाकारा ।
भाविचराचरबीजं शिवरूपविमर्शनिर्मलादर्शः ॥'४
यह विमर्श शक्ति परमशिव में नित्य अन्तर्लीन है—
'सकल भुवनोदयस्थितिलयमय लीलाविनोदनोद्युक्तः ।
अन्तर्लीनविमर्शः पातु महेशः प्रकाशमात्रतनुः ॥'५
'प्रकाश' विमर्शात्मक है और 'विमर्श' प्रकाशात्मक है । सांराश यह है कि—
'न शिवेन विना देवी न देव्या च विना शिवः ।
ना नयोरन्तरं किंचिच्चन्द्रचन्द्रिकयोरिव ॥'
१. हैमकोश २. विश्वकोश
३. पराप्रवेशिका ४-५. पुण्यानन्दनाथ-कामकला विलास