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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 132, कुल 530 में से

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पृष्ठ 132

३० वरिवस्यारहस्ये
'मनस्त्वं व्योमस्त्वं मरुदसि मरुत्सारथिरसि,
त्वमापस्त्वं भूमिस्त्वयि परिणतायां नहि परम् ।
त्वमेव त्वामात्मानं परिणमयितुं विश्ववपुषा,
चिदानन्दाकारं शिवयुवति भावेन विभृषे ॥ ३५ ॥'
आचार्य शङ्कर 'सौन्दर्यलहरी' के इस श्लोक द्वारा स्वाभीष्ट 'परिणामवाद' की
पुष्टि करते हैं ।१
आचार्य भास्करराय का परिणामवाद—योगिराज भास्करराय सृष्टि के सन्दर्भ
में 'परिणामवाद' के प्रतिपादक हैं । किन्तु यह 'परिणाम' सामान्य परिणाम से भिन्न
है । जिस प्रकार मिट्टी एवं उसके परिणाम रूप घट में कोई भेद नहीं हैं उसी
प्रकार ब्रह्म एवं जगत् में कोई भिन्न नहीं है । ब्रह्म सत्य है तो जगत् भी सत्य है।
भेद मात्र ही मिथ्या है—वस्तुतस्तु जगतो ब्रह्मपरिणामकत्वं स्वीकुर्वतां तांत्रिकाणां मते
जगतः सत्यत्वमेव मृद्घटयोरिव ब्रह्मजगतोरत्यन्तभेदेन ब्रह्मणः सत्यत्वेन जगतोऽपि
सत्यत्वावश्यम्भावात् भेदमात्रस्य मिथ्यात्व स्वीकारेण अद्वैतश्रुती नामखिलानां
निर्वाहः ।'२
आचार्य भास्करराय ने 'वाचारंभणंविकारः'—(छा०उ०) 'आत्मकृतेः परिणामात्'
(ब्रह्मसूत्र) को उद्धृत करके 'वरिवस्यारहस्यम्' में परिणामवाद की पुष्टि ही नहीं की
प्रत्युत यह भी कहा कि वेदों की एवं ब्रह्मसूत्रकार की भी यही दृष्टि थी ।
'श्रीकण्ठभाष्य' में भी परिणामवाद का समर्थन किया गया है—
'कारणविकाररूपोहि परिणाम पूर्वरूपपरित्यागेन रूपात्तरापत्तिः परिणामः ॥'
वल्लभाचार्य ने 'परिणामवादएवाभिप्रेतः'३ कहकर, निम्बार्काचार्य ने 'सर्वज्ञं
सर्वशक्ति ब्रह्म स्वशक्तिविक्षेपेण जगदाकारं स्वात्मानं परिणामय्य अव्या कृतेन स्वरूपेण
शक्तिमता कृतिमत्ता परिणतमेव भवति ।'४ भास्कराचार्य ने 'परमात्मा स्वयमात्मानं
कार्यत्वेन परिणामयामासेत्यर्थः ।'५ कहकर एवं श्रीपति पण्डित ने 'चेतना चेतनात्मक
प्रपञ्चाकारेण परिणामात् । ननुदधि-क्षीर न्यायवत् स्वस्वरूप परित्यागपूर्वक रूपान्तर
प्राप्तिरेव परिणामः ।'६ कहकर 'परिणामवाद' का प्रतिपादन किया है ।
किन्तु यह 'परिणामवाद' रामानुजाचार्य (श्रीभाष्य में) के परिणामवाद से भिन्न
है ।
१. लक्ष्मीधर—'लक्ष्मीधरा' व्याख्या—"परिणमयितुं परिणाम वन्तं कर्तुं"
'डिण्डिमभाष्य'—"तदाकार परिणामनम् । त्वमेवाष्टमर्तिरूपेण परिणतासि'
'अष्टमूर्तिरूपेण परिणतायाम्', 'आभ्यां परिणामाभ्यामेव जगच्चक्रं उन्मूलयति' ।
'गोपालसुन्दरी टीका'—'परिणमयितुं परिणामं प्रापयितुं ।
२. 'सौभाग्यभास्करः' (पृ० १५१) ३. अणुभाष्य
४. 'वेदान्त पारिजात' (१।४।६) ५. भास्कराचार्य
६. श्रीपतिपण्डित 'श्रीकरभाष्य'