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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 130, कुल 530 में से

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पृष्ठ 130

२८ वरिवस्यारहस्ये
('परिणामवाद' एवं चतुर्विधा सृष्टि)
उस 'विमर्शरूपिणी' शक्ति को सम्यक रूप से (एवं) अवश्य जानना चाहिए
जिसके परिणामस्वरूप (यह) अर्थमयी, शब्दमयी, चक्रमयी एवं देहमयी सृष्टि (हुई)
है ॥ ५ ॥

  • प्रकाश *
    अवश्यम्, सर्वविज्ञानसाधनत्वान्मोक्षादिपुरुषार्थप्रदत्वाच्च । अर्थमयी शिवादि-
    क्षित्यन्तषट्त्रिंशत्तत्त्वरूपा । शब्दमयी परादिवैखर्यन्ता । चक्रमयी बिन्द्वादिभूगृहान्ता ।
    देहमयी सूक्ष्मादिस्थूलान्ता ॥ ५ ॥
  • सरोजिनी *
    आचार्य भास्कर कहते हैं कि—विमर्शरूपिणी शक्ति को इसलिए अवश्यमेव
    जानना चाहिए क्योंकि वह समस्त विज्ञानों का साधन है एवं धर्म, अर्थ, काम एवं
    मोक्ष प्रदान करती है—'अवश्यम्, सर्वविज्ञान साधनत्वान्मोक्षादिपुरुषार्थप्रदत्वाच्च ।।'
    अर्थमयी—शिवादि क्षित्यन्तषट्त्रिंशत तत्त्वरूपा । अर्थात् समस्ततत्त्वमय ।
    'परशुराम कल्पसूत्र' में कहा गया है कि तत्त्व छत्तीस हैं—'षट्त्रिंशत्तत्वानिविश्व' ।
    ये तत्त्व तीन भागों में विभक्त है—(१) 'आत्मतत्त्व' (२) 'विद्यातत्त्व' (३) एवं
    'शिवतत्त्व' । ये ३६ तत्त्व निम्न हैं—(१) शिव (२) शक्ति (३) सदाशिव (४)
    ईश्वर (५) शुद्धविद्या (६) माया (७) अविद्या (८) कला (९) राग (१०) काल
    (११) नियति (१२) पुरुष/जीव (१३) प्रकृति (१४) मन (१५) बुद्धि (१६)
    अहङ्कार (१७-२१) श्रोत्रादि पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ (२२-२६) वागादि पञ्चकर्मेन्द्रियाँ (२७-
    ३१)—रूपादि पञ्चमहाविषय (३२-३६)—आकाशादिक पञ्चभूत । भगवती समस्त
    विश्व को जन्म देने में स्वतन्त्र हैं ।
    'चितिः स्वतन्त्रा विश्वसिद्धि हेतुः ॥'१ क्षेमराज कहते हैं—'विश्वस्य'
    सदाशिवादेः भूम्यन्तस्य 'सिद्धौ' निष्पत्तौ, प्रकाशने स्थित्यात्मनि, पर प्रमातृ-
    विश्रान्त्यात्मनि च संहारे, पराशक्तिरूपा 'चितिः' एव भगवती 'स्वतन्त्रा' अनुत्तर
    विमर्शमयी शिवभट्टारकाभिन्ना 'हेतु' कारणम् !'
    'ननु जगदपि चितो भिन्नं नैव किंचित् ॥'२
    शब्दमयी—शब्द की चार वृत्तियाँ हैं—(१) 'परा' (२) 'पश्यन्ती' (३)
    'मध्यमा' (४) 'वैखरी' ।। भगवती इन रूपों में भी परिणत होती हैं क्योंकि वे
    शब्दरूपा हैं—वे परा-पश्यन्ती-मध्यमा-वैखरीरूपा हैं—'परा प्रत्यक्चितीरूपा पश्यन्ती
    पर देवता । मध्यमा वैखरीरूपा भक्त मानस हंसिका ॥'३ वेदों में वाक्चतुष्टय का
    उल्लेख है 'चत्वारि वाक् परिमिता पदानि । तानिविदुर्ब्राह्मणो ये मनीषिणः । गुहा
    त्रीणि निहिता नेंगयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति ॥'
    १-२. क्षेमराज—'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' ३. श्रीललितासहस्रनाम