वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽंशः २१
त्रिपुरासिद्धान्तर्गत 'परशुरामकल्पसूत्र' (१।४) की टीका में श्रीरामेश्वर ने ३६
तत्त्वों का विवरण दिया है और इसी प्रकार मृगेन्द्रसंहिता एवं 'षट्त्रिंशत्तत्व- संदोह'
में भी इसका सविस्तार विवरण दिया गया है। 'परशुरामकल्पसूत्र' (१।४) की
टीका में कहा गया है कि सृष्टि के आदि में स्वकीयस्वरूपमात्र में अवस्थित
परमशिव में जो 'एकोऽह बहुस्याम' के रूप में इच्छा उत्पन्न हुई वही 'इच्छाशक्ति'
है और उसी से 'ज्ञानशक्ति' एवं ज्ञानशक्ति से क्रियाशक्ति उत्पन्न हुई। इस शक्तित्रय
के सहयोग से शब्द सृष्टि एवं अर्थसृष्टि प्रारब्ध हुई। इस सृजनेच्छाशक्ति से विशिष्ट
परमशिव ही 'शिवतत्त्व' है। वैसे तो परमशिवं 'निर्गुण' हैं किन्तु सिसृक्षा के उदित
होते ही वे 'सगुण' एवं शक्तियुक्त हो जाते हैं।
'सौभाग्यभास्कर' में श्रीभास्करराय कहते हैं—प्रलयकाल में सूक्ष्मावस्थापन्न
जगत् को गर्भीकृत करके शक्ति शिव में विलीन हो जाती है। ऐसी स्थिति में
क्रियाशक्ति भी नहीं रहती। इस अवस्था में स्थित शिव ही निर्गुण ब्रह्मस्वरूप
'परमशिव' कहलाते हैं। सृष्टि की उन्मुखावस्था में परमशिव के 'ईक्षण', 'काम',
'तप', 'विचिकीर्षा' आदि के रूप में प्रथम स्पन्दन होता है। और इसी से शक्ति
का विकास होता है। इस शक्ति से युक्त परमशिव ही प्रथम तत्त्व 'शिव' कहलाते
हैं। इसी तथ्य को 'षट्त्रिंशत्तत्वसन्दोह' में इस प्रकार कहा गया है—
'यदयनुत्तरमूर्तिर्निजेच्छयाऽखिलमिदं जगत्स्रष्टुम् ।
स्पन्दते स स्पन्दः प्रथमः शिवतत्त्वमुच्यते तज्ज्ञैः ॥१
जब अनुत्तरमूर्ति परमशिव स्वेच्छावश जगत् की सृष्टि करने के लिए स्पन्दित
हुए तब सृष्टि की इस उन्मुखावस्था में उनका जो प्रथम स्पन्दन हुआ वही
'शिवतत्त्व' है।२
प्रत्येक जीव में स्थित शिवतत्त्व ही आत्मतत्त्व है। यह चैतन्यरूप है।
'चैतन्यमात्मा'३ इसे ही 'परासंवित्' परमेश्वर 'शिव' या 'परमशिव' कहते हैं। यह
जड़ाजड़ सभी सत्ताओं में व्यष्टि-समष्टि रूप में स्थित है। यह देशकालातीत होते
हुए भी सभी देशों एवं कालों में, एक होते हुए भी अनन्त रूपों में स्थित है।
अद्वैत होते हुए भी द्वैत रूप से भासमान है। यह विश्वरूप होते हुए भी
विश्वातीत है। समस्त जगत् इसी तत्त्व का अभिन्नरूप है। 'परमशिव' स्वयं ३६
तत्त्वों के रूप में जगत् में भासित होता है। इस विश्वोत्तीर्ण, विश्वात्मक,
परमानन्दरूप एवं प्रकाशैकघन 'शिव तत्त्व' का ही (अपने से लेकर पृथ्वीपर्यन्त)
३६ तत्त्व अपना अभिन्न स्फुरण है यही परमशिव भट्टारक नाना वैचित्र्यों के रूप में
स्वयं स्फुरित होते हैं।४ क्षेमराज कहते हैं—'अखिलम् अभेदेनैव स्फुरति ॥'
'श्रीमत्परमशिवस्य पुनः विश्वोत्तीर्ण विश्वात्मक परमानन्दमय प्रकाशैकघनस्य एवं
विधमेव शिवादिधरण्यन्तं अखिलं अभेदेनैव स्फुरति, न तु वस्तुतः अन्यत्
१. आचार्य क्षेमराज—ष०त्रिं०त०सं० २. शाक्तदर्शनम्
३. शिवसूत्र (१।१) ४. प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (पृ० ३,८)