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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 125, कुल 530 में से

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प्रथमोऽंशः २३
भी संभव नहीं है । इसी तत्त्वातीत अवस्था को शैवागम में 'अकथ्या' एवं
'अन्तःस्वानन्दगोचरा' कहा गया है ।
'विज्ञानभैरव' में कहा गया है कि यह न तो नवात्मा है, न तत्त्वरूप है, न
शब्दराशि है, न त्रिशिराभैरव है, न शक्तित्रयात्मक है, न नादबिन्दुम flag? नहीं: नादबिन्दुमय है, न
चन्द्रार्धनिरोधिका है, न वर्णचक्र में स्थित अहंस्वभाव या षट्चक्रात्मक ही है और न
तो शक्तिस्वरूप ही है प्रत्युत् वह दिक्कालकलनोन्मुक्त, अव्यपदेश्य, अकथ्य,
अन्तःस्वानुभवानन्द एवं विकल्पोन्मुक्तगोचर है—
'तत्त्वतो न नवात्माऽसौ शब्दराशिन भैरवः ।
न चासौ त्रिशिरा देवो न च शक्तित्रयात्मकः ।
नादबिन्दुमयो वापि न चन्द्रार्धनिरोधिकाः ।
न चक्रक्रमसंभिन्नो न च शक्तिस्वरूपकः ।
दिक्कालकलनोन्मुक्ता देशोदेशाविशेषिणी ।
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