सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 116

१४ वरिवस्यारहस्ये
१३. यह 'विमर्श' ही उसकी अपने महेश्वरता की पूर्ण प्रतीति है—'स एव
विमृशत्वेन नियतेन महेश्वरः ।।'१
१४. प्रकाश एवं विमर्श अभिन्न होते हुए भी 'प्रकाश' शिवरूप है एवं 'विमर्श'
शक्तिरूपा है । शिव एवं शक्ति का यह नित्य सामरस्य ही 'परमशिव' है ।
१५. शिव के बिना शक्ति का अपना कोई अस्तित्व नहीं और शक्ति के बिना
शिव स्कटिक आदि की भाँति जड़ हो जाएगा क्योंकि स्फटिक एवं मणि आदि
प्रकाशरूप होते हुए भी अपनी सत्ता का विमर्शन (प्रतीति) नहीं कर सकते ।
इसीलिए कहा गया है—
'न शिवः शक्तिरहितो न शक्तिर्व्यतिरेकिणी । शिवशक्तस्तथाभावानिच्छया
कर्तुमीहते । शक्तिशक्तिमतोर्भेदः शैवे जातु न वर्ण्यते ।।'२ शक्तिस्वभाव से शक्त होने
पर ही शिव कर्ता बन पाता है अन्यथा नहीं ।
१६. शक्ति ही आत्मारूप परमशिव का 'विमर्श' है । इसी 'विमर्श' के बल पर
शिव 'कर्तुं' 'अकर्तुं' एवं अन्यथाकर्तुं में समर्थ हैं क्योंकि 'विमर्शोहि सर्वसहः परमपि
आत्मीकरोति, आत्मानं च परीकरोति, उभयम् एकीकरोति एकीकृतं द्वयमपि
न्यग्भावयति इत्येवं स्वभावः ।।'३
१७. शिव से लेकर पृथिवीपर्यन्त ३६ तत्त्वों में अभेदरूप से स्फुरित आत्मा का
इच्छाप्रसार ही उस विश्वोत्तीर्ण परम शिव का विश्वात्मक रूप है । इसे, शैव तन्त्रों
में 'विमर्श' कहा गया है । 'विमर्श' विश्वात्मक है । विमर्श परमशिव की शक्ति है।
विमर्शा (शक्ति) का स्फार ही यह समस्त प्रपञ्च है—क्रियाशक्तिरेऽव (स्वातंत्र्या!मर्श-
रूपायाः) अयं सर्वोविस्फारः ।।'४
१८. 'विमर्श' चिदात्मा के प्रकाश स्वरूप की प्रतीति है । यह 'विमर्श' ही
उसका 'स्वातंत्र्य' है । इसके द्वारा परमशिव परनिरपेक्ष होकर स्वात्ममात्र की पूर्णता
में विश्रान्त रहता है उसकी पर-निरपेक्ष आत्मपूर्णता की प्रतीति ही उसका आनन्द
है.... 'स एव परानपेक्षः पूर्णत्वादानन्दरूपो' क्योंकि 'अन्यनिरपेक्षतैव परमार्थतः
आनन्दः'५ चित्अंश शिवभाव है और आनन्दांश शक्तिभाव है अतः परमशिव का
जो आनन्द है उसका भी अधिष्ठान 'विमर्श' है । एक ही शिव प्रकाशस्वरूप के
प्राधान्य की दृष्टि से 'विश्वोत्तीर्ण' है और विमर्शस्वरूप के प्राधान्य से विश्वमय है
अतः परमशिव की विश्वमयता का आधार भी 'विमर्श' ही है । विमर्श ही उसकी
स्वातंत्र्य शक्ति है ।
१९. परमेश्वर प्रकाशात्मा है और प्रकाश विमर्शस्वभाव है—'परमेश्वरः
प्रकाशात्मा प्रकाशश्च विमर्शस्वभावः ।।'६
१. ईश्वरप्रत्यभिज्ञा (१-१।८।११) २. शिवदृष्टि (३।२-३)
३-४. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (भाग-२, पृ० ५, ४२)
५. ई०विम० (भाग-१, पृ० २०७) ६. पराप्रावेशिका