वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽंशः १५
'विमर्श'—प्रकाशात्म शिवरूपी दीपक की प्रभा ही 'विमर्श शक्ति' कही गई
है—'शिवस्य प्रकाशात्मनो दीपस्य शक्तिर्विमर्शाख्यैव प्रभा ।'१
'विमर्श' उस नित्य शक्ति को कहते हैं जो शिव के भीतर पूर्वस्थित पदार्थों के
अवभासन में सहायता करती है । परमात्मा का आनन्दरूपांश ही 'स्फुरत्ता'
'पराअहंता', 'पराललिता भट्टारिका' 'त्रिपुरसुन्दरी' एवं 'विमर्श' आदि पदों द्वारा
अभिहित किया जाता है—'तस्य चानन्दरूपांश एवं स्फुरणं परा अहंता, विमर्शः,
पराललिता भट्टारिका, त्रिपुरसुन्दरी, इत्यादि पदैः व्यवह्रियते ।'२ 'विमर्श' शिव का
स्वभाव है । तत्त्व प्रकाशात्मा है और विमर्श ही उसका स्वभाव है । 'सृष्टि' अवस्था
में विश्वाकार होने से, 'स्थिति' अवस्था में विश्व को प्रकाशन द्वारा तथा 'संहार'
अवस्था में आत्मसात् करने से शिव में पूर्ण जो अकृत्रिम अह॑भाव है उसी को
'विमर्श' शक्ति कहते हैं ।३ यदि शिव में 'विमर्श' शक्ति न होती तो वे अनीश्वर
एवं जड़ हो जाएंगे । चित, चैतन्य, परावाक, परमात्मा का ऐश्वर्य, कर्तृत्व, स्फुरत्ता
आदि 'विमर्श' के ही पर्यायवाची शब्द हैं ।
व्युत्पत्ति की दृष्टि से 'विमर्श' शब्द 'वि' उपसर्ग सहित 'मृश' धातु से घञ्
प्रत्यय लगाकर निष्पन्न हुआ है और उसका अर्थ है—किसी तथ्य का अनुसंधान,
किसी विषय का विवेचन या समीक्षा । दार्शनिक दृष्टि से 'विमर्शतत्त्व' इस अर्थ से
पृथक् एक पारिभाषिक पद के रूप में व्यवहृत होकर परम शिव की समवायिनी
पराशक्ति के अर्थ में व्यवहृत होता है ।
परमेश्वर के हृदय में सिसृक्षा उत्पन्न होते ही उनके जो दो रूप हो जाते हैं
उनमें से शिवरूप 'प्रकाश' है एवं शक्तिरूप 'विमर्श' है । 'विमर्श' का अर्थ है
अकृत्रिम एवं पूर्णतम अहं की स्फूर्ति । विमर्शस्वरूपा स्फूर्ति सृष्टिकाल में विश्वाकार
में रूपायित होने एवं प्रलयकाल में विश्वसंहरण (विश्व को अन्तर्विलीन करने) के
रूप में प्रस्तुत होती है । 'विमर्शो नाम विश्वाकारेण विश्वप्रकाशेन विश्वसंहरेण च
अकृत्रिमाहमिति स्फुरणम्' ।।४ विमर्श के द्वारा प्रकाश का अनुभव होता है और
प्रकाश की स्थिति में विमर्श की कल्पना सङ्गत होती है । जिस प्रकार दर्पण के
बिना मुख का प्रत्यक्षीकरण संभव नहीं हो पाता उसी प्रकार विमर्श के बिना प्रकाश
का स्वरूप पूर्ण नहीं हो पाता । जिस प्रकार शर्करा में माधुर्य एवं सुरा में मादकता
होते हुए भी उन्हें इनका ज्ञान नहीं होता उसी प्रकार शक्ति के बिना शिव को
अपने प्रकाशस्वरूप का ज्ञान नहीं हो पाता। शिव में अपने चैतन्य का ज्ञान 'शक्ति'
के माध्यम से होता है । यदि शक्ति नहीं तो शिव मात्र शव रह जाता है—
'शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं ।
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि ।।'५
१. दीपिका (अमृतानन्द) २. भास्करराय (व०र०)
३-४. पराप्रावेशिका (पृ० १-२)
५. शङ्कराचार्य 'सौन्दर्यलहरी' । 'तस्य देवादिदेवस्य परबोध स्वरूपिणः । विमर्शः
परमा शक्तिः सर्वज्ञा ज्ञानशालिनी' ।। (श्री कालीकुल)