वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽंशः ३३
—वाक्यों द्वारा आचार्य क्षेमराज ने 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' में यह प्रतिपादित किया
है कि सारे अर्थ, समस्त अर्थमयी सृष्टि, समस्त विश्व एवं समस्त तत्त्व (३६
तत्त्व) भगवती चिति या विमर्श शक्ति के ही अपने परिणाम या रूपान्तर हैं ।
पृथिवी से शक्तितत्त्वपर्यन्त यह समस्त सृष्टि पाँच अण्डों में विभक्त है जो
निम्नांकित हैं—(१) पिण्ड (२) ब्रह्माण्ड (३) प्रकृत्यण्ड (४) मायाण्ड (५)
शाक्ताण्ड
ये पाँचों अण्ड 'विश्व' हैं । शिव तत्त्व 'विश्वातीत' एवं शून्य है ।
(i) 'शाक्ताण्ड' में शान्तिकला है । इसके अधिष्ठाता सदाशिव हैं ।
(ii) 'मायाण्ड' में विद्या कला है । इसके अधिष्ठाता रुद्र हैं ।
(iii) 'प्रकृत्यण्ड' में प्रतिष्ठा कला है । इसके अधिष्ठाता विष्णु हैं ।
(iv) 'ब्रह्माण्ड' में निवृत्ति कला है । इसके अधिष्ठाता ब्रह्मा हैं ।
[चित्र-विवरण:]
शान्त्यतीत कला } विश्वातीत
विश्व ↓
शाक्ताण्ड (अधिष्ठाता : सदाशिव) — शान्ति कला
मायाण्ड (अधिष्ठाता : रुद्र) — विद्या कला
प्रकृत्यण्ड (अधिष्ठाता : विष्णु) — प्रतिष्ठा कला
ब्रह्माण्ड (अधिष्ठाता : ब्रह्मा) — निवृत्ति कला
[मण्डल चक्र के अन्तर्गत:]
बाह्य वृत्त: विश्वातीत — शिव तत्त्व
द्वितीय वृत्त: सदाशिव, ईश्वर, सद्विद्या, शुद्धविद्या
तृतीय वृत्त: विद्या कला
चतुर्थ वृत्त: प्रतिष्ठा कला
केन्द्र: १४ भुवन, ब्रह्माण्ड, ब्रह्मा
अधोभाग: रुद्र मायाण्ड, विष्णु प्रकृत्यण्ड
ब्रह्माण्ड में
१. ७ ऊर्ध्वलोक (भूलोक से सत्यलोक)
२. ७ अधोलोक (तल, वितल, सुतल,
तलातल, पाताल आदि ७ लोक)
३ वरि.