वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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'पराशक्तिरूपा चितिः एव भगवती स्वतन्त्रा अनुत्तर विमर्शमयी शिव
भट्टारिकाभिन्ना ॥'१
शिवस्य प्रकाशमयस्य प्रथा विमर्शशक्तिः ॥ (अमृतानन्द योगी) शिवस्य
प्रकाशात्मनो दीपस्य शक्तिर्विमर्शाख्यैव प्रभा, सा निर्विकल्पात्मना विश्वाकारा
मेयमातृप्रमाप्रमाणभेदैः सङ्कुचरूपा ॥'२ विश्वाकारप्रथा षट्त्रिंशत्तत्वात्मना परिणता
विमर्शशक्तिः ॥३
'विश्वस्य शिवादेर्भूभ्यन्तस्य प्रकाशामर्शने प्रस्फुटस्य स्फुटीकारः प्रकाशः ।
इदन्तया हृदयङ्गमीभावो विमर्श एवामर्शनम् ॥'४ 'प्रकाश' परमशिव एवं 'विमर्श'
पराशक्ति का वाचक है—'दिव्यं प्रकाशविमर्शात्मक परमशिवपराशक्तिप्रतिपादनं ।'५
अमृतानन्द योगी ने कहा है कि विश्वगुरु की शक्ति का नाम 'विमर्श' है जो
कि एक होते हुए भी अनेक भावार्थ रूप में व्यक्त होती है—'विमर्शरूपिणी
शक्तिरस्य विश्वगुरोः सदा । परिस्फुरति सैकापि नाना भावार्थरूपिणी ॥'
प्रकाशात्मक परशिव 'अहमेव' के अनुसंधान के साथ परापश्यन्ती
मध्यमा-वैखरी के क्रम से विमर्शाश के द्वारा प्रकट हुआ करते हैं—'प्रकाशात्मकः
परशिवोऽहमेव विश्वानुग्रहपरः परा पश्यन्ती मध्यमा वैखरीक्रमेण व्यापृत्य विमर्शाशेन
प्रकटो भूत्वा प्रकाशेन प्रतिवचनदातापि सन् तन्त्रं समवतारयामि ।'६
'परम तत्व' क्या है? 'प्रकाश' उसका रूप है—उसका स्वभाव है अर्थात् वह
महाप्रकाशस्वरूप है । वह निराकाङ्क्ष है । स्फटिक मणि, दर्पण आदि पदार्थ
निराकाङ्क्ष होने पर भी जड़ हैं किन्तु परमतत्व निराकाङ्क्ष होकर भी महाचेतन है और
स्वात्मविश्रान्ति के कारण 'महानन्द' कहा गया है । स्वात्मा (स्वभाव) अखण्ड
अहंता चमत्कार के रस में विश्राम करने के कारण परमशिव परमनिर्वृति एवं
महानन्दस्वरूप है । स्फटिकादिक प्रकाश ग्रहण करने में समर्थ तो हैं किन्तु केवल
प्रकाश्य है किन्तु परमात्मा स्वप्रकाश है—प्रकाशात्म—प्रकाशक एवं प्रकाशस्वरूप
है । 'अहं' विमर्श में 'अ' प्रकाशात्मक परमशिव रूप परमतत्व है तथा 'ह'
पराशक्ति विमर्श ।७
प्रकाशस्वरूप परमेश्वर का स्वभाव ही 'विमर्श' है । जो विश्वाकार,
विश्वप्रकाश, विश्वसंहार रूप से अकृत्रिम अहमाकार का स्फुरण है वही 'विमर्श' है ।
यदि वह प्रकाश निर्विमर्श हो जाय तो वह अनीश्वर और जड़ हो जाएगा । वह
विमर्श विश्वाकार से सृष्टि में और विश्व प्रकाश से स्थिति में और स्वात्मसाक्षात्कार
रूप के द्वारा संहरण से संहार में पूर्णाहन्ता चमत्कारस्वरूप है । इसी 'विमर्श' को
चित, चैतन्य, स्वाभाविक रूप से प्रकाशित होने वाली 'परावाक्', स्वातन्त्र्य,
१. प्रत्यभिज्ञाहृदयम् २-५. दीपिका (अमृतानन्दनाथ)
६. अमृतानन्द
७. 'अ' प्रकाशस्वरूप परमशिव है तथा 'ह' शक्तिस्वरूप 'विमर्श' ।