वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ | वरिवस्यारहस्ये
७. परमशिव इच्छामय है क्योंकि ज्ञान- | ७. ब्रह्म इच्छाविहीन एवं निरीह है।
क्रिया का औन्मुख्य ही इच्छा है। |
पञ्चकृत्य उसका स्वभाव है। |
८. दो का नित्य सामरस्य ही वास्तविक | ८. द्वैत अज्ञान है । अद्वैत द्वैताभाव
अद्वैत है । अद्वैत द्वैताभाव का | का वाचक है ।
वाचक नहीं है । |
९. शिव स्वयं का आवरक एवं स्वयं | ९. विक्षेप एवं आवरण शक्तियाँ ही
का उन्मीलक है । उसने लीला हेतु | जीव में उसकी इच्छा के विरुद्ध
आत्मप्रच्छादन कर रखा है । | अज्ञान एवं भ्रान्ति उत्पन्न करती हैं।
आच्छादन उसकी विवशता नहीं |
उसकी क्रीड़ा या लीला है । |
१०. ब्रह्म भी सत्य है और जगत् भी | १०. ‘ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या' ।
सत्य है । जीव और जगत् दोनों |
सत्य हैं । |
११. भेद-अभेद का ही आत्मप्रकाश है | ११. भेद मिथ्या है ।
अतः मिथ्या हो ही नहीं सकता । |
१२. शिव एवं शक्ति दोनो तत्वतः एक | १२. ब्रह्म एवं माया भिन्न-भिन्न हैं ।
ही हैं । दोनों में अभिन्नता है । |
१३. भेद एवं अभेद में, व्युत्थान एवं | १३. जब तक भेद है, द्वैत है, बंधन
निरोध में बन्धन एवं मुक्ति में, सुख | है, माया है, तब तक मुक्ति कहाँ?
एवं दुःख में, ब्रह्म एवं माया में |
द्वैत एवं अद्वैत में, तथा भेद एवं |
अभेद के भीतर सम्यग्दर्शन होने |
पर चिदानन्द की (शिवशक्ति के |
सामरस्य की) प्राप्ति होती है । |
१४. ब्रह्म, जीव एवं जगत् सभी चिन्मय | १४. ब्रह्म एवं जीव चिन्मय है जबकि
हैं । जगत् जब चैतन्य की सृष्टि है | जगत् जड़ है और जड़ वस्तु
तब अचैतन्य आयेगा कहाँ से ? | अचित् है अतः अनात्मक है ।
सर्वचिन्मयवाद ही सत्य है । जड़ता |
भी चैतन्य का एक रूप है, चैतन्य |
से पृथक् नहीं है अतः आत्मा का |
ही अवभास है । |
१५. ‘अद्वैत' द्वय का नित्य सामरस्य है। | १५. ‘अद्वैत' द्वय का अभाव है
१६. यह वसुगुप्त, उत्पल, सोमानन्द, | १६. यह शङ्कराचार्य द्वारा प्रतिपादित
अभिनवगुप्त एवं क्षेमराज आदि द्वारा | अद्वैत दर्शन है ।
प्रतिपादित द्वयात्मक अद्वयवाद का |
दर्शन है । |