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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 121, कुल 530 में से

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प्रथमोऽंशः १९
यथा चन्द्रिका चन्द्रमा से पृथक् नहीं हो सकती और न तो चन्द्रमा चन्द्रिका
से उसी प्रकार शिव शिवा से एवं शिवा शिव से (प्रकाश विमर्श से एवं विमर्श
प्रकाश से) पृथक् नहीं हो सकते ।
'शक्ति' एवं शक्तिमान में अभेद—आचार्य सोमानन्दपाद ने 'शिवदृष्टि' में कहा
है कि भगवान् शिव तभी तक शक्तिमान कहलाते हैं जब तक कि शक्ति उनके
साथ है क्योंकि—
न शिवः शक्तिरहितो न शक्तिर्व्यतिरेकिणी ।
शिवः शक्तस्तथा भगवानिच्छया कर्तुमीहते ॥१
इसीलिए कहा गया है कि शक्ति एवं शक्तिमान् में अभेद है—
'शक्तिशक्तिमतोर्भेदः शैवे जातु न वर्ण्यते ॥'२
'सौन्दर्यलहरी' में आचार्य शङ्कर कहते हैं कि—यदि 'शिव' शक्ति से समन्वित
न रहें तो वे हिल भी नहीं सकते—
'शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं ।
नो चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि ॥'३
'शक्ति' के विभिन्न रूप—'शक्ति' के अनन्त रूप हैं किन्तु उनमें से पाँच
रूप प्रधान हैं—(१) चितशक्ति (२) आनन्दशक्ति (३) इच्छाशक्ति (४) ज्ञानशक्ति
(५) क्रियाशक्ति ।
(क) 'चित शक्ति'—यह प्रकाशात्मक रूप है । इसीके द्वारा शिव अपने
को 'प्रकाश' (स्वप्रकाश) समझते हैं ।
(ख) 'आनन्द शक्ति'—इसके द्वारा शिव आनन्दमय हैं और इस शक्ति की
सहायता से ही वे अपने में 'आनन्द' का साक्षात्कार कर पाते हैं ।
(ग) 'इच्छा शक्ति'—इसके द्वारा ही शिव प्रपञ्च का सृजन, पालन एवं
संहार करते हैं ।
(घ) 'ज्ञान शक्ति'—इसके द्वारा ही शिव ज्ञानस्वरूप हैं ।
(ङ) 'क्रिया शक्ति'—इसके द्वारा ही शिव सभी स्वरूपों को धारण कर
पाते हैं ।
इन्हीं शक्तियों की सहायता से शिव अपने में 'अहं' का बोधकर पाते हैं, एवं
विश्व की अभिव्यक्ति कर पाते हैं, जगत् शिव की शक्ति का ही अपना विराट रूप
है । इसे परमशिव अपने में ('स्वभित्तौ' = अपने हृदय की दीवार में) स्वेच्छया
अभिव्यक्त करते हैं । शक्ति के बिना शिव जड़वत हैं ।
१. सोमानन्द 'शिवदृष्टि' २. शिवदृष्टि
३. सौन्दर्यलहरी