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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 131, कुल 530 में से

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प्रथमोऽंशः २९
'चक्रमयी'—बिन्दु से लेकर भूगृहान्त समस्त चक्र । चक्र नवयोन्यात्मक है—
'नवयोन्यात्मकं चक्रं चिदानन्दघनं महत् । चक्रं नवात्मकमिदं नवधा भिन्न
मन्त्रकम् ।।'१ देवी चक्ररूपा है—'एवंविश्वप्रकारा च चक्ररूपा महेश्वरी ।।'२
त्रैलोक्यमोहन, सर्वशापरिपूरण, सर्वसङ्क्षोभण, सौभाग्यदायक, सर्वार्थसाधक,
सर्वरक्षाकर, सर्वरोगहर एवं सर्वसिद्धिप्रद चक्र ।।
'देहमयी'—(१) स्थूल देह (२) सूक्ष्म देह (३) कारणदेह आदि देह ॥३
'यत्परिणामात्'—जिसके परिणमन से—
परिणामवाद—एक रूप का तिरोभाव और रूपान्तर का आविर्भाव ही
'परिणाम' है । यथा 'दही' दूध का परिणाम या विक्रिया है—'परिणामे तु
रूपान्तरं तिरोभवति, रूपान्तरं च प्रादुर्भवति । 'परिणाम' उपादान के समान सत्ता
वाला होता है ।४
'परिणामवाद' का प्राचीन रूप—भर्तृहरि ने 'वाक्यपदीय' में 'परिणाम' एवं
'विवर्त' दोनों को समानार्थक माना है । वे कहते हैं—'यह 'विश्व' शब्द का ही
परिणाम है ऐसा आम्नाय वेत्ताओं का कथन है, सर्वप्रथम यह जगत् छन्दों से ही
विवृत अथवा परिणत हुआ ।'
'शब्दस्य परिणामोऽयमित्याम्नायविदो विदुः ।
छन्दोभ्य एव प्रथममेतद्विश्वं व्यवर्तत ।।' (वा०प०, प्र०का०)
शान्तरक्षित ने 'तत्त्वसंग्रह' के आगम काण्ड में कहा गया है कि—
'विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः । इस प्रथम कारिका के 'विवर्त' शब्द का
'परिणाम' शब्द के द्वारा ही अनुवाद किया है—'नाशोत्पादसमालीढं ब्रह्म शब्दमयं च
यत् । यत्तस्य परिणामोऽयं भावग्रामः प्रतीयते ॥'
भवभूति को भी, 'परिणाम' एवं 'विवर्त' में कोई भेदक रेखा है—यह ज्ञात
नहीं था इसीलिए उन्होंने दोनों शब्दों को समान अर्थ में व्यवहृत किया है—
'एको रसः करुण एव निमित्तभेदाद्
भिन्न पृथक् पृथगिवाश्रयते विवर्तान् ।
आवर्तबुद्बुदतरङ्गमयान्विकारा
नंभो यथा सलिलमेव हितत्समस्तम् ।।'
'विवर्त' अधिष्ठान से विषम सत्ता रखता है ।
शङ्कराचार्य विवर्तवादी थे कि परिणामवादी?—ब्रह्मसूत्र के भाष्यकार वेदान्ती
शङ्कराचार्य को सभी 'विवर्तवादी' मानते हैं और वे 'विवर्तवादी' के रूप में प्रसिद्ध
भी हैं किन्तु 'सौन्दर्यलहरी' के तांत्रिक स्तोत्र में वे परिणामवाद का समर्थन करते
हैं—
१-२. योगिनीहृदय ३. 'प्रकाश' (भास्करराय)
४. 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा विवृति विमर्शिनी' (पृ० ८, अ० १, वि० १)