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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 133, कुल 530 में से

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प्रथमोऽंशः ३१
उपर्युक्त परिणामवाद ‘अविकृत परिणामवाद’ है। ‘अपूर्व परिणामवाद’ है। जो
ब्रह्म अभिन्ननिमित्तोपादान कारण है वह विश्वरूप में परिणत होने पर भी विकृत नहीं
होता।
‘वामकेश्वर तन्त्र’ में ‘तस्यां परिणतायां तु न कश्चित्पर इष्यते’१ ‘तस्य दृश्यं
तत्परिणम एवं, तस्यां परिणतायां’२ वाक्यों द्वारा ‘परिणामवाद’ ही तो उसका अभीष्ट
प्रतीत होता है। यद्यपि इन वाक्यों में आए ‘परिणतायां’ का अर्थ जयरथ ने
‘विद्यमानायां’ किया है किन्तु तन्त्राचार्य भास्करराय ने इसका वास्तविक अर्थ
‘परिणत होने पर’ ही किया है। ‘चतुश्शती’ में भी इसी दृष्टि को प्रतिपादित किया
गया है—
‘त्रिपुरा परमाशक्तिराद्यजाता महेश्वरी।
स्थूलसूक्ष्मस्वभावेन त्रैलोक्योत्पत्तिमातृका॥
कवलीकृत निःशेष तत्त्वग्रामस्वरूपिणी।
यस्यां परिणतायान्तु न किञ्चित्परमिष्यते॥’
‘परिणामवाद’ में त्रुटि यह है कि ‘परिणाम’ में रूपान्तर का आविर्भाव एवं
पदार्थ के पूर्व रूप का तिरोभाव हो जाता है। ‘परमशिव’ प्रकाश है। प्रकाश के
रूपान्तर का अभाव संभव नहीं है क्योंकि तब तो (तिरोधान की स्थिति में)
अंधकार छा जाएगा। ऐसी स्थिति में ‘अप्रकाश’ प्रकाश में कैसे आएगा? इस
प्रकार ‘विवर्त’ एवं ‘परिणाम’ दोनों ही स्थितियों में जगत् के प्रकाश में आने की
व्याख्या संभव नहीं है—‘परिणामे तु रूपान्तरं तिरोभवति। रूपान्तर च प्रादुर्भवति।
प्रकाशस्य तु रूपान्तर भावात् तत्तिरोधाने स्यादान्ध्यम्। अप्रकाशश्च प्रादुर्भवन् नैव
प्रकाशेत् इति उभयथापि सुप्तं जगत् स्यात्॥’३
इसी प्रकार ‘प्रतिबिम्बवाद’ भी सदोष है क्योंकि—‘प्रतिबिम्ब’ में संवेदन की
स्वच्छता मात्र होती है—प्रतिबिम्ब में स्वातन्त्र्य नहीं है—
प्रकाशविमर्शात्मा संवित्स्वभाव परमशिव स्वातन्त्र्य द्वारा रुद्र से स्थावर पर्यन्त,
प्रमातृरूप में, नील सुखादि प्रमेय रूप में, अनतिरिक्त होते हुए भी अतिरिक्त की
भाँति एवं स्वरूप को अनावृत किए हुए भी संवित् रूप में, अपनी स्वातन्त्र्य शक्ति
की महिमा से प्रकाशित होता है।४
भास्करराय की दृष्टि में शङ्कराचार्य—भास्करराय मखिन की दृष्टि में
शङ्कराचार्य परिणामवादी थे। वे कहते हैं कि ‘मनस्त्वं व्योमस्त्वम्’ इति श्लोके
‘त्वयिपरिणतायाम्’ इति स्वाभिमतः ‘परिणामवाद’ एव स्फुटीकृतः॥५ ‘विवर्तवाद’
वेदान्ति संमतं परिणामवादी तांत्रिको दूषयति’ ‘परिणामवाद एवाभिप्रेतः’६ ‘श्रुतेरपि
१-२. वामकेश्वर तन्त्र,
३-४. ‘ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृति विमर्शिनी’ (अ. १; २०, वि. १, पृ. ८९)
५. वरिवस्यारहस्य—‘प्रकाश’ टीका (१।३) ६. तत्रैव