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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 530 में से

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पृष्ठ 124

२२ वरिवस्यारहस्ये
किंचित ग्राह्यं ग्राहकं वा; अपितु श्रीपरमशिवभट्टारक एवं इत्थं नानावैचित्र्यसहस्रैः
स्फुरति ।।' 'एवं भगवान् विश्वशरीरः ।' 'चिदात्मा शिवभट्टारक एव एक आत्मा न
तु अन्यः किंचित् ।।'१ इसीलिए कहा गया है—'तेन शब्दार्थचिन्तासु न सावस्था न
यः शिवः ।।'२
'परमशिव' और 'शिवतत्त्व'—'परमशिव' शुद्ध अद्वैत की तत्त्वातीत स्थिति
है। इसे न 'शिव' कहा जा सकता है और न तो 'शक्ति' न इसे विश्वोत्तीर्ण कहा
जा सकता है और न तो विश्वमय। उसकी भावना एवं उसका उपदेश दोनों संभव
नहीं है—
'अप्रमेयेऽपरिच्छिन्ने स्वतन्त्रे भाव्यता कुतः ।' (तन्त्रालोक)
शैव-शाक्त दर्शनो में छत्तीस तत्त्व स्वीकार किए गए हैं, 'परमशिव' इनमें से
कोई भी तत्त्व नहीं है क्योंकि वह 'तत्त्वातीत' है।
अप्रतिहतशक्ति परमशिव अपने स्वातन्त्र्यस्वभाव के कारण प्रमातृप्रमेयादि
अनन्तरूपों में आत्मावभासन करने की इच्छा से जगल्लीला के लिए नानारूप
धारण करने के कारण 'विश्वमय' हैं किन्तु स्वरूपतः 'विश्वोत्तीर्ण' हैं। इसी कारण
श्रीक्षेमराज इसे 'विश्वमय' एवं 'विश्वातीत' दोनों एक साथ कहते हैं—
'श्रीमत्परमशिवस्य' पुनः 'विश्वोत्तीर्णविश्वात्मकः'३ 'परमशिव' है तो विश्वोत्तीर्ण किन्तु
वह विश्वशरीरी भी है—'भगवान् विश्वशरीरः'४ विश्व उसकी आत्मा के साथ अभिन्न
रूप में स्थित है—'श्रीपरमशिवः स्वात्मैक्येन स्थितं विश्वं'५ इसीलिए
'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' में कहा गया है—चितिसङ्कोचात्मा चेतनोऽपि सङ्कुचित विश्वमयः'६
'चिदैकात्म्येन विश्वशरीरः शिवभट्टारक एव'७ श्रीपरमशिवभट्टारक एवं इत्थं
नानावैचित्र्यसहस्रैः स्फुरति'८ 'जगतः प्रकाशैकात्म्येन अवस्थानम् उक्तम्'९ 'ननु जगदपि
चितो भिन्नं नैव किञ्चित् ।'१०
'परमशिव' विश्वमय है या विश्वातीत ?—इस प्रश्न पर अपना मत प्रस्तुत
करते हुए आचार्य क्षेमराज कहते हैं कि—
(१) विश्वोत्तीर्णमात्मतत्त्वम् इति तांत्रिकाः ।
(२) विश्वमयम् इति कुलाद्याम्नायनिष्ठाः ।
(३) विश्वोत्तीर्णं विश्वमयं च इति त्रिकादिदर्शनविदः ।
एक ही चिदात्मा भगवान् परमशिव स्वातन्त्र्यावभासित विभिन्न भूमिकाओं में
आत्मा के रूप में अवस्थित हैं तथापि वे मूलतः निष्क्रिय, निर्गुण एवं निराकार हैं।
चिदात्मा परमेश्वर अपनी स्वातन्त्र्यशक्ति के बल से अभेद व्याप्ति का विमज्जन
करके भेद-व्याप्ति का अवलम्बन ग्रहण करते हैं—'चिदात्मा परमेश्वरः स्वातन्त्र्यात्
अभेदव्याप्तिं निमज्य भेदव्याप्तिं अवलम्बते ।।'११ सामरस्य एक ऐसी अवाङ्मन-
सगोचर परम स्थिति है जिसमें शक्ति एवं शक्तिमान् जैसे शब्दों की कल्पना करना
१-११. आचार्य क्षेमराज—प्रत्यभिज्ञाहृदयम्