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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 530 में से

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पृष्ठ 134

३२ वरिवस्यारहस्ये
परिणामवाद एव संमतः सिध्यति 'आत्मकृतेः परिणामात्'
अर्थमयी—जगत् 'विमर्श शक्ति' का परिणाम है । 'विमर्श शक्ति' शब्द अर्थ,
चक्र एवं देह के रूप में परिणत होकर जगत् बन जाती है । विमर्श 'विश्वरूपिणी'
है—
'यदा सा परमा शक्तिः स्वेच्छया विश्वरूपिणी ॥'१
"सैव परा शक्तिर्विमर्शरूपिणी स्वेच्छया विश्वरूपिणी विश्वं सृजति ॥"२
'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' में कहा गया है कि शक्ति अपने अन्तःस्थित विश्व को ही
प्रकट करती है—'अन्तःस्थितवतामेव घटते बहिरात्मना ।'
अभिनवगुप्त भी कहते हैं—'यस्यामन्तर्विश्वमेतद्विभाति बाह्याभासं भासमानं
विसृष्टौ' विश्व परासत्ता से पृथक् कोई अन्य स्वतन्त्र सत्ता नहीं है—'इदं... विश्वं वा
परस्यां पारमेश्वर्यां भैरवसंविदि अविभागेन बोधात्मकेन रूपेणास्ते ॥' 'चितिः स्वतन्त्रा
विश्वसिद्धि हेतुः ॥' (प्र०ह०) कहकर क्षेमराज ने भी जगत् को चितिशक्ति से
अभिन्न स्वीकार किया है क्योंकि वह स्वेच्छापूर्वक स्वभित्ति पर विश्व का उन्मीलन
करती है—
'स्वेच्छया स्वभित्तौ विश्वमुन्मीलयति । (प्र०ह०२)
(१) 'जगतः प्रकाशैकात्म्येन अवस्थानम् ।'३
(२) ननुं जगदपि चितो भिन्नं नैव किंचित् ॥४
(३) चिदेव भगवती स्वच्छस्वतन्त्ररूपा तत्तदनन्त जगदात्मना स्फुरति ।५
(४) परमानन्दमयप्रकाशैकघनस्य एवंविधमेव शिवादिधण्यन्तं अखिलं अभेदेनैव
स्फुरति । न तु वस्तुतः अन्यत किंचित् ग्राह्यं ग्राहकं वा । श्रीपरमशिव-
भट्टारक एव इत्थं नानावैचित्र्यसहस्रैः स्फुरति ।६
(५) श्रीपरमशिवः स्वात्मैक्येन स्थितं विश्वं ।
(६) विश्वशरीर शिवैकरूप एव । 'विश्वशरीरः शिवभट्टारक एव ॥ 'न साऽवस्था
न यः शिवः ॥'७
(७) शरीरमेव घटाद्यपि वा ये षट्त्रिंशत्तत्त्वमयं शिवरूपतां पश्यन्ति ॥८

१. योगिनीहृदय २. दीपिका
३-७. प्र० ह०
८. एक 'मायाण्ड' में असंख्य प्रकृत्यण्ड हैं । एक एक प्रकृत्यण्ड में असंख्य
'ब्रह्माण्ड' हैं । 'मायाण्ड'—पुरुष से षट्कंचुक पर्यन्त तत्त्वों द्वारा निर्मित है ।
'शाक्ताण्ड' माया से ऊपर है । यह ज्योतिर्मय एवं शुद्ध सत्वात्मक हैं ।
इसका उपादान शुद्धविद्या, ईश्वर एवं सदाशिव हैं ।