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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 530 में से

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पृष्ठ 119

प्रथमोऽंशः १७
परमात्मा का मुख्य ऐश्वर्य, कर्तृत्व, स्फुरत्ता, सार, हृदय, स्पन्द इत्यादि शब्दों द्वारा
आगमों में कहा गया है । संवित्प्रकाश रूप का विमर्श-प्राधान्य ही शैव शासन में
प्रतिपादित है । चैतन्य विमर्श ही आत्मा का मुख्य स्वभाव है ।¹ इस विमर्श शक्ति
के विभिन्न नामान्तर हैं—
'चितिः प्रत्यवमर्शात्मा परावाक् स्वरसोदिता ।
स्वातन्त्र्यमेतन्मुख्यं तदैश्वर्यं परमात्मनः ।।
सा स्फुरत्ता महासत्ता देशकालविशेषिणी ।
सैषा सारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः ।।'
शक्तिः—'शक्ति' शब्द शक् धातु से क्तिन् प्रत्यय लगाकर बनता है । शक्ति
का अर्थ है सामर्थ्य या क्षमता । शिव की विश्वसिसृक्षा शक्ति ही 'शक्तितत्त्व' के
नाम से प्रसिद्ध है—शिवस्य विश्वसिसृक्षा शक्तिः शक्तित्वमिति नाम्ना ख्याता ।।'²
रामेश्वर ने 'परशुरामकल्प सूत्रटीका' में कहा है कि निर्गुण शिव ही 'बहुस्यां
प्रजायेय'—इस इच्छाशक्ति से युक्त होकर तथा सृष्ट्युन्मुख हो कर 'शक्तितत्व'
कहलाने लगता है । शिव की सिसृक्षा ही 'शक्ति' है ।
त्रिकसिद्धान्त मत के अनुसार परमशिव परमेश्वर के हृदय में सिसृक्षाविर्भाव
मात्र से ही उनके दो रूप हो जाते हैं—(१) शिवरूप (२) शक्तिरूप । शिव
प्रकाशरूपी है और शक्ति विमर्शरूपिणी ।
प्रपञ्च-वासना की दृष्टि से शिव एवं शक्ति में निम्न भेद हैं—
'प्रपञ्चवासणारूपा शक्तिरित्यभिधीयते ।
निष्प्रपञ्चचिदेकात्मा शिवतत्त्वं समीरितम् ।।'³
'शक्ति' का 'श' अक्षर ऐश्वर्य का एवं 'क्ति' अक्षर पराक्रम का वाचक है
अतः 'शक्ति' शब्द ऐश्वर्य एवं पराक्रम प्रदान करने वाली देवी का वाचक है ।⁴
'या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता' कहकर दुर्गासप्तशती में भगवती के उस
स्वरूप को, जो समस्त प्राणियों में शक्ति के रूप में स्थित रहता है, नमस्कार
किया गया है और उसे शक्तिस्वरूप कहा गया है । 'शक्ति' शब्दकोशीय दृष्टि से
निम्न अर्थों का वाचक है—(१) कासूसामर्थ्ययोश्शक्तिः (२) शक्तिः पराक्रमः प्राणौ
(३) षड्गुणाश्शक्तयस्तिस्रः ।⁵
'शक्लृ शक्तौ' धातु से क्तिन् प्रत्यय लगाने पर 'शक्ति' शब्द निष्पन्न होता
है । उत्साह, गौरी, बल एवं पराक्रम के अर्थ में ही 'शक्ति' शब्द व्यवहार में
अधिक प्रयुक्त होता है—
'शक्तिरस्तान्तरे गौर्यामुत्साहादौ बलेस्त्रियाम् ।।'⁶
१. 'षट्त्रिंशत् तत्व संदोह' २-३. शाक्तदर्शनम् (पृ० ९०)
४. देवीभागवत पुराण ५. अमरकोश
६. मेदिनीकोश
२ वरि.