वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽंशः २५
करनेवाले आचार्य शङ्कर एवं उनके केवलाद्वैतवादी अनुयायियों को शान्तब्रह्मवादी
कहा है । सांख्यानुयायी भी शान्तब्रह्मवादी कहे गए हैं—‘शान्तब्रह्म- वादिभिः सांख्यैः
पुरुषस्य परमात्मनोऽधिष्ठेयं कर्मानुरूपं सुखदुःखभोक्तृतया व्यपदिश्यते’ १ चूँकि आचार्य
भास्करराय शान्त ब्रह्मवादी नहीं हैं और उनका परमशिव शङ्कराचार्य के निर्गुण ब्रह्म
की भाँति निष्क्रिय एवं निर्गुण नहीं है अतः अपने मत को शाङ्कर मत से पृथक्
रूप में प्रतिपादित करने के लिए ही उन्होंने शिव की सक्रियता का भी उल्लेख
किया है ।
‘ईश्वराद्वयवाद’ में शिव पञ्चकृत्यकारी है—जबकि शान्तब्रह्मवाद का निर्गुण
ब्रह्म निष्क्रिय है ।
| ‘शान्तब्रह्मवाद’ २ | ‘ईश्वराद्वयवाद’ |
| १. ब्रह्म निर्गुण, निराकार एवं निष्क्रिय | १. शिव पञ्चकृत्यकारी है । |
| है । | |
| २. विश्व मिथ्या है । | २. विश्व सत्य है, शिवस्वरूप है । |
| ३. माया शक्ति मिथ्या एवं | ३. शक्ति सत्य है और चिदात्मक है । |
| अनिर्वचनीय है । | |
| ४. आत्मा जीवदशा में भी निष्क्रिय है | ४. शिव अपनी सकल या जीव दशा |
| और औपचारिक कर्तृत्व या सुख | में भी पञ्चकृत्यकारी है । |
| दुःखादिभौक्तृत्व से युक्त है | |
| ५. अज्ञान या माया आकस्मिक नहीं है | ५. माया एवं अज्ञान अध्यास एवं |
| प्रत्युत् आत्मा का स्वातंत्र्यमूलक, | अध्यारोपजन्य भ्रान्ति है तथा |
| स्वेच्छा परिगृहीत रूप है यथा नट | आत्मा का आवरक होने से उसका |
| द्वारा अभिनय के समय स्वेच्छा- | विरोधी है । |
| गृहीत रूप । शिव अपने स्वरूप | |
| को आच्छादित एवं अनाच्छादित | |
| करने में स्वतन्त्र हैं । ‘प्रज्ञान’ शिव | |
| की स्वातंत्र्यशक्ति का विजृंभणमात्र | |
| है । प्रज्ञान आत्मा की शक्ति है । | |
| ६. आत्मा कर्तृत्वपूर्ण नित्य पञ्चकृत्य- | ६. आत्मा में कर्तृत्व नहीं है । |
| कारी है । इसका स्वभाव ही विमर्श | |
| है । उसके लिए ज्ञान एवं क्रिया | |
| एक से हैं । उसकी क्रिया ही ज्ञान | |
| है और उसका ज्ञान ही क्रिया है । | |
| ज्ञान-क्रिया की उन्मुखता ही ‘इच्छा’ | |
| है । | |
१. भोजराज—‘योगसूत्रवृत्ति’
२. ‘परमार्थचर्चाविवरण’ (पृ०६) अभिनवगुप्तपाद—‘तन्त्रालोक’