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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

उ० १ । ३ । १५) "एतद्यो | बुद्धिरूप गुहामें छिपा हुआ जानता
वेद निहितं गुहायां सोऽवि- | है, हे सोम्य ! वह अविद्यारूप
द्याग्रन्थिं विकिरतीह सोम्य" | ग्रन्थिको छिन्न-भिन्न कर देता है",
(मु० उ० २ । १ । १०) । | "उस परावर ( ब्रह्मादि देवताओंसे
"भिद्यते हृदयग्रन्थि- | भी उत्तम ) परमात्माका साक्षात्कार
श्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । | कर लेनेपर इसके हृदयकी ग्रन्थि
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि | टूट जाती है, सारे संशय कट जाते
तस्मिन्दृष्टे परावरे ॥" | हैं तथा समस्त कर्म क्षीण हो जाते
(मु० उ० २।२।८) | हैं", "जिस प्रकार नदियाँ बहती
"यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रे- | हुई अपने नाम और रूपको छोड़कर
ऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय । | समुद्रमें लीन हो जाती हैं उसी
तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः | प्रकार विद्वान् नाम और रूपसे मुक्त
परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥" | होकर परसे भी पर दिव्य पुरुषको
(मु० उ० ३।२।८) | प्राप्त हो जाता है", "वह, जो कि
"स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म | उस परब्रह्मको जानता है, ब्रह्म ही हो
वेद ब्रह्मैव भवति" (मु० उ० | जाता है", "हे सोम्य ! जो भी उस
३।२।९)। "स यो ह वै | छायाहीन, अशरीर, अलोहित, शुद्ध
तदच्छायमशरीरमलोहितं शुभ्र- | अक्षर ब्रह्मको जानता है [ वह सर्वज्ञ हो
मक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य" | जाता है ]" "वह सब कुछ जानता
(प्र० उ० ४।१०) । "स सर्व- | है", "उस जाननेयोग्य पुरुषको
मवैति ।" "तं वेद्यं पुरुषं वेद यथा | जान, जिससे मृत्यु तुझे व्यथित न
मा वो मृत्युः परिव्यथाः" (प्र० | करे", "उस अवस्थामें एकत्व देखने-
उ० ६ । ६) । "तत्र को मोहः | वाले पुरुषको क्या मोह और क्या
कः शोक एकत्वमनुपश्यतः" | शोक हो सकता है ?" "ज्ञानसे
(ईशा० ७)। "विद्ययामृतमश्नुते" | अमरत्वको प्राप्त होता है",
ईशा० ११) । "भूतेषु भूतेषु | "बुद्धिमान् लोग उसे समस्त प्राणियोंमें

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५
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विचित्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकाद- | उपलब्धकर [ मृत्युके पश्चात् ] इस
मृता भवन्ति।” (के० उ० २।५) | लोकसे जाकर अमर हो जाते हैं”,
“अपहत्य पाप्मानमनन्ते स्वर्गे | “[ जो परात्मविद्याको जानता है
लोके ज्येये प्रतितिष्ठति” (के० | वह ] पापको त्यागकर विनाशरहित
उ० ४।९) । “तन्मया अमृता वै | सुखमय स्वयं-प्रकाश परम महान्
बभूवुः” (श्वेता० उ० ५।६) । | ब्रह्ममें प्रतिष्ठित होता है”, “वे -
“तद्वात्मतत्त्वं प्रसमीक्ष्य देही एकः | ब्रह्मस्वरूप होकर निश्चय ही अमर
कृतार्थो भवते वीतशोकः” | हो गये”, “उस आत्मतत्त्वका
(श्वेता० उ० २ । १४) । “य | साक्षात्कार कर कोई देहधारी जीव
एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति” (बृ० | कृतकृत्य और शोकरहित हो जाता
उ० ४ । ४ । १४) । “ईशं तं | है”, “जो इसे जानते हैं, अमर हो
ज्ञात्वामृता भवन्ति” (श्वेता० | जाते हैं”, “उस ईश्वरको जानकर
उ० ३ । ७) । “तदेवोपयन्ति”। | अमर हो जाते हैं”, “उसीको प्राप्त
“निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति” | होते हैं”, “इसे अनुभव करके जीव
(क० उ० १ । १ । १७)। “तमेवं | परमशान्ति प्राप्त करता है”, “उसे इस
ज्ञात्वा मृत्युपाशांश्छिनत्ति” | प्रकार जानकर यह मृत्युके बन्धनोंको
(श्वेता० उ० ४।१५) । “ये पूर्वं | काट देता है”, “पूर्वकालमें जिन
देवा ऋषयश्च तं विदुः” (श्वेता० | देवता और ऋषियोंने उसे जाना
उ० ५।६) । “तेषां शान्तिः शाश्वती | [ वे अमर हो गये ]” “[ अपनी
नेतरेषाम्” (क० उ० २।२।१३)। | बुद्धिमें स्थित उन परमात्माको जो
“बुद्धियुक्तो जहातीह | देखते हैं ] उन्हें ही नित्य शान्ति
उभे सुकृतदुष्कृते ।” | प्राप्त होती है औरोंको नहीं।”
(गीता २ । ५०) | “समत्वयोगविषयक बुद्धिसे युक्त
“कर्मजं बुद्धियुक्ता हि | हुआ पुरुष [ ज्ञान-प्राप्तिके द्वारा ]
| पुण्य और पाप दोनोंको इसी लोकमें
| त्याग देता है”, “समत्वबुद्धिसे युक्त

६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
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फलंत्यक्त्वा मनीषिणः । | पुरुष कर्मजनित फल ( इष्टानिष्ट
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः | देहकी प्राप्ति) को त्यागकर ज्ञानी
पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥” | हो जीते-जी जन्म-बन्धनसे मुक्त
(गीता २।५१) | होकर समस्त उपद्रवोंसे रहित मोक्ष-
“सर्वं ज्ञानप्लवेनैव | नामक परमपद प्राप्त करते हैं”,
वृजिनं संतरिष्यसि ।” | “तू ज्ञानरूप नौकाके द्वारा ही
“ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि | सम्पूर्ण पापोंके पार हो जायगा”,
भस्मसात्कुरुते तथा ।” | “उसी प्रकार ज्ञानरूप अग्नि
(गीता ४।३६-३७) | सम्पूर्ण कर्मोंको भस्म (निर्बीज)
“एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्या- | कर देता है”, “हे भारत ! इस
त्कृतकृत्यश्च भारत ।” | गुह्यतम शास्त्रको जानकर ही मनुष्य
(गीता १५।२०) | बुद्धिमान् और कृतकृत्य होता है”,
“ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा | “फिर मुझे तत्त्वतः जानकर तत्काल
विशते तदनन्तरम् ।” | मुझहीमें प्रवेश कर जाता है”, “इन
(गीता १८।५५) | सब साधनोंमें आत्मज्ञान ही उत्कृष्ट
“सर्वेषामपि चैतेषा- | माना गया है तथा सम्पूर्ण विद्याओंमें
मात्मज्ञानं परं स्मृतम् । | भी वही सबसे बढ़कर है, क्योंकि
तद्ध्यग्र्यं सर्वविद्यानां | उससे अमृतत्वकी प्राप्ति होती है।
प्राप्यते ह्यमृतं यतः। | इसे प्राप्त कर लेनेपर ही द्विज कृत-
प्राप्यैतत्कृतकृत्यो हि | कृत्य होता है, अन्य किसी प्रकार
द्विजो भवति नान्यथा ॥ | नहीं। इस प्रकार जो मन-ही-मन
एवं यः सर्वभूतेषु | सम्पूर्ण प्राणियोंमें आत्माको ही देखता
पश्यत्यात्मानमात्मना । | है वह सबमें साम्यबुद्धिको प्राप्त करके
स सर्वसमतामेत्य | सनातन ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है,
ब्रह्माभ्येति सनातनम् ॥ | तथा सम्यग्दृष्टिसे सम्पन्न होनेके
सम्यग्दर्शनसम्पन्नः | कारण वह कर्मोंसे बन्धनको प्राप्त
कर्मभिर्न निबध्यते ।

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७

दर्शनेन विहीनस्तु | नहीं होता। जो पुरुष इस दृष्टिसे
संसारं प्रतिपद्यते ॥” | रहित है वह संसारको प्राप्त होता
“कर्मणा बध्यते जन्तु- | है”, “जीव कर्मसे बँधता है और
र्विद्यया च विमुच्यते । | ज्ञानसे मुक्त हो जाता है, इसलिये
तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति | पारदर्शी मुनिजन कर्म नहीं करते ।
यतयः पारदर्शिनः ॥ | स्थिरबुद्धि प्राचीन आचार्योंने
ज्ञानं निःश्रेयसं प्राहु- | ज्ञानको ही मोक्षका साधन बतलाया है,
र्वृद्धा निश्चयदर्शिनः । | अतः शुद्ध ज्ञानसे जीव सम्पूर्ण पापोंसे
तस्माज्ज्ञानेन शुद्धेन | मुक्त हो जाता है”, “इस प्रकार
मुच्यते सर्वपातकैः ॥” | मृत्युको अवश्य होनेवाली जानकर
“एवं मृत्युं जायमानं विदित्वा | विद्वान् ज्ञानके द्वारा नित्य तेजः-
ज्ञानेन विद्वांस्तेज अभ्येति नित्यम्। | स्वरूप ब्रह्मको प्राप्त होता है, इसके
न विद्यते ह्यन्यथा तस्य पन्था- | सिवा उसके लिये कोई और मार्ग
स्तं मत्वा कविरास्ते प्रसन्नः ॥” | नहीं है, उसे जान लेनेपर विद्वान्
“क्षेत्रज्ञस्येश्वरज्ञाना- | प्रसन्नचित्त हो जाता है”,
द्विशुद्धिः परमा मता ।” | “परमात्माके ज्ञानसे जीवकी अत्य-
“अयं तु परमो धर्मो | न्तिकी शुद्धि मानी गयी है”,
यद्योगेनात्मदर्शनम् ॥” | “योगसाधनके द्वारा आत्माका
“आत्मज्ञः शोकसंतीर्णो | साक्षात्कार करना—यही परमधर्म
न बिभेति कुतश्चन । | है”, “आत्मज्ञानी शोकसे पार
मृत्योः सकाशान्मरणा- | होकर मृत्यु, मरण अथवा किसी
दथवान्यकृताद्भयात् ॥” | अन्य कारणसे होनेवाले भय—
“न जायते न म्रियते | इनमेंसे किसीसे भी नहीं डरता”,
न वध्यो न च घातकः । | “परमात्मा न उत्पन्न होता है, न
न बध्यो बन्धकारी वा | मरता है, न मारा जाता है और न
न मुक्तो न च मोक्षदः ॥ | मारता है, वह न तो बाँधा जानेवाला
पुरुषः परमात्मा तु | है और न बाँधनेवाला है तथा न मुक्त
यदतोऽन्यदसच्च तत् ।” | है और न मोक्षप्रद ही है, उससे
| भिन्न जो कुछ है वह असत् ही है ।”

८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १


[बायाँ स्तम्भ - संस्कृत मूल एवं भाष्य]

एवं श्रुतिस्मृतीतिहासादिषु
ज्ञानस्यैव मोक्षसाधनत्वावगमा-
द्युज्यत एवोपनिषदारम्भः ।
किंचोपनिषत्समाख्ययैव ज्ञान-
स्यैव परमपुरुषार्थ-
साधनत्वमव-
गम्यते । तथा हि—
उपनिषदित्युपनिपूर्वस्य सदेर्वि-
शरणगत्यवसादनार्थस्य रूपमा-
चक्षते । उपनिषच्छब्देन व्याचि-
ख्यासितग्रन्थप्रतिपाद्यवस्तुविषया
विद्योच्यते । तादर्थ्याद्ग्रन्थोऽप्यु-
पनिषत् । ये मुमुक्षवो दृष्टानु-
श्रविकविषयवितृष्णाः सन्त उप-
निषच्छब्दितविद्यां तन्निष्ठतया
निश्चयेन शीलयन्ति तेषाम-
विद्यादेः संसारबीजस्य विशरणा-
द्दिनाशात्परब्रह्मगमयितृत्वाद्वर्भ-
जन्मजरामरणाद्युपद्रवावसादयितृ-

(पार्श्व-टिप्पणी: उपनिषत्समाख्यायापि ज्ञानस्य परमपुरुषार्थसाधनत्वम्)


[दायाँ स्तम्भ - हिन्दी अनुवाद]

इस प्रकार श्रुति, स्मृति और
इतिहासादिमें ज्ञान ही मोक्षका
साधन जाना जाता है, अतः इस
[ज्ञान-साधक] उपनिषद्‌को आरम्भ
करना उचित ही है ।
इसके सिवा उपनिषद् नामसे
भी ज्ञानका ही परमपुरुषार्थमें साधन
होना जाना जाता है । जाननेका
प्रकार यह है—'उपनिषद्'—यह
उप और नि उपसर्गपूर्वक विशरण,
विनाश, गति और अवसादन
(अन्त) अर्थवाले सद् धातुका
रूप बतलाया जाता है । उपनिषद्
शब्दसे, हम जिस ग्रन्थकी व्याख्या
करना चाहते हैं उसके द्वारा प्रतिपाद्य
वस्तुको विषय करनेवाले ज्ञानका
कथन होता है । उस ज्ञानकी प्राप्ति
ही इसका प्रयोजन है इसलिये यह
ग्रन्थ भी उपनिषद् कहा जाता है ।
जो मोक्षकामी पुरुष दृष्ट और श्रुत
विषयसे विरक्त हो उपनिषद् शब्दसे
कही जानेवाली विद्याका निश्चयपूर्वक
तत्परतासे अनुशीलन करते हैं
उनकी संसारकी बीजभूता अविद्यादि-
का विशरण—विनाश हो जानेके
कारण, उन्हें परब्रह्मके पास ले
जानेके कारण और उनके जन्म-
मरणादि उपद्रवोंका अवसादन (अन्त)

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९

त्वादुपनिषत्समाख्यायाप्यन्यकृता- | करनेके कारण यह उपनिषद् है;
| इस प्रकार नामसे भी अन्य सब
त्परं श्रेय इति ब्रह्मविद्योपनिष- | साधनोंकी अपेक्षा परम श्रेयस्कर
| होनेके कारण ब्रह्मविद्या 'उपनिषद्'
दुच्यते । | कही जाती है ।
ननु भवेदेवमुपनिषदारम्भो | पूर्व०—यदि विज्ञान ही मोक्षका
[कर्मणामपि मोक्षसाधनत्व-मित्याक्षेपः] यदि विज्ञानस्यैव | साधन होता तो इस प्रकार ( इस
मोक्षसाधनत्वं भवेत्। | उद्देश्यसे ) उपनिषद्का आरम्भ
न चैतदस्ति । कर्म- | किया जा सकता था; किन्तु ऐसी
| बात है नहीं; क्योंकि “हमने
णामपि मोक्षसाधनत्वावगमात्— | सोमपान किया है, अतः हम अमर
“अपाम सोमममृता अभूम ।” | हो गये हैं”, “चातुर्मास्ययाग करने-
| वालेका पुण्य अक्षय होता है”
“अक्षय्यं ह वै चातुर्मास्ययाजिनः | इत्यादि वाक्योंसे कर्मोंका भी
सुकृतं भवति” इत्यादिना । | मोक्षसाधनत्व स्वीकार किया गया है ।
न त्वेतदस्ति, श्रुतिस्मृतिविरो- | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है,
[उक्ताक्षेपनिरासः] धान्न्यायविरोधाच्च । | क्योंकि इससे श्रुति-स्मृतियोंका
| विरोध है और यह युक्तिसे भी
श्रुतिविरोधस्तावत्-- | विरुद्ध है। श्रुतिका विरोध तो इस
“तद्यथेह कर्मजितो लोकः | प्रकार है—“जिस प्रकार यह कर्म-
क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्य- | द्वारा उपार्जित लोक क्षीण हो जाता
जितो लोकः क्षीयते” ( छा० उ० | है उसी प्रकार वह पुण्यद्वारा प्राप्त
८।१।६) । “तमेवं विद्वान- | लोक भी क्षीण हो जाता है”,
मृत इह भवति” ( नृसिंह पूर्व० | “उसीको जाननेवाला पुरुष इस
| लोकमें अमर हो जाता है”,
१।१६ ) नान्यः पन्था विद्यते- | “मोक्षप्राप्तिके लिये कोई दूसरा मार्ग
ऽयनाय” ( श्वेता० उ० ६।१५ ) । | नहीं है”, “कर्म, प्रजा अथवा धनसे

१० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

१० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
"न कर्मणा न प्रजया धनेन | नहीं, किन्हीं-किन्हींने त्यागसे ही
त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः" (कैव० | अमरत्व प्राप्त किया है", "जिनपर
३)। "प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञ- | ज्ञानकी अपेक्षा निकृष्ट श्रेणीका कर्म
रूपा अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म। | अवलम्बित कहा गया है वे [सोलह
एतच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढा | ऋत्विक्, यजमान और यजमानपत्नी-]
जरामृत्युं ते पुनरेवापियन्ति" | ये यज्ञके अठारह रूप अस्थिर एवं
(मु० उ० १ । २ । ७)। "ना- | नाशवान् हैं; जो मूढ 'यही श्रेय है'
स्तकृतः कृतेन” (मु० उ० १ । | ऐसा मानकर प्रसन्न होते हैं वे फिर भी
२ । १२)। | जरा-मरणको प्राप्त होते हैं।" "इस
"कर्मणा बध्यते जन्तु- | संसारमें कोई नित्य पदार्थ नहीं है,
र्विद्यया च विमुच्यते। | अतः [अनित्य फलके साधक]
तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति | कर्मसे हमें क्या प्रयोजन है?"
यतयः पारदर्शिनः ॥" | [अब स्मृतिका विरोध दिखलाते
“अज्ञानमलपूर्णत्वात् | हैं-] "जीव कर्मसे बँधता है और
पुराणो मलिनः स्मृतः । | ज्ञानसे मुक्त हो जाता है; इसीसे
तत्क्षयाद्वै भवेन्मुक्ति- | पारदर्शी मुनिजन कर्म नहीं करते",
र्नान्यथा कर्मकोटिभिः ॥" | "अज्ञानरूपी मलसे पूर्ण होनेके
“प्रजया कर्मणा मुक्ति- | कारण यह पुरातन जीव मलिन
र्धनेन च सतां न हि। | माना जाता है, उस मलका क्षय
त्यागेनैकेन मुक्तिः स्या- | होनेसे ही इसकी मुक्ति होती है,
त्तदभावे भ्रमन्त्यहो ॥" | अन्यथा करोड़ों कर्मोंसे भी इसका
“कर्मोदये कर्मफलानुरागा- | छुटकारा नहीं हो सकता",
स्तथानुयन्ति न तरन्ति मृत्युम् ।" | "सत्पुरुषोंकी मुक्ति प्रजा, कर्म अथवा
धनसे नहीं होती, एकमात्र त्यागसे
ही होती है; त्याग न होनेपर तो वे
भटकते ही रहते हैं", "कर्मका
उदय होनेपर उसके फलमें अनुराग
होता है, अतः उसीका अनुगमन
करते हैं, मृत्युको पार नहीं कर पाते,"

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११
“ज्ञानेन विद्वांस्तेज अभ्येति नित्यं | “ज्ञानके द्वारा विद्वान् नित्य
न विद्यत ह्यन्यथा तस्य पन्थाः॥” | प्रकाशको प्राप्त होता है, इसके
“एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना | सिवा उसका कोई और मार्ग नहीं
गतागतं कामकामा लभन्ते।” | है।” “इस प्रकार केवल त्रयीधर्म
(गीता ९।२१) | (वैदिक कर्म) में लगे रहनेवाले
“श्रमार्थमाश्रमाश्चापि | सकाम पुरुष आवागमनको प्राप्त होते
वर्णानां परमार्थतः॥” | हैं”, “वस्तुतः तो ब्राह्मणादि वर्णोंके
“आश्रमैर्न च वेदैश्च | ब्रह्मचर्यादि आश्रम भी केवल श्रमके
यज्ञैः सांख्यैर्व्रतैस्तथा। | ही लिये हैं”, “आश्रमोंसे, वेदोंसे,
उग्रैस्तपोभिर्विविधै- | यज्ञोंसे, सांख्यसे, व्रतोंसे, नाना
र्दानैर्नानाविधैरपि। | प्रकारकी भीषण तपस्याओंसे और
न लभन्ते तमात्मानं | अनेकों प्रकारके दानोंसे लोग उस
लभन्ते ज्ञानिनः स्वयम् ॥” | आत्माको प्राप्त नहीं कर सकते;
“त्रयीधर्ममधर्मार्थं | किन्तु ज्ञानी उसे स्वतः प्राप्त कर
किंपाकफलसंनिभम् । | लेते हैं”, “त्रयीधर्म अधर्मका ही
नास्ति तात सुखं किञ्चि- | हेतु होता है, यह किंपाक (सेमर)
दत्र दुःखशताकुले ॥ | फलके समान है। हे तात ! सैकड़ों
तस्मान्मोक्षाय यतता | दुःखोंसे पूर्ण इस कर्मकाण्डमें कुछ
कथं सेव्या मया त्रयी ।” | भी सुख नहीं है, अतः मोक्षके
“अज्ञानपाशबद्धत्वा- | लिये प्रयत्न करनेवाला मैं त्रयीधर्मका
दमुक्तः पुरुषः स्मृतः ॥ | किस प्रकार सेवन कर सकता हूँ”,
ज्ञानात्तस्य निवृत्तिः स्या- | “अज्ञानरूपी बन्धनसे बँधा होनेके
| कारण जीव अमुक्त माना गया है;
| उस बन्धनकी निवृत्ति ज्ञानसे हो
| सकती है, जिस प्रकार कि प्रकाशसे
१. यह फल देखनेमें बहुत सुन्दर होता है, परन्तु इसमें कोई सार
नहीं होता ।

१२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

१२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
त्प्रकाशात्तमसो यथा । | अन्धकारकी । अतः अज्ञानका
तस्माज्ज्ञानेन मुक्तिः स्या- | पूर्णतया क्षय होनेपर ज्ञानसे ही
दज्ञानस्य परिक्षयात् ॥” | मुक्ति होती है,” “व्रत, दान, तप,
“व्रतानि दानानि तपांसि यज्ञाः | यज्ञ, सत्य, तीर्थ, आश्रम और
सत्यं च तीर्थाश्रमकर्मयोगाः। | कर्मयोग—ये सब स्वर्गके ही हेतु हैं,
स्वर्गार्थमेवाशुभमश्रुवं च | अतः अशुभ ( अकल्याणकर )
ज्ञानं ध्रुवं शान्तिकरं महार्थम् ॥” | और अनित्य हैं । किन्तु ज्ञान नित्य,
“यज्ञैर्देवत्वमाप्नोति | शान्तिकारक और परमार्थस्वरूप है”,
तपोभिर्ब्रह्मणः पदम् । | “मनुष्य यज्ञोंके द्वारा देवत्व प्राप्त
दानेन विविधान्भोगा- | करता है, तपस्यासे ब्रह्मलोक पाता
ज्ञानान्मोक्षमवाप्नुयात् ॥” | है, दानसे तरह-तरहके भोग प्राप्त
“धर्मरज्ज्वा व्रजेदूर्ध्वं | करता है और ज्ञानसे मोक्षपद पाता
पापरज्ज्वा व्रजेदधः। | है”, “धर्मकी रस्सीसे पुरुष ऊपरकी
द्वयं ज्ञानासिना छित्त्वा | ओर जाता है और पापरज्जुसे अधो-
विदेहः शान्तिमृच्छति ॥” | गतिको प्राप्त होता है, परन्तु जो इन
“त्यज धर्ममधर्मं च | दोनोंको ज्ञानरूप खड्गसे काट देता
उभे सत्यानृते त्यज। | है वह देहाभिमानसे रहित होकर
उभे सत्यानृते त्यक्त्वा | शान्ति प्राप्त करता है”, “धर्म-अधर्म
येन त्यजसि तच्च्यज ॥” | दोनोंका त्याग करो तथा सत्-असत्
| दोनोंहीसे मुख मोड़ लो, इस प्रकार
| सत्-असत् दोनोंकी आस्था छोड़कर
| जिस ( त्यागाभिमान ) के द्वारा उनका
| त्याग करते हो उसे भी त्याग दो ।”
एवं श्रुतिस्मृतिविरोधान्न कर्म- | इस प्रकार श्रुति और स्मृतियोंसे
| विरोध होनेके कारण तथा युक्तिसे
साधनममृतत्वं न्यायविरोधाच्च । | भी विरुद्ध होनेसे अमृतत्व कर्मसाध्य
| नहीं है । यदि उसे कर्मसाध्य माना
कर्मसाधनत्वे मोक्षस्य चतुर्विध- | जायगा तो मोक्ष भी चार प्रकारकी

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३
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क्रियान्तर्भावादनित्यत्वं स्यात् । | क्रियाओंके अन्तर्गत होनेसे अनित्य
| हो जायगा; क्योंकि 'जो क्रियासाध्य
यत्कृतकं तदनित्यमिति कर्म- | होता है वह अनित्य होता है' इस
| नियमके अनुसार क्रियासाध्य वस्तुकी
साध्यस्य नित्यत्वादर्शनात् । | नित्यता नहीं देखी जाती । किन्तु
| मोक्षको तो सभी सिद्धान्तवालोंने
नित्यश्च मोक्षः सर्ववादिभिरभ्युप- | नित्य माना है । चातुर्मास्ययागके
गम्यते । तथा च श्रुतिश्चातुर्मा- | प्रकरणमें ऐसी श्रुति भी है कि "हे
| मर्त्य ! तू पुनः पुत्ररूपसे उत्पन्न
स्यप्रकरणे—प्रजामनु प्रजायसे | होता है, यही तेरा अमरत्व है ।"
तदु ते मर्त्यामृतमिति । किंच, | तथा "सुकृतम्" ( अक्षय्यं ह वै
| चातुर्मास्ययाजिनः सुकृतं भवति ) इस
सुकृतमिति सुकृतस्याक्षयत्व- | श्रुतिमें सुकृतका अक्षयत्व बतलाया
| गया है और 'सुकृत' शब्द कर्मके
मुच्यते । सुकृतशब्दश्च कर्मणि । | अर्थमें प्रयुक्त होता है ।
नन्वेवं तर्हि कर्मणां देवादि- | शंका—तब इस प्रकार तो
| देवत्वादिकी प्राप्तिके हेतु होनेसे कर्म
प्राप्तिहेतुत्वेन बन्धहेतुत्वमेव । | बन्धनके ही कारण सिद्ध होते हैं ?
सत्यम्, स्वतो बन्धहेतुत्व- | समाधान—सचमुच, स्वयं तो वे
| बन्धनके ही कारण हैं । ऐसा ही
मेव । तथा च श्रुतिः—"कर्मणा | श्रुति भी कहती है—"कर्मसे

१. उत्पाद्य, विकार्य, संस्कार्य और प्राप्य-ये चार प्रकारके क्रियाफल हैं ।
जब कोई अविद्यमान वस्तु क्रियाद्वारा उत्पन्न की जाती है तो उसे उत्पाद्य कहते हैं,
जैसे घट, पट आदि । एक वस्तुको दूसरे रूपमें परिणत करनेपर जो फल प्राप्त होता
है उसे विकार्य कहते हैं जैसे हारको गलाकर उसका कङ्कण बना दिया जाय । दोषको
हटाना और गुणको प्रकट कर देना संस्कार्य है जैसे किसी दर्पणको घिसकर
उसका मैल हटा दिया जाय और उसमें चमक पैदा कर दी जाय । किसी अप्राप्य
वस्तुको क्रियाद्वारा प्राप्त करना यह प्राप्य क्रियाफल है; जैसे गमनक्रियाके द्वारा किसी
ग्रामविशेषमें पहुँचना ।

१४ | श्वेताश्वतरोपनिषद् | [ अध्याय १

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१४ | श्वेताश्वतरोपनिषद् | [ अध्याय १


वाम स्तम्भ (मूल संस्कृत):

पितृलोकः” (बृ० उ० १ । ५ ।
१६) । “सर्व एते पुण्यलोका
भवन्ति” (छा० उ० २ । २३ ।
१) । “इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं
नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः ।
नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं
लोकं हीनतरं वा विशन्ति” (मु०
उ० १ । २ । १०) ।
“एवं कर्मसु निःस्नेहा
ये केचित्पारदर्शिनः ।”
“विद्यामयोऽयं पुरुषो
न तु कर्ममयः स्मृतः ॥”
“एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना
गतागतं कामकामा लभन्ते”
(गीता ९ । २१)
इति ।
यदा पुनः फलनिरपेक्षमीश्व-
रार्थं कर्मानुतिष्ठन्ति तदा मोक्ष-
साधनज्ञानसाधनान्तःकरणशुद्धि-
साधनपारम्पर्येण मोक्षसाधनं
भवति । तथाह भगवान्—
“ब्रह्मण्याधाय कर्माणि


दक्षिण स्तम्भ (हिन्दी अनुवाद):

पितृलोक प्राप्त होता है”, “ये सब
पुण्यलोकोंके ही भागी होते हैं”,
“इष्ट और पूर्तकर्मोंको ही सर्वश्रेष्ठ
समझनेवाले मूढ़ पुरुष किसी अन्य
श्रेयःसाधनको नहीं जानते; वे लोग
स्वर्गलोकके उच्च स्थानमें अपने पुण्य-
कर्मके उपभोगके लिये प्राप्त दिव्य
देहमें पुण्यफल भोगकर इस मनुष्य-
लोकमें या इससे भी निकृष्ट लोक
(पशु-पक्षी आदि योनि अथवा
नरक) में प्रवेश करते हैं”, “इस प्रकार
जो कोई कर्मोंमें अनासक्त होते हैं वे
ही पारदर्शी होते हैं”, “यह पुरुष
ज्ञानस्वरूप है, यह कर्मप्रधान नहीं
माना जाता”, “इस प्रकार त्रयीधर्म
(केवल वैदिक कर्म) में तत्पर रहनेवाले
सकाम पुरुष आवागमनको प्राप्त होते
रहते हैं” इत्यादि ।
किन्तु जब कोई पुरुष फलकी
इच्छा न रखकर केवल भगवान्‌के
लिये ही कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं
तो वे मोक्षके साधन ज्ञानकी साधन-
भूता अन्तःकरण-शुद्धिके साधन
होकर परम्परासे मोक्षके साधन होते
हैं। ऐसा ही भगवान्‌ने कहा है—
“जो पुरुष [ कर्मफलकी ] आसक्ति
छोड़कर भगवान्‌के समर्पण-

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५
ൠൠൠൠൠൠൠൠൠൠൠൠൠൠൠ
सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः। | पूर्वक कर्म करता है वह जलसे
लिप्यते न स पापेन | कमलके पत्तेके समान [ उस कर्मके
पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ | शुभाशुभ फलरूप ] पापसे लिप्त
कायेन मनसा बुद्ध्या | नहीं होता", "योगीलोग फलविषयक
केवलैरिन्द्रियैरपि । | आसक्ति छोड़कर केवल शरीर, मन,
योगिनः कर्म कुर्वन्ति | बुद्धि और इन्द्रियोंसे अन्तःकरणकी
सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥" | शुद्धिके लिये कर्म किया करते हैं", "हे
( गीता ५।१०-११ ) | कुन्तीनन्दन ! तुम जो कुछ भी कर्म करते
"यत्करोषि यदश्नासि | हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ [ श्रौत
यज्जुहोषि ददासि यत् । | या स्मार्तयज्ञरूप ] हवन करते हो, जो
यत्तपस्यसि कौन्तेय | कुछ तप करते हो और जो कुछ
तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥ | दान देते हो वह सब मुझे अर्पण
शुभाशुभफलैरेवं | कर दो । ऐसा करनेसे तुम शुभाशुभ
मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः । | फलरूप कर्मके बन्धनसे छूट जाओगे
संन्यासयोगयुक्तात्मा | और संन्यासयोगसे युक्त हो जीते-जी
विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥" | ही कर्म-बन्धनसे मुक्त होकर देह-
( गीता ९।२७-२८ ) | पात होनेके बाद मुझे ही प्राप्त
इति । | होगे", इत्यादि ।
तथा च मोक्षे क्रमं शुद्धयभावे | इसी प्रकार विष्णुधर्मोत्तरपुराणमें
मोक्षाभावं कर्मभिश्च तच्छुद्धिं | भी मोक्षमें क्रम, चित्तशुद्धिके अभावमें
दर्शयति श्रीविष्णुधर्मे— | मोक्ष न होना और कर्मोंके द्वारा चित्तकी
"अनूचानस्ततो यज्वा | शुद्धि होना—ये सब दिखाये गये
कर्मन्यासी ततः परम् । | हैं—"योगी पहले वेदाध्यायी, फिर
ततो ज्ञानित्वमभ्येति | यज्ञकर्ता, तत्पश्चात् कर्मसंन्यासी और
योगी मुक्तिं क्रमाल्लभेत ॥" | फिर ज्ञानित्व प्राप्त करता है इस प्रकार
| वह क्रमशः मुक्तिलाभ करता है",

१६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

१६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
“अनेकजन्मंसंसार- “जबतक अनेकों जन्मके
चिते पापसमुच्चये । सांसारिक संसर्गसे सञ्चित हुआ
नाक्षीणे जायते पुंसां पापपुञ्ज क्षीण नहीं होता तबतक
गोविन्दाभिमुखी मतिः॥” लोगोंकी बुद्धि भगवान्‌की ओर प्रवृत्त
“जन्मान्तरसहस्रेषु नहीं होती ।” “हजारों जन्मोंके
तपोज्ञानसमाधिभिः । पीछे तपस्या, ज्ञान और समाधिके
नराणां क्षीणपापानां द्वारा जिनके पाप क्षीण हो गये हैं
कृष्णे भक्तिः प्रजायते ॥” उन्हीं लोगोंकी भगवान् कृष्णमें भक्ति
“पापकर्मशयो ह्यत्र होती है ।” “इस लोकमें पापकर्मोंका
महामुक्तिविरोधकृत् । संस्कार ही आत्यन्तिकी मुक्तिका
तस्यैव शमने यत्नः विरोधी है; अतः संसारसे डरनेवाले
कार्यः संसारभीरुणा ॥” पुरुषको उसीके नाशका प्रयत्न
“सुवर्णादिमहादान- करना चाहिये ।” “सुवर्णदानादि
पुण्यतीर्थावगाहनैः । बड़े-बड़े दानोंसे, पवित्र तीर्थोंमें
शारीरैश्च महाक्लेशैः स्नान करनेसे और शास्त्रानुकूल
शास्त्रोक्तैस्तच्छमो भवेत् ॥” शारीरिक महान् कष्टोंके सहनसे
“देवताश्रुतिसच्छास्त्र- उसका नाश हो सकता है ।”
श्रवणैः पुण्यदर्शनैः । “देवाराधन, श्रुति और सच्छास्त्रोंके
गुरुशुश्रूषणैश्चैव श्रवण, पवित्र तीर्थस्थानोंके दर्शन
पापबन्धः प्रशाम्यति ॥” और गुरुकी सेवा करनेसे भी पापका
याज्ञवल्क्योऽपि शुद्धयपेक्षां बन्धन निवृत्त हो जाता है ।”
तत्साधनं च दर्शयति— याज्ञवल्क्यजी भी ज्ञानमें चित्त-
“कर्त्तव्याशयशुद्धिस्तु शुद्धिकी अपेक्षा और उसके साधन
भिक्षुकेण विशेषतः । प्रदर्शित करते हैं— “ज्ञानोत्पत्तिका
ज्ञानोत्पत्तिनिमित्तत्वा- हेतु होनेसे भिक्षुको स्वतन्त्रता (मुक्ति)
त्स्वतन्त्रीकरणाय च ॥ प्राप्त करनेके लिये विशेषरूपसे
( याज्ञ० यतिधर्म० ६२) चित्तकी शुद्धि ही करनी चाहिये ।
मलिनो हि यथादर्शो जिस प्रकार मलिन दर्पणमें अपना
रूपालोकस्य न क्षमः । रूप नहीं देखा जा सकता उसी

अध्याय १ शाङ्करभाष्यार्थ १७

अध्याय १ शाङ्करभाष्यार्थ १७

तथाविपक्वकरण | प्रकार जिसका अन्तःकरण परिपक्व
आत्मज्ञानस्य न क्षमः ॥” | (वासनारहित) नहीं है वह आत्म-
(याज्ञ० यतिधर्म० १४१) | ज्ञान प्राप्त करनेकी योग्यता नहीं
“आचार्योपासनं वेद- | रखता।” [अब चित्तशुद्धिके साधन
शास्त्रार्थस्य विवेकिता । | बतलाते हैं-] “गुरुसेवा, वेद और
सत्कर्मणामनुष्ठानं | शास्त्रके तात्पर्य का विवेचन, शुभकर्मों-
सङ्गः सद्भिर्गिरः शुभाः ॥ | का आचरण, सत्पुरुषोंका संग, अच्छी
स्त्र्यालोकालम्भविगमः | वाणी बोलना, स्त्रीमात्रके दर्शन और
सर्वभूतात्मदर्शनम् । | स्पर्शका त्याग, समस्त प्राणियोंमें
त्यागः परिग्रहाणां च | आत्मदृष्टि करना, परिग्रहका त्याग,
जीर्णकाषायधारणम् ॥ | पुराने काषाय वस्त्र धारण करना,
विषयेन्द्रियसंरोध- | विषयोंकी ओरसे इन्द्रियोंको रोकना,
स्तन्द्रालस्यविवर्जनम्। | तन्द्रा और आलस्यको त्यागना,
शरीरपरिसंख्यानं | देहतत्त्वका विचार, प्रवृत्तिमें दोष-
प्रवृत्तिष्वघदर्शनम् ॥ | दर्शन, रजोगुण और तमोगुणके
नीरजस्तमसा सत्त्व- | त्यागद्वारा सत्त्वगुणको बढ़ाना, किसी
शुद्धिर्निःस्पृहता शमः । | प्रकारकी इच्छा न करना और
एतैरुपायैः संशुद्ध- | मनोनिग्रह-इन उपायोंके द्वारा
सत्त्वयोग्यमृती भवेत् ॥” | जिसका अन्तःकरण पवित्र हो गया
(याज्ञ० यतिधर्म० १५६-१५९) | है वह योगी अमृतत्व (मोक्ष) को
“यतो वेदाः पुराणानि | प्राप्त हो जाता है” “वेद,
विद्योपनिषदस्तथा । | पुराण, ज्ञानमय उपनिषद्, श्लोक,
श्लोकाः सूत्राणि भाष्याणि | सूत्र, भाष्य तथा और भी जहाँ-कहीं

१. भाष्यका लक्षण इस प्रकार बताया गया है—
सूत्रस्थं पदमादाय पदैः सूत्रानुसारिभिः ।
स्वपदानि च वर्ण्यन्ते भाष्यं भाष्यविदो विदुः ॥
जिसमें कि सूत्रके पदोंको लेकर तदनुकूल अन्य पद

१८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

१८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
यच्चान्यद्वाङ्मयं क्वचित् ॥
वेदानुवचनं यज्ञो
ब्रह्मचर्यं तपो दमः ।
श्रद्धोपवासः स्वातन्त्र्य-
मात्मनो ज्ञानहेतवः ॥"
(याज्ञ० यति० १८९-१९०)
तथा चाथर्वणे विशुद्धद्यपेक्ष-
मात्मज्ञानं दर्शयति-
"जन्मान्तरसहस्रेषु
यदा क्षीणास्तु किल्बिषाः ॥
तदा पश्यन्ति योगेन
संसारोच्छेदनं महत् ॥”
(योगशिख० १ । ७८-७९)
“यस्मिन्विशुद्धे विरजे च
चित्ते य आत्मवत्पश्यन्ति यतयः
क्षीणदोषाः ।” "तमेतं वेदानु-
वचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति
यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन"
(बृ० उ० ४ । ४ । २२) इति
बृहदारण्यके विविदिषाहेतुत्वं
यज्ञादीनां दर्शयति ।
जो कुछ शास्त्र हैं वे सब एवं
वेदपाठ, यज्ञानुष्ठान, ब्रह्मचर्य, तप,
इन्द्रियदमन, श्रद्धा, उपवास और
स्वतन्त्रता (दूसरे किसीकी आशा
न रखना) ये सब आत्मज्ञानके
साधन हैं।"
इसी प्रकार अथर्ववेदीय उपनिषद्में
भी 'आत्मज्ञान चित्तशुद्धिकी अपेक्षा
रखनेवाला है' यह दिखलाते हैं-
"जिस समय सहस्रों जन्मोंके अनन्तर
पाप क्षीण हो जाते हैं उसी समय
पुरुष योगके द्वारा संसारका उच्छेद
करनेवाला [ज्ञानरूप] महान्
साधन देख पाते हैं।" "जिस
चित्तके शुद्ध और निर्मल हो जानेपर
जिनके दोष क्षीण हो गये हैं वे
यतिजन सम्पूर्ण भूतोंको आत्मस्वरूप
ही देखते हैं।" बृहदारण्यकमें भी
“उस इस आत्माको ब्राह्मणगण वेद-
पाठ, यज्ञ, दान, तप और उपवासके
द्वारा जाननेकी इच्छा करते हैं” इस
वाक्यद्वारा श्रुति यज्ञादिको जिज्ञासाका
हेतु प्रदर्शित करती है ।
वाचक शब्द] और कुछ स्वाभिमत पद रहते हैं उसे भाष्यका लक्षण जाननेवाले
'भाष्य' मानते हैं ।

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९

ननु "विद्यां चाविद्यां च | पूर्व०-किन्तु "जो विद्या (ज्ञान)
कर्मणामप्य- यस्तद्वेदोभय सह" | और अविद्या (कर्म) इन दोनोंको
मृतत्वहेतुत्वम् (ईशा० उ० ११)। | साथ-साथ जानता है", "तप और
"तपो विद्या च विप्रस्य निःश्रेय- | ज्ञान ये ब्राह्मणके निःश्रेयसके उत्कृष्ट
सकरं परम्।" इत्यादिना कर्मणाम- | साधन हैं" इत्यादि वाक्योंसे तो
प्यमृतत्वप्राप्तिहेतुत्वमवगम्यते । | कर्मोंका भी अमृतत्वकी प्राप्तिमें हेतु
होना जान पड़ता है ?
सत्यम्, अवगम्यत एव तद- | सिद्धान्ती-ठीक है, जान तो
तच्च तदपे-पेक्षितशुद्धिद्वारेण न | पड़ता ही है; परन्तु ज्ञानके लिये
क्षितशुद्धिद्वारेण च साक्षात् । तथा | अपेक्षित चित्तशुद्धिके द्वारा ही कर्मका
न साक्षात् हि-"विद्यां चाविद्यां | अमृतत्वमें हेतुत्व है, साक्षात् नहीं।
च" (ईशा० उ० ११) । "तपो | इसीसे "विद्यां चाविद्यां च" तथा
विद्या च विप्रस्य निःश्रेयसकरं | "तपो विद्या च विप्रस्य निःश्रेयसकरं
परम्।" इत्यादिना ज्ञानकर्मणोर्निः- | परम्" इत्यादि वाक्योंसे ज्ञान और
श्रेयसहेतुत्वमभिधाय कथमनयो- | कर्मका निःश्रेयसमें हेतुत्व बतलाकर
स्तद्धेतुत्वमित्याकाङ्क्षायां "तपसा | ऐसी जिज्ञासा होनेपर कि ये किस
कल्मषं हन्ति विद्ययामृतमश्नुते।" | प्रकार उसके हेतु हैं- "तपसा कल्मषं
"अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्यया- | हन्ति विद्ययामृतमश्नुते"* और
मृतमश्नुते" (ईशा० उ० ११) | "अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृत-
इतिवाक्यशेषेण कर्मणः कल्मष- | मश्नुते"† इन वाक्यशेषोंसे कर्मका
क्षयहेतुत्वं विद्याया अमृतप्राप्ति- | पापक्षयमें कारणत्व और ज्ञानका
हेतुत्वं प्रदर्शितम् । यत्र तु | अमृतत्वप्राप्तिमें हेतुत्व प्रदर्शित किया
शुद्ध्याद्यवान्तरकार्यानुपदेशस्त- | है । और भी जहाँ कहीं शुद्धि आदि
त्रापि शाखान्तरोपसंहारन्यायेनो- | अन्य कर्मोंका उपदेश दिखायी न
दे वहाँ भी शाखान्तरोपसंहारन्यायसे‡

  • तपसे पाप नष्ट करता है और ज्ञानसे अमृतत्व प्राप्त करता है ।
    † कर्मसे [ संसाररूप ] मृत्युको पार करके ज्ञानसे अमृतत्व प्राप्त करता है ।
    ‡ जहाँ एक ही जातिके कर्म या उपासनाका वेदकी विभिन्न शाखाओंमें वर्णन

२० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

[Header]
२० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
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पसंहारः कर्त्तव्यः । | उसका उपसंहार (संग्रह) कर लेना चाहिये ।
ननु "कुर्वन्नेवेह कर्माणि | पूर्व०-किन्तु "कर्म करते हुए
[विद्याया मोक्षसाधनत्व-माक्षिपति] जिजीविषेच्छतं | ही सौ वर्षतक जीवित रहनेकी
समाः” (ईशा० उ० | इच्छा करे” ऐसा जीवनपर्यन्त
२) इति यावज्जीवकर्मानुष्ठाननियमे | कर्मानुष्ठानका नियम रहते हुए ज्ञान
सति कथं विद्याया मोक्षसाधनत्वम् ? | मोक्षका साधन कैसे माना जा सकता है ?
उच्यते—कर्मण्यधिकृतस्यायं | सिद्धान्ती-बतलाते हैं, यह
[आक्षेपं परिहरति] नियमो नानधिकृत- | नियम कर्माधिकारीके ही लिये है, जो कर्मके अधिकार और शास्त्राज्ञासे
स्यानियोज्यस्य ब्रह्मवादिनः । तथा | बाहर है उस ब्रह्मवेत्ताके लिये नहीं
च विदुषः कर्मानधिकारं दर्शयति | है ! इसी प्रकार श्रुति भी ब्रह्मवेत्ताको कर्मके अधिकारसे बाहर दिखाती है-
श्रुतिः—"नैतद्विद्वानृषिणा विधेयो | "यह ब्रह्मवेत्ता ऋषियोंकी आज्ञाके
न रुध्यते विधिना शब्दचारः ।” | अधीन नहीं है और न यह शास्त्रका
"एतद्ध स्म वै तत्पूर्वे विद्वांसो- | अनुयायी होकर उसकी आज्ञासे रुक
ऽग्निहोत्रं न जुहवाञ्चक्रिरे ।” “एतं | ही सकता है," "इसीलिये पूर्ववर्ती विद्वान् अग्निहोत्र नहीं करते थे,”
वै तमात्मानं विदित्वा ब्राह्मणाः | “इस आत्मतत्त्वको जान लेनेपर
पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकै- | ब्राह्मणलोग पुत्रैषणा, वित्तैषणा और
षणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं | लोकैषणाको छोड़कर भिक्षाचर्या

[Footnote]
हो, किन्तु शास्त्रभेदसे उनके फल या अनुष्ठानकी शैलीमें भेद दिखायी दे वहाँ अन्य
शाखामें आये हुए अधिक अंशको सम्मिलित करके न्यूनताकी पूर्ति कर लेनी चाहिये ।
इसे शाखान्तरोपसंहारन्याय कहते हैं। इसका विशद वर्णन ब्रह्मसूत्रभाष्यके तृतीय
अध्यायके तृतीय पादमें देखना चाहिये ।

[अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१

[अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१


चरन्ति” (बृ० उ० ३।५।१) | करते थे,” “ब्रह्मवेत्ता कावषेय
“एतद्ध स्म वै तद्विद्वांस आहु- | ऋषियोंने भी यही कहा है—हम
ऋषयः कावषेयाः किमर्था वय- | किस प्रयोजनके लिये अध्ययन करें
मध्येण्यामहे किमर्था वयं यक्ष्यामहे | और किस उद्देश्यकी पूर्तिके लिये यज्ञ
स ब्राह्मणः केन स्याद्येन स्यात्ते- | करें ? वह किस प्रकार ब्रह्मनिष्ठ हो
नेदृश एवेति।”यथाह भगवान्— | सकता है, जिस प्रकार भी हो ऐसा
“यस्त्वात्मरतिरेव स्या- | (सर्वत्यागी) ही होगा।” जैसा
दात्मतृप्तश्च मानवः । | कि श्रीभगवान् भी कहते हैं—
आत्मन्येव च संतुष्ट- | “जो पुरुष आत्मामें ही प्रेम
स्तस्य कार्यं न विद्यते ॥ | करनेवाला, आत्मामें ही तृप्त
नैव तस्य कृतेनार्थो | और आत्मामें ही सन्तुष्ट है, उसके
नाकृतेनेह कश्चन । | लिये कुछ भी कर्त्तव्य नहीं है। उस
न चास्य सर्वभूतेषु | पुरुषका इस लोकमें कर्म करनेसे
कश्चिदर्थव्यपाश्रयः॥” | कोई प्रयोजन नहीं है और कर्म न
(गीता ३। १७-१८) | करनेसे यहाँ उसे प्रत्यवाय आदि
तथा चाह भगवान्परमेश्वरो | अनर्थकी भी प्राप्ति नहीं होती
लैङ्गे कालकूटोपाख्याने— | तथा सम्पूर्ण भूतोंमें उसका कोई अर्थ-
“ज्ञानेनैतेन विप्रस्य | व्यपाश्रय (अर्थसिद्धिका सहारा)
त्यक्तसङ्गस्य देहिनः । | भी नहीं है।”
कर्तव्यं नास्ति विप्रेन्द्रा | लिङ्गपुराणमें कालकूटोपाख्यानमें
अस्ति चेत्तत्त्वविन्न च ॥ | ऐसा ही भगवान् महेश्वर भी कहते
इह लोके परे चैव | हैं—“हे द्विजेन्द्रगण ! इस ज्ञानकें
कर्तव्यं नास्ति तस्य वै । | द्वारा निःसंग हुए जीवको कोई
जीवन्मुक्तो यतस्तु स्या- | कर्त्तव्य नहीं रहता, यदि रहता है
द्ब्रह्मवित्परमार्थतः ॥ | तो वह तत्त्ववेत्ता नहीं है। उसे इस
| लोक और परलोकमें भी कोई कर्त्तव्य
| नहीं है, क्योंकि वास्तवमें ब्रह्मवेत्ता
| तो जीते हुए ही मुक्त हो जाता है।


श्वेता० २—

२२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
ज्ञानाभ्यासरतो नित्यं | परमार्थतत्त्वको जाननेवाला ज्ञाना-
विरक्तो ह्यर्थवित्स्वयम् । | भ्यासमें तत्पर विरक्त पुरुष कर्तव्यकी
कर्तव्यभावमुत्सृज्य | चिन्ता छोड़कर केवल ज्ञानहीको
ज्ञानमेवाधिगच्छति ॥ | प्राप्त करता है। हे द्विजश्रेष्ठ ! जो
वर्णाश्रमाभिमानी य- | वर्णाश्रमाभिमानी पुरुष ज्ञानदृष्टिको
स्त्यक्त्वा ज्ञानं द्विजोत्तमाः। | त्यागकर मोहवश कहीं अन्यत्र सुख
अन्यत्र रमते मूढः | मानता है वह अज्ञानी है, इसमें
सोऽज्ञानी नात्र संशयः ॥ | सन्देह नहीं। क्रोध, भय, लोभ,
क्रोधो भयं तथा लोभो | मोह, भेददृष्टि, मद, अज्ञान और
मोहो भेदो मदस्तमः। | धर्माधर्म—ये सब ऐसे लोगोंको ही
धर्माधर्मौ च तेषां हि | प्राप्त होते हैं और इनके अधीन
तद्वशाच्च तनुग्रहः॥ | होनेपर देह धारण करना पड़ता
शरीरे सति वै क्लेशः | है। तथा शरीरके रहते हुए क्लेश
सोऽविद्यां संत्यजेत्ततः। | अवश्यम्भावी है। अतः जीवको
अविद्यां विद्यया हित्वा | अविद्याका त्याग करना चाहिये।
स्थितस्यैवेह योगिनः॥ | जो योगी विद्याद्वारा अविद्याका त्याग
क्रोधाद्या नाशमायान्ति | करके स्थित है उसके क्रोधादि दोष
धर्माधर्मौ च नश्यतः। | तथा धर्म और अधर्म इस लोकमें
तत्क्षयाच्च शरीरेण | रहते हुए ही नष्ट हो जाते हैं।
न पुनः संप्रयुज्यते ॥ | उनका क्षय होनेपर उसका फिर
स एव मुक्तः संसारा- | शरीरसे संयोग नहीं होता, तथा
दुःखत्रयविवर्जितः।।" | वही त्रिविध तापसे छूटकर संसारसे
तथा शिवधर्मोत्तरे— | मुक्त हो जाता है।"
"ज्ञानामृतेन तृप्तस्य | तथा शिवधर्मोत्तरमें कहा है—
कृतकृत्यस्य योगिनः। | "जो योगी ज्ञानामृतसे तृप्त होकर
नैवास्ति किञ्चित्कर्तव्य- | कृतकृत्य हो गया है उसके लिये
मस्ति चेन्न स तत्त्ववित् । | कोई कर्तव्य नहीं रहता, और यदि
| रहता है तो वह तत्त्ववेत्ता नहीं है।

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३

लोकद्वयेऽपि कर्तव्यं | उसे दोनों लोकोंमें कोई कर्त्तव्य नहीं
किञ्चिदस्य न विद्यते । | रहता वह सर्वथा पूर्ण और समदर्शी
इहैव स विमुक्तः स्या- | होनेके कारण इस लोकमें ही मुक्त
त्सम्पूर्णः समदर्शनः ॥” | हो जाता है ।”
तस्माद्विदुषः कर्तव्याभावाद- | अतः विद्वान्के लिये कोई
| कर्त्तव्य न होनेके कारण ‘कर्म
विद्यावद्विषय एवायं कुर्वन्नेवे- | करता हुआ ही सौ वर्ष जीनेकी
| इच्छा करे’ इत्यादि रूपसे कर्म
त्यादिकर्मनियमः । कुर्वन्नेवेति | करनेका नियम केवल अज्ञानियोंके
| ही लिये है । अथवा यह समझना
च नायं कर्मनियमः किन्तु विद्या- | चाहिये कि ‘कुर्वन्नेव’ इत्यादि वाक्य
| कर्मका नियामक नहीं है,
माहात्म्यं दर्शयितुं यथाकामं | अपि तु ज्ञानकी महिमा दिखानेके
| उद्देश्यसे [ज्ञानीके लिये] स्वेच्छानुसार
कर्मानुष्ठानमेव द्रष्टव्यम् । एतदुक्तं | कर्मानुष्ठान प्रदर्शित करनेके लिये
| ही है । इसके द्वारा यह बतलाया
भवति-यावज्जीवं यथाकामं | गया है कि विद्वान् स्वेच्छासे जीवन-
| पर्यन्त पुण्य-पापादिरूप कर्म करता
पुण्यपापादिकं कुर्वत्यपि विदुषि | भी रहे तो भी ज्ञानके सामर्थ्यसे उसे
| उन कर्मोंका लेप नहीं होगा ।
न कर्मलेपो भवति विद्यासामर्थ्या- | तात्पर्य यह है कि ‘ईशावास्यमिद
| सर्वम्’ यहाँसे लेकर ‘तेन त्यक्तेन
दिति । तथा हि-“ईशावास्य- | भुञ्जीथाः’ इस प्रथम मन्त्रसे सर्वकर्म-
| परित्यागपूर्वक आत्मरक्षाका प्रतिपादन
मिद सर्वम्” (ईशा० उ० १) | करनेपर वेद यह देखकर कि जिसके
| लिये कोई भी विधि नहीं की जा
इत्यारभ्य “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः” | सकती उस ब्रह्मवेत्ताके लिये
| सर्वकर्मपरित्यागका विधान करना भी
( ईशा० उ० १) इति विदुषः |
सर्वकर्मत्यागेनात्मपालनमुक्त्वा- |
नियोज्ये ब्रह्मविदि त्यागकर्तव्य- |