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सर्वकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 25, कुल 276 में से

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पृष्ठ 25

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११
“ज्ञानेन विद्वांस्तेज अभ्येति नित्यं | “ज्ञानके द्वारा विद्वान् नित्य
न विद्यत ह्यन्यथा तस्य पन्थाः॥” | प्रकाशको प्राप्त होता है, इसके
“एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना | सिवा उसका कोई और मार्ग नहीं
गतागतं कामकामा लभन्ते।” | है।” “इस प्रकार केवल त्रयीधर्म
(गीता ९।२१) | (वैदिक कर्म) में लगे रहनेवाले
“श्रमार्थमाश्रमाश्चापि | सकाम पुरुष आवागमनको प्राप्त होते
वर्णानां परमार्थतः॥” | हैं”, “वस्तुतः तो ब्राह्मणादि वर्णोंके
“आश्रमैर्न च वेदैश्च | ब्रह्मचर्यादि आश्रम भी केवल श्रमके
यज्ञैः सांख्यैर्व्रतैस्तथा। | ही लिये हैं”, “आश्रमोंसे, वेदोंसे,
उग्रैस्तपोभिर्विविधै- | यज्ञोंसे, सांख्यसे, व्रतोंसे, नाना
र्दानैर्नानाविधैरपि। | प्रकारकी भीषण तपस्याओंसे और
न लभन्ते तमात्मानं | अनेकों प्रकारके दानोंसे लोग उस
लभन्ते ज्ञानिनः स्वयम् ॥” | आत्माको प्राप्त नहीं कर सकते;
“त्रयीधर्ममधर्मार्थं | किन्तु ज्ञानी उसे स्वतः प्राप्त कर
किंपाकफलसंनिभम् । | लेते हैं”, “त्रयीधर्म अधर्मका ही
नास्ति तात सुखं किञ्चि- | हेतु होता है, यह किंपाक (सेमर)
दत्र दुःखशताकुले ॥ | फलके समान है। हे तात ! सैकड़ों
तस्मान्मोक्षाय यतता | दुःखोंसे पूर्ण इस कर्मकाण्डमें कुछ
कथं सेव्या मया त्रयी ।” | भी सुख नहीं है, अतः मोक्षके
“अज्ञानपाशबद्धत्वा- | लिये प्रयत्न करनेवाला मैं त्रयीधर्मका
दमुक्तः पुरुषः स्मृतः ॥ | किस प्रकार सेवन कर सकता हूँ”,
ज्ञानात्तस्य निवृत्तिः स्या- | “अज्ञानरूपी बन्धनसे बँधा होनेके
| कारण जीव अमुक्त माना गया है;
| उस बन्धनकी निवृत्ति ज्ञानसे हो
| सकती है, जिस प्रकार कि प्रकाशसे
१. यह फल देखनेमें बहुत सुन्दर होता है, परन्तु इसमें कोई सार
नहीं होता ।