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सर्वकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 37, कुल 276 में से

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पृष्ठ 37

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३

लोकद्वयेऽपि कर्तव्यं | उसे दोनों लोकोंमें कोई कर्त्तव्य नहीं
किञ्चिदस्य न विद्यते । | रहता वह सर्वथा पूर्ण और समदर्शी
इहैव स विमुक्तः स्या- | होनेके कारण इस लोकमें ही मुक्त
त्सम्पूर्णः समदर्शनः ॥” | हो जाता है ।”
तस्माद्विदुषः कर्तव्याभावाद- | अतः विद्वान्के लिये कोई
| कर्त्तव्य न होनेके कारण ‘कर्म
विद्यावद्विषय एवायं कुर्वन्नेवे- | करता हुआ ही सौ वर्ष जीनेकी
| इच्छा करे’ इत्यादि रूपसे कर्म
त्यादिकर्मनियमः । कुर्वन्नेवेति | करनेका नियम केवल अज्ञानियोंके
| ही लिये है । अथवा यह समझना
च नायं कर्मनियमः किन्तु विद्या- | चाहिये कि ‘कुर्वन्नेव’ इत्यादि वाक्य
| कर्मका नियामक नहीं है,
माहात्म्यं दर्शयितुं यथाकामं | अपि तु ज्ञानकी महिमा दिखानेके
| उद्देश्यसे [ज्ञानीके लिये] स्वेच्छानुसार
कर्मानुष्ठानमेव द्रष्टव्यम् । एतदुक्तं | कर्मानुष्ठान प्रदर्शित करनेके लिये
| ही है । इसके द्वारा यह बतलाया
भवति-यावज्जीवं यथाकामं | गया है कि विद्वान् स्वेच्छासे जीवन-
| पर्यन्त पुण्य-पापादिरूप कर्म करता
पुण्यपापादिकं कुर्वत्यपि विदुषि | भी रहे तो भी ज्ञानके सामर्थ्यसे उसे
| उन कर्मोंका लेप नहीं होगा ।
न कर्मलेपो भवति विद्यासामर्थ्या- | तात्पर्य यह है कि ‘ईशावास्यमिद
| सर्वम्’ यहाँसे लेकर ‘तेन त्यक्तेन
दिति । तथा हि-“ईशावास्य- | भुञ्जीथाः’ इस प्रथम मन्त्रसे सर्वकर्म-
| परित्यागपूर्वक आत्मरक्षाका प्रतिपादन
मिद सर्वम्” (ईशा० उ० १) | करनेपर वेद यह देखकर कि जिसके
| लिये कोई भी विधि नहीं की जा
इत्यारभ्य “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः” | सकती उस ब्रह्मवेत्ताके लिये
| सर्वकर्मपरित्यागका विधान करना भी
( ईशा० उ० १) इति विदुषः |
सर्वकर्मत्यागेनात्मपालनमुक्त्वा- |
नियोज्ये ब्रह्मविदि त्यागकर्तव्य- |