श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ
पृष्ठ 27, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 27अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३
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क्रियान्तर्भावादनित्यत्वं स्यात् । | क्रियाओंके अन्तर्गत होनेसे अनित्य
| हो जायगा; क्योंकि 'जो क्रियासाध्य
यत्कृतकं तदनित्यमिति कर्म- | होता है वह अनित्य होता है' इस
| नियमके अनुसार क्रियासाध्य वस्तुकी
साध्यस्य नित्यत्वादर्शनात् । | नित्यता नहीं देखी जाती । किन्तु
| मोक्षको तो सभी सिद्धान्तवालोंने
नित्यश्च मोक्षः सर्ववादिभिरभ्युप- | नित्य माना है । चातुर्मास्ययागके
गम्यते । तथा च श्रुतिश्चातुर्मा- | प्रकरणमें ऐसी श्रुति भी है कि "हे
| मर्त्य ! तू पुनः पुत्ररूपसे उत्पन्न
स्यप्रकरणे—प्रजामनु प्रजायसे | होता है, यही तेरा अमरत्व है ।"
तदु ते मर्त्यामृतमिति । किंच, | तथा "सुकृतम्" ( अक्षय्यं ह वै
| चातुर्मास्ययाजिनः सुकृतं भवति ) इस
सुकृतमिति सुकृतस्याक्षयत्व- | श्रुतिमें सुकृतका अक्षयत्व बतलाया
| गया है और 'सुकृत' शब्द कर्मके
मुच्यते । सुकृतशब्दश्च कर्मणि । | अर्थमें प्रयुक्त होता है ।
नन्वेवं तर्हि कर्मणां देवादि- | शंका—तब इस प्रकार तो
| देवत्वादिकी प्राप्तिके हेतु होनेसे कर्म
प्राप्तिहेतुत्वेन बन्धहेतुत्वमेव । | बन्धनके ही कारण सिद्ध होते हैं ?
सत्यम्, स्वतो बन्धहेतुत्व- | समाधान—सचमुच, स्वयं तो वे
| बन्धनके ही कारण हैं । ऐसा ही
मेव । तथा च श्रुतिः—"कर्मणा | श्रुति भी कहती है—"कर्मसे
१. उत्पाद्य, विकार्य, संस्कार्य और प्राप्य-ये चार प्रकारके क्रियाफल हैं ।
जब कोई अविद्यमान वस्तु क्रियाद्वारा उत्पन्न की जाती है तो उसे उत्पाद्य कहते हैं,
जैसे घट, पट आदि । एक वस्तुको दूसरे रूपमें परिणत करनेपर जो फल प्राप्त होता
है उसे विकार्य कहते हैं जैसे हारको गलाकर उसका कङ्कण बना दिया जाय । दोषको
हटाना और गुणको प्रकट कर देना संस्कार्य है जैसे किसी दर्पणको घिसकर
उसका मैल हटा दिया जाय और उसमें चमक पैदा कर दी जाय । किसी अप्राप्य
वस्तुको क्रियाद्वारा प्राप्त करना यह प्राप्य क्रियाफल है; जैसे गमनक्रियाके द्वारा किसी
ग्रामविशेषमें पहुँचना ।