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सर्वकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 35, कुल 276 में से

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पृष्ठ 35

[अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१


चरन्ति” (बृ० उ० ३।५।१) | करते थे,” “ब्रह्मवेत्ता कावषेय
“एतद्ध स्म वै तद्विद्वांस आहु- | ऋषियोंने भी यही कहा है—हम
ऋषयः कावषेयाः किमर्था वय- | किस प्रयोजनके लिये अध्ययन करें
मध्येण्यामहे किमर्था वयं यक्ष्यामहे | और किस उद्देश्यकी पूर्तिके लिये यज्ञ
स ब्राह्मणः केन स्याद्येन स्यात्ते- | करें ? वह किस प्रकार ब्रह्मनिष्ठ हो
नेदृश एवेति।”यथाह भगवान्— | सकता है, जिस प्रकार भी हो ऐसा
“यस्त्वात्मरतिरेव स्या- | (सर्वत्यागी) ही होगा।” जैसा
दात्मतृप्तश्च मानवः । | कि श्रीभगवान् भी कहते हैं—
आत्मन्येव च संतुष्ट- | “जो पुरुष आत्मामें ही प्रेम
स्तस्य कार्यं न विद्यते ॥ | करनेवाला, आत्मामें ही तृप्त
नैव तस्य कृतेनार्थो | और आत्मामें ही सन्तुष्ट है, उसके
नाकृतेनेह कश्चन । | लिये कुछ भी कर्त्तव्य नहीं है। उस
न चास्य सर्वभूतेषु | पुरुषका इस लोकमें कर्म करनेसे
कश्चिदर्थव्यपाश्रयः॥” | कोई प्रयोजन नहीं है और कर्म न
(गीता ३। १७-१८) | करनेसे यहाँ उसे प्रत्यवाय आदि
तथा चाह भगवान्परमेश्वरो | अनर्थकी भी प्राप्ति नहीं होती
लैङ्गे कालकूटोपाख्याने— | तथा सम्पूर्ण भूतोंमें उसका कोई अर्थ-
“ज्ञानेनैतेन विप्रस्य | व्यपाश्रय (अर्थसिद्धिका सहारा)
त्यक्तसङ्गस्य देहिनः । | भी नहीं है।”
कर्तव्यं नास्ति विप्रेन्द्रा | लिङ्गपुराणमें कालकूटोपाख्यानमें
अस्ति चेत्तत्त्वविन्न च ॥ | ऐसा ही भगवान् महेश्वर भी कहते
इह लोके परे चैव | हैं—“हे द्विजेन्द्रगण ! इस ज्ञानकें
कर्तव्यं नास्ति तस्य वै । | द्वारा निःसंग हुए जीवको कोई
जीवन्मुक्तो यतस्तु स्या- | कर्त्तव्य नहीं रहता, यदि रहता है
द्ब्रह्मवित्परमार्थतः ॥ | तो वह तत्त्ववेत्ता नहीं है। उसे इस
| लोक और परलोकमें भी कोई कर्त्तव्य
| नहीं है, क्योंकि वास्तवमें ब्रह्मवेत्ता
| तो जीते हुए ही मुक्त हो जाता है।


श्वेता० २—