शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
षष्ठांशं वा चतुर्थांशं भृतेर्भृत्यस्य पालयेत्।
द्वितीयोऽध्यायः [१२१]
जब बड़ा हो जाय तो उसके गुणों को देखकर तदनुसार वेतन प्राप्त करे।
षष्ठांशं वा चतुर्थांशं भृतेर्भृत्यस्य पालयेत्।
दद्यात्तदधं भृत्याय द्वित्रिवर्षेऽखिलं तु वा ॥ ४१७ ॥
भृत्य के वेतन का षष्ठांश या चतुर्थांश काटकर राजा अपने यहां जमा करता रहे और जब दो-तीन वर्ष हो जाय तब आधी या पूरी रकम उसे दे देवे।
वाक्यपारुष्यान्न्यूनभृत्या स्वामी प्रबलदण्डतः।
भृत्यं प्रशिक्षयेन्नित्यं शत्रुत्वं त्वपमानतः ॥ ४१८ ॥
कटुभाषी भृत्य का भृति-दान-प्रकार—यदि स्वामी या राजा भृत्यों से कठोर बातें करता है या वेतन पूरा नहीं देता है या प्रबल दण्ड देता है किंवा अपमान करता है तो इन सब व्यवहारों से वह अपने भृत्यों को शत्रुता करना सिखाता है।
भृतिदानेन संतुष्टा मानेन परिवर्धिताः।
सान्त्विता मृदुवाचा ये न त्यजन्त्यधिपं हि ते ॥ ४१९ ॥
और समय पर वेतन देने से संतुष्ट किये हुये, संमान से गौरव पद पर पहुँचाये हुये, मृदु वचनों से समझाये हुये जो भृत्य हैं वे अपने स्वामी को नहीं छोड़ते हैं।
अधमा धनमिच्छन्ति धनमानौ तु मध्यमाः।
उत्तमा मानमिच्छन्ति मानो हि महतां धनम् ॥ ४२० ॥
जो केवल धन चाहते हैं वे 'अधम' जो धन तथा मान दोनों चाहते हैं वे 'मध्यम' एवं जो केवल मान चाहते हैं वे 'उत्तम' जन कहलाते हैं। क्योंकि बड़े लोगों का धन मान (आदर) ही है।
यथागुणान्स्वभृत्यांश्च प्रजाः संरक्षयेन्नृपः।
शाखाप्रदानतः कांश्चिदपरान् फलदानतः ॥ ४२१ ॥
अन्यान् सुचक्षुषा हास्यैस्तथा कोमलया गिरा।
सुभोजनैः सुवसनैस्ताम्बूलैश्च धनैरपि ॥ ४२२ ॥
कांश्चित् सुकुशलप्रश्नैरधिकारप्रदानतः।
वाहनानां प्रदानेन योग्याभरणदानतः ॥ ४२३ ॥
छत्रातपत्रचमरदीपिकानां प्रदानतः।
क्षमया प्रणिपातेन मानेनाभिगमेन च ॥ ४२४ ॥
सत्कारेण च ज्ञानेन ह्यादरेण शमेन च।
प्रेम्णा समीपवासेन स्वार्धासनप्रदानतः ॥ ४२५ ॥
सम्पूर्णासनदानेन स्तुत्योपकारकीर्तनात्।
१२२ | शुक्रनीतिः
राजा का भृत्य के संग वर्त्तन का वर्णन—राजा योग्यतानुसार भृत्यों एवं प्रजाजनों का मनोरञ्जन निम्नरीति से करे जैसे—किसी को शाखा-प्रदान ( यत्किंचित् देने ) से, किसी को फलदान ( यत्किंचित् से कुछ अधिक देने ) से, किसी को अच्छी दृष्टि से देखने से, किसी को हँसकर बात-चीत करने से, किसी को कोमल वचनों से, किसी को सुन्दर भोजन, सुन्दर वस्त्र, ताम्बूल ( पान का बीड़ा ) या धन देने से, किसी को अच्छी तरह से कुशल-प्रश्न करने से, किसी को किसी विभाग का अधिकार-प्रदान करने से, किसी को वाहन ( सवारी ) या योग्य आभूषण-प्रदान करने से, किसी को छात्र ( पक्षों का बना छाता ), आतपत्र ( वस्त्र का बना छाता ), चामर या दीपक-प्रदान करने से, किसी को क्षमा-प्रदान करने से, किसी को प्रणाम करने से, किसी को संमान के साथ उसके साथ गमन करने से, किसी को सत्कार करने से, किसी को शास्त्रीय प्रसङ्ग चलाने से, किसी को आदर, शान्ति या प्रेम-प्रदर्शन करने से, किसी को समीप में रहने से, किसी को अपने अर्द्धासन पर बैठाने से, किसी को संपूर्ण आसन-प्रदान करने से और किसी को स्तुति या उपकार का वर्णन करने से प्रसन्न करे ।
यत्कार्ये विनियुक्ता ये कार्याङ्कैरङ्कयेच्च तान् ॥ ४२६ ॥
लोहजैस्ताम्रजै रीतिभवै रजतसंभवैः ।
सौवर्णै रत्नजैर्वापि यथायोग्यैः स्वलाञ्छनैः ॥ ४२७ ॥
प्रविज्ञानाय दूरात्तु वस्त्रैश्च मुकुटैरपि ।
भृत्य को कार्य-मुद्रा से अंकित करने का निर्देश—राजा जो भृत्य जिस कार्य में नियुक्त किये गये हों, उन्हें दूर से यह अमुक कार्य में नियुक्त है, इसको फौरन जानने के लिये लोहा, तामा, पीतल, चांदी, सोना या रत्न के बने हुये, योग्यतानुसार अपने-अपने चिह्नों, वस्त्रों और मुकुटों के द्वारा कार्यों ( विभागों ) के चिह्नों से युक्त करे ।
वाद्यवाहनभेदैश्च भृत्यान्कुर्यात् पृथक्पृथक् ॥ ४२८ ॥
स्वविशिष्टं च यच्चिह्नं न दद्यात् कस्यचिन्नृपः ।
भृत्यों को विशिष्ट राजचिह्न न देने का निषेध—और राजा विशिष्ट अधिकारियों को बाजे और सवारियों की भिन्नता से अर्थात् इस अधिकारी के यातायात के समय ऐसे बाजे होने चाहिये । और इस अधिकारी के यातायात में ऐसी सवारी होना चाहिये—इस भांति की विशेषताओं से पृथक्-पृथक् करे और राजा अपने विशिष्ट राजचिह्न छत्र-मुकुटादि को किसी के लिये न देवे ।
दश प्रोक्ताः पुरोधाद्या ब्राह्मणाः सर्व एव ते ॥ ४२६ ॥