शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
चतुर्थाऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३१५
चतुर्थाऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३१५
मिथ्याभियोगसदृशैर्दण्डयेदभियोगिनम् ॥ २८१ ॥
अन्यथा अर्थात् झूठा विवाद उपस्थित करनेवाले वादी को बहुत वर्षों तक कारागार (जेल) में बन्द कर दे जो कि झूठा विवाद उपस्थित करने के लिये दण्ड के अनुरूप हो।
कामक्रोधौ तु संयम्य योऽर्थान् धर्मेण पश्यति ।
प्रजास्तमनुवर्तन्ते समुद्रमिव सिन्धवः ॥ २८२ ॥
प्रजा की अनुकूलता करनेवाले राजा के गुणों का निर्देश—काम और क्रोध के ऊपर नियन्त्रण रखकर जो राजा विवाद का निर्णय करता है, प्रजायें उसी का अनुवर्त्तन करती हैं जैसे समुद्र का अनुवर्त्तन नदियां करती हैं।
जीवतो रस्त्वतन्त्रः स्याज्ज्रयाऽपि समन्वितः ।
तयोरपि पिता श्रेयान् बीजप्राधान्यदर्शनात् ॥ २८३ ॥
जीवित रहते हुये माता-पिता के पुत्र को वृद्ध हो जाने पर भी स्वतन्त्र न होने का एवं उन दोनों में पिता की श्रेष्ठता का निर्देश—वृद्धावस्था से युक्त हो जाने पर भी पुत्र माता-पिता के जीवित रहते उसके सामने स्वतन्त्र संपत्ति का स्वामी नहीं हो सकता है। और उन दोनों (माता-पिता) के मध्य में बीज की प्रधानता मानने से पिता ही सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
अभावे बीजिनो माता तदभावे तु पूर्वजः ।
स्वातन्त्र्यं तु स्मृतं ज्येष्ठे ज्यैष्ठ्यं गुणवयःकृतम् ॥ २८४ ॥
पिता के अभाव में माता और माता के अभाव में भाई को श्रेष्ठ होने का निर्देश—पिता के अभाव में माता और माता के अभाव में ज्येष्ठ भाई सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। क्योंकि सर्वत्र ज्येष्ठ ही में स्वतन्त्रता मानी गई है और उसकी ज्येष्ठता गुण तथा अवस्था दोनों ही के होने से मानी जाती है केवल अवस्था से नहीं।
याः सर्वाः पितृपत्न्यः स्युस्तासु वर्तेत मातृवत् ।
स्वसमैकेन भागेन सर्वास्ताः प्रतिपालयन् ॥ २८५ ॥
पिता की सभी पत्नियों में मातृवद् व्यवहार करने का निर्देश—चाहे जितनी पिता की पत्नियाँ हों उनमें सगी माता के सदृश आदरभाव रखना चाहिये। और अपने समान एक १ भाग से उन सबों का पालन करना चाहिये।
अस्वतन्त्राः प्रजाः सर्वाः स्वतन्त्रः पृथिवीपतिः ।
अस्वतन्त्रः स्मृतः शिष्य आचार्ये तु स्वतन्त्रता ॥ २८६ ॥
स्वतन्त्रा-स्वतन्त्र का निर्णय—सभी प्रजायें अस्वतन्त्र (पराधीन)
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शुक्रनीतिः
होती हैं। किन्तु केवल एक राजा स्वतन्त्र होता है। और शिष्य परतन्त्र माना जाता है। और आचार्य में स्वतन्त्रता मानी जाती है।
सुतस्य सुतदाराणां वशित्वमनुशासने।
विक्रये चैव दाने च वशित्वं न सुते पितुः॥ २८७॥
पुत्र और पुत्रवधुओं को पिता या श्वशुर की आज्ञा मानने में पराधीनता मानी गई है किन्तु समर्थ पुत्र के लिये बेचने और दान देने में पिता की आज्ञा की प्रतीक्षा की आवश्यकता नहीं मानी गई है।
स्वतन्त्राः सर्व एवैते परतन्त्रेषु नित्यशः।
अनुशिष्टौ विसर्गे वाऽविसर्गे चेश्वरा मताः॥ २८८॥
परतन्त्र होने पर भी ये सभी पुत्र सदा स्वतन्त्र ही माने जाते हैं क्योंकि पिता के साथ मन्त्रणा करने, देने और न देने में स्वाधीन माने गये हैं।
मणिमुक्ताप्रवालानां सर्वस्यैव पिता प्रभुः।
स्थावरस्य तु सर्वस्य न पिता न पितामहः॥ २८९॥
**स्वामित्व का निर्णय—**मणि, मुक्ता (मोती) और प्रवाल (मूंगा) आदि संपूर्ण चल संपत्ति के ऊपर पिता का प्रभुत्व रहता है। किन्तु संपूर्ण स्थावर (अचल) संपत्ति के ऊपर पिता या पितामह का पूर्ण प्रभुत्व नहीं रहता है, हाँ आंशिक रूप से रहता है।
भार्या पुत्रश्च दासश्च त्रय एवाधनाः स्मृताः।
यत्ते समधिगच्छन्ति यस्यैते तस्य तद्धनम् ॥ २९०॥
पत्नी, पुत्र और नौकर ये तीनों ही क्रम से पति, पिता और स्वामी के रहते दम तक अधन (धन के स्वामित्व से हीन) माने गये हैं अतः इन ये लोग जो कुछ भी धन कहीं से प्राप्त करते हैं ये सब जिनके पत्नी, पुत्र या नौकर होते हैं उन्हीं के अधिकार में चले जाते हैं, इसी से ये 'अधन' कहलाते हैं अर्थात् इनका अपना कोई अलग धन नहीं होता है।
वर्तते यस्य यद्धस्ते तस्य स्वामी स एव न।
अन्यस्वमन्यहस्तेषु चौर्याद्यैः किन्न दृश्यते ॥ २९१॥
जो धन जिनके हाथ में रहता है उस धन का स्वामी वही नहीं माना जाता है जैसे चोरी आदि कारणों से दूसरे का धन दूसरे के हाथ में क्या नहीं देखा जाता है किन्तु हाथ में रखा देखने मात्र से वह उस धन का स्वामी नहीं माना जाता है।
तस्माच्छास्त्रात एव स्यात् स्वाम्यं नानुभवादपि।
अस्यापहृतमेतेन न युक्तं वक्तुमन्यथा॥ २९२॥
इससे शास्त्रानुसार ही किसी धन का कोई स्वामी हो सकता है केवल