शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
चतुर्थोऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २७१
चतुर्थोऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २७१
उसके लिये वेद का अच्छा ज्ञाता, इन्द्रियों का दमन करनेवाला, कुलीन, पक्षपात न करनेवाला, शान्त प्रकृतिवाला, चञ्चलता से रहित, परलोक से डरनेवाला, धार्मिक, उद्योगी और क्रोध से रहित ऐसे ब्राह्मण को नियुक्त करे ।
यदा विप्रो न विद्वान् स्यात् क्षत्रियं तत्र योजयेत् ।
वैश्यं वा धर्मशास्त्रज्ञं शूद्रं यत्नेन वर्जयेत् ॥ १४ ॥
ब्राह्मण न मिलने पर क्षत्रियादि नियुक्त करने का एवं शूद्र को न नियुक्त करने का निर्देश— जब वैसा विद्वान ब्राह्मण न मिले तब उसके लिये (निर्णय के लिये) पूर्वोक्त गुणों से युक्त धर्मशास्त्र का जाननेवाला क्षत्रिय अथवा वैश्य को नियुक्त करे किन्तु शूद्र को यत्नपूर्वक निर्णय के लिये त्याग कर दे अर्थात् उसको नियुक्त न करे ।
यद्वर्णजो भवेद्राजा योष्यस्तद्वर्णजः सदा ।
तद्वर्णे एव गुणिनः प्रायशः सम्भवन्ति हि ॥ १५ ॥
जिस जाति का राजा स्वयं हो निर्णय करने के लिये अपना प्रतिनिधि उसी जाति के व्यक्ति को सदा चुने । क्योंकि प्रायः करके राजा की जाति में ही गुणवान् लोग उत्पन्न होते हैं ।
व्यवहारविदः प्राज्ञा वृत्तशीलगुणान्विताः ।
रिपौ मित्रे समा ये च धर्मज्ञाः सत्यवादिनः ॥ १६ ॥
निरालसा जितक्रोध-कामलोभाः प्रियंवदाः ।
राज्ञा नियोजितव्यास्ते सभ्याः सर्वासु जातिषु ॥ १७ ॥
सभासद् के लक्षण— व्यवहार (मुकदमा देखने की रीति) के जाननेवाले, बुद्धिमान, चरित्र, शील तथा गुण से युक्त, शत्रु तथा मित्र के साथ समान व्यवहार करनेवाले (राग-द्वेष से रहित), धर्म के जाननेवाले, सत्यवादी, आलस्य से रहित, क्रोध, काम तथा लोभ को जीतनेवाले, प्रिय वचन बोलनेवाले ऐसे सभी जातियों के व्यक्तियों को राजा द्वारा विचार-सभा का सदस्य (जूरी) नियुक्त करना चाहिये ।
कीनाशाः कारुकाः शिल्पिकुसीदिश्रेणिनर्तकाः ।
लिङ्गिनस्तस्कराः कुर्युः स्वेन धर्मेण निर्णयम् ॥ १८ ॥
अशक्यो निर्णयो ह्यन्यैस्तत्तज्ज्ञैरेव तु कारयेत् ।
राजा के द्वारा निर्णयायोग्य पुरुषों के लक्षण— कीनाश (कृषक), कारु (बढ़ई), शिल्पी (कारीगर), सूद खानेवाले, श्रेणि (निकृष्ट जातियों के संघ), नाचनेवाले, लिङ्गी (भाण-योगी आदि) तथा तस्कर (जाति विशेष) ये सब लोग अपने २ धर्म के अनुसार अपनी २ जातियों के विवाद का निर्णय स्वयं पंचायत द्वारा करें, क्योंकि उनकी जाति के धर्म को न जाननेवाले
२७२ | शुक्रनीतिः
अन्य लोगों से निर्णय होना असंभव है, अतः जिस जाति के लोगों का विवाद हो, उसका निर्णय उसी जाति के लोगों से कराना चाहिये ।
आश्रमेषु द्विजातीनां कार्ये विवदतां मिथः ॥ १९ ॥
न विब्रूयान्नृपो धर्मे चिकीर्षुर्हितमात्मनः ।
राजा को द्विजाति आदिकों का स्वयं निर्णय न करने का निर्देश— अपना हित चाहनेवाला राजा ब्रह्मचर्यादि आश्रमों में स्थित होकर परस्पर किसी कार्य को लेकर विवाद करनेवाले द्विजातियों के धर्म के विरुद्ध कुछ न कहे।
तपस्विनां तु कार्याणि त्रैविद्यैरेव कारयेत् ॥ २० ॥
मायायोगविदां चैव न स्वयं कोपकारणात् ।
तपस्वियों एवं माया तथा योग विद्या के जाननेवाले लोगों के विवाद का निर्णय वेद के जाननेवाले ब्राह्मणों द्वारा ही कराना चाहिये, अन्य के द्वारा नहीं, क्योंकि विरुद्ध निर्णय होने पर उन लोगों को कोप होगा अतः उससे बचने के लिये स्वयं निर्णय न करे ।
सम्यग्विज्ञानसम्पन्नो नोपदेशं प्रकल्पयेत् ॥ २१ ॥
उत्कृष्टजातिशीलानां गुर्वाचार्यतपस्विनाम् ।
स्वयं विशिष्ट ज्ञान से युक्त होने पर भी राजा उत्कृष्ट जाति एवं शील से युक्त, गुरु, आचार्य, एवं तपस्वी लोगों को उपदेश न दे ।
आरण्यास्तु स्वकैः कुर्युः सार्थिकाः सार्थिकैः सह ॥ २२ ॥
सैनिकाः सैनिकैरेव ग्रामेऽप्युभयवासिभिः ।
जंगली लोग जंगलियों के द्वारा, संघ बनाकर रहनेवाले अपने संघ के लोगों के द्वारा एवं सैनिक लोग सैनिकों के द्वारा और ग्राम में भी रहनेवाले लोग ग्राम तथा जंगल दोनों में निवास करनेवालों के द्वारा अपने विवाद का निर्णय करावें ।
अभियुक्ताश्च ये यत्र यन्निबन्धियोजनाः ॥ २३ ॥
तत्रत्यगुणदोषाणां त एव हि विचारकाः ।
राजा ने जहां पर जिन्हें नियुक्त कर दिया है, तथा जिस कार्य के लिये जो नियुक्त हुये हैं वेही वहां के गुण तथा दोषों के विचार करनेवाले वस्तुतः होते हैं।
राजा तु धार्मिकान् सभ्यान् नियुञ्ज्यात् सुपरीक्षितान् ॥ २४ ॥
व्यवहारधुरं वोढुं ये शक्ताः पुङ्गवा इव ।
जो अच्छे बैलों के समान विवाद-निर्णय के भार को धारण करने में भलीभांति समर्थ हों तथा पूर्ण रूप से परीक्षित एवं धार्मिक हों उन्हीं लोगों को राजा निर्णायक सभ्य ( जूरी ) बनाये ।
चतुर्थोऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २७३
लोकवेदज्ञधर्मज्ञाः सप्त पञ्च त्रयोऽपि वा ॥ २५ ॥
यत्रोपविष्टा विप्राः स्युः सा यज्ञसदृशी सभा ।
**यज्ञ-सदृश सभा के लक्षण—**जिस सभा में संख्या में ७, ५ अथवा ३ भी लौकिक तथा वैदिक कृत्यों के जाननेवाले धर्मज्ञ ब्राह्मण बैठे हुये हों, वह यज्ञ के समान समझी जाती है ।
श्रोतारो वणिजस्तत्र कर्तव्याः सुविचक्षणाः ॥ २६ ॥
**सभा में सुननेवालों में वैश्यों के रहने का निर्देश—**और उस सभा में श्रोता के रूप में अत्यन्त विचक्षण ( पण्डित ) वैश्यों को भी रखना चाहिये ।
अनियुक्तो नियुक्तो वा धर्मज्ञो वक्तुमर्हति ।
दैवीं वाचं स वदति यः शास्त्रमुपजीवति ॥ २७ ॥
जो धर्मशास्त्र का जाननेवाला हो उसकी चाहे नियुक्ति हो या न हो, किन्तु फिर भी उसे सभा में बोलना उचित ही होता है, क्योंकि जो शास्त्रानुसार आचरण करनेवाला होता है उसकी वाणी देवता के समान मानी जाती है ।
सभा वा न प्रवेष्टव्या वक्तव्यं वा समञ्जसम् ।
अब्रुवन् विब्रुवंश्चापि नरो भवति किल्बिषी ॥ २८ ॥
**सभा में जाने का नियम—**पहले तो विचार-सभा में जाना ही नहीं चाहिये, और यदि जाय तो जो सत्य बात हो उसे अवश्य ही कहना चाहिये । क्योंकि सभा में जाकर भी उचित बात न कहनेवाला अथवा अनुचित कहने-वाला, दोनों ही व्यक्ति पापभागी होते हैं ।
राज्ञा ये विदिताः सम्यक् कुलश्रेणिगणादयः ।
साहसस्तेयवर्ज्यानि कुर्युः कार्याणि ते नृणाम् ॥ २९ ॥
**सभा में निर्णय करनेवालों का क्रम-निर्देश—**राजा जिन्हें भलीभांति से न्यायपरायण समझता हो ऐसे कुल, श्रेणि ( पञ्चायत ) और गण ( बोर्ड ) के लोगों को साहस ( बांका ) और स्तेय ( चोरी ) को छोड़ कर अन्य लोगों के मुकदमों का निर्णय करने का कार्य-भार देवे ।
विचार्या श्रेणिभिः कार्यं कुलैर्यन्न विचारितम् ।
गणैश्च श्रेण्यविज्ञातं गणाज्ञातं नियुक्तकैः ॥ ३० ॥
**निर्णायकों का तारतम्य—**उपयुक्त कुलों के द्वारा जिनका उचित निर्णय न हो सका है, उनका निर्णय श्रेणियों के द्वारा करना चाहिये । और श्रेणियों के द्वारा उचित निर्णय न होने पर गणों के द्वारा, एवं गणों के द्वारा उचित निर्णय न होने पर राजा से नियुक्त किये हुये जजों के द्वारा निर्णय कराना चाहिये ।
१८ शु०
२७४ | शुक्रनीतिः
कुलादिभ्योऽधिकाः सभ्यास्तेभ्योऽध्यक्षोऽधिकः कृतः ।
सर्वेषामधिको राजा धर्माधर्मनियोजकः ॥ ३१ ॥
पूर्वोक्त कुलादिकों से अधिक सभ्यों ( जूरियों ) का निर्णय माननीय होता है, उनसे अधिक अध्यक्ष ( जज ) का निर्णय माननीय होता है। और इन सबों से अधिक धर्मा-धर्म का निर्णय करने में राजा की मान्यता होती है।
उत्तमाऽधममध्यानां विवादानां विचारणात् ।
उपर्युपरिबुद्धीनां चरन्तीश्वरबुद्धयः ॥ ३२ ॥
क्योंकि राजा उत्तम, मध्यम तथा अधम श्रेणी के सभी विवादों (मुकदमों) का निर्णायक प्रधान रूप से होता है। और उसकी बुद्धि साधारण निर्णायकों की बुद्धि से अधिक ऊँची होती है।
एकं शास्त्रमधीयानो न विन्द्यात् कार्यनिर्णयम् ।
तस्माद् बहुागमः कार्यो विवादेषूत्तमो नृपैः ॥ ३३ ॥
**निर्णय करने में समर्थ पुरुष के लक्षण—**केवल एक ही शास्त्र का जानने-वाला व्यक्ति विवाद का निर्णय करना नहीं जान सकता है, अतः बहुत से शास्त्रों के ज्ञाता किसी उत्तम व्यक्ति को ही राजा निर्णायक नियुक्त करे।
स ब्रूते यं स धर्मः स्यादेको वाऽध्यात्मचिन्तकः ।
**धर्म का लक्षण—**और जो आत्म-तत्त्व का जाननेवाला व्यक्ति होता है, वह अकेला ही जो कहता है वह धर्म माना जाता है अर्थात् उसका निर्णय सर्वमान्य होता है।
एकद्वित्रिचतुर्वारं व्यवहारानुचिन्तनम् ॥ ३४ ॥
कार्यं पृथक् पृथक् सभ्यै राज्ञा श्रेष्ठोत्तरैः सह ।
**अनुचिन्तन-प्रकार का निर्देश—**राजा सबसे श्रेष्ठ सभ्यों (जूरियों) के साथ मिल कर पृथक् २ मुकदमे की गुरुता-लघुता जैसी हो उसके अनुसार एक बार अथवा २, ३, या ४ बार विचार कर निर्णय करे।
अर्थिप्रत्यर्थिनौ सभ्यांल्लेखकप्रेक्षकांश्च यः ॥ ३५ ॥
धर्मवाक्यै रञ्जयति स सभास्तारतामियात् ।
जो विचारपति या सभ्य ( जूरी ) वादी-प्रतिवादी, सभ्यों (जूरियों), लेखकों या दर्शकों को धर्मयुक्त वचनों से प्रसन्न करता है, वह सभ्यों में श्रेष्ठता को प्राप्त करता है। अर्थात् सर्वोत्तम समझा जाता है।
नृपोऽधिकृतसभ्याश्च स्मृतिर्गणकलेखकौ ॥ ३६ ॥
हेमाग्न्यम्बुस्वपुरुषाः साधनाङ्गानि वै दश ।
**दश साधनों का निर्देश—**१. राजा, २. अधिकारी सभ्य (विद्वान