शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६७
चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६७
गुल्फाधश्च तथा ग्रीवा जानु पञ्चाङ्गुलं स्मृतम् ॥ १९४ ॥
षड्विंशत्यङ्गुलं सक्थि तथा जङ्घा प्रकीर्त्तिता ।
और गुल्फ के नीचे का भाग, ग्रीवा, जानु प्रत्येक पांच अंगुल प्रमाण का, तथा ऊरु और जंघा प्रत्येक छब्बीस अंगुल प्रमाण का होना चाहिये ।
एकाङ्गलो मूर्ध्नि मणिर्दशताले प्रकल्पेत् ॥ १९५ ॥
पञ्चाशदङ्गुलौ बाहू दशताले स्मृतौ सदा ।
और इस ताल प्रमाण की मूर्त्ति में सिर की मणि एक अंगुल प्रमाण की, तथा दोनों बाहु पृथक्-पृथक् पन्द्रह अंगुल प्रमाण के सदा होने चाहिये ।
द्व्यङ्गुलौ द्व्यङ्गुलौ चोनौ ततो हीनप्रमाणके ॥ १९६ ॥
पाटवं तु यथाशोभि सर्वमानेषु कल्पयेत् ।
इससे (दश ताल से ) हीन प्रमाणवाली मूर्त्ति में प्रत्येक बाहु का प्रमाण दो-दो अंगुल कम होना चाहिये । और सभी प्रकार के प्रमाणों में अङ्गों की सजावट शोभानुसार करनी चाहिये ।
नवतालप्रमाणे न ह्यूनाधिक्यं प्रकल्पयेत् ॥ १९७ ॥
और नव ताल प्रमाण की मूर्त्ति में अङ्गों के प्रमाण में कमी-बेशी नहीं करनी चाहिये ।
दशताले तु विज्ञेयौ पादौ पञ्चदशाङ्गुलौ ।
एकैकाङ्गुलहीनौ ः स्तस्ततो न्यूनप्रमाणके ॥ १९८ ॥
इस ताल प्रमाण की मूर्त्ति में दोनों पैर पृथक्-पृथक् पन्द्रह अंगुल प्रमाण के बनाने चाहिये । इससे हीन प्रमाण की मूर्त्ति में दोनों पैर एक-एक अंगुल कम प्रमाण के होने चाहिये ।
दशतालोर्ध्वमानं तु ताले तालेऽधिकाङ्गुलम् ।
कल्पयेन्मुखतो धीमान् शिल्पवित्सु यथा तथा ॥ १९९ ॥
दश ताल से अधिक प्रमाण की मूर्त्ति में प्रत्येक ताल पर एक २ अंगुल अधिक प्रमाण अंगों का करना चाहिये । और बुद्धिमान मूर्तिकार को मुख से आरम्भ कर पैर पर्यन्त अङ्ग जिस भांति से सुन्दर हो सके वैसा बनाना चाहिये ।
दीर्घोरुजङ्घा विकटा क्रूरा स्याद् भीषणाऽऽसुरी ।
पैशाची प्रतिमा ज्ञेया राक्षसी सुकृशाऽपि वा ॥ २०० ॥
आसुरी आदि मूर्तियों के लक्षण— जिस मूर्त्ति की ऊरु तथा जंघा दीर्घ (लम्बी), हो एवं वह देखने में विकट, क्रूर तथा भीषण आकारवाली हो तो उसे 'आसुरी' और उक्त लक्षणों से युक्त होती हुई जो मूर्त्ति अत्यन्त कृश हो उसे 'पैशाची' अथवा 'राक्षसी' समझनी चाहिये ।
| २६८ | शुक्रनीतिः |
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न पञ्चाङ्गुलतो हीना न षडङ्गुलतोऽधिकाः।
करस्य मध्यमा प्रोक्ता सर्वमानेषु तद्विदैः ॥ २०१ ॥
सभी प्रमाण की मूत्ति में हाथ की मध्यमा अंगुलि पांच अंगुल से कम तथा छः अंगुल से अधिक प्रमाण की नहीं बनानी चाहिये ऐसा मूर्ति-कला के विद्वान लोग कहते हैं।
क्वचित्तु बालसदृशं सदैव तरुणं वयः।
मूर्तीनां कल्पयेच्छिल्पी न वृद्धसदृशं क्वचित् ॥ २०२ ॥
शिल्पी को कभी मूर्त्तियों की वृद्धसदृश कल्पना न करने का निर्देश—
मूर्तिकार कहीं पर बालक के समान और कहीं युवा के समान मूर्ति बनावे किन्तु कहीं पर भी वृद्ध के समान मूर्त्ति न बनावे ।
एवंविधान् नृपो राष्ट्रे देवान् संस्थापयेत् सदा ।
प्रतिसंवत्सरे तेषामुत्सवान् सम्यगाचरेत् ॥ २०३ ॥
**राजा को उक्त देवताओं का स्थापन करके प्रतिवर्ष उनका उत्सव करने का निर्देश—**राजा अपने राज्य के अन्दर इसी भांति से बनी देव-मूर्तियों को सदा स्थापना करे । और प्रतिवर्ष उनके उत्सव भलीभांति करे ।
देवालये मानहीनां मूर्तिं भग्नां न धारयेत् ।
प्रासादांश्च तथा देवान् जीर्णानुद्धृत्य यत्नतः ॥ २०४ ॥
देवतां तु पुरस्कृत्य नृत्यादीन् वीक्ष्य सर्वदा ।
न मनः स्त्रोपभोगार्थं विदध्यादु यत्नतो नृपः ॥ २०५ ॥
**मानहीन और भग्न प्रतिमा को रखने का निषेध—**और देवमन्दिर में उक्त प्रकार के प्रमाणों से हीन प्रमाण की अथवा खण्डित मूर्ति को न रहने दे । तथा देवता और उनके मन्दिरों के जीर्ण हो जाने पर उनका यत्नपूर्वक पुनः संस्कार करते हुये और सदा देवताओं के आगे नृत्यादि देखते हुये, राजा यत्नपूर्वक अपने राजोचित भोग भोगने में मनको न प्रवृत्त करे ।
प्रजाभिर्विहिता ये ये ह्युत्सवास्तांश्च पालयेत् ।
प्रजानन्देन संतुष्येत् तद्दुःखैर्दुःखितो भवेत् ॥ २०६ ॥
इति शुक्रनीतौ राष्ट्रमध्यं चतुर्थाध्यायस्य लोकधर्मनिरूपणं नाम चतुर्थं प्रकरणं समाप्तम् ॥ ४ ॥
**प्रजाकृत उत्सवों का सदैव पालने करने का निर्देश—**और प्रजाओं द्वारा जो २ उत्सव किये जाते हों उनकी रक्षा करे एवं प्रजाओं के आनन्द से आनन्दित तथा दुःख से स्वयं दुःखित हो ।
इस प्रकार शुक्रनीति-भाषाटीका में राष्ट्र का मध्य चतुर्थाध्याय का लोकधर्मनिरूपण-नामक चतुर्थ प्रकरण समाप्त हुआ ।
चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६९
चतुर्थाध्यायस्य पञ्चमं प्रकरणं राजधर्मनिरूपणम्
दुष्टनिग्रहणं कुर्याद् व्यवहारानुदर्शनैः ।
स्वाज्ञया वर्तितुं शक्त्या स्वाधीना च सदा प्रजा ॥ १ ॥
राजा को प्रजा-सुख से सुखी और प्रजा-दुःख से दुखी होने का निर्देश—
विचार के विषय उपस्थित होने पर उसका भलीभांति विचार कर जो दुष्ट हों उनका निग्रह करना चाहिये । ऐसा करने से प्रजा सदा राजा के अधीन रहती है और उसकी आज्ञा के अनुसार कार्य करने में समर्थ होती है । अर्थात् प्रजा जिस प्रकार से स्वेच्छापूर्वक व्यवहार न करे, वैसा करना चाहिये ।
स्वेष्टहानिकरः शत्रुर्दृष्टः पापप्रचारवान् ।
इष्टसंपादनं न्याय्यं प्रजानां पालनं हि तत् ॥ २ ॥
शत्रु, दुष्ट तथा प्रजापालन के लक्षण— अपने अभीष्ट की हानि करनेवाला 'शत्रु' और आचरण द्वारा पाप का प्रचार करनेवाला 'दुष्ट' कहलाता है । और न्यायपूर्वक प्रजा का अभीष्ट सिद्ध करना ही प्रजा का 'पालन' कहलाता है ।
शत्रोरनिष्टकरणान्निवृत्तिः शत्रुनाशनम् ।
पापाचारनिवृत्तिर्यैर्दुष्टनिग्रहणं हि तत् ॥ ३ ॥
शत्रुनाश और दुष्टनिग्रह का लक्षण— शत्रु को अनिष्ट करने से निवृत्त कर देना ही 'शत्रु का नाश' और पापाचरण से निवृत्त करना 'दुष्ट का निग्रह' कहलाता है ।
स्वप्रजाधर्मसंस्थानं सदसत्प्रविचारतः ।
जायते चार्थसंसिद्धिर्व्यवहारस्तु येन सः ॥ ४ ॥
व्यवहार-लक्षण— जिसके द्वारा सत् और असत् विषय का अच्छी तरह से विचार करने से अपनी प्रजा की धर्म में स्थिति तथा कार्यों की भलीभांति सिद्धि होती है, उसे 'व्यवहार-मुकदमा' कहते हैं ।
धर्मशास्त्रानुसारेण क्रोधलोभविवर्जितः ।
सप्राड्विवाकः सामात्यः सब्राह्मणपुरोहितः ॥ ५ ॥
समाहितमतिः पश्येद् व्यवहाराननुक्रमात् ।
राजा को प्राड्विवाकादि के साथ व्यवहारों को देखने का निर्देश— राजा क्रोध और लोभ से रहित एवं प्राड्विवाक ( पूछनेवाला और उस पर विचार करनेवाला ), अमात्य, ब्राह्मण और पुरोहित के साथ सावधान होकर न्यायार्थ उपस्थित व्यवहारों को क्रमानुसार देखे ।
नैकः पश्येच्च कार्याणि वादिनोः शृणुयाद्वचः ॥ ६ ॥
रहसि च नृपः प्राज्ञः सभ्याश्चैव कदाचन ।
| २७० | शुक्रनीतिः |
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बुद्धिमान राजा अथवा न्याय-सभा के सदस्यगण अकेले एकान्त में वादी-प्रतिवादी के कार्यों (मुकदमों) को कभी न देखे और न उनकी बातों को सुने ।
पक्षपाताधिरोपस्य कारणानि च पञ्च वै ॥ ७ ॥
रागलोभभयद्वेषा वादिनोश्च रहःश्रुतिः ।
पक्षपात के ५ कारणों का निर्देश— पक्षपात रूप दोष के निश्चित रूप से ये ५ कारण हैं—१. राग, २. लोभ, ३. भय, ४. द्वेष, ५. वादी-प्रतिवादी की एकान्त में बातें सुनना ।
पौरकार्याणि यो राजा न करोति सुखे स्थितः ॥ ८ ॥
व्यक्तं स नरके घोरे पच्यते नात्र संशयः ।
राजा के अनिष्टकारक हेतुओं का निर्देश— जो राजा सुखभोग में आसक्त रहकर पुरवासी-प्रजाजनों का हित-कार्य मुकदमा आदि देखना, नहीं करता है । वह भविष्य में निश्चित घोर नरक का दुःख भोगेगा । इसमें सन्देह नहीं है ।
यस्त्वधर्मेण कार्याणि मोहात् कुर्यान्नराधिपः ॥ ९ ॥
अचिरात्तं दुरात्मानं वशे कुर्वन्ति शत्रवः ।
जो राजा मूढतावश अधर्म कार्यों को करता है उस दुरात्मा को शत्रु लोग शीघ्र अपने वश (अधीन) कर लेते हैं ।
अस्वर्ग्या लोकनाशाय परानीकभयावहा ॥ १० ॥
आयुर्बौजहरी राज्ञामस्ति वाक्ये स्वयंकृतिः ।
वादी-प्रतिवादी जनों की बातों को सुनकर राजा यदि सभासदों की राय लिये बिना स्वयं कोई निर्णय करता है तो उससे उसे नरक की प्राप्ति, प्रजाओं का नाश, शत्रुसेनाओं से भय (शत्रुओं की वृद्धि) आयु का क्षय इत्यादि होते हैं ।
तस्माच्छास्त्रानुसारेण राजा कार्याणि साधयेत् ॥ ११ ॥
इससे राजा को शास्त्रानुसार कार्यों (मुकद्दमों) को भलीभांति देखना चाहिये ।
यदा न कुर्यान्नृपतिः स्वयं कार्यविनिर्णयम् ।
तदा तत्र नियुञ्जीत ब्राह्मणं वेदपारगम् ॥ १२ ॥
दान्तं कुलीनं मध्यस्थमनुद्वेगकरं स्थिरम् ।
परत्र भीरुं धर्मिष्ठमुयुक्तं क्रोधवर्जितम् ॥ १३ ॥
स्वयं कार्य-निर्णय न कर सकने पर योग्य ब्राह्मण को नियुक्त करने का राजा को निर्देश— जब राजा स्वयं कार्यों (मुकद्दमों) का निर्णय न करे तब