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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पञ्चमाध्याये खलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४०१

पञ्चमाध्याये खलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४०१

अहितकर को हितकर की भांति दिखाकर अन्त में सदा अपने कार्य को सिद्ध करते हैं ।

विस्रम्भयित्वा चात्यर्थं मायया घातयन्ति ते ।

और वे चालाकी से प्रथम अपने ऊपर अत्यन्त विश्वास पैदा कराके अन्त में उसका नाश कर देते हैं ।

यस्य चाप्रियमन्विच्छेत्तस्य कुर्यात् सदा प्रियम् ॥ ३१ ॥
व्याधो मृगवधं कर्तुं गीतं गायति सुस्वरम् ।

और वे जिसका अप्रिय (बुराई) करना चाहते हैं उसका प्रथम सदा प्रिय कार्य करते हैं। जैसे बहेलिया मृग का वध करने के लिये प्रथम सुन्दर स्वर के साथ उसके सामने गाते हैं बाद में मार डालते हैं।

मायां विना महाद्रव्यं द्राङ् न सम्पाद्यते जनैः ॥ ३२ ॥
विना परस्वहरणान्न कश्चित् स्यान्महाधनः ।
मायया तु बिना तद्धि न साध्यं स्याद्यथेप्सितम् ॥ ३३ ॥

बिना धूर्त्तता के अत्यन्त धन न मिलने का निर्देश— बिना धूर्त्तता के लोग बहुत धन शीघ्र नहीं पा सकते हैं। और बिना दूसरे का धन हरण किये कोई बड़ा धनी नहीं हो सकता है। और बिना माया के जो ईप्सित कार्य है वह सिद्ध नहीं हो सकता है।

स्वधर्मं परमं मत्वा परस्वहरणं नृपाः ।
परस्परं महायुद्धं कृत्वा प्राणांस्त्यजन्त्यपि ॥ ३४ ॥

राजा लोगों को दूसरे का धन हरण करने को स्वधर्म समझने का निर्देश— राजा लोग दूसरे का धन हरण करना परम स्वधर्म समझ कर परस्पर महायुद्ध करके प्राण भी दे डालते हैं।

राज्ञो यदि न पापं स्याद्दस्यूनामपि नो भवेत् ।
सर्वं पापं धर्मरूपं स्थितमाश्रयभेदतः ॥ ३५ ॥

आश्रयभेद से सभी पापों का धर्म रूप में स्थित होने का निर्देश— यदि राजा को वैसा करने से पाप नहीं लगता है तो डाकुओं को भी दूसरे का धन हरण करने में पाप नहीं लगे क्योंकि आश्रयभेद से सभी पाप धर्मरूप हो जाते हैं, अर्थात् दूसरे का धन हरण करना डाकुओं के लिये पाप हो जाता है किन्तु राजाओं के लिये वही धर्म हो जाता है।

बहुभिर्यः स्तुतो धर्मो निन्दितोऽधर्म एव सः ।
धर्मेतत्त्वं हि गहनं ज्ञातुं केनापि नोचितम् ॥ ३६ ॥

बहुतों द्वारा प्रशंसित धर्म और निन्दित अधर्म मानने का निर्देश— जो व्यापार बहुतों के द्वारा प्रशंसित होता है, वह धर्म गिना जाता है और जो

२६ शु०

४०२ | शुक्रनीतिः

निन्दित होता है वह अधर्म गिना जाता है। अतः धर्म का तत्त्व गहन है, उसका किसी के द्वारा समझ सकना असंभव है।

अतिदानंतपःसत्ययोगो दारिद्र्यकृत्त्विह ।
धर्मार्थों यत्र न स्यातां तद्वाक् कामं निरर्थकम् ॥ ३७ ॥

अत्यंत दानादि करने की निषिद्धता का निर्देश — संसार में अतिदान, तपस्या तथा सत्य का संसम्बन्ध ये तीनों दरिद्रता उत्पन्न करने वाले होते हैं अर्थात् अतिदान से दरिद्र हो जाना जगतप्रसिद्ध ही है, इसी तरह तपस्या में भी धर्मानुष्ठानुष्ठान के द्वारा धन-व्यय होने से एवं धनप्राप्ति धूसंतता करने से होतो है उसमें यदि सत्य का संबन्ध हो तो धनप्राप्ति के असम्भव होने से दरिद्रता होना उचित ही है। जिस वाणी में धर्म और अर्थ न हों तो वह (वाणी) अत्यन्त निरर्थक समझी जाती है।

अर्थे वा यदि वा धर्मे समर्थो देशकालवित् ।
निःसंशयो नरः पूज्यो नष्टः संशयिता सदा ॥ ३८ ॥

धर्मानुसार अर्थार्जन करने वाले की पूज्यता का निर्देश — यदि कोई मनुष्य धर्म तथा अर्थ में समर्थ है अर्थात् धर्मानुसार अर्थार्जन करने में निपुण है और देश-काल का ज्ञाता अर्थात् तदनुसार कार्य करने वाला एवं संशय-रहित है तो वही सदा पूज्य होता है। और जो संशय करने वाला है वह नहीं माननीय होता है।

अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित् ।
अतोऽर्थाय यतेतैव सर्वदा यत्नमास्थितः ॥ ३६ ॥
अर्थाद्धर्मश्च कामश्च मोक्षश्चापि भवेन्नृणाम् ।

अर्थ के लिये अवश्य यत्न करने का निर्देश — अर्थ का दास पुरुष ही होता है न कि पुरुष का दास अर्थ होता है। अतः अर्थ के लिये सर्वदा प्रयत्न-पूर्वक यत्नशील रहना चाहिये। और मनुष्यों के अर्थ से ही धर्म, काम और मोक्ष सभी पुरुषार्थ प्राप्त होते हैं।

शस्त्रास्त्राभ्यां बिना शौर्यं गार्हस्थ्यं तु श्रियं विना · ४० ॥
ऐकमत्यं विना युद्धं कौशल्यं ग्राह्यकं विना ।
दुःखाय जायते नित्यं सुसहायं बिना विपत् ॥ ४१ ५
न विद्यते तु विपदि सुसहायं सुहृत्-समम् ।

शौर्यादिकों का शस्त्रास्त्रादि के बिना दुःखदायी होने का निर्देश — शस्त्र और अस्त्र के बिना शूरता, स्त्री के बिना गार्हस्थ्य (गृहस्ती), सैनिकों की एकता के बिना युद्ध, समझने वाले के बिना चतुराई, और सुन्दर सहायक के बिना

पञ्चमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४०३

विपत्ति नित्य दुःख देने के लिये ही होती है । और विपत्ति में सुन्दर मित्र के समान अन्य कोई सच्चा सहायक नहीं होता है ।

अविभक्तधनान् मैत्र्या भृत्या भक्तधनान् सदा ॥ ४२ ॥
मित्रं स्वसदृशैर्भोगैः सत्यैश्च परितोषयेत् ।

अविभक्त और विभक्त ज्ञातिवर्ग तथा मित्र के साथ व्यवहार के प्रकार का निर्देश— जिनके साथ धन का बँटवारा नहीं हुआ है अर्थात् एक साथ रहनेवाले जो ज्ञाति-वर्ग के हैं, उन्हें सौहार्द भाव से, और जिनके साथ धन का बटवारा हो चुका है, ऐसे लोगों को मासिक या वार्षिक वृत्ति-प्रदान द्वारा, एवं मित्रों को अपने सदृश भोग ( भोजनादि ) का प्रबन्ध तथा सत्य व्यवहार द्वारा सदा राजा सन्तुष्ट रखे ।

नृपसम्बन्धिस्त्रीपुत्रसुहृद्भृत्याविदस्युभिः ॥ ४३ ॥
अतो विभागं दत्त्वैषां भुङ्क्ते यस्तु स्वकं धनम् ।

अपने सम्बन्धी स्त्री-पुत्रादि को सन्तुष्ट रखते हुये धनोपभोग करने का निर्देश— जो राजा अपने सम्बन्धी, स्त्री, पुत्र, मित्र भृत्य तथा दस्यु गणों को जिस प्रकार से ये संतुष्ट हो सकें वैसा प्रबन्ध करके अपने धन का उपभोग करता है, वस्तुतः वही सुखी होता है ।

त्यक्त्वा तु दर्पकार्पण्यमानोद्वेगभयानि च ॥ ४४ ॥
कुर्वीत नृपतिर्नित्यं स्वार्थसिद्धयै तु नान्यथा ।
विशेषभृतितो भृत्यं प्रेममानाधिकारतः ॥ ४५ ॥

स्वकार्य-सिद्ध्यर्थ भृत्य को सर्वथा संचय रखने का निर्देश— राजा अपने कार्य की सिद्धि के लिये ही दर्प ( अहङ्कार ), कृपणता, मान, उद्वेग और भय को छोड़कर विशिष्ट जीविका का प्रदान, प्रेम तथा संमान-प्रदर्शन एवं अधिकार-प्रदान से भृत्य को नित्य युक्त करता रहे, इससे अन्यथा न करे ।

ब्राह्मणाग्निजलैः सर्वैर्धनवान् भक्ष्यते सदा ।
स सुखी मोदते नित्यमन्यथा दुःखमश्नुते ॥ ४६ ॥

ब्राह्मणादि द्वारा यज्ञादि करने में धन का व्यय करने से ही सुखी होने का निर्देश— दान करने से ब्राह्मण द्वारा, यज्ञ करने से अग्नि द्वारा, पौंसला आदि का प्रबन्ध करने से जल द्वारा जिस धनी का धन व्यय होता रहता है । वह धनी नित्य सुखी होने से प्रसन्न रहता है अन्यथा रीति से व्यय होने पर दुःखी रहता है ।

दर्पस्तु परहासेच्छा मानोऽहं सर्वतोऽधिकः ।
कार्पण्यं तु व्यये दैन्यं भयं स्वोच्छेदशङ्कनम् ॥ ४७ ॥

४०४शुक्रनीतिः

मानसस्यानवस्थानमुद्वेगः परिकीर्तितः ।

दर्पं, मान, कार्पण्य, भय तथा उद्वेग के लक्षण— दूसरे के हास की इच्छा को 'दर्प', मैं सबसे अधिक गुणादि में हूँ इसे 'मान', व्यय में कंजूसी करने को 'कार्पण्य', अपने उच्छेद होने की शङ्का को 'भय' और मन का स्थिर न रहने को 'उद्वेग' कहते हैं ।

लघोरप्यपमानस्तु महावैराय जायते ॥ ४८ ॥
दानमानसत्यशौर्यमार्दवं सुसुहृत्करम् ।

महान वैर तथा मित्रता के कारणों का निर्देश— क्षुद्रजन के लिये भी किया हुआ अपमान महावैर को पैदा करने में समर्थ होता है । किसी को कुछ देना, संमान करना, सत्य व्यवहार करना, शूरता और मृदुता ये सब अत्यन्त मित्रता पैदा करनेवाले होते हैं ।

सर्वानापदि सदसि समाहूय बुधान् गुरून् ॥ ४९ ॥
भ्रातॄन् बन्धूंश्च भृत्यांश्च ज्ञातीन् सभ्यान् पृथक् पृथक् ।
यथार्हं पूज्य विनतः स्वामीष्टं याचयेन्नृपः ॥ ५० ॥

आपत्ति पड़ने पर राजा के कर्त्तव्य का निर्देश— राजा आपत्ति पड़ने पर विनम्र होकर पण्डित, गुरु, भाई, बन्धु, भृत्य, जाति के लोग और सभासद् इन सबों को राज्यसभा में बुलाकर यथायोग्य सम्मान करने के बाद अपना अभीष्ट सिद्ध करने के लिये इस रीति से प्रार्थना करे । अर्थात् उपाय पूछे ।

आपदं प्रतरिष्यामो यूयं युक्त्या वदिष्यथ ।
भवन्तो मम मित्राणि भवत्सु नास्ति भृत्यता ॥ ५१ ॥

मैं आपत्ति को पार कर जाऊं इसके लिये आप लोग युक्ति बतायें । आप लोग मेरे मित्र हैं आप लोगों को मैं अपना केवल भृत्य नहीं मानता हूँ ।

न भवत्सदृशास्त्वन्ये सहायाः सन्ति मे ह्यतः ।
तृतीयांशं भृतेर्माह्यमर्धं वा भोजनार्थकम् ॥ ५२ ॥
दास्याम्यापत्समुत्तीर्णः शेषं प्रत्युपकारवित् ।

आप लोगों के समान मेरा कोई दूसरा सहायक नहीं है । अतः इस समय केवल भोजन के लिये वेतन का तृतीयांश या अर्द्धांशमात्र ही आप लोग ग्रहण करें । क्योंकि इस समय व्यय अधिक होने से मैं समग्र वेतन देने में असमर्थ हूँ और जब मैं आपत्ति को पार कर लूंगा तब आप लोगों के उपकार का बदला चुकाना उचित जानकर शेष भी वेतन चुका दूंगा ।

भृतिं विना स्वामिकार्यं भृत्यः कुर्यात् समाष्टकम् ॥ ५३ ॥
षोडशाब्दं धनी यः स्यादितरोऽर्थानुरूपतः ।

आपत्ति में विना वेतन के भी स्वामि-कार्य करने की कालमर्यादा का

पञ्चमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४०५

**निर्देश—**जो भृत्य ऐसा धनी हो कि अपने पास से १५ वर्ष तक बिना वेतन लिये जीविका चला सकता है वह बिना वेतन लिये ८ वर्ष तक स्वामी का कार्य करे, और जो इससे भिन्न हों वे अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार जितना समय तक बिना वेतन के हो सके स्वामिकार्य करें।

निर्धनैरन्नवस्त्रं तु नृपाद् ग्राह्यं न चान्यथा ॥ ५४ ॥
यतो भुक्तं सुखं सम्यक् तद्दुःखैर्दुःखितो न चेत् ।
विनिन्दति कृतघ्नस्तु स्वामी भृत्योऽन्यएव वा ॥ ५५ ॥

और जो निर्धन हों वे राजा से अन्न-वस्त्र मात्र ग्रहण करें। इससे अन्यथा होने पर न ग्रहण करें। जिस स्वामी से आजतक जिसने भलीभांति सुख का उपभोग किया, आज यदि उसके दुःख से वह दुःखी न हो तो वैसे कृतघ्न भृत्य की स्वामी या अन्य कृतज्ञ भृत्य भी निन्दा करते हैं।

सकृत् सुभुक्तं यस्यापि तदर्थं जीवितं त्यजेत् ।
भृत्यः स एव सुश्लोको नापत्तौ स्वामिनं त्यजेत् ॥ ५६ ॥
स्वामी स एव विज्ञेयो भृत्यार्थं जीवितं त्यजेत् ।

**प्रशंसायोग्य भृत्य और स्वामी का वर्णन—**जो भृत्य जिसका सम्मान-पूर्वक दिया हुआ अन्न एक बार भी भोजन करले तो उसके रक्षार्थ समय पड़ने पर जीवन का भी त्याग कर दे। वही भृत्य सुन्दर यश वाला माना जाता है जो आपत्ति पड़ने पर भी स्वामी का साथ नहीं छोड़ता है और वही वस्तुतः स्वामी है जो आवश्यकता पड़ने पर भृत्य के रक्षार्थ अपना जीवन भी त्याग कर देता है।

न रामसदृशो राजा पृथिव्यां नीतिमानभूत् ॥ ५७ ॥
सुभृत्यता तु यन्नीत्या वानरैरपि स्वीकृता ।

**योग्य स्वामी तथा भृत्य का उदाहरण—**इस पृथिवी पर राम के समान कोई दूसरा नीतिमान राजा नहीं हुआ, क्योंकि जिसकी नीति के द्वारा वानरों ने भी भलीभांति से भृत्यता स्वीकार कर ली थी।

अपि राष्ट्रविनाशाय चोराणामेकचित्तता ॥ ५८ ॥
शक्ता भवेन्न किं शत्रुनाशाय नृपभृत्ययोः ।

**एकचित्तता के भाव का वर्णन—**जब चोरों का मिल कर एकचित्त हो जाना राष्ट्र-विनाश करने में समर्थ हो जाता है, तब भला राजा और भृत्य का एकचित्त हो जाना क्या शत्रुविनाश करने के लिये समर्थ नहीं हो सकता है, अपितु अवश्य हो सकता है।

न कूटनीतिरभवच्छ्रीकृष्णसदृशो नृपः ॥ ५६ ॥
अर्जुनाद् ग्राहिता स्वस्य सुभद्रा भगिनी छलात् ।

४०६ | शुक्रनीतिः

श्रीकृष्ण की कूटनीति का वर्णन—श्रीकृष्ण भगवान के समान कोई दूसरा राजा कूटनीति का प्रयोग करनेवाला नहीं हुआ, जिन्होंने कूटनीति द्वारा जबर-दस्ती अपनी बहन सुभद्रा अर्जुन को दिला दी (ब्याह दी)

नीतिमत्तान्तु सा युक्तिर्या हि स्वश्रेयसेऽखिला ॥ ६० ॥

नीतिमानों की वही युक्ति वस्तुतः युक्ति (उपाय) है जो उनके संपूर्ण कल्याण करने में उचित हो।

आदौ तद्धितकृत्स्नेहं कार्यं स्नेहमनन्तरम् ।
कृत्वा सधर्मवादं च मध्यस्थः साधयेद्धितम् ॥ ६१ ॥

हित सिद्ध करने में मध्यस्थ पुरुष के व्यवहार का निर्देश—मध्यस्थ (उदासीन) पुरुष प्रथम किसी के हितैषी मित्र के साथ स्नेह, तदनन्तर कर्त्तव्य कर्म और धर्मकथनपूर्वक स्नेह-प्रदर्शन करके हित सिद्ध करे।

परस्परं भवेत् प्रीतिस्तथा तद्गुणवर्णनम् ।
इष्टान्नधनवसनैर्लोभनं कार्यसिद्धिदम् ॥ ६२ ॥

परस्पर जैसे प्रीति हो वैसे उसके प्रेम के गुणों का वर्णन करे। और अभीष्ट अन्न-वस्त्र का लोभ दिखाये। यह कार्य-सिद्धि करने वाला होता है।

दिव्यावलम्बनं मिथ्या संल्लापं धैर्य्यवर्धनम् ।
इमे उपाया मध्यस्थ-कुट्टिनीकारिणां मताः ॥ ६३ ॥

मध्यस्थ (उदासीन), कुट्टिनी और धूर्त्त लोगों को दिव्य (शपथ) का अवलम्बन, झूठमूठ (मनगढन्त) बात करना और धैर्य बँधाना ये सब उपाय इष्ट होते हैं। इससे वे लोग कार्य सिद्ध करते हैं।

नात्मसङ्गोपने युक्तिं चिन्तयेत् स पशोर्जडः ।
जारसङ्गोपने छद्म संश्रयन्ति स्त्रियोऽपि च ॥ ६४ ॥

अपनी रक्षा की युक्ति का विचार न करनेवाले की निन्दा का निर्देश—जो अपनी रक्षा करने के लिये उपाय नहीं सोचता है वह पशु से भी बढ़कर जड़ है। और स्त्रियां भी अपने जार पति को छिपाने में छल का आश्रय लेती हैं।

युक्तिश्छलात्मिका प्रायस्तथान्या योजनात्मिका ।
यच्छद्माचारी भवति तेन छद्मा समाचरेत् ॥ ६५ ॥
अन्यथा शीलनाशाय महतामपि जायते ।

कार्यसिद्धयर्थ दो प्रकार की युक्तियों का निर्देश—कार्यसिद्धि के लिये युक्ति (उपाय) दो प्रकार की होती है, उसमें प्रायः करके छलरूपा पहली और सत्यरूपा दूसरी होती है। जो छल करनेवाले हैं, उनके लिये छलरूपा युक्ति का प्रयोग करना चाहिये। अन्यथा छल करना बड़े लोगों के चरित्र को बिगाड़ देनेवाली हो जाती है।

पञ्चमाध्याये खलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४०७

अस्ति बुद्धिमतां श्रेणिर्न त्वेको बुद्धिमानतः ॥ ६६ ॥
देशे काले च पुरुषे नीतिं युक्तिमनेकधाम् ।
कल्पयन्ति च तद्विद्या दृष्ट्वा रुद्धां तु प्राक्तनीम् ॥ ६७ ॥

और बुद्धिमानों की श्रेणी होती है न कि सिर्फ एक ही कोई बुद्धिमान होता है अतः चतुर लोग जहां पर सत्यरूपा युक्ति निष्फल देखते हैं वहां पर देश, काल तथा पात्र के अनुसार अनेक प्रकार की नीति तथा युक्ति की कल्पना करते हैं ।

मन्त्रौषधिपृथग्वेष-कालवागर्थसंश्रयात् ।
छद्म सञ्जनयन्तीह तद्विद्याकुशला जनाः ॥ ६८ ॥

छल का वर्णन— इस संसार में माया (छल) करने में निपुण लोग मन्त्र, औषध, नाना प्रकार के वेष, काल, वचन और अर्थ, इन सबों का आश्रय लेकर छल-प्रयोग करते हैं ।

लोकेऽधिकारिप्रत्यक्षं विक्रीतं दत्तमेव वा ।
वस्त्रभाण्डादिकं क्रीतं स्वचिह्नैरङ्कयेच्चिरम् ॥ ६९ ॥

लोक में बेंची हुई (वस्त्र-पात्र आदि), दी हुई (किसी को दान में दे दी गई) तथा खरीदी हुई वस्तुओं पर उनके अधिकारी (बेंचने, देने तथा खरीदनेवाले) लोगों के सामने उनको अपनी २ मुहरों से ऐसा चिह्न बना देना चाहिये, जो बहुत दिन तक न मिट सके ।

स्तेनकूटनिवृत्त्यर्थं राज्ञातं समाचरेत् ।
जडान्धबालद्रव्याणां दद्याद् वृद्धिं नृपः सदा ॥ ७० ॥

चोरों की जालसाजी रोकने के लिये अर्थात् चोरी का माल न बिकने पावे, इसके लिये उन बिकी हुई वस्तुओं की सूचना राजा को दे देनी चाहिये अर्थात् लिखा देनी चाहिये । और जड़, अन्ध तथा लड़कों के जो धन हों, उनको यदि राजा के पास रक्खा जाय तो राजा उसका सूद बराबर उन सबों को दे ।

स्वीया तथा च सामान्या परकीया तु स्त्री यथा ।
त्रिविधो भृतकस्तद्वदुत्तमो मध्यमोऽधमः ॥ ७१ ॥

तीन प्रकार के भृत्यों का निर्देश— जैसे स्त्री स्वीया (अपनी), सामान्या (वेश्या आदि) और परकीया (दूसरे की) भेद से ३ प्रकार की होती है। वैसे भृत्य भी उत्तम, मध्यम तथा तथा अधम भेद से तीन प्रकार का होता है ।

स्वामिन्येवानुरक्तो यो भृतकस्तूत्तमः स्मृतः ।
सेवते पुष्टवृत्तीदं प्रकरं स च मध्यमः ॥ ७२ ॥

४०८ | शुक्रनीतिः

पुष्टोऽपि स्वामिनाऽव्यक्तं भजतेऽन्यं स चाधमः ।

**उत्तमादि भृत्यों के लक्षण—**जो स्वामी में अनुरक्त रहे, वह भृत्य 'उत्तम' और जो पर्याप्त वेतन देनेवाले स्वामी की सेवा अधिक वेतन पाने के लोभ से करता है, वह 'मध्यम' एवं जो स्वामी से भलीभांति पालित होने पर भी छिपे रूप से दूसरे की भी सेवा करता है, वह 'अधम' भृत्य कहलाता है।

उपकरोत्यपकृतो ह्युत्तमोऽप्यन्यथाऽधमः ॥ ७३ ॥
मध्यमः साम्यमन्विच्छेदपरः स्वार्थतत्परः ।

**प्रकारान्तर से उत्तमादि भृत्यों के लक्षण—**जो अपकार करने पर भी स्वामी का उपकार करता है वही 'उत्तम' है इससे अन्यथा अर्थात् उपकार करने पर जो अपकार करता है, वह 'अधम' कहलाता है। और मध्यम 'भृत्य' तुल्य व्यवहार को पसन्द करता है अर्थात् उपकार करनेवाले के प्रति उपकार तथा अपकार करनेवाले के प्रति अपकार करना चाहता है, और इसके बाद का दूसरा जो अधम है वह केवल अपना स्वार्थ साधने में तत्पर रहता है।

नोपदेशं विना सम्यक् प्रमाणैर्ज्ञायतेऽखिलम् ॥ ७४ ॥
बाल्यं वाऽप्यथ तारुण्ये प्रारम्भितसमाप्तिदम् ।

**उपदेश के बिना सबका ज्ञान न होने का तथा बाल्य व युवा अवस्था में प्रारम्भ किये हुये कार्य की समाप्ति का निर्देश—**उपदेश के बिना केवल प्रमाणों से सभी बातें भलीभांति नहीं जानी जा सकती हैं। और बाल्य तथा युवा ये दो अवस्थायें प्रारम्भ किये हुये की समाप्ति देनेवाली अर्थात् इनमें जो आरम्भ किया जाता है उसकी समाप्ति भी हो जाती है।

प्रायो बुद्धिमतो ज्ञेयं न वार्धक्यं कदाचन ॥ ७५ ॥
आरम्भं तस्य कुर्याद्धि यत्समाप्तिं सुखं व्रजेत् ।

**आरम्भ किये हुये की समाप्ति होने में वृद्धावस्था की अयोग्यता का निर्देश—**किन्तु वार्द्धक्य (वृद्धावस्था) को प्रायः बुद्धिमान उक्त भांति का कदापि नहीं मानते हैं। इसमें प्रारम्भ किये हुये कार्य की समाप्ति नहीं हो पाती, क्योंकि उसी कार्य का आरम्भ करना चाहिये। जिसकी समाप्ति बिना क्लेश के हो जाय।

नारम्भो बहुकार्याणामेकदैव सुखावहः ॥ ७६ ॥
नारम्भितसमाप्तिं तु विना चान्यं समाचरेत् ।

**बहुत कार्यों का एक साथ आरम्भ करने का निषेध—**बहुत कार्यों का एक साथ ही आरम्भ करना सुखावह नहीं होता है और आरम्भ किये हुये कार्य की बिना समाप्ति हुये किसी दूसरे कार्य को नहीं करना चाहिये।