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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

द्वितीयोऽध्यायः

द्वितीयोऽध्यायः
८५

धर्मनिष्ठ, दृढ अङ्गोंवाले, बाल्य अवस्था को पार किये हुये, तरुण, सदा सेवा करने में कुशल, जो कुछ कार्य स्वामी का उत्तम या चाहे मल-मूत्रादि उठाना आदि नीच भी कार्य हो उन सबों को करने के लिये उद्यत रहनेवाले एवं आज्ञानुसार कार्य करनेवाले हों ऐसे लोगों को राजा 'परिचारक' बनावे ।

शत्रुप्रजाभृत्यवृत्तं विज्ञातुं कुशलाश्च ये ।
ते गूढचाराः कर्त्तव्या यथार्थश्रुतबोधकाः ॥ १८६ ॥

जासूस के लक्षण—जो शत्रु तथा प्रजागण के व्यवहार को जानने के लिये कुशल एवं यथार्थ बातों को सुनकर उन्हें ठीक २ बताने वाले हों ऐसे लोगों को गूढचार ( जासूस ) पद पर नियुक्त करना चाहिये ।

राज्ञः समीपप्राप्तानां नतिस्थानविबोधकाः ।
दण्डधरा वेत्रधराः कर्त्तव्यास्ते सुशिक्षकाः ॥ १६० ॥

दण्डधारी-आसा-बल्लभधारी के लक्षण—जो राजा के समीप उपस्थित हुये लोगों को प्रणाम करने की रीति एवं बैठने के लिये स्थान को अच्छी तरह से बतानेवाले, विनय तथा शिक्षा जाननेवाले हों ऐसे लोगों को दण्ड तथा बेंत धारण करके राजा के समीप में रहने वाला बनाना चाहिये ।

तन्त्रीकण्ठोत्थितान् सप्तस्वरान् स्थानविभागशः ।
उत्पादयति संवेत्ति ससंयोगविभागिनः ॥ १६१ ॥
अनुरागं सुस्वरं च सतालं च प्रगायति ।
सन्नृत्यं वा गायकानामधिपः स च कीर्त्तितः ॥ १६२ ॥

गायकाधिप के लक्षण—जो वीणा या कण्ठ से निकले हुये स. रि. ग. म, प. ध. नि. इन ७ स्वरों को स्थान-विभाग के अनुसार यथार्थ रूप से पैदा करते हैं एवं संयोग तथा विभाग को साथ अर्थात् मिले हुये या अलग २ उन सबों को भलीभांति समझते हैं और जो राग, स्वर-ताल के साथ गाते या नाचते हैं ऐसे लोगों को गायकों ( गानेवालों ) का अधिपति बनाना चाहिये ।

तथाविधा च पण्यस्त्री निर्लज्जा भावसंयुता ।
शृङ्गाररसतन्त्रज्ञा सुन्दराङ्गी मनोरमा ॥ १६३ ॥
नवीनोत्तुङ्गकठिनकुचा सुस्मितदर्शिनी ।

वेश्या के लक्षण—और पूर्वोक्त रीति से गाने तथा नाचनेवाली, लज्जा न करनेवाली, भाव ( अनुराग ) से युक्त, शृङ्गार रस के तत्त्व को जाननेवाली, सुन्दर अङ्गों वाली, मनको आनन्दित करनेवाली, नवीन अवस्थावाली, ऊँचे, कठिन कुचोंवाली, सुन्दर स्मित ( मुसुकान ) के साथ देखने वाली ( कटाक्ष करनेवाली ) ऐसी जो वेश्या हो उसे राजा अपने यहां रखें ।

ये चान्ये साधकास्ते च तथा चित्तविरञ्जकाः ॥ १६४ ॥

८६ | शुक्रनीतिः

सुभृत्यास्तेपि सन्धार्या नृपेणात्महिताय च ।
वेश्या-भृत्य के लक्षण— और इसके अतिरिक्त अन्य वेश्याओं के भृत्य जो मनोऽभिलषित कार्य के करने में चतुर, चित्त को विशेष रूप से प्रसन्न करने वाले ऐसे अच्छे भृत्य हों उन्हें अपने हित के लिये राजा को रखना चाहिये ।

वैतालिकाः सुकवयो वेत्रदण्डधराश्च ये ॥ १६५ ॥
शिल्पज्ञाश्च कलावन्तो ये सदाप्युपकारकाः ।
दुर्गुणासूचका भाणा नर्तका बहुरूपिणः ॥ १६६ ॥
आरामकृत्रिमवनकारिणो दुर्गकारिणः ।
महानालिकयन्त्रस्थगोलैर्लक्ष्यविभेदिनः ॥ १९७ ॥
लघुयन्त्राग्नेयचूर्णबाणगोलासिकारिणः ।
अनेकयन्त्रशास्त्रास्त्रधनुस्तूणादिकारकाः ॥ १९८ ॥
स्वर्णरत्नाद्यलङ्कारघटका रथकारिणः ।
पाषाणघटका लोहकारा धातुविलेपकाः ॥ १९९ ॥
कुम्भकाराः शौल्विकाश्च तक्षाणो मार्गकारकाः ।
नापिता रजकाश्चैव वासिका मलहारकाः ॥ २०० ॥
वार्ताहराः सौचिकाश्च राजचिह्नाग्रधारिणः ।
भेरीपटहगोपुच्छ-शंखवेणवादिभिःस्वनैः ॥ २०१ ॥
ये व्यूहरचका यानव्यपथानादिबोधकाः ।
नाविकाः खनका व्याधाः किराता मारिका अपि ॥ २०२ ॥
शस्त्रसंमार्जनकरा जलधान्यप्रवाहकाः ।
आपणिकाश्च गणिका वाद्यजायाप्रजीविनः ॥ २०३ ॥
तन्तुवायाः शाकुनिकाश्चित्रकाराश्च चर्मकाः ।
गृहसंमार्जकाः पात्रधान्यवस्त्रप्रमार्जकाः ॥ २०४ ॥
शय्यावितानास्तरण-कारकाः शासका अपि ।
आमोदास्वेदसद्धूपकारास्ताम्बूलिकास्तथा ॥ २०५ ॥
हीनाल्पकर्माणश्चैते योज्याः कार्यानुरूपतः ।

वैतालिक तथा शिल्पशों को पास में रखने का निर्देश— और जो वैतालिक (राजा की स्तुति करके जगानेवाले), सुकवि, वेत या दण्ड धारण करनेवाले (रक्षक विशेष), शिल्प कला के पण्डित, कलाओं (६४ प्रकार की कामविद्या) में कुशल, सदा हित करनेवाले, दूसरों के दोषों की सूचना देनेवाले, भाण (परिहास के पण्डित), बहुरूपिया, बगीचा तथा बनावटी जंगल बनाने में कुशल, दुर्ग (किला) बनानेवाले, महानालिक यन्त्रों (बड़ी तोपों) के अन्दर रखे हुवे गोलों से शत्रुओं पर लक्ष्य-भेद (निशाना) करनेवाले (गोलन्दाज), लघु

द्वितीयोऽध्यायः
८७

यन्त्र ( बन्दूक आदि ), आग्नेय चूर्ण ( बारूद ), बाण, गोला और तलवार आदि के एवं अनेक प्रकार के युद्धोपयोगी यन्त्र, शस्त्र, अस्त्र, धनुष, तूणीर ( तर्कश ) आदि के बनानेवाले कारीगर, सोना, रत्न आदि के अलङ्कारों को बनानेवाले, रथ बनानेवाले पत्थरों को गढ़ने वाले ( सङ्गतराश ), लुहार, गेरू आदि धातुओं से गृहादि को रंगनेवाले ( रंगसाज ), कुम्हार, शौल्बिक ( ताम्बे के वर्त्तन बनानेवाले ), बढ़ई, सड़क बनानेवाले, नाई, धोबी, वासिक ( लकड़हारा ), मेहतर, संवाद पहुँचानेवाले, दर्जी, राज-चिह्न ( छत्र-चामर—निशान ) लेकर राजा के आगे रहनेवाले, व्यूह-रचना करनेवाले एवं भेरी ( नगारा ), पटह ( ढोल ), गोपुच्छ ( रणसिंघा ), शङ्ख, वंशी आदि को बजाकर यान ( शत्रुओं के ऊपर चढ़ाई करना ) और व्यपयान ( शत्रुओं से पीछे हटना ) आदि ( आक्रमण करना ) समयों में सैनिकों को सूचना देनेवाले, नाविक ( मल्लाह ), खनक ( खननेवाले ), व्याध ( शिकार खेलनेवाले या बहेलिया ), किरात ( कोल-भिल्लादि ), बोझा ढोनेवाले, शस्त्रों को साफ करनेवाले ( सान चढ़ाकर तीक्ष्ण करनेवाले ), जल तथा धान्य को ढोनेवाले, आपणिक ( व्यापार करनेवाले ), परदेशी स्त्री-विहीन कर्मचारियों के काम-शान्त्यर्थं वेश्यायें, बाजा बजाते हुये स्त्रियों के साथ नाच कर जीविका चलानेवाले, जुलाहे, पक्षी बढ़ाकर जीविका रखनेवाले, चित्रकार, चर्मकार ( मोची ), झाडू देनेवाले, वर्त्तन, धान्य, वस्त्र इनको सफा करनेवाले, शय्या, वितान ( चंदोवा ), बिछौना आदि के बनाने और उसको लगाने की कला को करनेवाले, चित्त को प्रसन्न करनेवाले ( सुगन्धित ) एवं पसीना न लाने वाले अच्छे धूपों को बनानेवाले, ताम्बूल ( पान का बीड़ा ) लगानेवाले, तथा अन्यान्य हीन तथा क्षुद्र राजसंबन्धी कार्य करने वाले इन सबों को कार्य के अनुरूप यथायोग्य राजा अपने यहाँ रक्खे ।

प्रोक्तं पुण्यतमं सत्यं परोपकरणं तथा ॥ २०६ ॥
आज्ञायुक्तांश्च भृतकान्सततं धारयेन्नृपः ।

सत्य तथा परोपकार की श्रेष्ठता तथा इनसे युक्त राजकर्मचारी रखने का निर्देश— सत्य तथा परोपकार को सब पुण्यों में श्रेष्ठ बताया है अतः इनसे युक्त आज्ञानुसार सच्चाई के साथ राज-कार्य करनेवाले भृत्यों को राजा अपने यहाँ सदा रक्खे ।

हिंसा गरीयसी सर्वपापेभ्योऽनृतभाषणम् ॥ २०७ ॥
गरीयस्तरमेताभ्यां युक्तान्भृत्यान्न धारयेत् ।

संपूर्ण पापों से हिंसा तथा असत्य की प्रबलता तथा इनसे युक्त भृत्यों को

८८ शुक्रनीतिः

न रखने का निर्देश—और सब पापों से बढ़कर हिंसा (हत्या या कष्ट पहुंचाना) और झूठ बोलना है अतः इन दोनों से युक्त भृत्यों को न रखे ।
यदा यदुचितं कर्तुं वक्तुं वा तत्प्रबोधयन् ॥ २०८ ॥
तद्भक्ति कुरुते द्राक्तु स सद्भृत्यः सुपूज्यते ।
सद्भृत्य के लक्षण—जिस समय जो कार्य करने के लिये एवं जो बात बोलने के लिये उचित प्रतीत हो उसी को राजा से समझाता हुआ और स्वयं भी शीघ्रता से उसी बात को कहता एवं उसी कार्य को करता भी है वही भृत्य अच्छा कहलाता है और भली भांति पूजित भी होता है ।
उत्थाय पश्चिमे यामे गृहकृत्यं विचिन्त्य च ॥ २०९ ॥
कृत्वोत्सर्गं तु विष्णुं हि स्मृत्वा स्नायादनन्तरम् ।
प्रातः कृत्यं तु निर्वर्त्य यावत्सार्धमुहूर्त्तकम् ॥ २१० ॥
गत्वा स्वकार्यशालां वा कार्याकार्यं विचिन्त्य च ।
अच्छे भृत्यों का यह कृत्य है कि—वह रात्रि को पिछले प्रहर में उठकर गृह के ( उस दिन करने लायक ) कृत्यों का विचार करने के बाद मल-मूत्रादि का परित्याग कर विष्णु ( परमात्मा ) का स्मरण करते हुये स्नान करे । अथवा १।। मुहूर्त ( करीब १॥ घण्टे ) के अन्दर प्रातःकालीन नित्य के सम्पूर्ण कार्यों को समाप्त कर अपने कार्यालय में जाकर वहां के कर्त्तव्य या अकर्त्तव्य कार्यों का निश्चय कर तदुपरान्त स्नान करे ।
विनाऽऽज्ञया विशन्तं तु द्वास्थः सम्यङ् निरोधयेत् ॥ २११ ॥
निर्देशकार्यं विज्ञाप्य तेनाज्ञप्तः प्रमोचयेत् ।
द्वारपाल के कर्त्तव्यों का निर्देश—और द्वारपाल का यह कर्त्तव्य है कि वह द्वार पर रहकर बिना राजाज्ञा के अन्दर प्रवेश करनेवाले को अच्छी तरह से रोके । और उसके बताये हुये कार्य की सूचना राजा को देकर यदि राजा की आज्ञा अन्दर आने देने के लिये हो तो उसे अन्दर जाने के लिये छोड़ दे ।
दृष्ट्वागतान्सभामध्ये राज्ञे दण्डधरः क्रमात् ॥ २१२ ॥
निवेद्य तन्नतीः पश्चात्तेषां स्थानानि सूचयेत् ।
राजपार्श्ववर्त्ती दण्डधारियों का कर्त्तव्य—और राजा के पास दण्ड धारण करनेवाले भृत्यों का यह कर्त्तव्य है कि—वह राजसभा में आये हुये लोगों को देखकर क्रम से राजा से उसके प्रणाम करने की सूचना देकर पश्चात् उससे बैठने के लिये स्थान का निर्देश करे ।
ततो राजगृहं गत्वाऽऽज्ञप्तो गच्छेच्च सन्निधिम् ॥ २१३ ॥
मत्वा नृपं यथान्यायं विष्णुरूपमिवापरम् ।
प्रविश्य सानुरागस्य चित्तज्ञस्य समन्ततः ॥ २१४ ॥

द्वितीयोऽध्यायः [८१]

भर्तुरर्द्धासने दृष्टिं कृत्वा नान्यत्र निक्षिपेत् ।

**भृत्य का राजसमीपावस्थान करने पर कर्त्तव्य—**उसके (स्थान बताने के) बाद पुनः राजगृह (राजसभा) में जाकर राजा की आज्ञा पाने पर उसके समीप जावे । और जगत् के रक्षार्थ दूसरे विष्णु भगवान के समान स्थित राजा को नियमानुकूल प्रणाम करे और राजसभा में पहुँचकर भृत्यों के प्रति अनुराग रखनेवाले एवं उनके हृदय को पहचाननेवाले राजा के अर्द्धासन की ओर स्थिर-दृष्टि होकर देखता रहे और किसी अन्य तरफ दृष्टि न दौड़ावे ।

अग्निं दीप्तमिवासीदेद्राजानमुपशिक्षितः ॥ २१५ ॥
आशीविषमिव क्रुद्धं प्रभुं प्राणधनेश्वरम् ।
जलती हुई अग्नि के समान एवं क्रुद्ध विषधर सर्प की भांति प्राण तथा धन लेने में समर्थ राजा को समझ कर अत्यन्त विनय के साथ उसके समीप जावे ।

यत्नेनोपचरेन्नित्यं नाहमस्मीति चिन्तयेत् ॥ २१६ ॥
समर्थयंश्च तत्पक्षं साधु भाषेत भाषितम् ।
तन्नियोगेन वा ब्रूयादर्थं सुपरिनिश्चितम् ॥ २१७ ॥
**राजा के पक्ष की पुष्टि करने का निर्देश—**और नित्य यत्न के साथ राजा की सेवा करे और 'राजा के आगे मेरी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है' ऐसा सोचे एवं राजा के पक्ष का ही समर्थन करता हुआ सन्तोषजनक बात कहे । अथवा राजा की आज्ञा पाने पर लोक-शास्त्र से सुनिश्चित बात कहे ।

सुखप्रबन्धगोष्ठीषु विवादे वादिनां मतम् ।
विजानन्नपि नो ब्रूयाद्भर्तुः क्षिप्तोत्तरं वचः ॥ २१८ ॥
**राजाज्ञा से विवादियों के मत को युक्ति से बोलने का निर्देश—**मनोविनोदार्थ प्रस्तुत राजगोष्ठी में परस्पर तर्क करनेवालों के विवाद उपस्थित होने पर सिद्धान्त बात को जानते हुये भी वादी रूप में बोलनेवाले राजा के उत्तर को काटकर कोई वचन न बोले ।

सदाऽनुद्धतवेषः स्यान्नृपाहूतस्तु प्राञ्जलिः ।
तद्वां कृतनतिः श्रुत्वा वस्त्रान्तरितसम्मुखः ॥ २१९ ॥
तदाज्ञां धारयित्वादौ स्वकर्माणि निवेदयेत् ।
नत्वाऽऽसीतासने प्रह्वो न तत्पार्श्वे न संमुखे ॥ २२० ॥
उच्चैः प्रहसनं कासं ष्ठीवनं कुत्सनं तथा ।
जृम्भणं गात्रभङ्गं च पर्वास्फोटं च वर्जयेत् ॥ २२१ ॥
**राजा से स्वकार्य निवेदन-प्रकार तथा जोर से हँसने आदि का निषेध—**राजा के बुलाने पर सदा विनीत के समान वेष बनाये हुये हाथ जोड़े और

९० : शुक्रनीतिः

नमस्कार करने के बाद शरीर के अगले हिस्से को वस्त्र से ढके हुये स्थित हो और राजा की बात सुनकर तथा सर्वप्रथम उनकी आज्ञा पाकर पश्चात् अपने कार्य का निवेदन करे। और नमस्कार करने के बाद नम्रता के साथ अपने आसन पर बैठे, और राजा के बगल में या सामने जोर से हँसना, खाँसना, थूकना, कुत्सित कार्य या किसी की निन्दा करना, जभाई लेना, शरीर तोड़ना, अंगुलियों के पोरों को चटकाना इन सब कार्यों को न करे।

राज्ञादिष्टन्तु यत्स्थानं तत्र तिष्ठेन्मुदान्वितः ।
प्रवीणोचितमेधावी वर्जयेदभिमानिताम् ॥ २२२ ॥
राजा के बताये हुये स्थान पर प्रसन्न चित्त से बैठे, प्रवीणों की भांति योग्य बुद्धिवाला होकर अभिमान करना छोड़ दे ।

आपद्युन्मार्गगमने कार्यकालात्ययेषु च ।
अपृष्टोऽपि हितान्वेषी ब्रूयात्कल्याणभाषितम् ॥ २२३ ॥
राजा के ऊपर जब कोई आपत्ति आ पड़े अथवा वह कुपथ पर चले, या कार्य करने का समय व्यतीत हो रहा तो बिना पूछने पर भी हित चाहने वाला होकर राजा से कल्याणकारक वचन कहे ।

प्रियं तथ्यं च पथ्यं च वदेद्धर्मार्थकं वचः ।
समानवार्तया चापि तद्धितं बोधयेत्सदा ॥ २२४ ॥
हितकारी सेवक का कृत्य—और सुनने में प्रिय, सत्य तथा हितकारक, धर्म तथा अर्थ से युक्त वचन सदा राजा से कहे, और संमानयुक्त बात-चीत से या समान बातों (उदाहरणों) के द्वारा सदा राजा को हित की बात समझावे ।

कीर्तिमन्यनृपाणां वा वदेन्नीतिफलं तथा ।
दाता त्वं धार्मिकः शूरो नीतिमानसि भूपते ॥ २२५ ॥
अनीतिस्ते तु मनसि वर्तते न कदाचन ।
ये ये भ्रष्टा अनीत्या तांस्तदग्रे कीर्तयेत्सदा ॥ २२६ ॥
नृपेभ्यो ह्यधिकोऽसीति सर्वेभ्यो न विशेषयेत् ।
और समझाने के लिये अन्य राजाओं की कीर्ति और नीति का फल राजा से कहे । और यह सदा उसके आगे कहे कि—'हे महाराज ! आप दाता, धार्मिक, शूर तथा नीति के जानने वाले या तदनुसार चलनेवाले हैं । और कभी आपके मन में अनीति नहीं रहती है। एवं जो जो अनीति पर चलने से राज्य से भ्रष्ट हो गये हैं उन सबों का वर्णन सदा राजा के आगे करे। और 'आप सब राजाओं से श्रेष्ठ हैं' ऐसा विशेष रूप से न कहे ।

परार्थदेशकालज्ञो देशे काले च साधयेत् ॥ २२७ ॥

द्वितीयोऽध्यायः । ६१

परार्थनाशनं न स्यात्तथा ब्रूयात्सदेव हि ।
और देश तथा काल का जाननेवाला होकर उचित देश तथा काल होने पर दूसरे का कार्य राजा से सिद्ध करावे। और राजा से सदा ऐसा वचन कहे जिससे दूसरे का कार्य न नष्ट हो ।

न कर्षयेत्प्रजां कार्यमिषतश्च नृपः सदा ॥ २२८ ॥
अपि स्थाणुवदासीत शुष्यन्परिगतः क्षुधा ।
न त्वेवानर्थसम्पन्नां वृत्तिमीहेत पण्डितः ॥ २२६ ॥

राजा को किसी भी मिष से प्रजा को पीड़ित न करने का निर्देश—
समझदार राजा किसी निजी कार्य के व्याज से सदा प्रजा को दुःखित न करे । चाहे भूख से पीड़ित होने से सूखकर स्थाणु (खून्थे) की भांति निश्चल हो जाय फिर भी अनर्थ से भरी हुई (बुरी) जीविका को न चाहे ।

यत्कार्ये यो नियुक्तः स भूयात्तत्कार्यतत्परः ।
नान्वाधिकारमन्विच्छेन्नाभ्यसूयेच्च केनचित् ॥ २३० ॥

समझदारों को अपने २ कार्यों में नियुक्त रहने का निर्देश—
जो जिस कार्य पर नियुक्त किया गया हो वह उस कार्य के करने में तत्पर रहे। और किसी दूसरे के अधिकार छीनने की इच्छा न करे और किसी के साथ असूया (मात्सर्य) न करे ।

न न्यूनं लक्षयेत्कस्य पूरयेत स्वशक्तितः ।
परोपकरणादन्यन्न स्यान्मित्रकरं सदा ॥ २३१ ॥

किसी की त्रुटि पर ध्यान न दे बल्कि अपनी शक्ति से उसकी त्रुटि को पूर्ण करे क्योंकि दूसरे के साथ उपकार करने से बढ़कर दूसरा कोई मित्रता पैदा करनेवाला कार्य नहीं है ।

करिष्यामीति ते कार्यं न कुर्यात्कार्यलम्बनम् ।
द्राक्कुर्यात् समर्थश्चेत्साशं दीर्घं न रक्षयेत् ॥ २३२ ॥

किसी से 'मैं तुम्हारा कार्य करूंगा' ऐसा कहकर उसके कार्य करने में विलम्ब न करे । यदि स्वयं समर्थ हो तो शीघ्र कार्य को पूरा कर दे। दीर्घ काल तक उसे आशा में लटका कर न रखे ।

गुह्यं कर्म च मन्त्रं च न भर्तुः सम्प्रकाशयेत् ।
विद्वेषं च विनाशं च मनसापि न चिन्तयेत् ॥ २३३ ॥

स्वामी के गुप्त कार्य के प्रकाश करने का निषेध—
स्वामी (राजा) के गुप्त कार्य या विचार को किसी के समक्ष प्रकाशित न करे। और उसके साथ विद्वेष या उसके नाश की कल्पना मन से भी न करे ।

राजा परममित्रोऽस्ति न कामं विचरेदिति ।

६२ : शुक्रनीतिः

स्त्रीभिस्तद्वर्धिभिः पापैर्वैरिभूतैर्निराकृतैः ॥ २३४ ॥
एकार्थचर्यां साहित्यं संसर्गं च विवर्जयेत् ।
राजा को मित्र मानने का एवं उनकी स्त्री आदि के साथ सहवास का निषेध—'राजा मेरा परम मित्र है'—ऐसा समझ कर मनमाना व्यवहार न करे। और स्वामी को चाहनेवाली स्त्रियों एवं स्वामी के साथ पाप (बुरा) व्यवहार या वैरभाव रखनेवाले किंवा स्वामी से तिरस्कृत लोगों के साथ मिलकर किसी कार्य को करना या उनके साथ रहना या किसी प्रकार का संबन्ध रखना त्याग दे।

वेषभाषानुकरणं न कुर्यात्पृथिवीपतेः ॥ २३५ ॥
सम्पन्नोपि च मेधावी न स्पर्धेत च तद्गुणैः ।
**राजवेषभूषा-धारण की नकल करने का निषेध—**राजा के वेष तथा भूषा का नकल न करे। गुणों से संपन्न तथा प्रतिभाशाली होने पर भी राजा के गुणों के साथ स्पर्धा न करे अर्थात् 'मैं राजा से अधिक गुणवान् हूँ' यह न दिखावे।

रागापरागौ जानीयाद्भर्तुः कुशलकर्मवित् ॥ २३६ ॥
इङ्गिताकारचेष्टाभ्यस्तदभिप्रायतां तथा ।
त्यजेद्विरक्तं नृपतिं रक्ते वृत्तिन्तु कारयेत् ॥ २३७ ॥
**राजा की विरक्ति तथा अनुरक्ति का ज्ञान रखने एवं तदनुसार त्याग तथा ग्रहण का निर्देश—**और निपुण लोगों के कर्म को अथवा राजा के या अपने शुभ कर्म को जाननेवाला होकर स्वामी के अनुराग अथवा विरक्ति को अर्थात् किस कार्य से स्वामी प्रसन्न या अप्रसन्न होते हैं—इस बात को एवं स्वामी के इशारा, आकार (मुखमुद्रा), और चेष्टा से उनके अभिप्राय को जाने। और यदि राजा को विरक्त जाने तो उसे छोड़ दे एवं अनुराग युक्त जाने तो उसके पास रहे।

विरक्तः कारयेन्नाशं विपक्षाभ्युदयं तथा ।
आशावर्धनकं कृत्वा फलनाशं करोति च ॥ २३८ ॥
अकोपोऽपि सकोपाभः प्रसन्नोऽपि च निष्फलः ।
वाक्यञ्च समदं वक्ति वृत्तिच्छेदं करोति च ॥ २३९ ॥
खद्यते विमुखश्चैव गुणसङ्कीर्त्तने कृते ।
दृष्टिं क्षिपत्यथान्यत्र क्रियमाणे च कर्मणि ॥ २४० ॥
विरक्तलक्षणं ह्येतद्रक्तस्य लक्षणं ब्रुवे ।
**विरक्त राजा के लक्षण—**राजा जिसके ऊपर विरक्त होता है उसका नाश करता है एवं उसके शत्रुओं का अभ्युदय (तरक्की) करता है। यदि स्वामी प्रथम आशा बढ़ाकर अन्त में कार्यफल को नष्ट कर देता है।

द्वितीयोऽध्यायः
६३

और बिना कोप के भी कोपयुक्त सा दिखाई पड़ता है। प्रसन्न होते हुये भी कार्य को सफल नहीं करनेवाला होता है। और अहङ्कारयुक्त बात बोलता है, जीविका का नाश करता है। गुणों की प्रशंसा करने पर भी विमुख दिखाई पड़ता है और अन्यत्र किये जा रहे कार्य की ओर दृष्टि लगाता है किन्तु गुण-कीर्त्तन करनेवाले की ओर नहीं लगाता है तो ये सब लक्षण विरक्त के समझने चाहिये। और आगे अनुरक्त स्वामी के लक्षण कहते हैं।

दृष्ट्वा प्रसन्नो भवति वाच्यं गृह्णाति चादरात् ॥ २४१ ॥
कुशलादिपरिप्री श्नी प्रदापयति चासनम्।
विविक्तदर्शनं चास्य रहस्येनं न शङ्कते ॥ २४२ ॥
जायेत हृष्टवदनः श्रुत्वा तस्य च तत्कथाम्।
अप्रियाण्यपि चान्यानि तद्युक्तान्यभिमन्वते ॥ २४३ ॥
उपायनञ्च गृह्णाति स्तोकं सम्पादनैस्तथा।
कथान्तरेषु स्मरति प्रहृष्टवदनस्तथा ॥ २४४ ॥

**अनुरक्त राजा के लक्षण—**जो देखकर प्रसन्न होता है और आदर के साथ वचनों को ग्रहण करता है अर्थात् सुनता है। कुशलादि पूछता है, बैठने को आसन दिलाता है। और सेवक के लिये एकान्त में दर्शन देता है एवं एकान्त में भेट होने पर उससे शङ्का नहीं रखता है। और उसकी जो बातें हैं उसे सुनकर प्रसन्न-वदन दिखाई पड़ता है और सेवक से संबद्ध अप्रिय बातों एवं कार्यों को उससे अन्य मानता है अर्थात् अभिनन्दन करता है। दिये हुये उपहार को स्वीकार करता है एवं सेवक के थोड़े से कार्यों को कर देने से भी उन्हें दूसरी बातों का प्रसङ्ग होने पर भी प्रहृष्ट-वदन होकर स्मरण करता है। ये सब अनुराग रखनेवाले स्वामी के लक्षण हैं। यदि ऐसा हो तो उस स्वामी का सेवा करनी चाहिये।

तद्दत्तवस्त्रभूषादिचिह्नं सम्धारयेत्सदा।
न्यूनाधिक्यं स्वाधिकारकार्ये नित्यं निवेदयेत् ॥ २४५ ॥
तदर्थां तत्कृतां वार्त्तां शृणुयाद्वापि कीर्त्तयेत्।

**राजा से प्रदत्त भूषणादि धारण का निर्देश—**अनुरक्त स्वामी के दिये हुये वस्त्र-भूषण आदि चिह्न को सदा धारण करना चाहिये। अपने अधिकार के कार्यों में जो न्यूनाधिक्य (कमी-बेश) हो गया हो उसे नित्य स्वामी से निवेदन करना चाहिये। और स्वामी से संबद्ध तथा स्वामी की कही हुई बातों को सुने और उसका कीर्त्तन करे।

चारसूचकदोषेण त्वन्यथा यद्वदेनृपः ॥ २४६ ॥
शृणुयान्मौनमाश्रित्य तद्व्यवञ्चानुमोदयेत्।

६४शुक्रनीतिः

स्वामी के प्रति भृत्य के कर्त्तव्य—यदि जासूस अथवा चुगलखोरों के दोष (कहने) से राजा विरुद्ध वचन कहें तो उसे चुपचाप भृत्य को सुन लेना चाहिये किन्तु सत्य की भांति उसे स्वीकार नहीं करना चाहिये ।

आपद्गतं सुभर्त्तारं कदापि न परित्यजेत् ॥ २४७ ॥
और विपत्ति में पड़े हुये अच्छे स्वामी का कभी परित्याग न करना चाहिये।

एकवारमप्यशितं यस्यानं ह्मादरेण च ।
तद्विष्टं चिन्तयेन्नित्यं पालकस्याञ्जसा न किम् ॥ २४८ ॥
चाहे जिस किसी का अन्न यदि आदर के साथ एक बार भी खा लिया जाय तो उसका हित नित्य चिन्तन करना उचित होता है फिर पालन करने वाले का वस्तुतः क्या हितचिन्तन नहीं करना चाहिये अर्थात् अवश्य करना चाहिये ।

अप्रधानः प्रधानः स्यात्काले चात्यन्तसेवनात् ।
प्रधानोऽप्यप्रधानः स्यात्सेवाल्स्यादिना यतः ॥ २४६ ॥
स्वामी की समय पर अत्यन्त सेवा करने से अप्रधान (गौण) सेवक प्रधान (मुख्य) हो जाता है किन्तु सेवा में आलस्यादि करने से प्रधान भी अप्रधान सेवक हो जाता है ।

नित्यं संसेवनरतो भृत्यो राज्ञः प्रियो भवेत् ।
स्वस्वाधिकारकार्यं यद्द्वाक्कुर्यात्सुमना यतः ॥ २५० ॥
नित्य भली-भांति सेवा में तत्पर रहनेवाला भृत्य राजा का प्रिय होता है। क्योंकि भृत्य अपने २ अधिकार ( जिम्मेदारी ) का कार्य शीघ्र करता है अतः स्वामी उससे प्रसन्न रहता है ।

न कुर्यात्सहसा कार्यं नीचं राजापि नो दिशेत् ।
तत्कार्यकारकाभावे राज्ञा कार्यं सदैव हि ॥ २५१ ॥
भृत्य स्वामी का कार्य अविवेक-पूर्वक न करे अर्थात् सावधानी से करे। और राजा भी भृत्य से नीच कार्य करने के लिये न कहे किन्तु यदि उस नीच (मल-मूत्रादि उठाना रूप) कार्य का करने वाला उस समय कोई राजा के पास न हो तो उस कार्य को सदा स्वयं राजा को कर देना उचित ही है ।

काले यदुचितं कर्तुं नीचमप्युत्तमोऽर्हति ।
यस्मिन्प्रीतो भवेद्राजा तदनिष्टं न चिन्तयेत् ॥ २५२ ॥
समय पड़ने पर यदि आवश्यकता हो तो मल-मूत्रादि उठाना निकृष्ट कार्य भी उसके अयोग्य उच्च कोटि के भृत्य के लिये करना उचित ही है क्योंकि