शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
चतुर्थोऽध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६१
चतुर्थोऽध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६१
पाषाणधातुजायां तु मानदोषान् विचिन्तयेत् ।
**प्रमाण तथा दोषरहित प्रतिमा का निर्देश—**स्वयं प्रगट, चन्द्रकान्त मणि से उत्पन्न, रत्न से उत्पन्न, गण्डक नदी से उत्पन्न शालिग्राम, ये सब बाणलिङ्ग कहे जाते हैं इन सब मूर्त्तियों में पूर्वोक्त मानसम्बन्धी दोषों का विचार सर्वथा नहीं करना चाहिये । किन्तु पाषाण तथा धातु-निर्मित मूर्त्तियों में मानविषयक दोषों का विचार करना ही चाहिये ।
श्वेतपीतारक्तकृष्णपाषाणैर्युगभेदतः । ॥ १५५ ॥
प्रतिमां कल्पयेच्छिल्पी यथारुच्यपरैः स्मृता ।
**युगभेद से वर्ण भेद का कथन—**मूर्त्तिकार युगभेदानुसार श्वेत, पीत, किंचित् रक्त तथा कृष्ण वर्ण के पत्थरों से मूर्त्ति का निर्माण करे । और इनसे अन्य काष्ठ आदि से अपनी रुचि के अनुसार मूर्त्ति का बर्त्तन बनावे ।
श्वेता स्मृता सात्त्विकी तु पीता रक्ता तु राजसी ॥ १५६ ॥
तामसी कृष्णवर्णा तु युक्तलक्ष्मयुता यदि ।
**वर्णभेद से सात्त्विकी आदि प्रतिमाओं का निर्देश—**पूर्वोक्त लक्षणों से युक्त मूर्त्ति यदि श्वेत वर्ण की हो तो 'सात्त्विकी' पीत या रक्त वर्ण की हो तो 'राजसी' और कृष्ण वर्ण की हो तो 'तामसी' कहलाती है ।
सौवर्णी राजती ताम्री रैतिकी वा कृतादिषु ॥ १५७ ॥
**युगभेद से सौवर्णादि का प्रतिमा-विभाग-निर्देश—**और सत्ययुग आदि (त्रेता, द्वापर, कलि) युगों में क्रम से सुवर्ण, चांदी, तामा तथा पीतल की मूर्त्तियां बनानी चाहिये ।
शांकरी श्वेतवर्णा वा कृष्णवर्णा तु वैष्णवी ।
सूर्यशक्तिगणेशानां ताम्रवर्णा स्मृताऽपि च ॥ १५८ ॥
लौही सीसमयी वापि यथोद्दिष्टा स्मृता बुधैः ।
शंकर की मूर्त्ति श्वेत वर्ण की, विष्णु की मूर्त्ति कृष्ण वर्ण की, सूर्य, शक्ति तथा गणेश की मूर्त्ति ताम्र वर्ण की अथवा लोहा तथा सीसा की शास्त्रानुसार बनाने के लिये कही हुई है ।
चलाच्चार्यां स्थिराच्चार्यां प्रासादाद्युक्तलक्षणाम् ॥ १५६ ॥
प्रतिमां स्थापयेन्नान्यां सर्वसौख्यविनाशिनीम् ।
**अयुक्त प्रतिमा के स्थापन का निषेध—**थोड़े दिन के लिये अथवा चिर दिन के लिये पूजनार्थ प्रासाद (मन्दिर) आदि में पूर्वोक्त लक्षणों से युक्त प्रतिमा का स्थापन करना चाहिये । इससे अन्य प्रकार की मूर्त्ति की स्थापना नहीं करनी चाहिये, क्योंकि वह सब सुखों को नष्ट करनेवाली होती है ।
सेव्यसेवकभावेषु प्रतिमालक्षणं स्मृतम् ॥ १६० ॥
२६२ | शुक्रनीतिः
जहां सेव्य-सेवक भाव है अर्थात् प्रतिमा पूजा करने के लिये बनाई जाती है वहां के लिये ही प्रतिमा के उक्त लक्षण बताये गये हैं अर्थात् जहां आमोद-प्रमोद के लिये बनाई गई है वहां के लिये उक्त नियम नहीं है।
प्रतिमायाश्च ये दोषा ह्यर्चकस्य तपोबलात् ।
सर्वेश्वरचित्तस्य नाशं यान्ति क्षणात् किल ॥ १६१ ॥
**भक्त-पूजक के तपोबल से प्रतिमा-दोषों के नष्ट होने का निर्देश—**और प्रतिमा के जो उक्त दोष हैं वे हर प्रकार से ईश्वर में अनुरक्त चित्तवाले भक्त पूजनकर्त्ता के तपोबल से क्षणमात्र में नष्ट हो जाते हैं अर्थात् उनके लिये दोष नहीं घटित होते हैं।
देवतायाश्च पुरतो मण्डपे वाहनं न्यसेत् ।
द्विबाहुर्गरुडः प्रोक्तः सुचक्षुः स्वक्षिपक्षयुक् ॥ १६२ ॥
नराकृतिश्चञ्चुमुखो मुकुटी कवचाङ्गदी ।
बद्धाञ्जलिर्नम्रशीर्षः सेव्यपादाब्जलोचनः ॥ १६३ ॥
**वाहन-स्थापन तथा वाहनों के लक्षणविषयक निर्देश—**देवता की मूर्ति के आगे मण्डप में उनके वाहन की मूर्ति रखनी चाहिये। और विष्णु के वाहन गरुड की मूर्ति में दो बाहु, चोंच, दो आँख, दो पक्ष सुन्दर रीति से बनानी चाहिये। एवं मुख के स्थान पर चोंच बनाकर शेष अङ्ग मनुष्य की भांति बनाना चाहिये। और मुकुट, कवच तथा अङ्गद (बाजू बन्द) आभूषण से युक्त, अञ्जलि बांधे हुये, सिर झुकाये तथा अपने सेव्य देवता के चरण कमलों की तरफ दृष्टि किये हुये बनाना चाहिये।
वाहनत्वं गता ये ये देवतानां च पक्षिणः ।
कामरूपधरास्ते ते यथा सिंहवृषादयः ॥ १६४ ॥
देवताओं के वाहन-भाव को प्राप्त हुये जो पक्षी या सिंह तथा वृष (बैल) आदि हैं वे सब इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले हैं।
स्वनामाकृतयश्चैते कार्या दिव्या बुधैः सदा ।
सुभूषिता देवताग्रमण्डपे ध्यानतत्पराः ॥ १६५ ॥
विद्वानों को देवता के मण्डप में उनके आगे ध्यान लगाये हुये, दिव्य सुन्दर रीति से अलङ्कृत किये हुये, अपने नामानुरूप आकृतिवाले उक्त वाहन सदा बनाने चाहिये।
मार्जारकृतिकः पीतः कृष्णचिह्नो बृहद्वपुः ।
असटो व्याघ्र इत्युक्तः सिंहः सूक्ष्मकटिर्महान् ॥ १६६ ॥
बृहद्भूगण्डनेत्रस्तु भालरेखो मनोहरः ।
सटावान् धूसरोऽकृष्णलाञ्छनश्च महाबलः ॥ १६७ ॥
चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६३
जो बिल्ली के समान आकृतिवाला पीत वर्ण का, काले चिह्नों से युक्त, ह्रस्व शरीर वाला, कन्धे के बालों (जटा) से रहित पशु होता है उसे 'व्याघ्र' कहते हैं और सिंह की कमर पतली तथा शरीर भारी होता है। पूर्व भौंह, गण्डस्थल तथा नेत्र बड़े होते हैं। भाल पर रेखायें होती हैं। यह देखने में सुन्दर तथा कन्धे पर बड़े २ बालों से युक्त, धूसर वर्ण का काले चिह्नों से रहित बड़ा बलवान् पशु होता है।
भेदः सटाल्लञ्छनतो नाकृत्या व्याघ्रसिंहयोः ।
व्याघ्र तथा सिंह में केवल कन्धे पर जटा (बड़े-बड़े बाल) का तथा काले लान्छन का भेद होता है। आकार दोनों के समान ही होते हैं।
गजाननं नराकारं ध्वस्तकणं पृथूदरम् ॥ १६८ ॥
बृहत्संक्षिप्तगहन-पीनस्कन्धाङ्घ्रिपाणिनम् ।
बृहच्छुण्डं भग्नवामरदमीप्सितवाहनम् ॥ १६९ ॥
ईषत्कुटिलदण्डाग्रवामशुण्डमदक्षिणम् ।
सन्ध्यस्थिधमनीगूढं कुर्यान्मानमितं सदा ॥ १७० ॥
**गणेश की मूर्ति के लक्षण तथा अवयवों का प्रमाण—**गणेश जी की मूर्ति में मुख हाथी के समान तथा अन्य अङ्ग मनुष्य के समान बनाना चाहिये। कान—हाथी के समान लम्बा-चौड़ा, उदर—स्थूल, बृहत्, संक्षिप्त, घन और स्थूल स्कन्ध, चरण तथा हाथ बनाने चाहिये। एवम् शूंड़—लम्बी, बायाँ दांत टूटा हुआ और इच्छानुसार वाहन बनाना चाहिये। शुण्ड का दण्ड अग्रभाग में बाईं ओर कुछ मुड़ा हुआ होना चाहिये, दक्षिण ओर नहीं होना चाहिये। और सन्धि, अस्थि तथा धमनी नहीं दिखाई पड़नी चाहिये। इस भाँति शास्त्रोक्त प्रमाणानुसार सदा मूर्ति बनाना चाहिये।
सार्धचतुस्तालमितः शुण्डादण्डः समस्ततः ।
दशाङ्गुलं मस्तकं च भ्रूगण्डश्चतुरङ्गुलः ॥ १७१ ॥
सम्पूर्ण सूंड की लम्बाई साढ़े चार ताल (विस्तृत अंगूठा से मध्यमा अङ्गुलि पर्यन्त एक ताल होता है) प्रमाण, मस्तक-दश अंगुल प्रमाण, भौंह तथा गण्ड स्थल चार अंगुल प्रमाण बनाना चाहिये।
नासोत्तरोष्ठरूपा च शेषा शुण्डा सपुष्करा ।
दशाङ्गुलं कर्णदैर्घ्यं तदष्टाङ्गुलविस्तृतम् ॥ १७२ ॥
नासिका तथा ऊपर का ओष्ठ इन दोनों के स्थान पर शूंड़ ही होती है। और शूंड़ का मूल भाग उत्तरोष्ठ रूप समझना चाहिये तथा अवशिष्ट पुष्कर (शुण्ड का अग्रभाग) सहित शूंड़ का भाग समझना चाहिये। कान की लम्बाई दश अंगुल की और चौड़ाई आठ अंगुल की होनी चाहिये।
| २६४ | शुक्रनीतिः |
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कर्णयोरन्तरे व्यासो द्व्यङ्गुलस्तालसम्मितः ।
मस्तकेऽस्यैव परिधिर्ज्ञेयः षट्त्रिंशदङ्गुलः ॥ १७३ ॥
दोनों कानों के अन्तर का व्यास १ ताल २ अंगुल प्रमाण का होना चाहिये। मस्तक में इस (कान) की परिधि छत्तीस अंगुल की होनी चाहिये।
नेत्रोपान्ते च परिधिः शीर्षतुल्यः सदा मतः ।
सद्व्यङ्गुलद्वितालः स्यान्नेत्राधः परिधिः करे ॥ १७४ ॥
कराग्रे परिधिर्ज्ञेयः पुष्करे च दशाङ्गुलः ।
त्र्यङ्गुलं कण्ठदैर्घ्यं तत्परिधिस्त्रिंशदङ्गुलः ॥ १७५ ॥
दोनों नेत्रों के उपान्त भाग की परिधि सदा मस्तक के तुल्य होनी चाहिये। नेत्रों के नीचे भाग की परिधि दो ताल तथा दो अंगुल प्रमाण की होनी चाहिये। शूंढ में शूंढ का अग्रभाग तथा पुष्कर में दश अंगुल प्रमाण की परिधि होनी चाहिये। कण्ठ की लम्बाई तीन अंगुल की एवं उसकी परिधि तीस अंगुल की होनी चाहिये।
परिणाहस्तूदरे च चतुस्तालात्मकः सदा ।
षडङ्गुलो नियोक्तव्योऽष्टाङ्गुलो वापि शिल्पिभिः ॥ १७६ ॥
उदर की लम्बाई सदा छः अथवा आठ अंगुल अधिक चार ताल प्रमाण की शिल्पी (मूर्तिकार) को बनानी चाहिये।
दन्तः षडङ्गुलो दीर्घस्तन्मूलपरिधिस्तथा ।
षडङ्गुलश्चाधरोष्ठः पुष्करं कमलान्वितम् ॥ १७७ ॥
दांत की लम्बाई छः अंगुल प्रमाण तथा उसके मूल भाग की परिधि भी उसी भांति (छः अंगुल प्रमाण) की बनानी चाहिये। अधरोष्ठ छः अंगुल का तथा पुष्कर कमल से युक्त बनाना चाहिये।
ऊरुमूलस्य परिधिः षट्त्रिंशदङ्गुलो मतः ।
त्रयोविंशत्यङ्गुलः स्यादूर्वग्रपरिधिस्तथा ॥ १७८ ॥
ऊरुमूल की परिधि छत्तीस अंगुल की और ऊरुवों के अग्रभाग की परिधि तेइस अंगुल की बनानी चाहिये।
जङ्घामूले तु परिधिर्विंशत्यङ्गुलसंमितः ।
परिधिर्बाहुमूलादेरधिको द्व्यङ्गुलोऽङ्गुलः ॥ १७९ ॥
जंघामूल की परिधि बीस अंगुल की और बाहु के मूलभाग की परिधि उससे दो अंगुल अधिक (२२ अंगुल) तथा अग्रभाग की अङ्गुल भर अधिक (२१ अङ्गुल) प्रमाण की होनी चाहिये।
कर्णनेत्रान्तरं नित्यं विज्ञेयं चतुरङ्गुलम् ।
मूलमध्याग्रमान्तरं तु दशसप्तषडङ्गुलम् ॥ १८० ॥