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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् । ३६७

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् । ३६७

विगृह्य याति हि यदा सर्वाञ्छत्रुगणान् बलात् ॥ २५४ ॥
विगृह्य यानं यानज्ञैस्तदाचार्यैः प्रचक्ष्यते ।

**विगृह्ययान के दो प्रकार के लक्षण—**जब कोई राजा किसी प्रकार का विग्रह का कारण दिखाकर जबरदस्ती शत्रुगणों पर चढ़ाई कर देता है तो उसे यान के जानने वाले राजनीति के आचार्य गण ‘विगृह्ययान’ कहते हैं।

अरिमित्राणि सर्वाणि स्वमित्रैः सर्वतो बलात् ॥ २५५ ॥
विगृह्य चारिभिर्गन्तुं विगृह्य गमनं तु वा ।

अथवा किसी २ के मत से शत्रु के साथ बलपूर्वक चारो तरह से लड़वा-कर जो शत्रु पर चढ़ाई करना है वह ‘विगृह्ययान’ कहलाता है।

सन्धायान्यत्र यात्रायां पाष्णिग्राहेण शत्रुना ॥ २५६ ॥
सन्धाय गमनं प्रोक्तं तज्जिगीषोः फलार्थिनः ।

**सन्धायान के लक्षण—**विजय को चाहनेवाले राजा को विशेष फल की इच्छा रखनेवाले विद्वान-अन्यत्र किसी शत्रु पर चढ़ाई करने के समय उसके पूर्व अपने पृष्ठ भाग-स्थित पड़ोसी शत्रु राजा के साथ सन्धि करके चढ़ाई करने को 'सन्धायागमन (यान)' कहते हैं।

एको भूपो यदैकत्र सामन्तैः सांपरायिकैः ॥ २५७ ॥
शक्तिशौर्ययुतैर्यानं सम्भूय गमनं हि तत् ।

**संभूययान के लक्षण—**अकेला कोई राजा यदि शक्ति तथा शूरता से युक्त और युद्ध करने में कुशल सामन्तों के साथ एकत्र होकर किसी पर चढ़ाई करे तो 'संभूयगमन (यान)' कहते हैं।

अन्यत्र प्रस्थितः सङ्गादन्यत्रैव च गच्छति ॥ २५८ ॥
प्रसङ्गयानं तत् प्रोक्तं यानविद्भिश्च मन्त्रिभिः ।

**प्रसङ्गयानं के लक्षण—**अन्यत्र किसी पर चढ़ाई करने के लिये चल चुकने पर मार्ग में यदि प्रसङ्गवश उससे अन्यत्र चढ़ाई करने के लिये चल देवें तो उसे यानवेत्ता मन्त्रिगण 'प्रसङ्गयान' कहते हैं।

रिपुं यातस्य बलिनः सम्प्राप्य विकृतं फलम् ॥ २५९ ॥
उपेक्ष्य तस्मिन् तद्यानमुपेक्षायानमुच्यते ।

**उपेक्षायान के लक्षण—**जो शत्रु बुरे फल को पाकर स्वयं विपन्न अवस्था में पड़ गया हो उसकी यदि उपेक्षा करके उसके ऊपर चढ़ाई कर दी जाय तो उसे 'उपेक्षायान' कहते हैं।

दुर्वृत्तेऽप्यकुलीने तु बलं दातरि रज्यते ॥ २६० ॥
हृष्टं कृत्वा स्वयम्बलं पारितोष्यप्रदानतः ।
नायकः पुरतो यायात् प्रवीरपुरुषावृतः ॥ २६१ ॥

३६८शुक्रनीतिः

मध्ये कलत्रं कोशञ्च स्वामी फल्गु च यद्धनम्।
ध्वजिनीं च सदोद्युक्तः स गोपायेद्दिवानिशम्॥ २६२॥

**रास्तों में सेना को चलाने की व्यवस्था—**राजा चाहे दुर्वृत्त (दुष्ट-चरित्र वाला) या नीच कुल का भी हो, किन्तु यदि दाता हो तो सेना उस पर अनुरक्त रहती है। अतः पारितोषिक-प्रदान द्वारा अपनी सेना को प्रसन्न करके श्रेष्ठ वीर पुरुषों से घिरा हुआ, अपनी सेना के आगे २ रहकर सेनानायक शत्रु पर चढ़ाई करे। और सेना के मध्य में स्त्री, कोश (खजाना), राजा और साधारण धन को रख कर इनकी तथा अपनी सेना की रात दिन सावधानी से सेनापति रक्षा करे।

नद्यद्रिवनदुर्गेषु यत्र यत्र भयं भवेत्।
सेनापतिस्तत्र तत्र गच्छेदू व्यूहकृतैर्बलैः॥ २६३॥

**नदी-पर्वतादि में भय की संभावना होने पर व्यूह बांध कर चलने का निर्देश—**जहाँ जहाँ पर मार्ग में नदी, पर्वत, वन तथा दुर्गम स्थान आने पर भय की संभावना हो, वहाँ वहाँ पर सेनापति सेना को व्यूहाकार में रखकर चले।

यायाद् व्यूहेन महता मकरेण पुरोभये।
श्येनेनोभयपक्षेण सूच्या वा धारवक्त्रया॥ २६४॥

**मकर, श्येन व सूचीमुख व्यूहों का नाम व योजना स्थल का निर्देश—**यदि आगे से भय की संभावना होतो बड़े मगर के आकार की व्यूह-रचना कर के चले, अथवा उभय पक्षवाले श्येन (बाज) पक्षी के आकार की किंवा तीक्ष्ण मुखवाली सूची के आकार की व्यूह-रचना कर के चले।

पश्चाद्भये तु शकटं पार्श्वयोर्वज्रसंज्ञकम्।
सर्वतः सर्वतोभद्रं चक्रं व्यालमथापि वा॥ २६५॥

**शकट, वज्र, सर्वतोभद्र, चक्रव्यूह, व्यालव्यूहों का नाम-निर्देश—**पीछे से यदि शत्रु-भय हो तो 'वज्रव्यूह', चारो तरफ से भय हो तो 'सर्वतोभद्र-व्यूह', चक्रव्यूह अथवा व्यालव्यूह की रचना करे।

यथादेशं कल्पयेद्वा शत्रुसेनाविभेदकम्।
अथवा देशानुसार शत्रु की सेना को भेदन करनेवाले व्यूह की रचना करे।

व्यूहरचनसङ्केतान् वाद्यभाषासमीरितान्॥ २६६॥
स्वसैनिकैर्विना कोऽपि न जानाति तथाविधान्।

**बाजा बजाने के ढङ्ग से संकेतों के जानने का निर्देश—**और बाजा बजाने के ढङ्ग से किये गये व्यूह की रचना के संकेत ऐसे हों जिन्हें अपनी सेना के अलावा दूसरा कोई सैनिक न जानता हो।

चतुर्थोध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३६९

नियोजयेच्च मतिमान् व्यूहाज्ञानाविधान् सदा ॥ २६७ ॥
इस भाँति से बुद्धिमान सेनापति सदा नाना प्रकार के व्यूहों की रचना में सैनिकों को रक्खे ।

अश्वानां च गजानां च पदातीनां पृथक् पृथक् ।
उच्चैः संश्रावयेद् व्यूहसङ्केतान् सैनिकान्नृपः ॥ २६८ ॥
वामदक्षिणसंस्थो वा मध्यस्थो वाऽग्रसंस्थितः ।
**सैनिकों को संकेतज्ञान कराने का निर्देश—**अश्व, गज तथा पैदल सेना के सैनिकों को पृथक् २ बुलाकर व्यूह-रचना के संकेतों को राजा वाम, दक्षिण, मध्य या अग्र भाग में स्थित होकर भली भांति सुना देवे ।

श्रुत्वा तान् सैनिकैः कार्यमनुशिष्टं यथा तथा ॥ २६९ ॥
**संकेतों के अनुसार सैनिकों को कार्य करने का निर्देश—**उन संकेतों को सुनकर जैसी आज्ञा हो उसके अनुसार सैनिकों को वैसा ही करना चाहिये ।

सम्मीलनं प्रसरणं परिभ्रमणमेव च ।
आकुञ्चनं तथा यानं प्रयाणमपयानकम् ॥ २७० ॥
पर्यायेण च सांमुख्यं समुत्थानं च लुण्ठनम् ।
संस्थानं चाष्टदलवच्चक्रवद् गोलतुल्यकम् ॥ २७१ ॥
**संकेतानुसार स्थिति रखने का निर्देश—**जैसे आज्ञानुसार कभी संमिलित हो जाना, फैल जाना, चारो ओर घूम जाना, सिकुड़ जाना, धीरे २ गमन करना, जल्दी २ चलना, पीछे हट जाना, पर्याय से संमुख हो जाना, खड़े हो जाना, लोटना, अष्टदल कमल की भांति पङ्क्ति बांध कर खड़ा होना, या चक्र भांति गोलाकार में खड़ा होना सैनिकों को ये सब करना चाहिये ।

सूचीतुल्यं शकटवदर्धचन्द्रसमं तु वा ।
पृथग् भवनमल्पल्पैः पर्यायैः पङ्क्तिवेशनम् ॥ २७२ ॥
शस्त्रास्त्रयोर्धारणं च सन्धानं लक्ष्यभेदनम् ।
मोक्षणं च तथाऽस्त्राणां शस्त्राणां परिघातनम् ॥ २७३ ॥
और कभी सूची, शकट या अर्धचन्द्र के आकार का व्यूह बनाकर खड़ा रहना, पर्याय से थोडी २ सेना का अलग २ हो जाना या पंक्ति बांधकर बैठ जाना, शस्त्र तथा अस्त्रों का धारण करना, संधान करना और लक्ष्य का भेदन करना, अस्त्रों का छोड़ना, शस्त्रों का प्रहार करना, इन सबों को संकेतानुसार करना चाहिये ।

द्राक् सन्धानं पुनः पातो ग्रहो मोक्षः पुनःपुनः ।
स्वगूह्नं प्रतीघातः शस्त्रास्त्रपदविक्रमः ॥ २७४ ॥
**संकेतानुसार बाणादि चलाने आदि का निर्देश—**संकेतानुसार बाणादि को

२४ शु०

३७० | शुक्रनीतिः

शीघ्रता के साथ धनुषादि पर चढ़ाना, फिर छोड़ना, फिर ग्रहण करना और फिर छोड़ना ऐसा बार-बार करना, अपने को छिपाना, शस्त्र तथा अस्त्रों का योग्यतानुसार पैंतरा बदलते हुये प्रहार करना, इन सबों को करना चाहिये।

द्वाभ्यां त्रिभिश्चतुर्भिर्वा पङ्क्तितो गमनं ततः।
तथा प्राग् भवनं चापसरणं तूपसर्जनम् ॥ २७५ ॥

**संकेतानुसार गमनादि करने का निर्देश—**कभी दो, तीन या चार की संख्या में पंक्ति बांधकर गमन करना, आगे हो जाना, पीछे हट जाना, यथा-स्थान पर पूर्ववत् स्थित हो जाना इन सबों को संकेतानुसार करे।

अपसृत्यास्त्रासद्ध्यर्थमुपसृत्य विमोक्षणे।
प्राग् भूत्वा मोचयेदस्त्रं व्यूहस्थः सैनिकः सदा ॥ २७६ ॥

**सदा व्यूहबद्ध होकर अस्त्रादि चलाने का निर्देश—**अस्त्र चलाने की सुविधा के लिये पीछे हटकर तथा छोड़ने के लिये समीप जाकर तथा सम्मुख रहकर व्यूहबद्ध सैनिक को सदा अस्त्र चलाना चाहिये।

आसीनः स्याद्विमुक्तास्त्रः प्राग्वा चापसरेत् पुनः।
प्रागासीनं तूपसृतो दृष्ट्वा स्वास्त्रं विमोचयेत् ॥ २७७ ॥

**अस्त्र-प्रयोगादि के समय सैनिकों की स्थिति का निर्देश—**सैनिक अस्त्र छोड़ चुकने के बाद बैठ जावे अथवा आगे की ओर सरक जावे। और आगे बैठे हुये शत्रु को देखकर उसके समीप जाकर अपने अस्त्र का प्रयोग करे।

एकैकशो द्विशो वाऽपि सङ्घशो बोधितो यथा।
क्रौञ्चानां खे गतिर्यादृक् पाङ्क्तः संप्रजायते ॥ २७८ ॥
तादृक् संचारयेत् क्रौञ्चव्यूहं देशबलं यथा।
सूक्ष्मग्रीवं मध्यपुच्छं स्थूलपक्षं तु पङ्क्तितः ॥ २७९ ॥

**क्रौञ्चव्यूह के लक्षण—**संकेत किये जाने पर जैसे आकाश में उड़ने पर क्रौञ्च पक्षियों की पंक्तिबद्ध स्थिति होती है वैसी एक १, दो २ या संघरूप से पंक्तिबद्ध स्थिति में रहने के द्वारा क्रौञ्चव्यूह की रचना देश तथा सैन्य के अनुसार करे। इसमें ग्रीवा भाग पतला, पुच्छभाग मध्यम तथा दोनों पक्षों के भाग मोटे रहते हैं। इसमें ऐसी सैनिकों की पंक्ति स्थिति रहती है।

बृहत्पक्षं मध्यगलपुच्छं श्येनं मुखे तनु।

**श्येनव्यूह के लक्षण—**जिसके दोनों पक्षभाग विशाल हों और गला तथा पुच्छभाग मध्यम हो एवं मुखभाग पतला हो, ऐसी यदि सैनिकों की पंक्ति हो तो उसे 'श्येनव्यूह' कहते हैं।

चतुष्पान्मकरो दीर्घस्थूलवक्त्रद्विरोष्ठकः ॥ २८० ॥

**मकरव्यूह के लक्षण—**जिसके ४ भाग में ४ पैर हों तथा दीर्घ और मोटा

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३७१

मुख भाग हो और उसमें दो ओष्ठ भाग हों। ऐसी पंक्ति में स्थित सेना को 'मकरव्यूह' कहते हैं।

सूचीसूक्ष्ममुखो दीर्घ-समदण्डान्तरन्ध्रयुक् ।

**सूचीमुख तथा चक्रव्यूह के लक्षण—**जिसका मुखभाग सूची के समान पतला हो और मध्यभाग समान भाव से दण्डाकार लम्बा हो, तथा अन्त में स्थित मुखभाग में छिद्रयुक्त हो ऐसी सेना की पंक्ति को 'सूचीमुख' व्यूह कहते हैं।

चक्रव्यूहश्चैकमार्गो ह्यष्टधा कुण्डलीकृतः ॥ २८१ ॥

जो चक्राकार गोल हो एवं मध्य में आठ भागों में विभक्त कुंडली आकार के मार्ग बने हों एवं उसके अन्दर घुसने के लिये एक ही मार्ग हो तो ऐसी सेनापंक्ति को 'चक्रव्यूह' कहते हैं।

चतुर्दिक्ष्वष्टपरिधिः सर्वतोभद्रसंज्ञकः ।
अमार्गश्चाष्टवलयी गोलकः सर्वतोमुखः ॥ २८२ ॥

**सर्वतोभद्र व्यूह के लक्षण—**जिसके चारों दिशाओं में ८-८ रेखाकार परिधि-रूप में सेना की पंक्ति हो उसे 'सर्वतोभद्र' व्यूह कहते हैं, अथवा सभी ओर जिसके मुख हों और जो आठ वलयाकार गोल पंक्तियों से युक्त एवं घुसने के मार्ग से रहित हो उसे भी 'सर्वतोभद्र' व्यूह कहते हैं।

शकटः शकटाकारो व्यालो व्यालाकृतिः सदा ।

**शकट व व्यालव्यूह के लक्षण—**शकटाकार सेनापंक्ति को 'शकटव्यूह' एवं व्याल (सर्प) के आकार की सेनापंक्ति को 'व्यालव्यूह' कहते हैं।

सैन्यमल्पं बृहद्वाऽपि दृष्ट्वा मार्गं रणस्थलम् ॥ २८३ ॥
व्यूहैर्व्यूहेन व्यूहाभ्यां सङ्करेणापि कल्पयेत् ।

**सैन्य की न्यूनता व अधिकतानुसार एवं युद्धभूमि के अनुसार १ या २ व्यूहरचना का निर्देश—**सैन्य की न्यूनता तथा अधिकता एवं मार्ग तथा रणस्थल भूमि को देखकर तदनुसार एक व्यूह अथवा दो या दो से अधिक व्यूहों से मिश्रित व्यूह-रचना की भी कल्पना की जा सकती है।

यन्त्रास्त्रैः शत्रुसेनाया भेदो येभ्यः प्रजायते ॥ २८४ ॥
स्थलेभ्यस्तेषु सन्तिष्ठेत् ससैन्यो ह्यासनं हि तत् ।

**आसन के लक्षण व उस समय के कर्तव्य—**जिन स्थलों से शत्रुसेना के ऊपर यन्त्रयुक्त अस्त्रों (तोप आदि) के द्वारा प्रहार करके उसका भेदन किया जा सके उन स्थलों में सेना के सहित राजा के ठहरने को 'आसन' कहते हैं।

तृणान्नजलसम्भारा ये चान्ये शत्रुपोषकाः ॥ २८५ ॥
सम्यङ् निरुध्य तान् यत्नात् परितश्चिरमासनात् ।

और तृण अन्न, जल आदि सामग्री तथा और भी जो वस्तुयें शत्रु की

३७२ | शुक्रनीतिः

सेना को आराम देनेवाली हों, उन सबों को आसन में (घेरा डालकर) स्थित राजा यत्नपूर्वक बहुत दिनों तक चारो ओर से रोकता रहे अर्थात् उन्हें शत्रु तक न जाने देवे।

विच्छिन्नविविधासारं प्रक्षीणयवसेन्धनम् ॥ २८६ ॥
विगृह्यमाणप्रकृति कालेनैव वशं नयेत् ।

सन्ध्याय आसन के लक्षण— शत्रु की सेना में जाने-आने के मार्ग को रोक देने पर एवं घास तथा जलाने की लकड़ी समाप्त होने पर तथा मन्त्री आदि अधिकारी वर्गों में आपस में विग्रह उपस्थित करा दे। हो जाने या करा देने पर थोड़े ही समय में शत्रु को वश में किया जा सकता है।

अरेश्च विजिगीषोश्च विग्रहे हीयमानयोः ॥ २८७ ॥
सन्धाय यदवस्थानं सन्धायासनमुच्यते ।

जब विजयार्थी आक्रमणकारी एवं शत्रु (जिसके ऊपर आक्रमण किया जाय) दोनों लड़ते २ क्षीण बल हो जाते हैं तब उन दोनों के सन्धि करके अपने २ स्थान पर स्थित रहने को ‘सन्ध्याय आसन’ कहते हैं।

उच्छिद्यमानो बलिना निरुपायप्रतिक्रियः ॥ २८८ ॥
कुलोद्भवं सत्यमार्यमाश्रयेत बलोत्कटम् ।

आश्रय के लक्षण— जब किसी बलवान् शत्रु द्वारा राज्य उच्छिन्न कर दिया जाय या उसका अवसर आ जाय और उसके प्रतीकार का कोई उपाय न दिखाई पड़े तो राजा अत्यन्त बलवान्, कुलीन, सत्यप्रतिज्ञावाले एवं श्रेष्ठ आचरण से युक्त किसी दूसरे राजा का आश्रय लेकर शत्रु को परास्त करे।

विजिगीषोस्तु साह्यार्थाः सुहृत्सम्बन्धिबान्धवाः ॥ २८६ ॥
प्रदत्तभृतिका ह्यन्ये भूपा अंशप्रकल्पिताः ।
सैवाश्रयस्तु कथितो दुर्गाणि च महात्मभिः ॥ २६० ॥

विजय के लिये चढ़ाई करनेवाले राजा के सहायता के लिये उसके मित्र, सम्बन्धी, बान्धव तथा इनसे अन्य जीविकार्थ जागीर प्राप्त किये हुये लोग किंवा ऐसे राजा जिनके लिये विजित राज्य में से नियत भाग दे देने का निश्चय किया गया हो, ये सब उचित होते हैं अतः इनके आश्रय में चला जाना किंवा किसी सुदृढ़ दुर्ग का आश्रय लेना, इसी को विद्वानों ने 'आश्रय' कहा है।

अनिश्चितोपायकार्यः समयानुचरो नृपः ।
द्वैधीभावेन वर्तेत काकाक्षिवदलक्षितम् ॥ २६१ ॥
प्रदर्शयेदन्यत्कार्यमन्यमालम्बयेच्च वा ।

द्वैधीभाव के लक्षण— समय के अनुसार बर्त्ताव करनेवाला राजा जब तक

चतुर्थोऽध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३७३

शत्रुसंकट से बचने का कोई उपाय निश्चित न कर सके तब तक किसी को पता न चल सके ऐसा कौवे के आंख की पुतळी की तरह दोनों ओर का व्यवहार रक्खे। दिखावे में दूसरा कार्य और करने में दूसरा कार्य रक्खे। इसी को 'द्वैधीभाव' कहते हैं।

सदुपायैश्च सन्मन्त्रैः कार्यसिद्धिरथोद्यमैः ॥ २६२ ॥
भवेदल्पजनस्यापि किं पुनर्नृपतेर्नहि ।

उपाय करने से कार्य सिद्ध होने का निर्देश— जब कि तुच्छ व्यक्ति के भी अच्छे उपायों, अच्छी सलाह एवं उद्यमों के द्वारा कार्य सिद्ध होते हैं तब क्या राजाओं के कार्य उन सबों के करने से नहीं हो सकते हैं अपितु अवश्य हो सकते हैं।

उद्योगेनैव सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ॥ २९३ ॥
न हि सुप्तमृगेन्द्रस्य . निपतन्ति गजा मुखे ।

उद्योग की अवश्य कर्त्तव्यता का निर्देश— उद्योग करने से ही संपूर्ण कार्य सिद्ध होते हैं न कि केवल मनोरथ करने से क्योंकि देखा भी जाता है कि—सोये हुये व्याघ्र के मुख में बिना उद्यम के स्वयं हाथी नहीं गिर पड़ता है, अपितु उसके लिये प्रबल उद्योग करना पड़ता है तभी कार्यसिद्धि होती है।

अयोऽभेद्यमुपायेन द्रवतामुपनीयते ॥ २९४ ॥
लोकप्रसिद्धमेवैतद् वारि वह्नेर्नियामकम् ।
उपायोपगृहीतेन तेनैतत् परिशोष्यते ॥ २९५ ॥
उपायेन पदं मूर्ध्नि न्यस्यते मत्तहस्तिनाम् ।

अभेद्य (कठिन से कठिन) लोहा भी उपाय करने से पिघलाया जाता है। और लोक में यह प्रसिद्ध ही है कि जल अग्नि को बुझा देनेवाला होता है परन्तु यदि उपाय का अवलम्बन किया जाय तो वही अग्नि उल्टे जल को सुखा देनेवाली हो जाती है। उपाय से ही मतवाले हाथी के भी मस्तक पर पैर रक्खा जाता है।

उपायेषूत्तमो भेदः षड्गुणेषु समाश्रयः ॥ २६६ ॥
कार्यौ द्वौ सर्वदा तौ तु नृपेण विजिगीषुणा ।
ताभ्यां विना नैव कुर्याद् युद्धं राजा कदाचन ॥ २९७ ॥

भेद और समाश्रय की श्रेष्ठता का निर्देश— शत्रु को जीतने के लिये उपायों में सर्वोत्तम उपाय 'भेद' (फूट डालना) है तथा सन्धि आदि षड्गुणों में श्रेष्ठ 'समाश्रय' (बलवान का आश्रय) माना गया है। अतः विजय चाहने-वाला राजा सर्वदा इन दोनों को करे। इन दोनों का बिना सहारा लिये राजा किसी शत्रु के साथ कभी युद्ध न करे।

३७४ | शुक्रनीतिः

परस्परं प्रातिकूल्यं रिपुसेनपमन्त्रिणाम्।
भवेद् यथा तथा कुर्यात् तत्प्रजायाश्च तत्स्त्रियाः ॥ २९८ ॥

जिस रीति से शत्रु के सेनापति और मन्त्रियों में परस्पर अनबन हो जाय एवं शत्रु की प्रजा के साथ और रानियों के साथ किंवा सेनापति और मन्त्रियों का अपनी २ सन्तान या स्त्रियों के साथ परस्पर अनबन हो जाय उस रीति का अनुसरण राजा को करना चाहिये ।

उपायान् षड्गुणान् वीक्ष्य शत्रोः स्वस्यापि सर्वदा।
युद्धं प्राणात्यये कुर्यात् सर्वस्वहरणे सति ॥ २९९ ॥

लाचारी होने पर युद्ध करने का निर्देश— प्रथम शत्रु के तथा अपने बीच में खूब विचार कर सामादि उपायों तथा सन्धि आदि षड्गुणों में जो उचित हो उनका प्रयोग करे किन्तु जब प्राण संकट अथवा सर्वस्व का हरण उपस्थित हो जाय तब लाचारी से युद्ध करे ।

स्त्रीविप्राभ्युपपत्तौ च गोविनाशेऽपि ब्राह्मणैः ।
प्राप्ते युद्धे क्वचिन्नैव भवेदपि पराङ्मुखः ॥ ३०० ॥

स्त्री, गौ, ब्राह्मण के रक्षार्थ युद्ध न करने से हानि— स्त्री तथा ब्राह्मण के ऊपर अनुग्रह करने के लिये किंवा गौ या ब्राह्मण का विनाश उपस्थित होने पर रक्षार्थ युद्ध करने में कभी भी नहीं मुख मोड़ना चाहिये ।

युद्धमुत्सृज्य यो याति स देवैर्हन्यते भृशम्।
यदि कोई ऐसे समय में युद्ध छोड़ कर भाग जाता है तो उसका देवगण अधिक विनाश करते हैं ।

समोत्तमाधमै राजा त्वाहूतः पालयन् प्रजाः ॥ ३०१ ॥
न निवर्तेत संग्रामात् क्षात्रधर्ममनुस्मरन्।

किसी के ललकारने पर क्षत्रिय को अवश्य युद्ध करने का निर्देश— प्रजा का पालन करता हुआ राजा अपने समान या अपने से उत्तम किंवा हीन-बलवाले किसी शत्रु के ललकारने पर क्षत्रिय-धर्म का ख्याल करता हुआ उसके साथ युद्ध करने से न हटे ।

राजानं चावियोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम् ॥ ३०२ ॥
भूमिरेतौ निगिलति सर्पो बिलशयानिव ।

युद्ध से पीछे हटनेवाला राजा एवं प्रवास करने से मुख मोड़नेवाला ब्राह्मण इन दोनों को पृथ्वी उस भांति निगल जाती है जिस भांति से सर्प बिल में रहनेवाले मूसे आदि को निगल जाता है ।

ब्राह्मणस्यापि चापत्तौ क्षत्त्रधर्मेण वर्ततः ॥ ३०३ ॥
प्रशस्तं जीवितं लोके क्षत्त्रं हि ब्रह्मसंभवम्।

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३७५

आपत्काल में ब्राह्मण का क्षत्रिय धर्म करने का निर्देश— आपत्ति पड़ने पर (जीविका का अभाव होने पर) क्षत्रियोचित जीविका द्वारा जीवन धारण करते हुये ब्राह्मण का जीवित रहना भी लोक में उत्तम माना जाता है क्योंकि क्षत्रिय की उत्पत्ति ब्राह्मण से हुई है अतः ब्राह्मण के लिये क्षत्रिय कर्म करना विरुद्ध नहीं है।

अधर्मः क्षत्रियस्यैष यच्छय्यामरणं भवेत् ॥ ३०४ ॥
विसृजञ्श्लेष्मपित्तानि कृपणं परिदेवयन् ।

शय्या पर पड़े २ क्षत्रिय को मरने का निषेध— क्षत्रिय के लिये तो यही अधर्म की बात है कि— शय्या पर पड़े २ कफ तथा पित्त को शरीर से अलग करते २ और दीनों की भांति विलाप करते २ मर जाना।

अविक्षतेन देहेन प्रलयं योऽधिगच्छति ॥ ३०५ ॥
क्षत्रियो नास्य तत् कर्म प्रशंसन्ति पुराविदः ।

उक्त प्रकार से बिना छत-विक्षत हुये शरीर से जो प्राण छोड़ता है उस क्षत्रिय के इस कर्म की प्रशंसा इतिहासवेत्ता लोग नहीं करते हैं।

न गेहे मरणं शस्तं क्षत्रियाणां विना रणात् ॥ ३०६ ॥
शौण्डीराणामशौण्डीरमघमं कृपणं च यत् ।

रण छोड़ कर घर में क्षत्रिय को मरने का निषेध— रण को छोड़ कर घर में मरना क्षत्रियों के लिये अच्छा नहीं है। गर्वशाली क्षत्रियों के लिये उक्त प्रकार से दीन-हीन अवस्था में (घर पर) मरना उनके गर्व को नष्ट करनेवाला और पापजनक होता है।

रणेऽशक्नुवन् कृत्वा ज्ञातिभिः परिवारितः ॥ ३०७ ॥
शस्त्रास्त्रैः सुविनिर्भिन्नः क्षत्रियो वधमर्हति ।

युद्ध में शत्रु को न मार सकने पर बन्धुओं के साथ युद्ध में लड़ते २ मर जाने से क्षत्रियों की परम कर्त्तव्यता का निर्देश— युद्ध में शत्रुओं को यदि न मार सका तो अपने ज्ञाति-वर्ग से युक्त होकर शस्त्रास्त्रों से छत-विक्षत होकर वध को प्राप्त हो जाना क्षत्रियों के लिये उचित है।

आहवेषु मिथोऽन्योऽन्यं जिघांसन्तो महीक्षितः ॥ ३०८ ॥
युध्यमानाः परं शक्त्या स्वर्गं यान्त्यपराङ्मुखाः ।

युद्ध में पीछे पैर न हटाने तथा लड़कर मर जाने की प्रशंसा— जो क्षत्रिय राजा लोग युद्ध में परस्पर एक दूसरे पर घातक प्रहार करते हुये पूरी शक्ति से अन्त तक लड़ते हैं और पीछे पैर नहीं हटाते हुये मर जाते हैं वे सीधे स्वर्ग को जाते हैं।

भर्तुरर्थे च यः शूरो विक्रमेद्वाहिनीमुखे ॥ ३०९ ॥

३७६ | शुक्रनीतिः

भयान्न विनिवर्तेत तस्य स्वर्गो ह्यनन्तकः।
**स्वामी के निमित्त करने का फल—**जो शूर-वीर स्वामी के निमित्त सेना के आगे रहकर लड़ता हुआ पराक्रम दिखलाता है और डरकर लड़ाई से भाग नहीं जाता है बल्कि वहीं मर जाता है, उसको अनन्तकाल तक स्वर्ग मिलता है।

आहवे निहतं शूरं न शोचेत कदाचन ॥ ३१० ॥
निर्मुक्तः सर्वपापेभ्यः पूतो याति सुलोकताम् ।
**युद्ध में वीरगति पाये हुये के लिये शोक करने का निषेध—**युद्ध में मरे हुये शूर के लिये कभी शोक नहीं करना चाहिये। क्योंकि वह सब पापों से छूटकर पवित्र होने से सुन्दर लोक को चला जाता है।

वराप्सरःसहस्राणि । शूरमायोधने हतम् ॥ ३११ ॥
त्वरमाणाः प्रधावन्ति मम भर्ता भवेदिति ।
**युद्ध में शूरतापूर्वक मरने का फल—**युद्ध में शूरता के साथ लड़कर मरे हुये योद्धा के तरफ उत्तम १ हजारों अप्सरायें तेजी से दौड़ पड़ती हैं और चाहती हैं कि यह हमारा ही प्रिय स्वामी बने दूसरी का नहीं।

मुनिभिर्दीर्घतपसा प्राप्यते यत् पदं महत् ॥ ३१२ ॥
युद्धाभिमुखनिहतैः शूरैस्तद् द्रागवाप्यते ।
**युद्ध में वीरगति पाने पर मुनिदुर्लभ लोक की सुगमता से प्राप्ति का निर्देश—**मुनि लोग दीर्घकाल तक भी तपस्या के द्वारा जिस बड़े पद (लोक) को प्राप्त करते हैं, युद्ध में सम्मुख होकर लड़ने से मारे गये शूर-वीर लोग शीघ्रता से उसी (पद) को प्राप्त कर लेते हैं।

एतत्पञ्च पुण्यं च धर्मश्चैव सनातनः ॥ ३१३ ।
चत्वार आश्रमास्तस्य यो युद्धे न पलायते ।
जो युद्ध में नहीं भागता है, उसके लिये वही तप, पुण्य, सनातनधर्म तथा चारों आश्रमों के अनुकूल धर्माचरण करना होता है।

न हि शौर्यात् परं किंचित् त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥ ३१४ ॥
शूरः सर्वं पालयति शूरे सर्वं प्रतिष्ठितम् ।
**शूरता की प्रशंसा सर्वोत्तमता का निर्देश—**शूरता से बढ़कर कोई वस्तु उत्तम नहीं है, क्योंकि शूर व्यक्ति ही सब लोगों का पालन कर सकता है, और शूर में ही सब कुछ प्रतिष्ठित रहता है।

चराणामचरा अन्नमदंष्ट्रा दंष्ट्रिणामपि ॥ ३१५ ॥
अपाणयः पाणिमतामन्नं शूरस्य कातराः।
**प्राणियों के अन्न का विचार—**चर जीवों के लिये अचर (स्थावर) पदार्थ, बड़े २ दाढ़वाले जीवों के लिये बिना दाढ़वाले जीव, हाथ-पैरवाले जीवों के

चतुर्थोऽध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३७७

किये बिना हाथ का जीव और शूरों के लिये कायर पुरुष अन्न ( भक्षणीय या नाश करने योग्य) होते हैं ।

द्वाविमौ पुरुषौ लोके सूर्यमण्डलभेदिनौ ॥ ३१६ ॥
परिव्राड् योगयुक्तो यो रणे चाभिमुखं हतः ।

सूर्यमण्डल भेदन करनेवाले दो पुरुषों का निर्देश— संसार में दो ही पुरुष मरकर सूर्यमण्डल का भेदन करनेवाले कहे जाते हैं, एक योगसाधन-सम्पन्न संन्यासी दूसरा रण में संमुख लड़कर मरनेवाला शूर-वीर ।

आत्मानं गोपयेच्छक्तो वधेनाप्यात्ततायिनः ॥ ३१७ ॥
सुविप्राद्ब्राह्मणगुरोर्युद्धे श्रुतिनिदर्शनात् ।

आततायी ब्राह्मण के गुरु को मारने का निर्देश— समर्थ पुरुष युद्ध में मारने के लिये उद्यत सुन्दर विद्वान ब्राह्मण तथा गुरु का भी वध करके अपनी रक्षा करनी चाहिये क्योंकि ऐसा वेद का वचन मन्वादि स्मृतियों में मिलता है ।

आचार्या वै कारुणिकाः प्राज्ञाश्चापापदर्शिनः ॥ ३१८ ॥
नैते महाभये प्राप्ते सम्प्रष्टव्याः कथंचन ।

शत्रु द्वारा संकट आ पड़ने पर आचार्य धर्मशास्त्रियों द्वारा उपाय पूछने की निरर्थकता का निर्देश— शत्रु से महान भय उपस्थित होने पर जो दयालु, निष्पाप, पण्डित और आचार्य हैं, इन सबों से प्रतीकार का उपाय कभी नहीं पूछना चाहिये । क्योंकि इनके द्वारा उचित उपाय बताना असम्भव है ।

प्रासादेषु विचित्रेषु गोष्ठीषूपवनेषु च ॥ ३१९ ॥
कथा विचित्राः कुर्वाणाः पण्डितास्तत्र शोभना ।

चित्र-विचित्र बने हुये राजभवनों में तथा गोष्ठियों ( सभाओं ) में और उपवनों में बैठकर विचित्र २ कथाओं का वर्णन करते हुये पण्डितगण सुशोभित होते हैं ।

बहून्याश्चर्यरूपाणि कुर्वाणा जनसंसदि ॥ ३२० ॥
ईड्यास्ते चोपसन्धाने पण्डितास्तत्र शोभनाः ।

जनों की सभा में बहुत से आश्चर्यजनक कार्यों को करते हुये और तत्त्व के निर्णय करने में प्रशंसित होनेवाले जो पण्डित हैं वे वहाँ-पर शोभा प्राप्त करते हैं ।

परेषां विवरज्ञाने मनुष्यचरितेषु च ॥ ३२१ ॥
हस्त्यश्वरथचर्यासु खरोष्ट्राजाविकर्मणि ।
गोधनेषु प्रतोलीषु स्वयंवर मुखेषु च ॥ ३२२ ॥
अन्नसंस्कारदोषेषु पण्डितास्तत्र शोभनाः ।

शत्रुओं के छिद्र जानने में और मनुष्यों के चरित्र, हाथी, घोड़े और रथ के

३७८ | शुक्रनीतिः

सम्बन्धी एवं गदहा, ऊँट, बकरा, भेड़ा के सम्बन्धी कार्यों को जानने में, किला शोधन, गली, स्वयंवर आदि तथा अन्न पकाने के सम्बन्धी दोषों के जानने में जो पण्डित हैं, उनकी उन-उन विषयों में शोभा होती है । अतः इन्हीं सब बातों में पंडितों से राय लेनी चाहिये ।

पण्डितान् पृष्ठतः कृत्वा परेषां गुणवादिनः ॥ ३२३ ॥
अरेर्निश्चितगुणाञ् ज्ञात्वा न सैन्ये भङ्गशङ्कया ।
विधीयतां तथा नीतिर्यथा वध्यो भवेत् परः ॥ ३२४ ॥

जिससे शत्रु मारा जा सके ऐसी नीति पर चलने का निर्देश—शत्रुओं के गुण की प्रशंसा करनेवाले पण्डितों को पीछे करके (अर्थात् उनकी बातों पर ध्यान न देकर के) शत्रु के मनोभावों को समझकर और युद्ध में सेना नष्ट हो जायगी इसकी आशङ्का छोड़कर वैसी नीति से कार्य करना चाहिये जिससे शत्रु मारा जा सके ।

आततायित्वमापन्नो ब्राह्मणः शूद्रवत् स्मृतः ।
नाततायिवधे दोषो हन्तुर्भवति कश्चन ॥ ३२५ ॥

आततायी ब्राह्मण को शूद्रवत् जानकर मारने में दोषाभाव का निर्देश—आततायी के भाव को प्राप्त किया हुआ ब्राह्मण 'शूद्रवत्' समझा जाता है। अतः वैसे आततायी ब्राह्मण के मारने में मारनेवाले को कोई दोष नहीं होता है ।

उद्यम्य शस्त्रमायान्तं भ्रूणमप्याततायिनम् ।
निहत्य भ्रूणहा न स्यादहत्वा भ्रूणहा भवेत् ॥ ३२६ ॥

आततायी बालक को भी मारने में दोषाभाव का निर्देश—मारने के लिये शस्त्र को उठाकर आते हुये आततायी बालक को भी मारकर भ्रूणहा नहीं कहा जा सकता है बल्कि उसे नहीं मारने से वह भ्रूणहत्या का पापभागी समझा जाता है ।

उद्यतेषुमथो दृष्ट्वा ब्राह्मणं क्षत्रबन्धुवत् ।
यो हन्यात् समरे क्रुद्धं युध्यन्तमपलायितम् ॥ ३२७ ॥
ब्रह्महत्या न तस्य स्यादिति धर्मेषु निश्चयः ।

युद्ध में क्षत्रिय की भांति लड़ते हुये ब्राह्मण को मारने में दोषाभाव का निर्देश—जो युद्ध में बाणादि लिए क्रुद्ध होकर क्षत्रिय की भांति युद्ध करते हुये और पीठ न दिखाते हुये (लड़ाई से मुख नहीं मोड़ते हुए) ब्राह्मण को देख कर मार डालता है । तो उसे ब्रह्महत्या का पाप नहीं लगता है । यह धर्मशास्त्रों में निर्णीत हो चुका है ।

अपसरति यो युद्धाज्जीवितार्थी नराधमः ॥ ३२८ ॥