शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
तृतीयोऽध्यायः १४९
तृतीयोऽध्यायः १४९
बलेन बाधते सर्वानश्वादीनपि हान्यथा ॥ ६२ ॥
बलमत्त की स्थिति का वर्णन— बल के मद से मत्त पुरुष एकाएक बिना समझे-बूझे युद्ध करने में मन लगाता है, और मनके विरुद्ध चलने पर अपने बल से सबों को कष्ट पहुँचाता है यहां तक अश्वादियों को भी पीडित करता है।
मानमत्तो मन्यतेस्म तृणवच्चाखिलं जगत् ।
अनर्होपि च सर्वेभ्यस्त्वत्यर्थासनमिच्छति ॥ ६३ ॥
मानमत्त की स्थिति का वर्णन— अभिमान से मतवाला पुरुष सम्पूर्ण जगत् के लोगों को तृण के समान तुच्छ समझता है और स्वयं अयोग्य होकर भी सबों से अधिक श्रेष्ठ आसन पाने की इच्छा करता है।
मदा एतेऽवलिप्तानां सतामेते दमाः स्मृताः ।
विद्यादि से सज्जनों को विनयी बनने का निर्देश— गर्वयुक्त लोगों के लिये ही पूर्वोक्त विद्या, शौर्य आदि ये सब मद (उन्मत्त बनानेवाले) होते हैं किन्तु सज्जनों के लिये ये ही दम (विनय लानेवाले) होते हैं।
विद्यायाश्च फलं ज्ञानं विनयश्च फलं श्रियः ॥ ६४ ॥
यज्ञदाने बलफलं सद्रक्षणमुदाहृतम् ।
विद्यादिकों के फल— जैसे विद्या का फल ज्ञान और विनय है। लक्ष्मी (धन) का फल यज्ञ तथा दान करना है। बल का फल सज्जनों की रक्षा करना कहा है।
नामिताः शत्रवः शौर्यफलं च करदीकृताः ॥ ६५ ॥
शमो दमश्चार्जवं चाभिजनस्य फलं त्विदम् ।
मानस्य तु फलं चैतत्सर्वे स्वसदृशा इति ॥ ६६ ॥
शूरतादि के फलों का निर्देश— शूरता का फल शत्रुओं को सिर झुकाना तथा उनको कर देनेवाली प्रजा बनाना है। और अभिजन (कुलीनता) का फल यह है कि मनको शान्त रखना, इन्द्रियों का दमन करना एवं सरलता रखना। मान का फल तो यह है कि—सब को अपने सदृश संमान-योग्य समझना।
सुविद्यामन्त्रभैषज्यस्त्रीरत्नं दुष्कुलादपि ।
गृह्णीयात् सुप्रयत्नेन मानमुत्सृज्य साधकः ॥ ६७ ॥
सुन्दर विद्यादि को नीच से भी ग्रहण करने का निर्देश— अपने कार्य को सिद्ध करनेवाला पुरुष अपने गौरव को त्यागकर अत्यन्त प्रयत्न के साथ सुन्दर विद्या, मन्त्र, औषध तथा स्त्रीरत्न (उत्तम गुणयुक्त सुन्दर स्त्री) यदि नीच-कुलवाले के पास हो तो भी उसे ग्रहण करे।
उपेक्षेत प्रनष्टं यत्प्राप्तं यत्तदुपाहरेत् ।
१४२ शुक्रनीतिः
न बालं न स्त्रियं चातिलालयेत्ताडयेन्न च ॥ ९८ ॥
विद्याभ्यासे गृहकृत्ये तावुभौ योजयेत्क्रमात् ।
नष्टवस्तु की उपेक्षा करने का निर्देश— जो वस्तु नष्ट हो गई हो उसकी उपेक्षा कर दे और जो उपस्थित हुई हो उसे ग्रहण करे। तथा बालक या स्त्री का अत्यन्त लाड-प्यार करना या अधिक ताडन करना उचित नहीं है। बल्कि उन (बालक तथा स्त्री) को क्रम से विद्याभ्यास तथा गृह-संबन्धी कार्यों में नियुक्त करना उचित है।
परद्रव्यं क्षुद्रमपि नादत्तं स हरेदणु ॥ ९९ ॥
नोच्चारयेदघं कस्य स्त्रियं नैव च दूषयेत् ।
परद्रव्यहरणादि का निषेध— बिना दिये तुच्छ भी दूसरे के द्रव्य (वस्तु) को न ग्रहण करे और दूसरे के छोटे भी पाप को किसी से या पापकर्त्ताओं से न कहे। और किसी स्त्री को दूषित न करे या दोष न लगावे।
न ब्रूयादनृतं साक्ष्यं कृतं साक्ष्यं न लोपयेत् ॥ १०० ॥
प्राणात्ययेऽनृतं ब्रूयात् सुमहत्कार्यसाधने ।
प्राणनाशादि की संभावनामें झूठ बोलने का निर्देश— झूठी गवाही न दे और दी हुई गवाही से पलट न जावे। और जब बहुत बड़ा कार्य सिद्ध करना हो या प्राण-सङ्कट उपस्थित हो तभी झूठ बोले अन्यथा झूठ न बोले।
कन्यादात्रे तु ह्यधनं दस्यवे सधनं नरम् ॥ १०१ ॥
गुप्तं जिघांसवे नैव विज्ञातमपि दर्शयेत् ।
जानकर भी कभी कन्या देनेवाले को 'तुम्हारा यह जामाता (दामाद) दरिद्र है' तथा डाकू को 'यह धनी है' एवं मारनेवाले को 'यह यहां मारने के भय से छिपा हुआ है' ऐसा किसी भी व्यक्ति के बारे में न कहे।
जायापत्योश्च पित्रोश्च भ्रात्रोश्च स्वामिभृत्ययोः ॥ १०२ ॥
भगिन्योर्मित्रयोर्भेदं न कुर्याद् गुरुशिष्ययोः ।
स्त्री-पुरुषादि में भेद डालने का निषेध— स्त्री-पुरुष, माता-पिता, भाई-भाई, स्वामी-भृत्य, बहिन-बहिन, मित्र-मित्र, गुरु-शिष्य इन सबों के बीच परस्पर भेद न डलावे।
न मध्याद् गमनं भाषाशालिनोः स्थितयोरपि ॥ १०३ ॥
सुहृदं भ्रातरं बन्धुमुपचर्य्यात् सदात्मवत् ।
वार्त्ता करते हुये पुरुषों के बीच जाने का निषेध— और परस्पर बात-चीत करते हुये दो व्यक्तियों के बीच में से न निकले। और मित्र, भाई, बन्धु (स्वजन), इन सबों के साथ सदा अपने समान व्यवहार करना चाहिये।
गृहागतं क्षुद्रमपि यथार्हं पूजयेत् सदा ॥ १०४ ॥
तृतीयोऽध्यायः [१४३]
तदीयकुशलप्रश्नैः शक्त्या दानैर्जलादिभिः ।
अपने गृह में आये हुये किसी भी तुच्छ व्यक्ति का उसके साथ कुशल-प्रश्न पूँछने से तथा यथाशक्ति उसे जलादि देने से यथायोग्य आदर-संमान करना चाहिये ।
सपुत्रस्तु गृहे कन्यां सपुत्रां वासयेन्नहि ॥ १०५ ॥
सभर्तृकां च भगिनीमनाथे ते तु पालयेत् ।
सपुत्र के लिये सपुत्र कन्या आदि को लाकर गृह में बसाने का निषेध—
जिसके पुत्र हो वह अपने गृह में पुत्रयुक्त कन्या एवं पतियुक्त बहन को लाकर सदा के लिये न रखे क्योंकि इससे कलह होने की संभावना रहती है और यदि कन्या तथा बहन अनाथ अवस्था में हों तो अवश्य लाकर उनका पालन करना चाहिये ।
'सर्पोऽग्निर्दुर्जनो राजा जामाता भगिनीसुतः ॥ १०६ ॥
रोगः शत्रुर्नावमान्योऽप्यल्प इत्युपचारितः ।
**सर्पादि को तुच्छ समझकर अपमान करने का निषेध—**सर्प, अग्नि, दुर्जन, राजा, जामाता (दामाद), भानजा, रोग, शत्रु ये सब छोटे अर्थात् बालक या हीन हैं इस ख्याल से कभी उनका तिरस्कार या उपेक्षा नहीं करनी चाहिये ।
क्रौर्यात्तैक्ष्ण्याद् दुःस्वभावात् स्वामित्वात् पुत्रिकामयात् ॥१०७॥
स्वपूर्वजपिण्डदत्वाद् वृद्धिभीत्या उपचारयेत् ।
ऋणशेषं रोगशेषं शत्रुशेषं न रक्षयेत् ॥ १०८ ॥
**सर्पादि से संभल कर व्यवहार करने का तथा ऋणादिका समूल नाश करने का निर्देश—**किन्तु क्रूर होने से सर्प से, तीक्ष्ण होने से अग्नि से, दुष्ट स्वभाव होने से दुर्जन से, स्वामी होने से राजा से, कन्या को क्लेश पहुँचाने के भय से जामाता से, अपने पूर्वजों को पिण्ड देनेवाला होने से भानजा से, बढ़ जाने से रोग से, भय होने से शत्रु से संभल कर ऐसा व्यवहार करना चाहिये जिससे ये हानि न पहुँचा सकें। और ऋण, रोग तथा शत्रु इनका शेष नहीं रखना चाहिये अर्थात् इन्हें समूल नष्ट कर देना चाहिये ।
याचकाद्यैः प्रार्थितः सन्न तीक्ष्णं चोत्तरं वदेत् ।
तत्कार्यं तु समर्थश्चेत् कुर्याद्वा कारयीत च ॥ १०९ ॥
**याचकादि के साथ व्यवहार का प्रकार—**याचक आदि से प्रार्थना किये जाने (मांगने) पर तीक्ष्ण उत्तर नहीं देना चाहिये । और यदि सामर्थ्य हो तो स्वयं उसके कार्य को कर दे या दूसरे से करा दे ।
दातॄणां धार्मिकाणां च शूराणां कीर्तनं सदा ।
शृणुयात्तु प्रयत्नेन तच्छिद्रं नैव लक्षयेत् ॥ ११० ॥
१४४ | शुक्रनीतिः
दाता आदि की कीर्त्ति सुनने का निर्देश—दाता, धार्मिक और शूर पुरुषों का गुण-कीर्त्तन ( प्रशंसा ) सदा प्रयत्नपूर्वक सुनना चाहिये, और इन सबों के दोष की तरफ ध्यान नहीं देना चाहिये ।
काले हितमिताहारविहारी विघसाशनः ।
अदीनात्मा च सुस्वप्नः शुचिः स्यात्सर्वदा नरः ॥ १११ ॥
समय आदि पर परिमित भोजन आदि करने का निर्देश—मनुष्यों को सदा समय पर हितकर तथा उचित मात्रा के साथ आहार तथा विहार, देवादि को भोग लगाकर प्रसाद-भोजन, अकातर-स्वभाव, अच्छी तरह से सोना तथा शरीर एवं मन से पवित्र रहना । इन सब विषयों को सदा करना चाहिये ।
कुर्याद्विहारमाहारं निर्हारं विजने सदा ।
व्यवसायी सदा च स्यात् सुखं व्यायाममभ्यसेत् ॥ ११२ ॥
स्त्री-संभोगादि का एकान्त में करने का निर्देश—और सदा स्त्री-संभोग, भोजन तथा मल-मूत्रादि का त्याग एकान्त में करना चाहिये । एवं सदा उद्योग करने में निरत रहना और सुखपूर्वक व्यायाम ( कसरत ) करना चाहिये ।
अन्नं न निन्द्यात् सुस्वस्थः स्वीकुर्यात् प्रीतिभोजनम् ।
आहारं प्रवरं विद्यात् षड्रसं मधुरोत्तरम् ॥ ११३ ॥
मधुरादि षड्रस अन्न को प्रीतिपूर्वक भोजन का निर्देश—अन्न की निन्दा नहीं करनी चाहिये एवं स्वस्थ रहने पर किसी के द्वारा आमन्त्रित प्रीतिभोज में भोजन करना स्वीकार करना चाहिये । तिक्त, कटु, अम्ल, लवण, कषाय ( कसैला ), मधुर इन ६ रसों से युक्त एवं प्रधान रूप से मधुरान्न ( मिठाई ) युक्त जो भोजन होता है उसे सर्वोत्तम समझना चाहिये ।
विहारं चैव स्वस्त्रीभिर्भेश्याभिर्न कदाचन ।
नियुद्धं कुशलैः सार्धं व्यायामं नतिभिर्वरम् ॥ ११४ ॥
स्व-स्त्री के साथ विहार करने का निर्देश—और अपनी स्त्री के साथ विहार करना उचित है वेश्याओं के साथ कदापि नहीं उचित है । और निपुण ( मल्ल-विद्या में निपुण ) लोगों के साथ प्रणत होकर कुश्ती लड़ना उत्तम व्यायाम है अतः इसे करना चाहिये ।
हित्वा प्राक्पश्चिमौ यामौ निशि स्वापो वरो मतः ।
दीनान्धपङ्गुबधिरा नोपहास्याः कदाचन ॥ ११५ ॥
रात्रि में सोने के समय का एवं दीनादिक उपहास के निषेध का निर्देश—रात्रि में प्रथम तथा चतुर्थ प्रहरों को छोड़कर मध्य के द्वितीय तथा तृतीय प्रहरों में सोना उत्तम होता है । दीन, अन्धा, पङ्गु तथा बहरा ऐसे लोगों का कभी उपहास ( हंसी ) नहीं करना चाहिये ।