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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २७५

चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २७५

किये हुये जूरी ), ३. स्मृति ( धर्मशास्त्र ), ४. गणक ( गणना करनेवाला ), ५. लेखक ( लिखनेवाला ), ६. सुवर्ण, ७. अग्नि, ८. जल, ९. धन, १०. पुरुष ( कर्मचारी ), ये १० व्यवहार ( मुकद्दमा ) निर्णय करने में साधन के अङ्ग हैं।

एतद्दशाङ्गकरणं यस्यामध्यास्य पार्थिवः ॥ ३७ ॥
न्यायान् पश्येत् कृतमतिः सा सभाऽध्वरसन्निभा ।

**यज्ञतुल्य सभा के द्वितीय लक्षण का निर्देश—**इस प्रकार से परिमार्जित बुद्धिवाला राजा जिस सभा में उपर्युक्त १० साधनों का आश्रय लेकर न्याय ( मुकद्दमों ) को देखता है ( निर्णय करता है ) उसे यज्ञ-सभा के समान समझना चाहिये।

दशानामपि चैतेषां कर्म प्रोक्तं पृथक् पृथक् ॥ ३८ ॥
वक्ताऽध्यक्षो नृपः शास्ता सभ्याः कार्य्यपरीक्षकाः ।
स्मृतिर्विनिर्णयं ब्रूते जयं दानं दमं तथा ॥ ३९ ॥

**दशाङ्गों के कर्मों का पृथक् २ निर्देश—**पूर्वोक्त इन १० साधनों के कर्म भी पृथक् २ कहे हुये हैं। जैसे—१. अध्यक्ष ( अधिकारी पुरुष ) विवाद-निर्णय का प्रकाशक होता है एवं २. राजा—शासन करनेवाला, ३. सभ्यगण ( जूरीगण )—निर्णय के औचित्य की परीक्षा करनेवाले होते हैं और ४. स्मृति ( मन्वादिस्मृति )—इसके द्वारा विवाद का निर्णय, मन्त्र जप, दान तथा इन्द्रियादि-निग्रह का ज्ञान होता है।

शपथार्थे हिरण्याग्नी अम्बु तृषितक्षुब्धयोः ।
गणको गणयेदर्थं लिखेन्न्याय्यं च लेखकः ॥ ४० ॥

५-६. शपथ ग्रहण करने के लिये सोना तथा अग्नि, ७. जल—इसका प्रयोग प्यासे तथा क्रोधी के लिये होता है ८. गणक—यह विवाद की शुभा-शुभ की गणना करनेवाला होता है। ९. लेखक—न्याय-संगत विषयों का लिखनेवाला होता है।

शब्दाभिधानतत्त्वज्ञौ गणनाकुशलौ शुची ।
नानालिपिज्ञौ कर्त्तव्यौ राज्ञा गणकलेखकौ ॥ ४१ ॥

**गणक तथा लेखक के लक्षण—**शब्द तथा अर्थ के तत्त्वज्ञ, गणना करने में कुशल, निर्दोष, नाना प्रकार की लिपियों के ज्ञाता ऐसे लक्षणों से युक्त गणक तथा लेखक की नियुक्ति राजा करे।

धर्मशास्त्रानुसारेण ह्यर्थशास्त्रविवेचनम् ।
यत्राधिक्रियते स्थाने धर्माधिकरणं हि तत् ॥ ४२ ॥

**धर्माधिकरण के लक्षण का निर्देश—**जिस स्थान पर धर्मशास्त्र के अनुसार

२७६ | शुक्रनीतिः

अर्थशास्त्र की विवेचना अधिक रूप से की जाय उसे धर्माधिकरण (न्यायालय-कचहरी) कहते हैं।

व्यवहारान् दिदृक्षुस्तु ब्राह्मणैः सह पार्थिवः।
मन्त्रज्ञैर्मन्त्रिभिश्चैव विनीतः प्रविशेत् सभाम् ॥ ४३ ॥

**राजासभा में प्रवेश करने का प्रकार—**व्यवहारों (मुकदमों) को देखने की इच्छा रखने वाला राजा विनीत भाव से मन्त्रणा करने में कुशल ब्राह्मणों तथा मन्त्रियों के साथ न्यायसभा में प्रवेश करे।

धर्मासनमधिष्ठाय कार्यदर्शनमारभेत्।
पूर्वोत्तरसमो भूत्वा राजा पृच्छेद्दिवादिनौ ॥ ४४ ॥

**सभा में राजा के कृत्यों का निर्देश—**इस प्रकार से राजा धर्मासन (न्यायासन) पर बैठकर मुकदमा देखना शुरू करे। वादी-प्रतिवादी दोनों में समभाव रखकर राजा उन दोनों से प्रश्न करे।

प्रत्यहं देशदृष्टैश्च शास्त्रदृष्टैश्च हेतुभिः।
जातिजानपदान् धर्माञ्छ्रेणिधर्मांस्तथैव च ॥ ४५ ॥
समीक्ष्य कुलधर्मांश्च स्वधर्मं प्रतिपालयेत्।

**राजा को पूर्ण विचारपूर्वक सब धर्मों की रक्षा करने का निर्देश—**प्रतिदिन लोक तथा शास्त्रों में देखे गये कारणों के द्वारा जाति, देश, श्रेणि एवं कुल के धर्मों को भलीभांति देख कर राजा अपना (विचारपूर्वक मुकदमों का निर्णय करना रूप) धर्म का पालन करे।

देशजातिकुलानां च ये धर्माः प्राक् प्रवर्तिताः ॥ ४६ ॥
तथैव ते पालनीयाः प्रजा प्रक्षुभ्यतेऽन्यथा।

**देश-जाति-कुलधर्मों का पालन करने का निर्देश—**देश, जाति एवं कुल के जो धर्म जिस भांति से पहले से चले आये हों उनका उसी भांति से पालन करना चाहिये। अन्यथा अपने मनसे यदि राजा कुछ उनमें परिवर्त्तन करे तो उससे प्रजा में क्षोभ उत्पन्न हो जाता है।

उद्वह्यते दाक्षिणात्यैर्मातुलस्य सुता द्विजैः ॥ ४७ ॥
मध्यदेशे कर्मकराः शिल्पिनश्च गवाशिनः।

**देश-जाति-कुलधर्मों के उदाहरणों का निर्देश—**जैसे दक्षिण देश के ब्राह्मण लोग मामा की कन्या (ममेरी बहिन) के साथ विवाह करते हैं। मध्य देश में कर्मकर तथा शिल्पी गोमांसभक्षी होते हैं।

मत्स्यादाश्च नराः सर्वे व्यभिचाररताः स्त्रियः ॥ ४८ ॥
उत्तरे मद्यपा नार्यः स्पृश्या नृणां रजस्वलाः।

और उत्तर देश में सभी लोग मछली खानेवाले होते हैं तथा स्त्रियां

चतुर्थाऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २७७

व्यभिचार कराने वाली एवं मद्य पीनेवाली होती हैं एवं वहां के लोग रजस्वला स्त्रियों का भी स्पर्श करते हैं, जो कि निषिद्ध है ।

खशजाताः प्रगृह्णन्ति भ्रातृभार्यामभर्तृकाम् ॥ ४९ ॥
अनेन कर्मणा नैते प्रायश्चित्तदण्डार्हकाः ।

और खस जाति के लोग विधवा भाई की स्त्री के साथ विवाह करते हैं । इन सब पूर्वोक्त निषिद्ध कर्मों के करने से भी ये सब राजा के द्वारा प्रायश्चित्त तथा दण्ड के अधिकारी नहीं होते हैं ।

येषां परम्पराप्राप्ताः पूर्वजैरप्यनुष्ठिताः [॥ ५० ॥
त एव तैर्न दुष्येयुराचारान्नेतरस्य तु ।

जिन जाति, देश तथा कुलों के जो प्राचीनकाल से प्रचलित एवं उनके पूर्वजों के द्वारा सदा पालन किये जाते हुये जैसे धर्म हों उनका वैसे ही पालन करना चाहिये । अतः राजा एक दूसरे के धर्मविषयक आचारों को दूषित न करने देवें, अर्थात् जिसका जैसा आचार हो उसको वैसा करने देवें ।

परस्त्रीधनसंलुब्धा मद्यासक्तरताः कलौ ॥ ५१ ॥
विज्ञानलवदुर्दग्धाः प्रायः श्रीसंयुताश्च ये ।
तन्त्रकर्मरता वेदविमुखाः स्युः सदैव हि ॥ ५२ ॥
महादण्डेन चैतेषां कुर्यात् संशोधनं नृपः ।

कलियुग में महादण्ड के योग्यों का निर्देश— कलियुग में जो धनवान् हैं वे प्रायः करके दूसरे की स्त्री तथा धन के अधिक लोभी, मद्यपान करने में आसक्त, थोड़े ज्ञान से भी अपने को सबसे अधिक पण्डित माननेवाले, तन्त्र कर्म करने में रत एवं वेदविमुख सदा होते हैं, राजा इन सबों को महादण्ड से भलीभांति दण्डित करे ।

न्यायाम्पश्येत्तु मध्याह्ने पूर्वाह्ने स्मृतिदर्शनम् ॥ ५३ ॥

न्यायादिकों के समय का निर्देश— राजा मध्याह्नकाल में न्याय (मुकदमों) को देखे । पूर्वाह्न (दोपहर के पूर्व) में स्मृतियों को देखे ।

मनुष्यमारणे स्तेये साहसेऽत्ययिके सदा ।
न कालनियमस्तत्र सद्य एव विवेचनम् ॥ ५४ ॥

मनुष्यमारणादिकों में समय के नियम में अभाव का निर्देश— किन्तु मनुष्य के मारने पर एवं चोरी, डांका किंवा अन्य नाशजनक मुकदमों के देखने में समय का नियम नहीं है बल्कि उन सबों में तत्काल ही विचार करना उचित होता है ।

धर्मासनगतं दृष्ट्वा राजानं मन्त्रिभिः सह ।
गच्छेन्निवेद्यमानं यत् प्रविरुद्धमधर्मतः ॥ ५५ ॥

२७८ | शुक्रनीतिः

यथासत्यं चिन्तयित्वा लिखित्वा वा समाहितः।
नत्वा वा प्राञ्जलिः प्रह्वो ह्यर्थी कार्यं निवेदयेत्॥ ५६॥

**राजा के समक्ष कार्य निवेदन करने के प्रकार का निर्देश—**न्यायासन पर मन्त्रियों के साथ बैठे हुये राजा को देखकर प्रार्थी उनके पास जावे। और जाकर अधर्म से रहित जो निवेदन करना हो उसे यथार्थ रूप से विचार कर और सावधान-चित्त से उसे लिखकर नमस्कार करते हुये हाथ जोड़ कर नम्रता के साथ कार्य का निवेदन करे (दावा दाखिल करे)।

यथार्हमेनमभ्यर्च्य ब्राह्मणैः सह पार्थिवः।
सान्त्वेन प्रशमय्यादौ स्वधर्मं प्रतिपादयेत्॥ ५७॥

**अर्थी के लिये राजा के कार्यों का निर्देश—**ब्राह्मणों के साथ राजा उक्त प्रार्थी का यथायोग्य संमान कर और सर्वप्रथम सान्त्वनासूचक शब्दों से सान्त्वना देकर स्वधर्म-पालन (मुकदमा देखना) प्रारम्भ करे।

काले कार्यार्थिनं पृच्छेत् प्रणतं पुरतः स्थितम्।
किं कार्यं क्व च ते पीडा मा भैषीर्ब्रूहि मानव॥ ५८॥
केन कस्मिन् कदा कस्मात् पीडितोऽसि दुरात्मना।
एवं पृष्ट्वा स्वभावोक्तं तस्य संशृणुयाद्वचः॥ ५९॥

समयानुसार राजा विनम्रभाव से संमुख में स्थित उस कार्यार्थी (मुकदमा दायर करनेवाले) से "हे भला आदमी! तुम्हारा क्या कार्य है? क्या कष्ट है? मत डरो! मुझसे कहो! तुम्हें किस दुरात्मा ने कहाँ पर, किस समय, क्यों पीड़ा पहुँचाई है?" इस प्रकार से पूछ कर उसके स्वाभाविक रीति से कहे हुये वचन को सुने।

प्रसिद्धलिपिभाषाभिस्तदुक्तं लेखको लिखेत्।

**लेखक के कृत्यों का वर्णन—**और लेखक उसके कहे हुये वाक्यों को उस समय की लिपि और भाषा में लिखे।

अन्यदुक्तं लिखेदन्योऽर्थिप्रत्यर्थिनां वचः॥ ६०॥
चौरवत् त्रासयेद् राजा लेखकं द्रागतन्द्रितः।

**राजा को अन्यथा लेख लिखनेवाले को दण्ड देने का निर्देश—**और यदि कोई लेखक वादी-प्रतिवादी के कहे हुये वचन को जैसा वह कहता है वैसा नहीं लिखे 'अर्थात् भिन्न रीति से लिखे' तो राजा उसे अविलम्ब चोर की भांति दण्ड देने में तत्परता रक्खे।

लिखितं तादृशं सभ्या न बिब्रूयुः कदाचन॥ ६१॥
बलाद् गृह्णन्ति लिखितं दण्डयेत्तांस्तु चौरवत्।

और सभ्य (जूरी) लोग भी उक्त रीति से लिखे हुये (अन्यथा) लेख

चतुर्थोऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २७९

(बयान) का कभी भी अनुमोदन न करें। यदि वे लोग अपने अधिकार के बल से उक्त लेख का अनुमोदन करें तो राजा उन लोगों को चोर की भाँति दण्ड दे।

प्राड्विवाको नृपाभावे पृच्छेदेवं समागतम् ॥ ६२ ॥

**राजा के अभाव में प्राड्विवाक को पूछने का निर्देश—**और राजा के उपस्थित न रहने पर प्राड्विवाक (जज) न्यायालय में उपस्थित वादी से पूर्वोक्त रीति से पूछे।

वादिनौ पृच्छति प्राङ् वा विवाको विविनक्त्यतः ।
विचारयति सभ्यैर्वा धर्माऽधर्मान् विवक्ति वा ॥ ६३ ॥

**प्राड्विवाक शब्द के अर्थका निर्देश—**विचारपति (जज) को 'प्राड्विवाक' इसलिये कहते हैं कि—वह वादी-प्रतिवादी से पूछता है अतः 'प्राङ्' कहलाता है और विचार करता है अतः 'विवाक' कहलाता है अतः दोनों मिलकर 'प्राड्विवाक' सिद्ध होता है और वही विचारपति सभ्यों के साथ मिलकर धर्माधर्म का विचार करता है अथवा विशेष रूप से अपना निर्णय कहता है।

सभायां ये हिता योग्याः सभ्यास्ते चापि साधवः।

राजसभा (न्यायालय) में जो हित चाहनेवाले, कार्य करने में चतुर एवं सज्जन हों, उन्हीं को सभ्य (जूरी) बनाना चाहिये।

स्मृत्याचारव्यपेतेन मार्गेणाधर्षितः परैः ॥ ६४ ॥
आवेदयति चेद्राज्ञे व्यवहारपदं हि तत्।

**व्यवहार पद का कथन—**धर्मशास्त्र एवं सदाचार से विरुद्ध मार्ग का आश्रय लेकर दूसरों के द्वारा पीडित किये जाने पर यदि कोई राजा के पास न्यायालय में आवेदन पत्र देता है उसे 'व्यवहार पद' (मुकदमा दायर करना) का स्थान कहते हैं।

नोत्पादयेत् स्वयं कार्यं राजा नाप्यस्य पूरुषः ॥ ६५ ॥
न रागेण न लोभेन न क्रोधेन प्रसेन्नृपः।
परैरप्रापितानर्थांश्च चापि स्वमनीषया ॥ ६६ ॥

**राजा या राजपुरुष को स्वयं व्यवहार को पैदा करने का निषेध—**राजा या उसके अधिकारी पुरुष स्वयं किसी विवाद (मुकदमा) को न्यायालय में न उपस्थित करें। और राजा अनुराग, लोभ या क्रोध के वशीभूत होकर किसी को पीड़ित न करे। और वादी-प्रतिवादी के बिना उपस्थित किये राजा अपनी बुद्धि से किसी मुकदमा को न्यायालय में न उपस्थित करे।

छलानि चापराधांश्च पदानि नृपतेस्तथा।

२८०शुक्रनीतिः

स्वयमेतानि गृह्णीयान्नृपस्त्व्यावेदकैर्विना ॥ ६७ ॥
सूचकस्तोभकाभ्यां वा श्रुत्वा चैतानि तत्त्वतः ।

राजा को छलादि का बिना निवेदन किये भी ग्रहण करने का निर्देश—
किन्तु बिना किसी के द्वारा मुकदमा दायर किये ही राजा स्वयं आगे कहे जानेवाले छल, अपराध तथा राजा के पद (विवाद-स्थान) इन सबों को सूचक (जासूस) अथवा स्तोभक (मुखबिर) के द्वारा सुनने के बाद ठीक २ जानकर मुकदमा कायम करे।

शास्त्रेणानिन्दितस्त्वर्थी नापि राज्ञा प्रचोदितः ॥ ६८ ॥
आवेदयति यत्पूर्व्वं स्तोभकः स उदाहृतः ।

स्तोभक के लक्षण — जो शास्त्र से अनिन्दित हो एवं राजा के द्वारा आवेदनार्थ प्रेरित न किया गया हो किन्तु यदि वह पहले ही आकर राजा से निवेदन करता है, उस आवेदन-कर्त्ता को स्तोभक कहते हैं।

नृपेण विनियुक्तो यः परदोषानुवीक्षणे ॥ ६९ ॥
नृपं संसूचयेज्ज्ञात्वा सूचकः स उदाहृतः ।

सूचक के लक्षण— राजा के द्वारा जो दूसरे के दोषों को निरीक्षण करने के लिये नियुक्त किये जाने पर उसे जान कर राजा को सूचित करता है, वह 'सूचक' कहलाता है।

पथिभङ्गी पराच्छेपी प्राकारोपरिलङ्घकः ॥ ७० ॥
निपानस्य विनाशी च तथा चायतनस्य च ।
परिखापूरकश्चैव राजच्छिद्रप्रकाशकः ॥ ७१ ॥
अन्तःपुरं वासगृहं भाण्डागारं महानसम् ।
प्रविशत्यनियुक्तो यो भोजनं च निरीक्षते ॥ ७२ ॥
विण्मूत्रश्लेष्मवातानां क्षेप्ता कामान् नृपाग्रतः ।
पर्य्यङ्कासनबन्धी चाप्यप्रस्थानविरोधकः ॥ ७३ ॥
नृपातिरिक्तवेषश्च विधृतः प्रविशेच्च यः ।
यश्चापद्वारेण विशेद्वेलायां तथैव च ॥ ७४ ॥
शय्यासने पादुके च शयनासनारोहणे ।
राजन्यासनशयने यस्तिष्ठति समीपतः ॥ ७५ ॥
राज्ञो विद्विष्टसेवी चाप्यदत्तविहितासनः ।
अन्यवस्त्राभरणयोः स्वर्णस्य परिधायकः ॥ ७६ ॥
स्वयंग्राहेण ताम्बूलं गृहीत्वा भक्षयेत्तु यः ।
अनियुक्तप्रभाषी च नृपाक्रोशक एव च ॥ ७७ ॥
एकवासास्तथाऽभ्यक्तो मुक्तकेशोऽवगुण्ठितः ।

चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २८१

विचित्रिताङ्गः स्रग्वी च परिधानविधूनकः ॥ ७८ ॥
शिरःप्रच्छादकश्चैव छिद्रान्वेषणतत्परः ।
आसङ्गी मुक्तकेशश्च घ्राणकर्णाक्षिदर्शकः ॥ ७९ ॥
दन्तोल्लेखनकश्चैव कर्णनासाविशोधकः ।
राज्ञः समीपे पञ्चाशच्छलान्येतानि सन्ति हि ॥ ८० ॥

पञ्चाशत् (५०) छलों का वर्णन— १. मार्ग को नष्ट करनेवाला, २. दूसरे का अपमान करनेवाला, ३. प्राकार (चहार-दीवारी) का लांघनेवाला ४. पीने के लिये बने हुये जलाशय को नष्ट या दूषित करनेवाला, ५. रहने के लिये बने हुये स्थान को नष्ट या दूषित करनेवाला, ६. परिखा (खाई) को पाटनेवाला, ७. राजा के दोषों को प्रकाशित करनेवाला, ८. बिना आज्ञा लिये अन्तःपुर (जनानखाने) में घुस जानेवाला, ९. बिना आज्ञा के वासगृह (रहने का स्थान), १०. भाण्डगृह (खजाना), ११. या महानस (रसोई गृह) में घुसनेवाला, १२. भोजन करते समय खानेवाले को एकटक देखनेवाला, १३. जानबूझ कर मल, १४. मूत्र, १५. कफ १६. अधोवायु का त्याग करनेवाला, १७. राजा के आगे वीरासन बांधकर घमण्ड से बैठनेवाला, १८. राजा के बैठने के आगे के स्थान को छेकनेवाला, १९. राजा से अधिक वेष-भूषा धारण किये हुये राजा के सामने उपस्थित होनेवाला, २१. किसी के गृह में प्रधान द्वार को छोड़कर अन्य मार्ग से प्रवेश करनेवाला, २२. असमय में किसी के घर में जानेवाला, २३. बिना अनुमति के किसी की शय्या पर शयन करनेवाला २४. आसन पर बैठनेवाला, २५. या खड़ाऊं अथवा जूता पहननेवाला, २६. राजा के सोने के समय शय्या पर पहुँच जाने पर भी उनके समीप ठहरनेवाला, २७. राजा के शत्रु की भी सेवा करनेवाला, २८. बिना अनुमति के किसी के गृह में ठहर जानेवाला, २९. बिना अनुमति के किसी के वस्त्र, ३०. आभूषण, ३१. या स्वर्ण का धारण करनेवाला, ३२. जबरदस्ती दूसरे के पान को लेकर खानेवाला, ३३. भाषण के लिये नियुक्त न किये जाने पर भी भाषण करनेवाला, ३४. राजा की निन्दा करनेवाला, ३५. राजा के समीप में केवल एक वस्त्र पहननेवाला, ३६. तेल लगाकर जानेवाला, ३७. केश खोल कर जानेवाला, ३८. मुख ढँक कर जानेवाला, ३९. विचित्र ढङ्ग से अङ्गों को बनाकर जानेवाला, ४०. माला पहनकर जानेवाला, ४१. पहिने हुये वस्त्र को हिलानेवाला, ४२. सिर को ढँकनेवाला, ४३. दूसरे के छिद्रों को ढूंढ़नेवाला, ४४. मद्यपानादि व्यसन करनेवाला, ४५. वेश-भूषादि का त्याग करनेवाला, ४६. अपनी नाक, ४७. कान, ४८. या आंख को विशेष रूप से दिखानेवाला, ४९. दांत को कुरेदनेवाला,

२८२ शुक्रनीतिः

१०. कान या नाक से मल निकालनेवाला, राजा के समीप में ये ५० दुष्ट (दोष) माने जाते हैं।

आज्ञोल्लङ्घनकारित्वं स्त्रीवधो वर्णसङ्करः।
परस्त्रीगमनं चौर्यं गर्भश्चैव पतिं विना ॥ ८१ ॥
वाक्पारुष्यमवाच्याद्यं दण्डपारुष्यमेव च।
गर्भस्य पातनं चैवेत्यपराधा दशैव तु ॥ ८२ ॥

दश अपराधों का वर्णन— १. आज्ञा का उल्लङ्घन करना, २. स्त्री की हत्या करना, ३. विवाह द्वारा वर्णसङ्करता करना, ४. पर-स्त्री गमन करना, ५. चोरी करना, ६. पति के अलावा अन्य पुरुष से गर्भ होना, ७. कठोर वचन बोलना, ८. नहीं कहने योग्य बातें कहना ९. कठोर दण्ड देना, १०. गर्भ का गिराना इस प्रकार से ये १० अपराध होते हैं।

उत्कृती सस्यघाती चाप्यग्निदश्च तथैव च।
राज्ञो द्रोहप्रकर्ता च तन्मुद्राभेदकस्तथा ॥ ८३
तन्मन्त्रस्य प्रभेत्ता च बद्धस्य च विमोचकः।
अस्वामिविक्रयं दानं भागं दण्डं विचिन्वति ॥ ८४ ॥
पटहाघोषणाच्छादी द्रव्यमस्वामिकं च यत्।
राजाबलीढद्रव्यं च यच्चैवाङ्गविनाशनम् ॥ ८५ ॥
द्वाविंशतिपदान्याहुर्नृपज्ञेयानि पण्डिताः।

राजा द्वारा ज्ञेय २२ पदों का वर्णन— १. उद्वेग करनेवाला २. धान्य (खेती) नष्ट करनेवाला, ३. गृहादि में अग्नि लगानेवाला, ४. राजद्रोह करनेवाला, ५. राजचिह्न को नष्ट करनेवाला, ६. राजा की गुप्त मन्त्रणा को प्रकाशित करनेवाला, ७. कैदियों को जेल से भगानेवाला, ८. बिना स्वामी के वस्तु को बेंच देना, ९. किसी के दान, हिस्सा, और दण्ड को लुप्त करनेवाला, ९. राजा के द्वारा जिस विषय की डुग्गी पिटा दी गई हो, उसको छिपानेवाला, १०. बिना स्वामी के (लावारिस) द्रव्य को ले लेनेवाला, ११. राजा से ले लिये द्रव्य पर अधिकार जमानेवाला, १२. किसी अङ्गों को काट देना, ये पूर्वोक्त १० अपराधों के सहित २२ पद अर्थात् विवाद के स्थान कहे हुये हैं जिसे पण्डितों को जानना चाहिये।

उद्धतः क्रूरवाग्वेषो गर्वितश्चण्ड एव हि ॥ ८६ ॥
सहासनश्चाभिमानी वादी दण्डमवाप्नुयात्।

दण्ड-योग्य वादी के लक्षणों का निर्देश— जो वादी उद्धत स्वभाववाला, निष्ठुर वचन बोलनेवाला एवं निष्ठुर कार्य करने योग्य वेषवाला, गर्वी, अत्यन्त

। चतुर्थोऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २८३

क्रोधी, विचारपति (जज) के साथ १ आसन पर बैठनेवाला और अत्यन्त भागी हो तो उसे दण्ड देना चाहिये ।

अर्थिना कथितं राज्ञे तदावेदनसंज्ञकम् ॥ ८७ ॥
कथितं प्राड्विवाकादौ सा भाषाऽखिलबोधिनी ।
स पूर्वपक्षः सभ्यादिस्तं विमृश्य यथार्थतः ॥ ८८ ॥
अर्थितः पूरयेद्धीनं तत्साध्यमधिकं त्यजेत् ।
वादिनश्चिह्नितं साध्यं कृत्वा राजा विमुद्रयेत् ॥ ८९ ॥

आवेदन पत्र के लक्षण तथा सबके बोध-योग्य भाषा (बयान) का निर्देश—
वादी द्वारा जो राजा के पास आवेदन पत्र दिया जाता है, उसे 'आवेदन' (अर्जी) कहते हैं। और जो प्राड्विवाक (जज) आदि के समक्ष कहा जाता है उसे 'भाषा' (बयान) कहते हैं। जो कि सारी बातों को समझानेवाली होती है। और वही 'पूर्वपक्ष' कहा जाता है। सभ्य (जूरी) आदि उसी पर प्रार्थना किये जाने पर यथार्थ रीति से विचार कर जो कमी हो उसे वादी से पूछकर पूरा कर ले एवं जो अधिक हो उसे निकाल दे। इस भांति से उसके बयान को पूर्ण करके उस पर उसके अंगूठे का निशान लगवावे और अन्त में राजा उस पर अपनी मुहर लगा दे। वादी का यह बयान भी एक प्रकार का साध्य (गवाही) होता है।

अशोधयित्वा पक्षं ये ह्युत्तरं दापयन्ति ताम् ।
रागात्क्षोभाद्भयाद्वापि स्मृत्यर्थे बाधिकारिणः ॥ ९० ॥
सभ्यादीन् दण्डयित्वा तु ह्यधिकारात्निवर्तयेत् ।

पूर्वपक्ष को बिना शुद्ध किये उत्तर दिलानेवाले अधिकारी को अधिकार-च्युत करने का निर्देश—
जो अधिकारी पुरुष राग, क्षोभ या भय से इस प्रकार से बिना वादी के पक्ष का जांच-परताल किये ही प्रतिवादी से उत्तर दिलाते हैं ऐसा करनेवाले उन अधिकारी सभ्य (जूरी) आदि को भविष्य में ऐसा पुनः निन्दित कार्य न करने का स्मरण रखने के लिये राजा दण्डित करे एवं अधिकार-च्युत कर दे।

ग्राह्याग्राह्यं विवादं तु सुविमृश्य समाश्रयेत् ॥ ९१ ॥
सञ्जातपूर्वपक्षं तु वादिनं सन्निरोधयेत् ।
राजाज्ञया सत्पुरुषैः सत्यवाग्भिर्मनोहरैः ॥ ९२ ॥
निरालसैरिङ्गितज्ञैश्च दृढशस्त्रास्त्रधारिभिः ।

पूर्वपक्ष पूर्ण होने पर वादी को रोक देने का निर्देश—
राजा विवाद (मुकदमा) लेने योग्य है या नहीं इसका भलीभांति विचार कर यदि योग्य हो तो ले ले। और जब वादी का पूर्वपक्ष (बयान) पूरा हो जाय

२८४शुक्रनीतिः

तो आगे कहने के लिये उसे अपनी आज्ञा से सत्य बोलनेवाले, मनोहर, आलस्यशून्य, इङ्गित ( इसारे ) को समझनेवाले, दृढ स्वभावों के धारण करनेवाले ऐसे सत्पुरुषों के द्वारा रोकवा दे ।

वक्तव्येऽर्थे ह्यतिष्ठन्तमुत्क्रामन्तं च तद्वचः ॥ ६३ ॥
आसेधयेद्विवादार्थी यावदाह्वानदर्शनम् ।
प्रत्यर्थिनं तु शपथैराज्ञया वा नृपस्य च ॥ ६४ ॥

जब तक राजाज्ञा न हो तब तक प्रत्यर्थी को रोक देने का निर्देश— विवादार्थी (वादी) व्यक्ति वक्तव्य अर्थ में स्थित न होते हुये अथवा उसके वचन का अतिक्रमण करते हुये प्रतिवादी व्यक्ति को बुलाने पर आने के साथ ही सौगन्ध देकर अथवा राजाज्ञा से रोक देवे ।

स्थानासेधः कालकृतः प्रवासात् कर्मणस्तथा ।
चतुर्विधः स्यादासेधो नासिद्धस्तं विलङ्घयेत् ॥ ९५ ॥

४ प्रकार के आसेधों का वर्णन— आसेध ४ प्रकार का होता है । १. स्थानकृत, २. कालकृत, ३. प्रवासकृत तथा ४. कर्मकृत आसेध । आसिद्ध ( रोका हुआ ) आसेध ( रोक ) का उल्लङ्घन न करे ।

यस्त्विन्द्रियनिरोधेन व्याहारोच्छ्वासनादिभिः ।
आसेधयेदनासेध्यैः स दण्ड्यो न त्वतिक्रमी ॥ ९६ ॥

यदि कोई मल-मूत्रादियों के द्वारों के निरोध से, कटु वाक्यों से अथवा कठिन शासन आदि जैसे अयोग्य आसेध के प्रकारों से किसी को अर्थात् वादी या प्रतिवादी को रोके तो वह दण्डनीय होता है । किन्तु आसेध का अतिक्रमण करनेवाला नहीं दण्डनीय होता है ।

आसेधकाल आसिद्ध आसेधं योऽतिवर्तते ।
स विनेयोऽन्यथा कुर्वन्नासेद्धा दण्डभाग् भवेत् ॥ ६७ ॥

जो आसेध ( अवरोध ) के समय में अवरुद्ध होकर आसेध का उल्लङ्घन करता है वह दण्डनीय होता है और यदि आसेध करनेवाला अन्यथा रीति से आसेध करे तो वह दण्डनीय होता है ।

यस्याभियोगं कुरुते तत्त्वेनाशङ्कयाऽथवा ।
तमेवाह्वानयेद्राजा मुद्रया पुरुषेण वा ॥ ६८ ॥

जिस पर अपराध की शंका या जो अपराधी हो उसी को बुलाने के लिये राजा का निर्देश— वस्तुतः या सन्देहवश जिसके ऊपर अभियोग ( मुकदमा ) चलाया जाता है, उसी को राजा अपनी मुहर लगे हुये पत्र या राजपुरुष ( सिपाही ) द्वारा न्यायालय में बुलावे ।