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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

तृतीयोऽध्यायः | १४५

तृतीयोऽध्यायः | १४५

नाकार्ये तु मतिं कुर्याद् द्राक्स्वकार्यं प्रसाधयेत्।
उद्योगेन बलेनैव बुद्ध्या धैर्येण साहसात् ॥ ११६ ॥
पराक्रमेणार्जवेन मानमुत्सृज्य साधकः।
**कार्य-साधक के कृत्यों का वर्णन—**करने के लिये अयोग्य कार्य के विषय में बुद्धि नहीं करनी चाहिये। और अपने कार्य को सिद्ध करनेवाले के लिये उचित है कि वह मान (गौरव) छोड़कर उद्योग, बल, बुद्धि, धैर्य, साहस, पराक्रम और सरलता के द्वारा यथासंभव शीघ्र अपने कार्य को सिद्ध करे।

यदि सिद्ध्यति येनार्थः कलहेन वरस्तु सः ॥ ११७ ॥
अन्यथाऽऽयुर्धनसुहृद्यशःसुखहरः स्मृतः ।
यदि कलह करने से अपना कार्य सिद्ध हो तो वह कलह अच्छा कहलाता है अन्यथा (यदि कार्य सिद्ध न हो तो) वह कलह केवल आयु, धन, मित्र, यश तथा सुख को हरण करनेवाला कहा है।

नानिष्टं प्रवदेत् कस्मिन्न छिद्रं कस्य लक्षयेत् ॥ ११८ ॥
आज्ञाभङ्गस्तु महतां राज्ञः कार्यो न वै क्वचित्।
**दुर्वचन का एवं गुरुजनादि की आज्ञा के उल्लङ्घन का निषेध—**किसी के लिये दुर्वचन न कहे और न किसी के छिद्र (दोष) को देखे। बड़े लोगों एवं राजा की आज्ञा का कभी उल्लङ्घन न करे।

असत्कार्यनियोक्तारं गुरुं वापि प्रबोधयेत् ॥ ११९ ॥
नातिक्रामेदपि लघुं क्वचित् सत्कार्यबोधकम्।
**असत् कार्य करानेवाले गुरु को भी बोध कराने का एवं छोटे के भी समुचित बात मानने का निर्देश—**बुरे कार्य में नियुक्त करनेवाले गुरु को भी समझावे कि आपने यह अनुचित आज्ञा दी है अतः मैं नहीं करूँगा। और सत्कार्य का उपदेश करनेवाले छोटे लोगों के भी वचनों का कभी उल्लङ्घन नहीं करना चाहिये। अर्थात् उसे अवश्य करना चाहिये।

कृत्वा स्वतन्त्रां तरुणीं स्त्रियं गच्छेन्न वै क्वचित् ॥ १२० ॥
स्त्रियो मूलमनर्थस्य तरुण्यः किं परैः सह।
**तरुणी स्त्री को स्वतन्त्र छोड़ कर जाने का निषेध—**और अपनी तरुणी स्त्री को स्वतन्त्र करके (इच्छानुसार रहने की आज्ञा देकर) अन्यत्र कहीं नहीं जाना चाहिये। क्योंकि पर पुरुषों के साथ रहने से साधारण भी स्त्रियां अनर्थ का कारण होती हैं फिर तरुणी स्त्रियों के विषय में क्या कहना है अर्थात् वे सबसे अधिक अनर्थ का कारण हैं।

न प्रमाद्येन्मदद्रव्यैर्न विमुह्येत् कुसन्ततौ ॥ १२१ ॥
मद पैदा करनेवाले द्रव्यों से (भांग आदि अथवा ऐश्वर्य से) अधिक:
१० शु०

१४६ शुक्रनीतिः

मतवाला नहीं होना चाहिये। और नालायक सन्तान पर 'यह मेरा पुत्र है' ऐसी ममता नहीं करनी चाहिये ।

साध्वी भार्या पितृपत्नी माता बालः पिता स्नुषा ।
अभर्तृकाऽनपत्या या साध्वी कन्या स्वसापि च ॥ १२२ ॥
मातुलानी भ्रातृभार्या पितृमातृस्वसा तथा ।
मातामहोऽनपत्यश्च गुरुश्वशुरमातुलाः ॥ १२३ ॥
बालोऽपिता च दौहित्रो भ्राता च भगिनीसुतः ।
एतेऽवश्यं पालनीयाः प्रयत्नेन स्वशक्तितः ॥ १२४ ॥
अविभवेऽपि विभवे पितृमातृकुलं सुहृत् ।
पत्न्याः कुलं दासदासीभृत्यवर्गांश्च पोषयेत् ॥ १२५ ॥
बिकलाङ्गान् प्रव्रजितान् दीनानाथांश्च पालयेत् ।

**साध्वी भार्यादिका यत्नपूर्वक पालने का निर्देश—**सुशीला स्त्री, विमाता, माता, अविवाहिता कन्या, पिता, पुत्रवधू, बिना पति और पुत्र की कन्या या बहन, मामी, भाई की वधू, पिता की बहन (फूआ), मां की बहन (मौसी), निःसन्तान नाना, गुरु, श्वशुर या मामा, बिना पिता का पुत्र, लड़की का लड़का (नाती), भाई या भानजा इन सबों का धन न रहने पर भी यथाशक्ति यत्नपूर्वक अवश्य पालन करना चाहिये। और यदि धन हो तो पिता तथा माता के कुलवाले एवं मित्र, पत्नी के कुल (ससुराल) वाले, दास, दासी और भृत्य वर्गों का पालन-पोषण करना चाहिये और विकलाङ्ग (काने, लंगड़े आदि), संन्यासी, दीन और अनाथ लोगों का पालन करना चाहिये ।

कुटुम्बभरणार्थेषु यत्नवान्न भवेच्च यः ॥ १२६ ॥
तस्य सर्वगुणैः किन्तु जीवन्नेव मृतश्च सः ।

**जीवन्मृत पुरुषों का निर्देश—**जो कुटुम्ब-पालन के विषय में प्रयत्नशील नहीं होता है वह सर्वगुण-संपन्न होते हुये भी जीवित रहकर मरे हुये के समान है अर्थात् उसका जीवन व्यर्थ है।

न कुटुम्बं भृतं येन नाशिताः शत्रवोपि न ॥ १२७ ॥
प्राप्तं संरक्षितं नैव तस्य किं जीवितेन वै ।

जिसने कुटुम्ब का भरण-पोषण नहीं किया और शत्रुओं को नष्ट नहीं किया एवं प्राप्त वस्तु की भलीभांति रक्षा नहीं की, उसके जीने से क्या अर्थात् उसका जीवन वृथा है।

स्त्रीनिर्जितो ऋणी नित्यं सुदरिद्रश्च याचकः ॥ १२८ ॥
गुणहीनोऽर्थहीनः सन् मृता एते सजीवकाः

तृतीयोऽध्यायः [१४७]

जो स्त्रियों के वशीभूत रहनेवाला, नित्य ऋण लेनेवाला, अत्यन्त दरिद्र, मांगनेवाला, गुण से हीन और धन से रहित है, ऐसे लोग जीवित रहकर मरे हुये के तुल्य हैं।

आयुर्वित्तं गृहच्छिद्रं मन्त्रमैथुनभेषजम् ॥ १२९॥
दानमानापमानं च नवैतानि सुगोपयेत् ।

**गुप्त रखने योग्य बातों का निर्देश—**आयु, धन, गृह के दोष, मन्त्र, मैथुन, औषध, दान, मान, अपमान इन ९ विषयों को अत्यन्त गुप्त रखना चाहिये (किसी से नहीं कहना चाहिये)।

देशाटनं राजसभावेशनं शास्त्रचिन्तनम् ॥ १३०॥
वेश्यादिदर्शनं विद्वन्मैत्रीं कुर्यादतन्द्रितः ।

**देशाटनादि की कर्त्तव्यता—**आलस्यरहित होकर देशभ्रमण, राजसभा में प्रवेश, शास्त्रों का चिन्तन, वेश्या आदि का दर्शन, विद्वानों के साथ मैत्री करनी चाहिये।

अनेकाश्च तथा धर्माः पदार्थाः पशवो नराः ॥ १३१॥
देशाटनात् स्वानुभूताः प्रभवन्ति च पर्व्वताः ।

**देशाटन के लाभ—**इनमें से देशाटन करने से मनुष्यों को अनेक प्रकार के धर्म, पदार्थ, पशु, मनुष्य और पर्व्वतों का अनुभव साक्षात् प्राप्त होता है।

कीदृशा राजपुरुषा न्यायान्यायं च कीदृशम् ॥ १३२॥
मिथ्याविवादिनः के च के वै सत्यविवादिनः ।
कीदृशी व्यवहारस्य प्रवृत्तिः शास्त्रलोकतः ॥ १३३॥
सभागमनशीलस्य तद्विज्ञानं प्रजायते ।

**सभा में बैठने से लाभ का वर्णन—**सभा में प्रवेश करने से मनुष्यों को राजपुरुष किस प्रकार के होते हैं ? न्याय-अन्याय कैसा होता है ? झूठा विवाद और सच्चा विवाद उपस्थित करनेवाले कैसे होते हैं ? शास्त्र और लोक के अनुसार ऋण देने आदि रूप विवाद-विषय का कैसा निर्णय होता है ? इत्यादि विषयों का विशिष्ट ज्ञान होता है।

नाहङ्कारो च धर्मान्धः शास्त्राणां तत्त्वचिन्तनैः ॥ १३४॥
एकं शास्त्रमधीयानो न विन्द्यात् कार्य्यनिर्णयम् ।
स्याद्बह्वागमसंदर्शी व्यवहारो महानतः ॥ १३५॥
बुद्धिमानभ्यसेन्नित्यं बहुशास्त्राण्यतन्द्रितः ।

**बहुत से शास्त्रों के अध्ययन के फल—**बहुत से शास्त्रों के तत्त्वों का चिन्तन करने से अहङ्कार तथा धर्मान्धता से युक्त नहीं होना चाहिये। और एक शास्त्र का केवल अध्ययन करके किसी कार्य (तत्त्व) का निर्णय नहीं करना

१४८ | शुक्रनीतिः

चाहिये। क्योंकि बहुत शास्त्रों को जिसने अच्छी तरह से देखा है वही महान् लौकिक व्यवहार का ज्ञाता हो सकता है अतः बुद्धिमान् मनुष्य आलस्य-रहित होकर बहुत से शास्त्रों का नित्य अभ्यास करे।

तदर्थं तु गृहीत्वापि तदधीना न जायते ॥ १३६ ॥
वेश्या तथाविधा वापि वशीकर्तुं नरं क्षमा ।
नेयात् कस्य वशं तद्वत् स्वाधीनं कारयेज्जगत् ॥ १३७ ॥

**वेश्यादर्शन के फल—**जैसे वेश्या किसी मनुष्य के धन को ग्रहण करके भी उसके अधीन नहीं हो जाती है और स्वयं अधीन न होते हुये भी उस मनुष्य को अपने वश में करने के लिये समर्थ होती है किन्तु स्वयं किसी के वश में नहीं होती है, वैसे ही जगत् के लोगों को अपने अधीन बनाये किन्तु स्वयं किसी के अधीन न हो। इसे वेश्या-दर्शन का फल समझना चाहिये।

श्रुतिस्मृतिपुराणानामर्थविज्ञानमेव च ।
सहवासात्पण्डितानां बुद्धिः पण्ढा प्रजायते ॥ १३८ ॥

**पण्डितों के साथ मैत्री के फल—**पण्डितों के साथ संगति करने से श्रुति, स्मृति तथा पुराणों के अर्थों का विशेष ज्ञान तथा सत्-असत् का विचार करनेवाली पण्ढा बुद्धि होती है। यह विद्वन्मैत्री का फल है।

देवपित्रतिथिभ्योऽन्नमदत्त्वा नाश्नीयात् क्वचित् ।
आत्मार्थं यः पचेन्मोहान्नरकार्थं स जीवति ॥ १३९ ॥

**अपने लिये केवल भोजन बनाकर खाने का निषेध—**देवता, पितृगण तथा अतिथियों को बिना दिये कभी भोजन नहीं करना चाहिये, क्योंकि जो मोहवश केवल अपने लिये भोजन बनाता है और देवादि को बिना दिये भोजन करता है उसका जीवन नरक के लिये होता है।

मार्गं गुरुभ्यो बलिने व्याधिताय शवाय च ।
राज्ञे श्रेष्ठाय व्रतिने यानगाय समुत्सृजेत् ॥ १४० ॥

**गुरुजनादि के लिये मार्ग देने का निर्देश—**गुरुजन, बलवान्, रोगी, शव (मुर्दा ले जाने के लिये), राजा, माननीय व्यक्ति, व्रतधारी, वाहन (सवारी) पर चढ़े हुए, ऐसे लोगों को जाने के लिये स्वयं हटकर मार्ग दे देना चाहिये।

शकटात्पञ्चहस्तं तु दशहस्तं तु वाजिनः ।
दूरतः शतहस्तं च तिष्ठेन्नागाद् वृषाद्दश ॥ १४१ ॥

**शकटादिकों से दूर रहकर चलने का निर्देश—**बैलगाड़ी आदि से ५ हाथ, घोड़े से १० हाथ, हाथी से १०० हाथ, बैल से १० हाथ की दूरी पर रहना चाहिये।