शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
तृतीयोऽध्यायः
तृतीयोऽध्यायः
१६७
यस्य मुक्तः खलः किं वा नररूपपशुश्च सः॥ २४८ ॥
**जीवन्मुक्त, खल वा पशु के तुल्य के लक्षण—**जिसका मन पढ़ाने या पढ़ने में और देवता, गुरु, ब्राह्मण, चित्रकला आदि कला, सङ्गीत, सेवा ( नौकरी ), सरलता, स्त्री, शूरता, तपस्या या साहित्य इनमें से किसी एक में भी नहीं रमता (लगता) है वह या तो जीवन्मुक्त या खल अथवा मनुष्य रूप में पशु है।
अन्योदयासहिष्णुश्च छिद्रदर्शी विनिन्दकः।
द्रोहशीलः स्वान्तमलः प्रसन्नास्यः खलः स्मृतः॥ २४९ ॥
**खल पुरुष के लक्षण—**जो दूसरे के अभ्युदय (तरक्की) को नहीं सह सकनेवाला, दोष देखनेवाला, निन्दा करनेवाला, द्रोह रखनेवाला, मलिन हृदय-वाला, ऊपर प्रसन्नता दिखानेवाला होता है वह 'खल' कहलाता है।
एकस्यैव न पर्याप्तमस्ति यद् ब्रह्मकोशजम्।
आशया वर्द्धितस्यास्ति तस्याल्पमपि पूर्तिकृत्॥ २५० ॥
**आशाबद्ध लोगों के लिये जगत् की सम्पूर्ण वस्तु की प्राप्ति से भी कमी बोध होने का निर्देश—**ब्रह्माण्ड के अन्दर विद्यमान जितनी वस्तुयें हैं वे सभी जिसकी आशा बढ़ी हुई है ऐसे अकेले एक पुरुष की थोड़ी भी इच्छापूर्ति के लिये पर्याप्त नहीं हैं अर्थात् उनकी इच्छा की पूर्ति ब्रह्माण्ड की सारी वस्तुओं से भी नहीं हो सकती है।
करोत्यकार्यं साशोऽन्यं बोधयत्यनुमोदते।
आशा से युक्त पुरुष न करने योग्य कार्य को भी स्वयं करता है और अन्य को भी वैसे कार्य करने के लिये समझाता है तथा अनुमोदन करता है।
भवन्त्यन्योपदेशार्थं धूर्त्ताः साधुसमाः सदा॥ २५१ ॥
स्वकार्यार्थ प्रकुर्व्वन्ति ह्यकार्याणांशतं तु ते।
**धूर्त पुरुष के कर्मों का निर्देश—**धूर्त लोग दूसरे को उपदेश देने के लिये अत्यन्त साधुपुरुषों के समान आचरण करते हैं किन्तु वे ही धूर्त स्वयं अपना कार्य सिद्ध करने के लिये सैकड़ों कुकृत्यों को कर डालते हैं।
पित्रोराज्ञां पालयति सेवने च निरालसः॥ २५२ ॥
छायेव वर्तते नित्यं यतते चागमाय वै।
कुशलः सर्वविद्यासु स पुत्रः प्रीतिकारकः॥ २५३ ॥
दुःखदो विपरीतो यो दुर्गुणो धननाशकः।
**प्रीतिकारक व दुःखदायी पुत्र के लक्षण—**जो पुत्र माता-पिता की आज्ञा का पालन करता है और उनकी सेवा करने में आलस्य नहीं करता है बल्कि छाया की भाँति सदा उनका अनुगमन करता है, धन या विद्या का अर्जन करने के
| १६८ | शुक्रनीतिः |
|---|
लिये नित्य प्रयत्नशील रहता है तथा सभी विद्याओं में निपुण होता है, वही (पुत्र) माता-पिता का आनन्द बढ़ानेवाला होता है। और जो माता-पिता की आज्ञा के विपरीत व्यवहार करनेवाला, दुर्गुणों से युक्त तथा धन नष्ट करनेवाला होता है वह दुःखदायी होता है।
पत्यौ नित्यं चानुरक्ता कुशला गृहकर्मणि ॥ २५४॥
पुत्रप्रसूः सुशीला या प्रिया पत्युः सुयौवना।
प्रीति देनेवाली स्त्री के लक्षण— जो स्त्री अपने पति में नित्य अनुराग रखनेवाली, गृहकार्य में चतुर, पुत्र पैदा करनेवाली, सुशीला और सुन्दर यौवनवाली होती है, वह पति की प्यारी होती है।
पुत्रापराधान् क्षमते या पुत्रपरिपोषिणी ॥ २५५॥
सा माता प्रीतिदा नित्यं कुलटाऽन्याऽतिदुःखदा।
आनन्ददायिनी तथा दुःखदायिनी माता के लक्षण— जो माता पुत्रों के अपराधों को क्षमा करनेवाली एवं उनका परिपोषण करनेवाली है वह नित्य आनन्द देनेवाली होती है, इससे अन्य जो माता कुलटा (व्यभिचारिणी) है वह अत्यन्त दुःख देनेवाली होती है।
विद्यागमार्थं पुत्रस्य वृत्त्यर्थं यतते च यः ॥ २५६॥
पुत्रं सदा साधु शास्ति प्रीतिकृत्स पिताऽनृणी।
आनन्ददायक पिता के लक्षण— जो पिता पुत्र को विद्वान बनाने के लिये एवं उसकी स्थायी जीविका रखने के लिये प्रयत्न करता है और पुत्र को सदा अच्छी शिक्षा देता रहता है एवं अपने ऊपर किसी का ऋण नहीं रखता है वह आनन्ददायक होता है अथवा वह आनन्ददायक तथा पुत्र के ऋण से उऋण होता है।
यः साहाय्यं सदा कुर्यात् प्रतीपन्न वदेत् क्वचित् ॥ २५७॥
सत्यं हितं वक्ति याति दत्ते गृह्णाति मित्रताम्।
मित्र के लक्षण— जो व्यक्ति सदा सहायता करे और कभी प्रतिकूल बात न कहे तथा सत्य एवं हितकर वचनों का उपदेश करे और धनादि दे तथा स्वयं प्रेमवश ले भी वही मित्र बन जाता है, अर्थात् जो मित्र होते हैं उनके ये लक्षण हैं।
नीचस्यातिपरिचयो ह्यन्यगेहे सदा गतिः ॥ २५८॥
जातौ संघे प्रातिकूल्यं मानहान्यै दरिद्रता।
मानहानिकारक कार्यों का निर्देश— नीच पुरुषों के साथ अत्यन्त घनिष्ठता, दूसरे के घर बराबर जाना, जिस जाति में स्वयं हो उस (ब्राह्मणादि) जाति
तृतीयोऽध्यायः
१६६
के लोगों के अथवा जिस समूह में हो उसके साथ प्रतिकूल आचरण करना एवं दरिद्रता ये सब मानहानि करनेवाले हैं अर्थात् इन सबों के होने से मानहानि होती है ।
व्याघ्राग्निसर्पहिंस्राणां नहि सङ्घर्षणं हितम् ॥ २५९ ॥
सेवितत्वात्तु राज्ञो नैते मित्राः कस्य सन्ति किम् ।
मैंने सेवा की है यह समझकर राजादि के साथ अधिक संघर्ष रखने का निषेध—'इन सबों की मैंने सेवा की है' इस साहस से राजा, व्याघ्र, अग्नि, सर्प तथा हिंसक पुरुष इनके साथ अधिक संघर्ष रखना हितकर नहीं होता है क्योंकि ये सब राजा-व्याघ्रादि क्या किसी के मित्र होते हैं ? अर्थात् किसी के मित्र नहीं होते हैं, इनको रुष्ट होते देर नहीं लगता है ।
दौर्मनस्यं च सुहृदां सुप्राबल्यं रिपोः सदा ॥ २६० ॥
विद्वत्स्वपि च दारिद्र्यं दारिद्र्ये बह्वपत्यता ।
धनिगुणि वैद्यनृपजलहीने सदा स्थितिः ॥ २६१ ॥
दुःखाय कन्यकाऽप्येका पित्रोरपि च याचनम् ।
**दुःखकारक कार्यों का निर्देश—**मित्रों या बन्धुओं का दुःखी होकर दिल फेर लेना, शत्रुओं की सदा प्रबलता, विद्वानों की दरिद्रता, दरिद्रता की अवस्था में बहुत सन्तान होना, धनिक, गुणी, वैद्य, राजा तथा जल से रहित देश में सदा निवास करना, माता-पिता के लिये एक भी कन्या का उत्पन्न होना और किसी से मांगना ये सब दुःखकारक होते हैं ।
सुरूपः सधनः स्वामी विद्वानपि बलाधिकः ॥ २६२ ॥
न कामयेद्यथेष्टं यत् स्त्रीणां नैव सुसौख्यकृत् ।
यो यथेष्टं कामयते स्त्री तस्य वशगा भवेत् ॥ २६३ ॥
**स्त्रियों को पति के प्रेम से ही अधिक सुख मानने का निर्देश—**पति भले ही सुन्दर स्वरूप, धन तथा विद्या से युक्त एवं अधिक बलशाली हो किन्तु यदि वह यथेष्ट प्रेम न करे तो स्त्रियों के लिये सुन्दर सुखकारक नहीं होता है अर्थात् स्त्रियां स्वामी के प्रेम से ही अधिक सुख मानती हैं ।
सन्धारणाल्लालनाच्च यथा याति वशं शिशुः ।
**स्त्री वशवर्तिनी बने इसके उपाय—**जैसे गोदी में उठाकर लेने और लाड़-प्यार करने से बच्चे वश में हो जाते हैं उसी भांति जो पति जिस स्त्री का यथेष्ट प्यार करता है वह स्त्री उसके वशीभूत हो जाती है ।
कार्यं तत्साधकादींश्च तद्व्ययं सुविनिर्गमम् ॥ २६४ ॥
विचिन्त्य कुरुते ज्ञानी नान्यथा लघ्वपि क्वचित् ।
व्यवसाय में साधन, व्यय, लाभ आदि का विचारकर प्रवृत्त होने का
१७० : शुक्रनीतिः
निर्देश—जानकार व्यवसायी किसी कार्य (व्यवसाय) को आरम्भ करने के प्रथम यह कार्य कैसा है ? इसके कौन २ से साधन (उपाय) हैं ? इसमें कितना व्यय है ? इसकी निकास (खपत) कैसी है अथवा जो व्यय होगा उससे लाभ कैसा है ? इन सबों को भलीभांति विचार करके पश्चात् कार्य करता है अन्यथा बिना विचार किये कोई छोटा भी कार्य कभी नहीं करता है ।
न च व्ययाधिकं कार्यं कर्तुमीहेत पण्डितः ॥ २६५
लाभाधिक्यं यत्क्रियते स सेवेद् व्यवसायिभिः ।
मूल्यं मानं च पण्यानां याथात्म्यान्मृग्यते सदा ॥ २६६ ॥
अधिक व्ययवाले कार्यों को न करने तथा लाभवाले कार्यों को करने का निर्देश—विज्ञजन को अधिक व्यय और स्वल्प लाभवाले कार्य करने की इच्छा नहीं रखनी चाहिये । और जिसमें अधिक लाभ हो ऐसे कार्य व्यवसायियों को करना चाहिये अर्थात् इससे अन्य कम लाभवाले कार्य छोड़ देने चाहिये और सदा बेचने योग्य द्रव्यों के मूल्य तथा तौल या संख्या का यथार्थ रूप से ख्याल रखना चाहिये ।
तपःस्त्रीकृषिसेवासूपभोग्ये नापि भक्षणे ।
हितः प्रतिनिधिनित्यं कार्येऽन्ये तं नियोजयेत् ॥ २६७ ॥
तपस्यादि में प्रतिनिधि बनाने में हितकारिता के अभाव का निर्देश—तपस्या करना, स्त्री (पत्नी), कृषि (खेती), सेवा, किसी वस्तु का उपभोग करना, भोजन करना । इन सबों के लिए अपना प्रतिनिधि किसी को बनाना हितकर नहीं है अर्थात् हानि की सम्भावना है । इससे अन्य कार्यों में प्रतिनिधि की नियुक्ति ठीक होती है ।
निर्जनत्वं मधुरभुग् जारश्चोरः सदेच्छति ।
साहाय्यं तु बलिद्विष्टं वेश्या धनिकमित्रताम् ॥ २६८ ॥
कुनृपश्च छलं नित्यं स्वामिद्रव्यं कुसेवकः ।
तत्त्वं तु ज्ञानवान् दम्भं तपोऽग्निं देवजीवकः ॥ २६९ ॥
मधुरभोजी आदिको निर्जनता आदि की इच्छा रखने का निर्देश—मिठाई खानेवाला, स्त्री-लम्पट (व्यभिचारी), चोर ये सब सदा निर्जनता (एकान्त जहां पर कोई दूसरा न रहे) चाहते हैं । बली शत्रु से आक्रान्त हुआ पुरुष सहायता की, वेश्या-धनियों के साथ मित्रता की, दुष्ट राजा-छल की, दुष्ट नौकर स्वामी के धन की, ज्ञानी पुरुष तत्त्व जानने की, पुजारी (वेतन लेकर देवपूजा करनेवाला), दम्भ (पाखण्ड), तप और अग्नि की नित्य इच्छा करते हैं ।
योग्या कान्तं च कुलटा जारं वैद्यं च व्याधितः ।
घृतपण्यो महार्घत्वं दानशीलं तु याचकः ॥ २७० ॥