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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

तृतीयोऽध्यायः १६३

तृतीयोऽध्यायः १६३

भावना मनमें करते रहना चाहिये। अर्थात् अपने को सबसे बड़ा नहीं समझना चाहिये।

नेच्छेत् स्वाम्यं तु देवेषु गोषु च ब्राह्मणेषु च ॥ २२४ ॥
महानर्थकरं ह्येतत् समग्रकुलनाशनम् ।

देवादिकों के ऊपर प्रभुत्व रखने की इच्छा का निषेध— देवता, गौ और ब्राह्मण इन तीनों पर प्रभुत्व रखने की इच्छा नहीं रखनी चाहिये। क्योंकि ऐसी इच्छा करना महान अनर्थ तथा समग्रकुल का विनाश करनेवाला होता है।

भजनं पूजनं सेवामिच्छेदेतेषु सर्वदा ॥ २२५ ॥
न ज्ञायते ब्रह्मतेजः कस्मिन्कीदृक्प्रतिष्ठितम् ।

देवादिकों के तिरस्कार का निषेध— अतः इन सबों (देवादिकों) की भजन, पूजन तथा सेवा करने की सर्वदा इच्छा रखनी चाहिये। क्योंकि न जाने इन सबों के बीच किसमें कैसा ब्रह्मतेज (ईश्वरीय तेज) उपस्थित है। इनका तिरस्कार कभी उचित नहीं है।

पराधीनं नैव कुर्यात्तरुणीधनपुस्तकम् ॥ २२६ ॥
कृतं चेल्लभ्यते दैवाद् भ्रष्टं नष्टं विमर्दितम् ।

तरुणी आदि को पराधीन करने का निषेध— अपनी तरुणी स्त्री, धन या पुस्तक को किसी दूसरे के अधीन नहीं कर देना चाहिये। यदि कर दिया जाय तो दैवात् जब उनकी पुनः प्राप्ति होती है तो तरुणी स्त्री संभोग के द्वारा भ्रष्ट की हुई, धन नष्ट हुआ एवं पुस्तक फटी या मैली की हुई रहती है।

बह्वर्थं न त्यजेदल्पहेतुनाऽल्पं न साधयेत् ॥ २२७ ॥
बह्वर्थव्ययतो धीमानभिमानेन वै क्वचित् ।
बह्वर्थव्ययभीत्या तु सत्कीर्तिं न त्यजेत् सदा ॥ २२८ ॥

अल्प कारण से बड़े अर्थ का एवं अधिक धन-व्यय होने से कीर्ति के त्याग का निषेध— बुद्धिमान व्यक्ति थोड़े से कार्य के लिये बहुत धन की प्राप्ति का त्याग न करे और अभिमान से कभी छोटे कार्य को सिद्ध करने के लिये अधिक धन का व्यय व्यर्थ न करे अर्थात् थोड़े व्यय से करे। और सदा 'बहुत धन का व्यय होगा' इस भय से सत्कीर्ति की प्राप्ति का त्याग न करे।

भटानामसदुक्त्या तु नेर्ष्येत् कुप्यान्न तैः सह ।

वीर सैनिकों के दुर्वचन सहने का निर्देश— वीर सैनिकों के दुर्वचन कहने पर उनसे ईर्ष्या (द्वेष) अथवा क्रोध न करे। किन्तु सहन ही करे।

लज्ज्यते च सुहृद्येन भिद्यते दुमना भवेत् ॥ २२६ ॥
वक्तव्यं न तथा किंचिद्विनोदेऽपि च धीमता ।

१६४शुक्रनीतिः

विनोद में भी दुखी करनेवाले वचन बोलने का निषेध—जिस वचन से मित्र लज्जित हो जाय या उसके मनमें फर्क पड़ जाय किंवा दुःखित चित्त हो जाय, वैसे वचनों को विनोद में भी बुद्धिमान व्यक्ति को थोड़ा भी नहीं कहना चाहिये ।

यस्मिन् सूक्तं दुरुक्तं च समं स्याद्वा निरर्थकम् ॥ २३० ॥
न तत्र प्रलपेत् प्राज्ञो वधिरेष्विव गायनः ।

अच्छा-बुरा कहने का असर न होने वाले से कुछ भी न कहने का निर्देश—जिस व्यक्ति के सामने अच्छा या बुरा कहना दोनों ही यदि बराबर या निरर्थक हो तो उसके समक्ष बुद्धिमान व्यक्ति प्रलाप ( व्यर्थ बात ) न करे क्योंकि उसका बात करना बहरे के सामने गाने के समान है ।

व्यसने सज्जमानं हि यो मित्रं नाभिपद्यते ॥ २३१ ॥
अनुनीय यथाशक्ति तं नृशंसं विदुर्बुधाः ।

बुरे व्यसनों से अलग न करनेवाले मित्र की नृशंसता का निर्देश—जो लोग द्यूत आदि बुरे व्यसनों में पड़े हुये अपने मित्र को यथाशक्ति समझा बुझाकर उससे अलग नहीं करते हैं अथवा उसके लिये यत्न नहीं करते हैं उन्हें पण्डित लोग नृशंस ( निष्ठुर ) समझते हैं ।

ज्ञातीनां हि मिथो भेदे यन्मित्रं नाभिपद्यते ॥ २३२ ॥
सर्वयत्नेन माध्यस्थ्यं न तन्मित्रं विदुर्बुधाः ।

कुमित्र के लक्षण—भाई आदियों का परस्पर भेद होने पर (दिल में फर्क आ जाने पर ) यदि कोई मित्र होकर भी उन लोगों का मध्यस्थ बनकर मनमुटाव नहीं दूर करता है तो उस ( मित्र ) को पण्डित लोग मित्र नहीं मानते हैं अर्थात् उसे कुमित्र मानते हैं ।

आजन्मसेवितं दानैर्मानैश्च परितोषितम् ॥ २३३ ॥
तीक्ष्णवाक्यानमित्रमपि तत्कालं याति शत्रुताम् ।
वक्रोक्तिशल्यमुद्धर्तुं न शक्यं मानसं यतः ॥ २३४ ॥

कठोर वचन से मित्र के शत्रु बन जाने का निर्देश—जिसकी जन्म से ही सेवा की गई हो और दान तथा मान से पोषण किया गया हो ऐसा मित्र भी तीक्ष्ण वाक्यों के कहने से तत्काल ही शत्रु बन जाता है क्योंकि चित्त में चुभे हुये कटु-वचनरूपी कांटों को निकालफर दूर करने में वह समर्थ नहीं होता है। अतः मित्रों को भी तीक्ष्ण बातें नहीं सुनानी चाहिये ।

वहेदमित्रं स्कन्धेन यावत्स्यात् स्वबलाधिकः ।
ज्ञात्वा नष्टबलं तं तु भिन्द्याद् घटमिवाश्मनि ॥ २३५ ॥

स्वबलाधिक शत्रु को कन्धे पर भी ले चलने का निर्देश—जब तक शत्रु

तृतीयोऽध्यायः

१६५

अपने से बल में अधिक रहे तब तक उसे कन्धे पर रखे अर्थात् उसका आदर करे और जब समझ ले कि वह हीनबल हो गया तब उसे घड़े के समान पत्थर पर पटक कर नष्ट कर दे ।

न भूषयत्यलंकारो न राज्यं न च पौरुषम् ।
न विद्या न धनं तादृग् यादृक्सौजन्यभूषणम् ॥ २३६ ॥

'मनुष्य का भूषण सुजनता है' इसका निर्देश— जैसा सुजनतारूपी भूषण मनुष्य को भूषित करता है वैसा अलङ्कार, राज्य, पौरुष (पराक्रम), विद्या या धन नहीं भूषित करता है ।

अश्वे जवो वृषे धैर्य्यं मणौ कान्तिः क्षमा नृपे ।
हावभावौ च वेश्यायां गायके मधुरस्वरः ॥ २३७ ॥
दातृत्वं धनिके शौर्यं सैनिके बहुदुग्धता ।
गोषु दमस्तपस्विषु विद्वत्सु वाषदूकता ॥ २३८ ॥
सभ्येष्व पक्षपातस्तु तथा साक्षिषु सत्यवाक् ।
अनन्यभक्तिर्भृत्येषु सुहितोक्तिश्च मन्त्रिषु ॥ २३९ ॥
मौनं मूर्खेषु च स्त्रीषु पातिव्रत्यं सुभूषणम् ।
महादुभूषणं चैतद्विपरीतममीषु च ॥ २४० ॥

अश्वादिकों में वेगादिक गुणों की भूषणता तथा अन्यथा (विपरीत) होने पर दुभूषणता का निर्देश— घोड़े में अधिक वेग, बैल में अधिक भारवहन की सामर्थ्य, मणि में चमक, राजा में क्षमा, वेश्या में हाव-भाव, गानेवाले में मधुर स्वर, धनी में दान देने की शक्ति, सैनिक में शूरता, गायों में बहुत दुग्ध देना, तपस्वियों में इन्द्रियों का दमन करना, विद्वानों में बोलने की अच्छी शक्ति, सभासदों में किसी का पक्षपात न करना, साक्षियों (गवाहों) में सत्य बोलना (सच्ची गवाही देना), भृत्यों में स्वामी की अनन्य भक्ति, मन्त्रियों में राजा के लिये सुन्दर हितकर वचन बोलना, मूर्खों में मौन रहना, स्त्रियों में पतिव्रताधर्म का पालन करना ही सुन्दर भूषण कहलाता है अर्थात् अन्यभूषण इन लोगों के लिये भूषण नहीं है। यदि इन सब घोड़े आदियों में वेगादि गुणों का अभाव हो तो उनकी सुन्दरता को अत्यन्त नष्ट करनेवाले होते हैं ।

गृहं बहुकुटुम्बेन दीपैर्गोभिः सुबालकैः ।
भात्येकनायकं नित्यं नैव निर्बहुनायकम् ॥ २४१ ॥

एक ही नायक आदि से ही परिवार आदि की शोभा का निर्देश— गृह में जब अधिक परिवार, बहुत से दीपकों का प्रकाश, बहुतसी गायें और बहुत से बालक सुन्दर हों तब उसकी नित्य शोभा होती है और जब तक गृह का

१६६ | शुक्रनीतिः

स्वामी एक व्यक्ति रहता है तभी तक उसकी शोभा बनी रहती है अनेक स्वामी होने पर शोभा नष्ट हो जाती है।

न च हिंस्रमुपेक्षेत शक्तो हन्याच्च तत्क्षणे ।

हिंस्र पुरुषादि की उपेक्षा करने का निषेध— हिंसक पुरुषों या पशुओं की उपेक्षा नहीं करनी चाहिये किन्तु सामर्थ्य हो तो तत्काल उनको नष्ट ही कर देना चाहिये क्योंकि देर करना अनिष्टकर होता है।

पैशुन्यं चण्डता चौर्यं मात्सर्यमतिलोभता ॥ २४२ ॥
असत्यं कार्यघातित्वं तथाऽलसकताऽप्यलम् ।
गुणिनामपि दोषाय गुणानाच्छाद्य जायते ॥ २४३ ॥

चुगुलखोरी आदि दोषों से गुणियों के गुणों के ढंक जाने का निर्देश— चुगुलखोरी, तीक्ष्णता (अत्यन्तक्रोध), चोरी, मत्सरता, अतिलोभ, असत्य भाषण, कार्य नष्ट करना, अत्यन्त आलस्य ये सब दोष हैं अतः यदि ये गुणवानों को भी हों तो उनके सम्पूर्ण गुणों को ढंक देने वाले होते हैं। अर्थात् इन दोषों से वे निन्दा के पात्र बन जाते हैं।

मातुः प्रियायाः पुत्रस्य धनस्य च विनाशनम् ।
बाल्ये मध्ये च वार्धक्ये महापापफलं क्रमात् ॥ ४४ ॥

बाल्यावस्था आदि में मां आदि के मरने में महापातक के फल का निर्देश— बाल्यावस्था में मां का, युवावस्था में प्रिया स्त्री का, वृद्धावस्था में पुत्र एवं धन का नष्ट हो जाना क्रमसे ये सब प्राक्तन महापाप के फल हैं।

श्रीमत्तामनपत्यत्वमधनानां च मूर्खता ।
स्त्रीणां षण्डपतित्वं च न सौख्यायेष्टनिर्गमः ॥ २४५ ॥

दुःखप्रद विषयों का निर्देश— धनवानों को पुत्र न होना, दरिद्रों को मूर्ख, स्त्रियों को नपुंसक पति मिलना, प्रिय वस्तुओं का अलग हो जाना, ये सब बातें सुख के लिये नहीं होती हैं अर्थात् दुःखप्रद होती हैं।

मूर्खः पुत्रोऽथवा कन्या चण्डी भार्या दरिद्रता ।
नीचसेवा ऋणं नित्यं नैतत्षट्कं सुखाय च ॥ २४६ ॥

सुखकारक न होनेवाली ६ बातों का निर्देश— १. मूर्ख पुत्र अथवा २. कन्या, ३. अत्यन्त क्रोध करनेवाली स्त्री, ४. दरिद्रता, ५. नीच जातिवालों अथवा नीच पुरुषों की सेवा तथा ६. नित्य ऋण लेना ये ६ बातें सुखकारक नहीं होतीं हैं अर्थात् इनसे नित्य मनुष्य दुःखी रहता है।

नाध्यापने नाध्ययने न देवे न गुरौ द्विजे ।
न कलासु न सङ्गीते सेवायां नार्जवे क्रियाम् ॥ २४७ ॥
न शौर्ये न च तपसि साहित्ये रमते मनः ।