शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २३६
चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २३६
(दिन के पूर्व भाग) के सब कृत्यों को समाप्त करके स्त्री सास तथा श्वशुर को जाकर प्रणाम करे ।
ताभ्यां भर्त्रा पितृभ्यां वा भ्रातृमातुलबान्धवैः ॥ ११ ॥
वस्त्रालङ्काररत्नानि प्रदत्तान्येव धारयेत् ।
और वह सास-श्वशुर, पति, माता-पिता, भाई, मामा, बान्धव (कुटुम्ब के लोग) इन सबों से दिये गये ही वस्त्र, अलङ्कार तथा रत्नों को धारण करे ।
मनोवाक्कर्मभिः शुद्धा पतिदेशानुवर्तिनी ॥ १२ ॥
छायेवानुगता स्वच्छा सखीव हितकर्मसु ।
दासीव दिष्टकार्येषु भार्या भर्तुः सदा भवेत् ॥ १३ ॥
मन, वचन तथा कर्म से पवित्र एवं निर्मल रहकर पति की आज्ञा के अनुसार चलनेवाली, छाया की भांति अनुगमन करनेवाली, हितकर कार्यों में सखी (मित्र) की भांति और बताये हुये कार्यों में दासी की भांति सदा स्त्री को अपने स्वामी के निकट रहना चाहिये ।
ततोऽन्नसाधनं कृत्वा पतये बिनिवेद्य सा ।
वैश्वदेवोद्धृतैरन्नैर्भोजनीयांश्च भोजयेत् ॥ १४ ॥
उसके बाद वह अन्न पकाकर पति के सामने रख कर वैश्वदेव से बचे हुये अन्न से भोजन कराने योग्य लोगों को भोजन करावे ।
पतिं च तदनुज्ञाता शिष्टमन्नाद्यमात्मना ।
भुक्त्वा नयेदहःशेषं सदाऽऽयव्ययचिन्तया ॥ १५ ॥
और पति को भोजन कराने के बाद उनकी आज्ञा लेकर बचे हुये अन्नादि को स्वयं भोजन कर सदा आय तथा व्यय का विचार करते हुये दिन के अवशिष्ट भाग को बितावे ।
पुनः सायं पुनः प्रातर्गृहशुद्धिं विधाय च ।
कृतान्नसाधना साध्वी सभृत्यं भोजयेत् पतिम् ॥ १६ ॥
फिर शाम को प्रातःकाल की भांति दुबारा गृह की सफाई करके भोजन बनाकर साध्वी स्त्री भृत्यों के सहित पति को भोजन करावे ।
नातितृप्ता स्वयं भुक्त्वा गृहनीतिं विधाय च ।
आस्तृत्य साधु शयनं ततः परिचरेत्पतिम् ॥ १७ ॥
उसके बाद स्वयं भी अत्यन्त अधिक भोजन नहीं किये हुई अवशिष्ट नियमित गृहकृत्य को समाप्त कर शय्या बिछा उस पर पति को सुलाकर उसकी भलीभांति पैर दबाना आदि परिचर्या करे ।
सुप्ते पतौ तदभ्यास्य स्वयं तद्गतमानसा ।
अनग्ना चाप्रमत्ता च निष्कामा विजितेन्द्रिया ॥ १८ ॥
| २४० | शुक्रनीतिः |
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नोच्चैर्वदेन्न परुषं न बह्वाहूतिमप्रियम् ।
न केनचिच्च विवदे-दप्रलापविवादिनी ॥ १९ ॥
न चास्य व्ययशीला स्यान्न धर्म्मार्थविरोधिनी ।
पति के सो जाने पर स्वयं भी पति में मनको लगाते हुये उसकी शय्या पर सो जावे। और स्त्री कभी नग्न न रहे, असावधानी न करे, किसी वस्तु की कामना न प्रगट करे, इन्द्रियों को अपने वश में रक्खे, उच्चस्वर से बात-चीत न करे, न कठोर स्वर से बोले, और न किसी को बहुत पुकारे, न अप्रिय वचन कहे, न किसी के साथ विवाद करे, और यदि विवाद करना ही पड़े तो विवाद के समय निरर्थक वचन न बोले, और पति का अधिक धनव्यय कराने-वाली एवं धर्म तथा अर्थ सम्बन्धी कार्यों का विरोध करनेवाली भी न होवे ।
प्रमादोन्मादरोषेर्ष्या-वचनान्यतिनिन्दिताम् ॥ २० ॥
पैशुन्यहिंसाविषय-मोहाहंकारदर्पताम् ।
नास्तिक्यसाहसस्तेय-दम्भान् साध्वी विवर्जयेत् ॥ २१ ॥
**साध्वी स्त्रियों को पैशुन्यादि-त्याग का निर्देश—**और साध्वी स्त्री असाव-धानता, उन्मत्तता, क्रोध तथा ईर्ष्या को प्रगट करनेवाले वचनों को एवं अति-निन्दित चुगलखोरी, हिंसा, विषयों के प्रति मोह, अहङ्कार, अपनी श्रेष्ठता, नास्तिकता, सहसा कार्य कर बैठना, चोरी, दम्भ इन सबों को छोड़ देवे।
एवं परिचरन्ती सा पतिं परमदैवतम् ।
यशस्यमिह यात्येव परत्रैषा सलोकताम् ॥ २२ ॥
**यथोक्त पति सेवा से पतिलोक जाने का निर्देश—**इस प्रकार से पति को ही परम देवता मानकर परिचर्या करती हुई वह स्त्री इस लोक में सुन्दर यश तथा परलोक में पतिलोक को प्राप्त करती है।
योषितो नित्यकर्मोक्तं नैमित्तिकमथोच्यते ।
रजसो दर्शनादेषा सर्व्वमेव परित्यजेत् ॥ २३ ॥
**स्त्रियों के नैमित्तिक कृत्यों का निर्देश—**इस भांति से स्त्रियों के नित्य कर्मों का वर्णन किया गया, अब नैमित्तिक कर्मों का वर्णन कर रहे हैं। वह स्त्री रजोदर्शन के दिन से उक्त सभी नित्य कर्मों का परित्याग कर देवे।
सर्व्वैरलक्षिता शीघ्रं लज्जिताऽन्तर्गृहे वसेत् ।
एकाम्बरा कृशा दीना स्नानालङ्कारवर्जिता ॥ २४ ॥
और सबसे अलक्षित होकर लजाई हुई गृह के अन्दर निवास करे। उस समय एक वस्त्र धारण करके कृश तथा दीन के समान स्नान तथा अलङ्कार से हीन होकर रहे।
स्वपेद् भूमावप्रमत्ता क्षपेदेवमहस्त्रयम् ।