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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

तृतीयोऽध्यायः १३७

तृतीयोऽध्यायः १३७

**प्रारब्धवश धनी-निर्धन होने का निर्देश—**उत्कर्ष (सुख की अवस्था) या अपकर्ष (दुःखावस्थ।) नित्य नहीं बना रहता है। प्राक्तन कर्मवश मनुष्य धनवान या निर्धन सदा होता है। अतः एक सी अवस्था सदा न रहने से सभी प्राणियों में मैत्रीभाव (सुख-से सुखी-दुःख से दुःखी होना) रखना न छोड़े ऐसा करने से सभी लोग सन्तुष्ट रहकर दुःख नहीं पहुँचायेंगे।

दीर्घदर्शी सदा च स्यात् प्रत्युत्पन्नमतिः क्वचित् ।
साहसी सालसो चैव चिरकारी भवेन्न हि ॥ ६९ ॥

**दीर्घदर्शी के लक्षण—**सदा दूर तक सोचनेवाला तथा क्वचित् समयानुसार तत्काल कर्त्तव्य स्थिर करनेवाला होना चाहिये, और सहसा कार्य करनेवाला, आलसी तथा देरी से धीरे-धीरे कार्य समाप्त करनेवाला नहीं होना चाहिये।

यः सुदुर्निष्फलं कर्म ज्ञात्वा कर्तुं व्यवस्यति ।
द्रागादौ दीर्घदर्शी स्यात् स चिरं सुखमश्नुते ॥ ७० ॥

जो व्यक्ति किसी कार्य के अच्छे-बुरे फल या निष्फलता को विचार कर तदनुसार कार्य करने की चेष्टा करता है और जो कार्य करने के प्रथम शीघ्र ही दूर तक उसके परिणाम (फल) को जाननेवाला होता है वह चिरकाल तक सुख भोगता है। अतः दीर्घदर्शी होना उचित है।

प्रत्युत्पन्नमतिः प्राप्तां क्रियां कर्तुं व्यवस्यति ।
सिद्धिः सांशायिकी तत्र चापल्यात् कार्यगौरवात् ॥ ७१ ॥

**प्रत्युत्पन्नमति के लक्षण—**जो प्रत्युत्पन्नमति (समयानुसार सूझवाला) व्यक्ति तत्काल में उपस्थित कार्य करने की चेष्टा करता है उसके कार्य में जल्द-बाजी तथा कार्य की गुरुता से सिद्धि के विषय में सन्देह बना रहता है अर्थात् वह कार्य हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है।

यतते नैव कालेऽपि क्रियां कर्तुं च सालसः ।
न सिद्धिस्तस्य कुत्रापि स नश्यति च सान्वयः ॥ ७२ ॥

**आलसी मनुष्य के लक्षण—**जो आलसी होता है वह समय उपस्थित होने पर भी करने योग्य कार्य के करने में प्रयत्नशील नहीं होता है, उसके कार्य की सिद्धि कभी भी नहीं होती है और वह वंश-सहित या साथी-सहित नष्ट हो जाता है।

क्रियाफलमविज्ञाय यतते साहसी च सः ।
दुःखभागी भवत्येव क्रियया तत्फलेन वा ॥ ७३ ॥

**साहसी के लक्षण व दोष—**जो साहसी व्यक्ति क्रिया के फल का बिना विचार किये हुये सहसा (एकाएक) कार्य करने का प्रयत्न करता है वह क्रिया या उसके फल के कारण से केवल दुःखभागी ही होता है।

१३८ शुक्रनीतिः

महत्कालेनाल्पकर्म चिरकारी करोति च ।
स शोचत्यल्पफलतो दीर्घदर्शी भवेदतः ॥ ७४ ॥

**चिरकारी मनुष्य के लक्षण—**जो चिरकारी (देरी तक कार्य करनेवाला) होता है वह थोड़े से कार्य को बहुत देर में धीरे २ करता हुआ समाप्त करता है वह थोड़ा फल होने से अनुताप करता है अतः दीर्घदर्शी (दूर तक परिणाम पर करनेवाली) होना चाहिये।

सुफलं तु भवेत्कर्म कदाचित् सहसाकृतम् ।
निष्फलं वापि प्रभवेत् कदाचित् सुविचारितम् ॥ ७५ ॥
तथापि नैव कुर्वीत सहसानर्थकारि तत् ।
कदाचिदपि सञ्जातमकार्यादिष्टसाधनम् ॥ ७६ ॥
यदनिष्टं तु सत्कार्यान्नाकार्यप्रेरकं हि तत् ।

**सहसा कार्य करने का निषेध—**सहसा किया हुआ भी कर्म कभी २ सुन्दर फल देनेवाला हो जाता है कभी २ भलीभांति विचार कर भी किया हुआ कर्म निष्फल हो जाता है। तथापि (कदाचित् कार्य सफलता होने पर भी) सहसा (बिना विचारे एकाएक) कार्य नहीं करना चाहिये, क्योंकि वह अनर्थ पैदा करनेवाला होता है। और कदाचित् अकार्य (नहीं करने योग्य कार्य) से भी जो इष्टसिद्धि होती है और सत् (अच्छे) कार्य से जो अनिष्ट फल होता है, इससे वह अकार्य को करने के लिये प्रेरणा करनेवाला नहीं हो सकता है।

भृत्यो भ्राताऽपि वा पुत्रः पत्नी कुर्यान्न चैव यत् ॥ ७७ ॥
विधास्यन्ति च मित्राणि तत्कार्यमविशङ्कितम् ।

**मित्र की विशेषता—**भृत्य, भाई, पुत्र और पत्नी भी जिस कार्य को पूर्ण नहीं कर सकते, उसीको उसके मित्र-गण निःसन्देह पूर्ण कर देते हैं।

यो हि मित्रमविज्ञाय याथातथ्येन मन्दधीः ॥ ७८ ॥
मित्रार्थे योजयत्येनं तस्य सोऽर्थोऽवसीदति ।

**बिना समझे किसी को मित्र बनाने का निषेध—**जो मन्दबुद्धि यथार्थ रूप से मित्र के भीतरी (अच्छे-बुरे) भाव को बिना समझे मित्रता के लिये उसे नियुक्त करता है उसका वह मैत्रीरूप अर्थ नष्ट हो जाता है।

न हि मानसिको धर्मः कस्यचिज्ज्ञायतेऽञ्जसा ॥ ७९ ॥
अतो यतेत तत्प्राप्त्यै मित्रलब्धिर्वरा नृणाम् ।

**मित्र की प्राप्ति के लिये यत्न करने का निर्देश—**किसी के मानसिक भाव को वस्तुतः नहीं जाना जा सकता है। इससे उसकी (अच्छे मित्र की) प्राप्ति