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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

चतुर्थाध्याये लोकधर्मानिरूपणप्रकरणम् २५७

चतुर्थाध्याये लोकधर्मानिरूपणप्रकरणम् २५७

प्रतिमायास्तृतीयांशमर्द्धांशं तत् सुपीठकम्।

प्रतिमा के आसन का प्रमाण— प्रतिमा (मूर्त्ति) का जो आसन हो वह देखने में सुन्दर एवं प्रतिमा के मान के अनुसार तृतीयांश या अर्द्धांश प्रमाण का होना चाहिये।

द्विगुणं त्रिगुणं द्वारं प्रतिमायाश्चतुर्गुणम् ॥ १३० ॥
एकद्वित्रिचतुर्हस्तं पीठं देवालयस्य च।

योग्यतानुसार द्वारादि का प्रमाण— देवमन्दिर का द्वार प्रतिमा के मान से द्विगुण, त्रिगुण या चतुर्गुण बड़ा बनाना चाहिये। और योग्यतानुसार प्रतिमा का पीठ (आसन) एक, दो, तीन या चार हाथ प्रमाण बनाना चाहिये।

पीठतस्तु समुच्छ्रायो भित्तेर्दशकराधिकः ॥ १३१
द्वारात्तु द्विगुणोच्छ्रायः प्रासादस्योर्ध्वभूमिभाक्।
शिखरं चोच्छ्रायसमं द्विगुणं त्रिगुणं तु वा ॥ १३२ ॥

देवमन्दिर की ऊंचाई का प्रमाण— देवगृह की भित्ति (भीत) की ऊंचाई पीठ से दस हाथ अधिक करनी चाहिये। प्रासाद (देवमन्दिर) के ऊपर की भूमि द्वार से दुगुनी ऊंची होनी चाहिये। और प्रासाद का शिखर ऊंचाई के अनुरूप द्विगुण या त्रिगुण बनाना चाहिये।

एकभूमिं समारभ्य सपादाशतभूमिकम्।
प्रासादं कारयेच्छक्त्या ह्यष्टास्रं पद्मसंनिभम् ॥ १३३ ॥
चतुर्दिक्षु मण्डपं वापि चतुःशालं समन्ततः।

मञ्जिल तथा प्रासाद की आकृति आदि का निर्देश— एक मञ्जिल से लेकर सवा सौ मञ्जिल तक का अठपहला कमल के आकार का, चारों दिशाओं में बने हुये मण्डपों से अथवा चारों तरफ कमरों से युक्त प्रासाद (मन्दिर) शक्ति के अनुसार बनाना चाहिये।

सहस्रस्तम्भसंयुक्तश्चोत्तमोऽन्यः समोऽधमः ॥ १३४ ॥

प्रासाद के उत्तमादि ३ भेदों का निर्देश— एक हजार स्तम्भों से युक्त प्रासाद 'उत्तम' उससे न्यून स्तम्भों का 'मध्यम' उससे भी न्यून स्तम्भों का 'अधम' प्रासाद कहलाता है।

प्रासादे मण्डपे वापि शिखरं यदि कल्प्यते।
स्तम्भास्तत्र न कर्तव्या भित्तिस्तत्र सुखप्रदा ॥ १३५ ॥

मन्दिर के स्तम्भों का प्रमाण तथा निषेध का निर्देश— जिस प्रासाद अथवा मण्डप के ऊपर यदि शिखर बनाना हो तो वहां पर स्तम्भ नहीं बनाना चाहिये क्योंकि वहां पर केवल भित्ति (भीत) ही सुखप्रद होती है,- स्तम्भ की कोई आवश्यकता नहीं है।

१७ शु०

२५८ | शुक्रनीतिः

प्रासादमध्यविस्तारः प्रतिमायाः समन्ततः ।
षड्गुणोऽष्टगुणो वापि पुरतो वा सुविस्तरः ॥ १३६ ॥

**प्रासाद के भीतरी विस्तार का विचार—**प्रासाद के भीतरी भाग का विस्तार चारो तरफ प्रतिमा से छगुना या आठगुना होना चाहिये और प्रतिमा के आगे की तरफ सब से अधिक विस्तार होना चाहिये ।

वाहनं मूर्तिसदृशं सार्धं वा द्विगुणं स्मृतम् ।
यत्र नोक्तं देवताया रूपं तत्र चतुर्भुजम् ॥ १३७ ॥
अभयं च वरं दद्याद्यत्र नोक्तं यदायुधम् ।
अधः करे तूर्ध्वकरे शङ्खं चक्रं तथाऽङ्कुशम् ॥ १३८ ॥
पाशं वा डमरुं शूलं कमलं कलशं स्रुवम् ।
लड्डुकं मातुलुङ्गं वा वीणां मालां च पुस्तकम् ॥ १३९ ॥

**प्रतिमा के वाहन, रूप तथा आयुध के स्थान का विचार—**देवता का वाहन देवमूर्ति के अनुरूप डेढ़गुना या दुगुना बड़ा होना चाहिये। जहां पर देवता का रूप (बाहु का उल्लेख) नहीं कहा हो वहां पर चतुर्भुज बनाना चाहिये । जहां पर देवता के आयुध (अस्त्र-शस्त्र) का उल्लेख न हो वहां पर नीचे के हाथों में क्रम से अभय तथा वर मुद्रा का अंकन करना चाहिये । और ऊपर हाथों में शङ्ख, चक्र, अंकुश, पाश, डमरु, शूल, कमल, कलश, स्रुवा, लड्डू, मातुलुङ्ग, वीणा, माला वा पुस्तक का अंकन करना चाहिये ।

मुखानां यत्र बाहुल्यं तत्र पङ्क्त्या निवेशनम् ।
तत् पृथग्-ग्रीवमुकुटं सुमुखं स्वक्षिकर्णयुक् ॥ १४० ॥

**प्रतिमा के अनेक मुख होने पर व्यवस्था का निर्देश—**जहां पर प्रतिमा में बहुत सा मुख बनाना हो वहां पर उन्हें एक पंक्ति में बनाना चाहिये । और उनकी ग्रीवा, मुकुट तथा मुख, आंख और कान को पृथक् २ सुन्दर रीति से बनाना चाहिये ।

भुजानां यत्र बाहुल्यं न तत्र स्कन्धभेदनम् ।

**अनेक भुजाओं की व्यवस्था—**जिस मूर्ति में बहुत भुजायें बनानी हों वहां स्कन्धों में भेद नहीं किया जाता है अर्थात् स्कन्ध दो ही बनाये जाते हैं किन्तु भुजायें दो से अधिक भी बनाई जाती है ।

कूर्परोर्ध्वं तु सूक्ष्माणि चिपिटानि दृढानि च ॥ १४१ ॥
भुजमूलानि कार्याणि पक्षमूलानि वै यथा ।

केहुनी के ऊपर भुजाओं के मूल भाग, दोनों पार्श्वों के मूल भाग के समान सूक्ष्म, चिपटे तथा दृढ़ बनाने चाहिये ।