शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३५६
चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३५६
नालिक की व्यवस्था का निर्देश—तोप या बन्दूक फौलाद् (उत्तम लौह) वा अन्य धातु के बनाये जाते हैं। और उन्हें नित्य झाड़-पोंछकर स्वच्छ किया जाता है तथा उसके पास चलानेवाले रहा करते हैं।
अङ्गारस्यैव गन्धस्य सुवर्चिलवणस्य च।
शिलाया हरितालस्य तथा सीसमलस्य च॥ २०६॥
हिङ्गुलस्य तथा कान्तरजसः कर्पूरस्य च।
जतोर्नील्याश्च सरलनिर्यासस्य तथैव च॥ २०७॥
समन्यूनाधिकैरंशैरग्निचूर्णान्यनेकंशः।
कल्पयन्ति च तद्विद्याश्चन्द्रिकाभादिमन्ति च॥ २०८॥
बारूद बनाने के दूसरे अनेक प्रकारों का निर्देश—कोयला, गन्धक, सोरा, मैनसिल, हरताल, सीसा का किट्ट, हिङ्गुल, कान्तसार लौह, कपूर, लाख, नीली (राल), देवदारु का गोंद इन सबों के सम, न्यून और अधिक भाग मिलाकर बनाने से नाना प्रकार की बारूद बनानेवाले बनाते हैं जिसमें से जलने पर चाँदनी की भांति प्रकाश निकलता है।
क्षिपन्ति चाग्निसंयोगाद् गोलं लक्षे सुनालगम्।
तोप के गोले को लक्ष्य पर फेंकने की रीति—चलानेवाले बन्दूक आदि में गोली-बारूद भरने के बाद आग लगाकर लक्ष्य 'पर छोड़ते हैं जिसकी विधि आगे बताई जा रही है।
नालाग्रं शोधयेदादौ दद्यात्तत्राग्निचूर्णकम्॥ २०९॥
निवेशयेत्तद्दण्डेन नालमूले यथा दृढम्।
ततः सुगोलकं दद्यात् ततः कर्णेऽग्निचूर्णकम्॥ २१०॥
कर्णचूर्णाग्निदानेन गोलं लक्ष्ये निपातयेत्।
पहले बन्दूक या तोप को साफ करके उसमें बारूद डालकर लौह आदि के दण्ड से खूब ठूंस २ कर भर देवे उसके बाद दृढ़ गोला या गोली नाल के मूल में रख देवे तदनन्तर उसके पार्श्व के छिद्र में बारूद भरकर उसमें आग लगा देने के बाद उसके सहारे से गोला या गोली को लक्ष्य साध कर चला देवे।
लक्ष्यभेदी यथा बाणो धनुर्ज्याविनियोजितः॥ २११॥
भवेत् तथा तु संघाय द्विहस्तश्च शिलीमुखः।
बाण का लक्षण—धनुष की डोरी पर ऐसा निशाना साध कर बाण रक्खे कि वह चलाने पर लक्ष्य को भेद सके। और बाण दो हाथ प्रमाण का बनाये।
अष्टास्रा पृथुबुध्ना तु गदा हृदयसम्मिता॥ २१२॥
३६० | शुक्रनीतिः
पट्टिशः स्वसमो हस्तबुध्नश्चोभयतोमुखः ।
**गदा व पट्टिश के लक्षण—**आठ पहलूवाली, मूल में मोटी और हृदय के बराबर ऊंची, दृढ़ दण्डोंवाली 'गदा' बनानी चाहिये । और अपने बराबर लम्बा तथा दोनों तरफ जिसके मुख हों एवं जो बीच में से हाथ से पकड़ा जाय ऐसा 'पट्टिश' शस्त्र होता है ।
ईषद्वक्रश्चैकधारो विस्तारे चतुरङ्गुलः ॥ २१३ ॥
क्षुरप्रान्तो नाभिसमो दृढमुष्टिः सुचन्द्ररुक् ।
खङ्गः प्रासश्चतुर्हस्तदण्डबुध्नः क्षुराननः ॥ २१४ ॥
दशहस्तमितः कुन्तः फालाग्रः शङ्कुबुध्नकः ।
**खड्ग-प्रास और कुन्त (भाला) के लक्षण—**कुछ टेढ़ा, एक तरफ धारवाला, ४ अंगुल चौड़ा, छुरा के समान तीक्ष्ण प्रान्त भागवाला, नाभि तक ऊंचा, दृढ़ मूंठवाला एवं चन्द्रमा के समान स्वच्छ चमकनेवाला ऐसा 'खड्ग' होता है । ४ हाथ लम्बे दण्ड के अग्रभाग में छुरे के समान तीक्ष्ण मुख-वाला 'प्रास' नामक शस्त्र होता है । और जो १० हाथ लम्बे दण्ड के अग्रभाग में तीक्ष्ण फल से युक्त होता है और उस फल के मूल में कील लगी हुई होती है, ऐसा 'कुन्त' (भाला) होता है ।
चक्रं षड्ढस्तपरिधि क्षुरप्रान्तं सुनाभियुक् ॥ २१५ ॥
त्रिहस्तदण्डस्त्रिशिखो लौहरज्जुः सुपाशकः ।
**चक्र और पाश के लक्षण—**जिसके घेरे की लम्बाई ६ हाथ की हो और चक्र की भांति गोलाकार होते हुये प्रान्त भाग छुरे के समान तीक्ष्ण हो एवं बीच में जिसकी नाभि सुन्दर दृढ़ बनी हुई हो उसे 'चक्र' कहते हैं । जिसमें ३ हाथ लम्बा दण्ड लगा हो और उसमें ३ शिखायें (छोर) हों जो लोह के तारों से बनी हों ऐसा 'पाश' नामक शस्त्र होता है ।
गोधूमसम्मितस्थूलपत्रं लोहमयं दृढम् ॥ २१६ ॥
कवचं सशिरस्त्राणमूर्ध्वकायविशोभनम् ।
**कवच और टोप के लक्षण—**गेहूँ बराबर मोटे लोह के दृढ़ पत्तरों द्वारा बने हुये शरीर के रक्षार्थ आवरण-विशेष को 'कवच' कहते हैं और इसके साथ शिर को सुशोभित एवं सुरक्षित रखने का एक टोप भी लौह-पत्रों का होता है ।
तीक्ष्णाग्रं करजं श्रेष्ठं लौहसारमयं दृढम् ॥ २१७ ॥
**करज के लक्षण—**पक्के उत्तम लोह के बने हुये, दृढ़ एवं नख के समान तीक्ष्ण नुकीले शस्त्र को 'करज' (बघनख) कहते हैं ।
यो वै सुपुष्टसम्भारस्तथा षड्गुणमन्त्रवित् ।
बह्वक्षसंयुतो राजा योद्धुमिच्छेत् स एव हि ॥ २१८ ॥
चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३६१
अन्यथा दुःखमाप्नोति स्वराज्याद् भ्रश्यतेऽपि च ।
युद्ध की इच्छा करने योग्य राजा का लक्षण— जो राजा युद्ध के लिये उपयुक्त सामग्रियों से परिपूर्ण और समयानुसार सन्धि, विग्रह (युद्ध), यान (चढ़ाई करना), आसन (अपने स्थान पर रहकर युद्ध के लिये तयार रहना), द्वैध (शत्रु के गोल में फूट डाल देना) इन षः गुणों एवं मन्त्रणा करना इनका जानकार, एवं बहुत से अस्त्र-शस्त्रादिकों से युक्त हो वही युद्ध करने की इच्छा रखे अन्यथा युद्ध करने पर वह दुःख पाता है और अपने राज्य को भी खो बैठता है।
आबिभ्रतोः शत्रुभावमुभयोः संयतात्मनोः ॥ २१६ ॥
अस्त्राद्यैः स्वार्थसिद्धयर्थं व्यापारो युद्धमुच्यते ।
युद्ध का सामान्य लक्षण— परस्पर शत्रुभाव रखते हुये निश्चल चित्त होकर दो व्यक्तियों का अस्त्रादिकों के द्वारा जो व्यापार होता है, उसे 'युद्ध' कहते हैं।
मन्त्रास्त्रैर्देविकं युद्धं नालाद्यस्त्रैस्तथाऽऽसुरम् ॥ २२० ॥
शस्त्रबाहुसमुत्थं तु मानवं युद्धमीरितम् ।
युद्ध के भेद और लक्षण— मन्त्र के द्वारा अस्त्रों का प्रयोग जिसमें हो उसे 'दैविक' युद्ध तथा तोप-बन्दूक आदि अस्त्रों के द्वारा प्रवृत्त युद्ध को 'आसुर' एवं शस्त्र (खड्गादि) तथा बाहु द्वारा प्रवृत्त युद्ध को 'मानव' कहते हैं।
एकस्य बहुभिः सार्धं बहूनां बहुभिश्च वा ॥ २२१ ॥
एकस्यैकेन वा द्वाभ्यां द्वयोर्वा तद्भवेत् खलु ।
और वह युद्ध एक का बहुतों के साथ, बहुतों का बहुतों के साथ, एक का एक के साथ अथवा दो का दो के साथ होता है।
कालं देशं शत्रुबलं दृष्ट्वा स्वीयबलं ततः ॥ २२२ ॥
उपायान् षड्गुणं मन्त्रं भवेच्च युद्धकामुकः ।
काल, देश, शत्रु का तथा अपना बल, उपाय (साम, दान, भेद, दण्ड), षड्गुण (सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैध, आश्रय) और मन्त्र इन सबों का विचार करके ही युद्ध में प्रवृत्त होना चाहिये।
शरद्धेमन्तशिशिरकालो युद्धेषु चोत्तमः ॥ २२३ ॥
बसन्तो मध्यमो ज्ञेयोऽधमो ग्रीष्मः स्मृतः सदा ।
युद्ध के लिये काल-विचार— युद्ध के लिये शरद्, हेमन्त तथा शिशिर ऋतु का समय उत्तम होता है। बसन्त का मध्यम और ग्रीष्म का सदा अधम समय होता है।
वर्षासु न प्रशंसन्ति युद्धं साम स्मृतं तदा ॥ २२४ ॥
३६२ | शुक्रनीतिः
वर्षाकाल में युद्ध करना उचित नहीं होता है, उस समय शत्रु के साथ साम ( किसी प्रकार की सन्धि ) रखना ही उचित होता है ।
युद्धसम्भारसम्पन्नो यदाधिकबलो नृपः।
मनोत्साही सुशकुनोत्पाती कालस्तदा शुभः॥ २२५॥
जिस समय राजा युद्ध की सामग्री से पूर्ण संपन्न होने से अधिक बलशाली हो और मनमें युद्ध का उत्साह हो तथा अच्छे शकुन दिखाई पड़ते हों उस समय युद्ध करना शुभ फल देनेवाला होता है ।
कार्येऽत्यावश्यके प्राप्ते कालो नो चेत्तदा शुभः।
निधाय हृदि विश्वेशं गेहे भक्त्याऽभियात्तदा॥ २२६॥
यदि आवश्यक कार्यवश युद्ध करना अनिवार्य हो जाय और उस समय शुभ फलप्रद समय उपस्थित न हो तो गृह में भक्तिपूर्वक भगवान का हृदय में ध्यान धरकर युद्ध के लिये सन्नद्ध हो जाय ।
न कालनियमस्तत्र गोस्त्रीविप्रविनाशने ।
गौ, स्त्री और ब्राह्मण का विनाश यदि उपस्थित हो जाय तो उनके रक्षार्थ युद्ध करने में किसी प्रकार के काल का नियम नहीं । अर्थात् उपरि लिखित नियमानुसार तत्काल युद्ध में प्रवृत्त हो जाय ।
यस्मिन् देशे यथाकालं सैन्यव्यायामभूमयः॥ २२७॥
परस्य विपरीताश्च स्मृतो देशः स उत्तमः।
युद्ध के लिये उत्तम देश का लक्षण—जिस स्थान पर समयानुसार सैनिकों को कवायद् कराने के लिये योग्य भूमि हो और शत्रु के लिये विपरीत पड़े तो वही स्थान युद्ध करने के लिये चुनना उत्तम होता है ।
आत्मनश्च परेषां च तुल्यव्यायामभूमयः॥ २२८॥
यत्र मध्यम उद्दिष्टो देशः शास्त्रविचिन्तकैः।
मध्यम युद्ध-देश के लक्षण—और जहां पर अपनी तथा शत्रु दोनों की सेनाओं के लिये कवायद करने योग्य भूमि हो उसे युद्ध शास्त्र के पण्डितों ने मध्यम भूमि कही है ।
अरातिसैन्यव्यायामसुपर्याप्तमहीतलः ॥ २२९॥
आत्मनो विपरीतश्च स वै देशोऽधमः स्मृतः।
अधम युद्ध-देश के लक्षण—जहां पर शत्रु की सेना के लिये कवायद करने योग्य पर्याप्त भूमि हो पर अपनी सेना के लिये विपरीत हो तो वह देश युद्ध के लिये 'अधम' कही गई है ।
स्वसैन्यात्तु तृतीयांशहीनं शत्रुबलं यदि ॥ २३०॥
अशिक्षितमसारं वा साद्यस्कं स्वजयाय वै।
चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३६३
युद्ध के लिये सेना का विचार— यदि अपनी सेना से संख्या में तृतीय अंश हीन शत्रु की सेना हो सो भी वह अशिक्षित, असार वा तत्काल में भर्ती की हुई हो तो वहां पर युद्ध करने से अपना जय निश्चित होता है।
पुत्रवत् पालितं यत्तु दानमानविवर्द्धितम् ॥ २३१ ॥
युद्धसम्भारसम्पन्नं स्वसैन्यं विजयप्रदम् ।
और यदि अपनी सेना पुत्र की भांति पाली हुई हो, तथा दान-मान से संतुष्ट की हुई हो एवं युद्धोपयोगी सभी सामग्रियों से भरपूर हो तो उसे लेकर युद्ध करने से विजय निश्चित होता है।
सन्धिं च विग्रहं यानमासनं च समाश्रयम् ॥ २३२ ॥
द्वैधीभावं च संविद्यान्मन्त्रस्यैतांस्तु षड्गुणान् ।
मन्त्र के षड्गुणों के नामों का निर्देश— १. युद्धादिकाल उपस्थित होने पर परस्पर हाथी-घोड़े आदि देकर सहायता आदि करने के नियम में बंध जाने को 'सन्धि', २. विरुद्ध आचरण द्वारा बैर भाव रखने को विग्रह, ३. शत्रु पर चढ़ाई करने को 'यान', ४. शत्रु की उपेक्षा करके अपने स्थान पर युद्ध-सामग्री के साथ स्थित रहने को 'आसन', ५. किसी से पीड़ित होने पर किसी प्रबल का आश्रय लेने को 'समाश्रय' ६. स्वार्थ-सिद्धि के लिये सेना को टुकड़ी-टुकड़ी में रखने को 'द्वैधीभाव' कहते हैं। और ये ही ६ मन्त्र के 'षड्गुण' कहलाते हैं।
याभिः क्रियाभिर्बलवान् मित्रतां याति वैरिषु ॥ २३३ ॥
सा क्रिया सन्धिरित्युक्ता विमृशेत् तां तु यत्नतः ।
सन्धि के लक्षण— जिस क्रिया के द्वारा बलवान् शत्रु निश्चित मित्रता भाव को प्राप्त करे उसे 'सन्धि' कहते हैं, इसका यत्नपूर्वक ख्याल रक्खे।
विकर्षितः सन् वाऽधीनो भवेच्छत्रुस्तु येन वै ॥ २३४ ॥
कर्मणा विग्रहस्तं तु चिन्तयेन्मन्त्रिभिर्नृपः ।
विग्रह के लक्षण— जिस क्रिया से शत्रु पीड़ित किया जाय या अधीन बनाया जाय उसे 'विग्रह' कहते हैं। राजा इसे मन्त्रियों के साथ खूब विचार कर करे।
शत्रुनाशार्थगमनं यानं स्वाभीष्टसिद्धये ॥ २३५ ॥
स्वरक्षणं शत्रुनाशो भवेत् स्थानात्तदासनम् ।
यान तथा आसन के लक्षण— अपनी अभीष्ट-सिद्धि के लिये किसी शत्रु के नाशार्थ चढ़ाई करने को 'यान' कहते हैं। जहां पर पड़े रहने से अपनी रक्षा तथा शत्रु का नाश हो सके वहां पड़े रहने को 'आसन' कहते हैं।
यैर्गुणैर्तो बलवान् भूयाद् दुर्बलोऽपि स आश्रयः ॥ २३६ ॥
३६४ | शुक्रनीतिः
द्वैधीभावः स्वसैन्यानां स्थापनं गुल्मगुल्मयोः।
**आश्रय व द्वैधीभाव के लक्षण—**जिसके द्वारा रक्षित होकर दुर्बल भी सबल हो जाय, ऐसे प्रवल किसी राजा का आश्रय लेने को 'आश्रय' कहते हैं। गुल्म-गुल्म (टुकडी २) रूप में विभाजित करके अपनी सेना को रखने को 'द्वैधीभाव' कहते हैं।
बलीयसाभियुक्तस्तु नृपोऽनन्यप्रतिक्रियः ॥ २३७॥
आपन्नः सन्धिमन्विच्छेत् कुर्वाणः कालयापनम्।
**सन्धि करने योग्य पुरुषों का निर्देश—**अत्यन्त बलवान द्वारा आक्रमण किये जाने पर कोई प्रतीकार का उपाय न होने से आपत्ति में पड़ा हुआ राजा अच्छे समय की प्रतीक्षा करता हुआ उससे सन्धि कर ले।
एक एवोपहारस्तु सन्धिरेष मतो हितः ॥ २३८॥
उपहारस्य भेदास्तु सर्वे ये मैत्रवर्जिताः।
**उपहार रूप सन्धि की सर्वश्रेष्ठता का निर्देश—**उस समय केवल उपहार (भेंट) देकर 'सन्धि' करना ही हितकर होता है। मित्रता को छोड़कर जितने भी सन्धि के प्रकार हैं वे सभी इस उपहार के ही भेद माने जाते हैं। अर्थात् इससे बढ़कर सन्धि के दूसरे प्रकार श्रेष्ठ नहीं हैं।
अभियोक्ता बलीयस्त्वादलब्ध्वा न निवर्तते ॥ २३९॥
उपहारादृते यस्मात् सन्धिरन्यो न विद्यते।
आक्रमणकारी अत्यन्त बलवान होने से बिना भेंट पाये युद्ध से निवृत्त नहीं होता है। अतः उपहार को छोड़कर अन्य कोई दूसरा सन्धि का उपाय नहीं है।
शत्रोर्बलानुसारेण उपहारं प्रकल्पयेत् ॥ २४०॥
सेवां बाऽपि च स्वीकुर्याद्दद्यात् कन्यां भुवं धनम्।
**शत्रु के बलानुसार उपहार की कल्पना के भेद—**शत्रु के बलानुसार उपहार की कल्पना की जाती है। जिसमें उसकी सेवा स्वीकार करनी पड़ती है किंवा अपनी कन्या, पृथ्वी (राज्य का कुछ अंश) या धन उपहार में देना पड़ता है।
स्वसामन्तांश्च सन्धियान् मन्त्रेणान्यजयाय वै ॥ २४१॥
सन्धिः कार्योऽप्यनार्येण सम्प्राप्योत्सादयेद्धि सः।
**पार्श्ववर्ती अनार्य राजा से भी सन्धि करने का निर्देश—**शत्रु को जीतने के लिये मन्त्रणा के द्वारा अपने पास के सामन्तों के साथ सन्धि कर ले। और सन्धि तो अनार्य (म्लेच्छ आदि) के साथ भी कर लेनी चाहिये, क्योंकि सन्धि न करने पर समय पाकर नुकसान पहुँचा सकता है।
चतुर्थोऽध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३६५
सङ्घातवान् यथा वेणुर्निबिडैः कण्टकैर्वृतः ॥ २४२ ॥
न शक्यते समुच्छेत्तुं वेणुः सङ्घातवांस्तथा।
**सन्धि के अवसरों का तथा उनसे लाभ का निर्देश—**जिस प्रकार से घने कांटा से घिरा हुआ बांस के समूह को कोई काट या उखाड़ नहीं सकता है, उसी प्रकार से म्लेच्छों से सन्धि किये हुये सहायवान राजा को भी कोई नहीं पछाड़ सकता है। अर्थात् राजा को अपने पास के भले-बुरे सभी राजाओं से मेल रखना चाहिये ऐसा करने से कोई शत्रु उसको परास्त नहीं कर सकता है।
सन्धिञ्चातिबले युद्धं साम्ये यानं तु दुर्बले ॥ २४३ ॥
सुहृद्भिराश्रयः स्थानं दुर्गादिभजनं द्विधा।
अति प्रबल शत्रु के साथ सन्धि, समान बलवाले के साथ युद्ध, दुर्बल शत्रु पर या न (युद्ध के लिये आक्रमण) व मित्र राजाओं के साथ आश्रय और दुर्गादि में दो जगह स्थान-सेना की स्थापना करना उचित होता है।
बलिना सह सन्धाय भये साधारणे यदि ॥ २४४ ॥
आत्मानं गोपयेत् काले बहुमित्रेषु बुद्धिमान्।
यदि राजा को बहुत से शत्रुओं से समानभाव से भय उपस्थित हो जाय तो उनमें जो अधिक बलशाली हो उसके साथ बुद्धिमानी के साथ समयानुसार सुलह करके अपनी रक्षा करनी चाहिये।
बलिना सह योद्धव्यमिति नास्ति निदर्शनम् ॥ २४५ ॥
प्रतिवातं हि न घनः कदाचिदपि सर्पति।
बलवान के साथ युद्ध करना उचित होता है, इसका उदाहरण कहीं भी नहीं मिलता है। क्योंकि देखा जाता है कि मामूली बादल कभी भी हवा के विपरीत नहीं ठहर सकता है।
बलीयसि प्रणमतां काले विक्रमतामपि ॥ २४६ ॥
सम्पदो न विसर्पन्ति प्रतीपमिव निम्नगाः।
जो बलवान शत्रु के समक्ष सिर झुकाते हैं और समय अच्छा आने पर फिर उसी से युद्ध करने लगते हैं। ऐसे राजाओं की संपत्ति उससे कभी विपरीत नहीं होती है अर्थात् कभी चलायमान नहीं होती है। जैसे नदियां कभी विपरीत नहीं बहती हैं।
राजा न गच्छेद्दु विश्वासं सन्धितोऽपि हि बुद्धिमान् ॥ २४७ ॥
अद्रोहसमयं कृत्वा वृत्रमिन्द्रः पुराऽवधीत्।
**विग्रह करने योग्य पुरुष के लक्षण—**बुद्धिमान राजा सन्धि किये हुये भी शत्रु का विश्वास न करे। क्योंकि प्राचीनकाल में द्रोह न करने की प्रतिज्ञा-
३६६ | शुक्रनीतिः
के साथ सन्धि करके भी इन्द्र ने वृत्रासुर को सन्धि की उपेक्षा करके मार डाला ।
आपन्नोऽभ्युदयाकाङ्क्षी पीड्यमानः परेण वा ॥ २४८ ॥
देशकालबलोपेतः प्रारभेत च विग्रहम् ।
जो राजा विपत्ति में पड़कर या दूसरे के द्वारा पीडित होकर भी यदि पुनः अपना अभ्युदय चाहता हो तो वह देश, काल तथा बल उचित होने पर युद्ध प्रारम्भ कर दे ।
प्रहीनबलमित्रं तु दुर्गस्थं शत्रुमागतम् ॥ २४९ ॥
अत्यन्तविषयासक्तं प्रजाद्रव्यापहारकम् ।
भिन्नमन्त्रिबलं राजा पीडयेत् परिवेष्टयन् ॥ २५० ॥
विग्रहः स च विज्ञेयो ह्यन्यश्च कलहः स्मृतः ।
विग्रह होने के कारणों का तथा विग्रह और कलह के भेद का निर्देश—
जो शत्रु सेना तथा मित्र से हीन हो गया हो, और अपने दुर्ग में घिर जाने से पड़ा हुआ हो, या दुर्गति में पड़ा हो या अत्यन्त विषयासक्त हो गया हो, किंवा प्रजाओं के द्रव्य को लूट लेता हो अथवा जिसके मन्त्रियों तथा सेनाओं में फूट पड़ गया हो तो ऐसे उपस्थित शत्रु को चारो तरफ से घेरकर राजा द्वारा पीडित करने को वस्तुतः 'विग्रह' कहते हैं और इससे भिन्न को केवल 'कलह' कहते हैं ।
बलीयसाऽल्पबलः शूरेण न च विग्रहम् ॥ २५१ ॥
कुर्याद्धि विग्रहे पुंसां सर्वनाशः प्रजायते ।
बलवान शत्रु के साथ विग्रह करने का निषेध—
अल्प सेनावाले दुर्बल राजा को शूर-वीर तथा अत्यन्त बलवान शत्रु से विग्रह नहीं करना चाहिये । क्योंकि ऐसे के साथ विग्रह करनेवालों का सर्वनाश हो जाता है ।
एकार्थाभिनिवेशित्वं कारणं कलहस्य वा ॥ २५२ ॥
उपायान्तरनाशे तु ततो विग्रहमाचरेत् ।
निरुपाय दशा में विग्रह करने का निर्देश—
किसी वस्तु के पाने का आग्रह जब दो व्यक्तियों में हो जाता है तब उसके कारण से उन दोनों में कलह उत्पन्न हो जाता है । दूसरा कोई उपाय न रहने पर अन्त में विग्रह करना उचित होता है ।
विगृह्यसंधाय तथा सम्भूयाथ प्रसङ्गतः ॥ २५३ ॥
उपेक्षया च निपुणैर्यानं पञ्चविधं स्मृतम् ।
यान के पांच भेद—
विगृह्ययान, संधाययान, संभूययान, प्रसङ्गयान, उपेक्षायान, इस भाँति से विद्वानों ने ५ प्रकार का यान कहा है । इनके लक्षण आगे कहेंगे ।