शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
चतुर्थाध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम् २०३
चतुर्थाध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम् २०३
विनाश करने के लिये सेना की रक्षा करने में तत्पर हो उस समय विशेष प्रकार का अधिक जुर्माना या चुंगी लगाकर प्रजा से धन का हरण करे तो उचित है।
धनिकेभ्यो भृतिं दत्त्वा स्वापत्तौ तद्धनं हरेत्।
राजा स्वापत्समुत्तीर्णस्तत् स्वं दद्यात् सवृद्धिकम् ॥ ११ ॥
आपत्तिरहित होने पर सूद सहित धन वापस करने का निर्देश—और अपने ऊपर आपत्ति आ पड़ने पर 'मैं सूद दूंगा' ऐसी प्रतिज्ञा कर धनिकों से उसके धन को जबरदस्ती राजा को ले लेना चाहिये। तथा जब वह आई हुई अपनी आपत्ति को पार कर जाय तब उस लिये हुये धन को सूदसहित उस (धनिक) को लौटा देना चाहिये।
प्रजाऽन्यथा हीयते च राज्यं कोशो नृपस्तथा ।
हीनाः प्रबलदण्डेन सुरथाद्या नृपा यतः ॥ १२ ॥
प्रबल दण्ड से अनिष्ट फल—अन्यथा अर्थात् धनाभाव से सेना की रक्षा न कर सकने से प्रजा, राज्य, कोश तथा राजा क्षीण हो जाता है। क्योंकि प्रबल दंड के करने से सुरथ आदि राजा लोग हीन अर्थात् राज्यच्युत हो गये।
दण्डभूभागशुल्कैस्तु बिना कोशाद् बलस्य च ।
संरक्षणं भवेत् सम्यग् यावद्विंशतिवत्सरम् ॥ १३ ॥
तथा कोशस्तु संधायैः स्वप्रजारक्षणक्षमः ।
कोश संग्रह करने का प्रमाण—बिना जुर्माना, मालगुजारी तथा चुंगी से प्राप्त धन के भी केवल राजा के कोश से ही २० वर्ष तक सेना की रक्षा भली भांति जितने से हो सकता है उतने कोश का तथा अपनी प्रजा की रक्षा के लिये उपयुक्त संग्रह करना उचित है।
बलमूलो भवेत् कोशः कोशमूलं बलं स्मृतम् ॥ १४ ॥
बलसंरक्षणात् कोशराष्ट्रवृद्धिरिरिक्षयः ।
जायते तत्त्रयं स्वर्गः प्रजासंरक्षणेन वै ॥ १५ ॥
प्रजा-संरक्षण के फल—कोश का मूल सेना है अर्थात् सेना के द्वारा कोश का संग्रह होता है, और सेना का मूल कोश है अर्थात् कोश के द्वारा सेना का संग्रह होता है, और सेना तथा कोश की रक्षा करने से कोश तथा राष्ट्र (राज्य) की वृद्धि एवं शत्रुओं का नाश होता है और प्रजा की रक्षा करने से पूर्वोक्त कोश तथा राष्ट्र की वृद्धि एवं शत्रु नाश ये तीनों होते हैं और अन्त में स्वर्ग भी मिलता है।
यज्ञार्थं द्रव्यमुत्पन्नं यज्ञः स्वर्गसुखायुषे ।
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अर्यंभावो बलं कोशो राष्ट्रवृद्धयै त्रयं स्त्रिदम् ॥ १६ ॥
**राष्ट्रवृद्धि के तीन कारण—**यज्ञ के लिये द्रव्य (धन) उत्पन्न हुआ है और यज्ञ स्वर्ग सुख एवं आयु की वृद्धि के लिये है, और शत्रु का अभाव, सेना, कोष ये तीनों राष्ट्र की वृद्धि के लिये हैं।
तद्बुद्धिर्नीतिनैपुण्यात् क्षमाशीलनृपस्य च ।
जायतेऽतो यतेतैव यावद्बुद्धिबलोदयम् ॥ १७ ॥
**नीति-निपुणता से कोशवृद्धि का यत्न करने का निर्देश—**क्षमाशील राजा की नीतिसंबन्धी निपुणता से ही उपर्युक्त विषयों की वृद्धि होती है अतः जितना बुद्धिबल हो उतना लगाकर वृद्धि के लिये प्रयत्न करना चाहिये।
मालाकारस्य वृत्त्यैव स्वप्रजारक्षणेन च ।
शत्रुं हि करदीकृत्य तद्धनैः कोशवर्धनम् ॥ १८ ॥
करोति स नृपः श्रेष्ठो मध्यमो वैश्यवृत्तितः ।
अधमः सेवया दण्डतीर्थदेवकरग्रहैः ॥ १९ ॥
**श्रेष्ठादिनृप के ३ लक्षण—**जो माली की भांति व्यवहार रखकर अर्थात् अपने बाग के वृक्षों को सींच कर जैसे माली उसकी रक्षा करता है उसी भांति प्रजा की रक्षा करने के साथ-साथ शत्रु को कर (मालगुजारी) देनेवाला बना-कर उनके धनों से कोश को बढ़ाता है वह नृप श्रेष्ठ कहलाता है, जो वैश्य-वृत्ति व्यवसाय आदि से कोश बढ़ाता है वह मध्यम, एवम् सेवा से तथा जुर्माना, तीर्थ स्थान तथा देवमन्दिरों पर कर लगाकर जो कोश बढ़ाता है वह अधम राजा कहलाता है।
प्रजा हीनधना रक्ष्या भृत्या मध्यधनाः सदा ।
यथाधिकम् प्रतिभुवोऽधिकद्रव्यास्तथोत्त्माः ॥ २० ॥
हीन धन तथा मध्यम धनवाली प्रजा की रक्षा वेतन देकर राजा को स्वामी की भांति करनी चाहिये। तथा अधिक धनवाली उत्तम प्रजा की रक्षा जामिनदार होकर करनी चाहिये।
धनिकाश्चोत्तमधना न हीना नाधिका नृपैः ।
क्योंकि उत्तम धनवाली धनिक प्रजा राजा से न हीन और न अधिक अर्थात् राजतुल्य होती हैं।
द्वादशाब्दप्रपूरं यद्धनं तन्नीचसंज्ञकम् ॥ २१ ॥
पर्याप्तं षोडशाब्दानां मध्यमं तद्धनं स्मृतम् ।
त्रिंशदब्दप्रपूरं स्यात् कुटुम्बस्योत्तमं धनम् ॥ २२ ॥
**नीचादि धन के लक्षण—**जो धन १२ वर्ष तक परिवार की रक्षा करने लायक होता है वह 'नीच' संज्ञक, जो १६ वर्ष तक रक्षा करने योग्य होता है