शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
चतुर्थोऽध्याये मित्रप्रकरणम् १८३
चतुर्थोऽध्याये मित्रप्रकरणम् १८३
सहज मित्र कहलानेवालों का निर्देश—जैसे—माता, माता के कुल के लोग नाना आदि, पिता, पिता के माता-पिता (दादा-दादी), पिता के चाचा, अपनी लड़की, पत्नी, पत्नी के कुल के लोग (ससुरालवाले), पिता की बहिन (फूआ), माता की बहिन (मौसी), अपनी बहिन, कन्या की सन्तान अथवा फुआ और मौसी की लड़की-लड़के, राजा, गुरु ये सब सहज (स्वाभाविक) मित्र होते हैं।
विद्या शौर्यं च दाक्ष्यं च बलं धैर्यं च पञ्चमम्।
मित्राणि सहजान्याहुर्वर्तयन्ति हि तैर्बुधाः॥१३॥
विद्यादि ५ की सहज मित्रता का निर्देश—विद्या, शूरता, चतुरता, बल तथा धीरता ये पांचों भी सहज मित्र कहलाते हैं क्योंकि पण्डित लोग इन्हीं से अपनी जीविका चलाते हैं।
पुत्रो निर्देशवर्त्ती यः स पुत्रोऽन्वर्थनामवान्।
श्रेष्ठ एकस्तु गुणवान् किं शतैरपि निर्गुणैः॥१४॥
सार्थक पुत्र के लक्षण—माता-पिता के आज्ञावशवर्त्ती जो पुत्र होता है वही यथार्थ नामवाला (सार्थक) पुत्र कहलाता है। और एक गुणवान् पुत्र श्रेष्ठ होता है, सैकड़ों निर्गुण (मूर्ख) पुत्रों से क्या? अर्थात् पिता का इनसे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता है।
स्वभावतो भवन्त्येते हिंस्रो दुर्वृत्त एव च।
ऋणकारी पिता शत्रुर्माता स्त्री व्यभिचारिणी॥१५॥
आत्मपितृभ्रातरश्च तत्स्त्रीपुत्राश्च शत्रवः।
स्वाभाविक शत्रु के लक्षण—स्वभावतः निम्नलिखित ये सब शत्रु होते हैं, जैसे, हिंसाशील, दुराचारी (दुष्ट), ऋण करनेवाला पिता, व्यभिचारिणी माता तथा स्त्री, अपने तथा पिता के भाई लोग (भाई-चाचा) और भाई तथा चाचा के स्त्री-और पुत्र,।
स्नुषा श्वश्रूः सपत्नी च ननान्दा यातरस्तथा॥१६॥
परस्पर शत्रु कहलानेवालों का निर्देश—पतोहू और सास, सौत-सौत, ननद-भौजाई, देवरानी-जेठानी ये सब प्रायः परस्पर शत्रु होती हैं।
मूर्खः पुत्रः कुवैद्यश्चारक्षकस्तु पतिः प्रभुः।
चण्डश्चण्डा प्रजा शत्रुरदाता धनिकश्च यः॥१७॥
मूर्ख पुत्रादिकों की शत्रु संज्ञा का निर्देश—मूर्ख पुत्र, दुष्ट चिकित्सक (प' अर्थ वैद्य), नहीं रक्षा करनेवाला पति (स्वामी), अत्यन्त क्रोधी प्रभु (राजा), अत्यन्त क्रोध करनेवाली प्रजा या सन्तान, नहीं देनेवाला (कंजूस) धनी जो होता है वह शत्रु है।
१८४ | शुक्रनीतिः
दुष्टानां नृपतिः शत्रुः कुलटानां पतिव्रता ।
साधुः खलानां शत्रुः स्यान्मूर्खाणां बोधको रिपुः ॥ १८ ॥
दुष्टों के लिये राजा, कुलटाओं के लिये पतिव्रता स्त्री, दुर्जनों के लिये सज्जन और मूर्खों के लिये उपदेश देनेवाला शत्रु होता है ।
उपदेशो हि मूर्खाणां क्रोधायैव शमाय न ।
पयः पानं भुजङ्गानां विषायैवामृताय न ॥ १९ ॥
मूर्खों के लिए उपदेश देने का निषेध—क्योंकि—मूर्खों के लिये उपदेश देना केवल क्रोधजनक होता है उससे उसे शान्ति नहीं मिलती है । और सर्पों के लिये दूध पिलाना केवल विषवर्द्धक होता है उससे अमृत नहीं होता है अर्थात् विष के बदले अमृत नहीं निकलता ।
आसमन्ताच्चतुर्दिक्षु सन्निकृष्टाश्च ये नृपाः ।
तत्परास्तत्परा येऽन्ये क्रमाद्धीनबलारयः ॥ २० ॥
शत्रूदासीनमित्राणि क्रमात्ते स्युस्तु प्राकृताः ।
अरिर्मित्रमुदासीनोऽनन्तरस्तत्परः परः ॥ २१ ॥
क्रमशो वा नृपा ज्ञेयाश्चतुर्दिक्षु तथाऽरयः ।
स्वसमीपतरा भृत्या ह्यमात्याद्याश्च कीर्तिताः ॥ २२ ॥
राजाओं के स्वाभाविक शत्रु-उदासीन-मित्र राजाओं के लक्षण—राजा के राज्य के सब तरफ चारों दिशाओं में समीपवर्त्ती एवं उनके बाद पुनः उनके बाद के जो अन्य राजा लोग हैं वे क्रम से स्वाभाविक पास के शत्रु, उसके बाद के उदासीन और पुनः उसके बाद के मित्र होते हैं । और हीन बलवाले शत्रु भी पास के, उसके बाद के पुनः उसके बाद के इस क्रम से शत्रु, उदासीन तथा मित्र होते हैं । और अरि, मित्र और उदासीन राजाओं के भी चारों दिशाओं में पास के, उसके बाद के पुनः उसके बाद के इस क्रम से उनके भी शत्रु, मित्र और उदासीन होते हैं । और अपने अत्यन्त समीपवर्त्ती भृत्य तथा अमात्य (मन्त्री) आदि भी राजा के द्वारा कष्ट दिये जाने पर शत्रु हो जाते हैं ।
बृंहयेत् कर्षयेन्मित्रं हीनाधिकबलं क्रमात् ।
भेदनीयाः कर्षणीयाः पीडनीयाश्च शत्रवः ॥ २३ ॥
विनाशनीयास्ते सर्वे सामादिभिरुपक्रमैः ।
मित्र और शत्रु राजाओं के प्रति राजाओं के आचरण का निर्देश—हीनबल और अधिक बलवाले मित्र राजाओं की भी क्रम से वृद्धि तथा क्षीणता करे। और जो शत्रु राजा लोग हैं उनमें सामादि उपायों से भेद डालना तथा उन्हें क्षीण, पीडित एवं नष्ट करना चाहिये ।
मित्रं शत्रुं यथायोग्यैः कुर्यात् स्ववशवर्तिनम् ॥ २४ ॥
उपायेन यथा व्यालो गजः सिंहोऽपि साध्यते ।
चतुर्थाध्याये मिश्रप्रकरणम्
१८४
जिस प्रकार से उपाय द्वारा सर्प, हाथी तथा सिंह को अपने वश में किया जाता है उसी प्रकार से यथायोग्य उपायों से मित्र तथा शत्रु को अपना वशवर्ती बनाना चाहिये ।
भूमिष्ठाः स्वर्गमायान्ति वज्रं भिन्दन्त्युपायतः ॥ २५ ॥
क्योंकि उपाय से मनुष्य भूमि में रहकर स्वर्ग पहुँच जाता है और वज्र को भी विदीर्ण कर देता है ।
सुहृत्संबन्धिस्त्रीपुत्रप्रजाशत्रुषु ते पृथक् ।
सामदानभेददण्डाश्चिन्तनीयाः स्वयुक्तितः ॥ २६ ॥
मित्रादि के प्रति सामादिकों का विचार स्वयुक्तियों से करने का निर्देश—
मित्र, संबन्धी, पुत्र, प्रजा और शत्रु इन सबों के विषय में उक्त साम, दान, तथा दण्ड का अपनी युक्ति से पृथक् २ विचार करना चाहिये ।
एकशीलवयोविद्याजातिव्यसनवृत्तयः ।
साहचर्ये भवेन्मित्रमेभिर्यदि तु सार्जवैः ॥ २७ ॥
मित्रता होने के कारणों का निर्देश— जिनके परस्पर स्वभाव, अवस्था, विद्या ( ज्ञान ), जाति, व्यसन ( आदत ), आजीविका ये सब समान हैं वे यदि निष्कपट भाववाले सरल होकर एक जगह मिलते हैं तो मित्र हो जाते हैं ।
त्वत्समस्तु सखा नास्ति मित्रे साम इदं स्मृतम् ।
मम सर्वं तवैवास्ति दानं मित्रे सजीवितम् ॥ २८ ॥
मित्र के लिये साम तथा दान वाक्यों के लक्षण— तुम्हारे समान मेरा दूसरा कोई मित्र नहीं है' ऐसा मित्र के लिये कहना 'साम वाक्य' कहलाता है । और 'जीवन के सहित मेरी सभी वस्तुयें तुम्हारी ही हैं' यह मित्र के लिये कहना 'दान वाक्य' कहलाता है ।
मित्रेऽन्यमित्रसुगुणान् कीर्तयेद् भेदनं हि तत् ।
मित्रे दण्डो न करिष्ये मैत्रीमेवंविधोऽसि चेत् ॥ २६ ॥
भेद तथा दण्ड-वाक्यों के लक्षण— 'मित्र के सामने अन्य मित्र के सुन्दर गुणों की प्रशंसा करना' यह मित्र के लिये 'भेद-वाक्य' और 'तुम यदि ऐसे हो तो मैं तुम्हारे साथ मित्रता नहीं रक्खूंगा' यह कहना मित्र के लिये 'दण्ड-वाक्य' कहलाता है ।
यो न संयोजयेदिष्टमन्यानिष्टमुपेक्षते ।
उदासीनः स न कथं भवेच्छत्रुः सुसान्ध्विकः ॥ ३० ॥
उदासीन के शत्रु बनने का निर्देश— जो स्वयं अभीष्ट कार्य की सिद्धि
१८६ | शुक्रनीतिः
न करे और दूसरे के किये हुये अनिष्ट की उपेक्षा करे, वह उदासीन भलीभांति सन्धि करने पर भी क्यों न शत्रु हो अर्थात् सन्धि करने पर भी वह शत्रु ही हो जाता है ।
परस्परमनिष्टं न चिन्तनीयं त्वया मया ।
सुसाहाय्यं हि कर्तव्यं शत्रौ साम प्रकीर्तितम् ॥ ३१ ॥
शत्रु के प्रति सामवाक्य के लक्षण—'तुम्हें और हमें परस्पर एक दूसरे के अनिष्ट का विचार नहीं रखना चाहिये, बल्कि सहायता ही करनी चाहिये' ऐसा शत्रु के लिये कहना 'सामवाक्य' कहलाता है ।
करैर्वा प्रमितैर्ग्रामैर्वत्सरे प्रबलं रिपुम् ।
तोषयेत्तद्धि दानं स्याद्यथायोग्येषु शत्रुशु ॥ ३२ ॥
शत्रु के लिए दान का स्वरूप-निर्देश—'प्रबल शत्रु को वर्ष में थोड़ा सा कर ( मालगुजारी ) या छोटा सा कोई ग्राम देकर या योग्यतानुसार कुछ देकर संतुष्ट करना' शत्रु के लिये 'दान' कहलाता है ।
शत्रुसाधकहीनत्वकरणात् प्रबलाश्रयात् ।
तद्धीनतोज्जीवनाच्च शत्रुभेदनमुच्यते ॥ ३३ ॥
शत्रु के प्रति भेद का स्वरूप-निर्देश—'शत्रु के सम्पूर्ण साधनों को हीन बना देना, शत्रु से अधिक बलशाली का आश्रय लेना एवं शत्रु से हीन बलवालों को प्रबल बना देना' इन सबों से 'शत्रु का भेद' होना कहा है ।
दस्युभिः पीडनं शत्रोः कर्षणं धनधान्यतः ।
तच्छिद्रदर्शनादुग्रबलैर्नीत्या प्रभीषणम् ॥ ३४ ॥
प्राप्तयुद्धानिवृत्तित्वैस्त्रासनं दण्ड उच्यते ।
शत्रु के प्रति दण्ड का स्वरूप-निर्देश—'डाकुओं से शत्रु को पीड़ा पहुँचाना ( लुटवाना ), धन-धान्य को क्षीण कर देना, दोष देखना, उग्र सेना तथा नीति से अत्यन्त डराना, यदि युद्ध हो रहा हो तो उस पर डटे रहने से त्रास पहुँचाना' ये सब शत्रु के लिये 'दण्ड' कहलाता है ।
क्रियाभेदादुपाया हि भिद्यन्ते च यथार्हतः ॥ ३५ ॥
योग्यतानुसार क्रिया में भिन्नता होने से सामादिक उपायों में भी भिन्नता होती है ।
सर्वोपायैस्तथा कुर्यान्नीतिज्ञः पृथिवीपतिः ।
यथा स्वाभ्यधिका न स्युर्मित्रोदासीनशत्रवः ॥ ३६ ॥
**मित्र, शत्रु तथा उदासीन राजाओं को बलवान् न होने देने का निषेध—**नीति के जाननेवाले राजा को हर एक उपायों से यही करना चाहिये कि उसके मित्र, उदासीन तथा शत्रु राजा लोग अपने से अधिक बलवान न होने पावें ।