सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

द्वितीयोऽध्यायः ७७

द्वितीयोऽध्यायः ७७

की घोड़ों की चालों को तथा घोड़े के सामर्थ्य के अनुसार उन्हें यथार्थ रूप से शिक्षा देना जानता है वह अश्वशिक्षक (घोड़ों को सिखानेवाला) के पद पर नियुक्त करने योग्य होता है।

वाजिसेवासु कुशलः पल्याणादिनियोगवित् ॥ १३७॥
दृढांगश्च तथा शूरः स कार्यो वाजिसेवकः।

**अश्वसेवक (साईस) के लक्षण—**जो घोड़ों की सेवा करने में कुशल, पल्याण (घोड़े की जीन) आदि लगाने की कला का जानने वाला, दृढ़ अङ्गों वाला तथा शूर होता है वह साईस बनाने योग्य है।

नीतिशास्त्रास्त्रव्यूहादिनतिविद्याविशारदाः ॥ १३८॥
अबाला मध्यवयसः शूरा दान्ता दृढांगकाः।
स्वधर्मनिरता नित्यं स्वामिभक्ता रिपुद्विषः ॥ १३९॥
शूद्रा वा क्षत्रिया वैश्या म्लेच्छाः संकरसम्भवाः।
सेनाधिपाः सैनिकाश्च कार्या राज्ञा जयार्थिना ॥ १४०॥

**सेनापति तथा सैनिकों के लक्षण—**जो नीति (कर्त्तव्य तथा अकर्त्तव्य जानने का) शास्त्र, शस्त्र तथा अस्त्र चलाना, व्यूह-रचना, नतिविद्या (शत्रुओं को नीचा दिखाना) इन सब विषयों में पण्डित, लड़कपन से रहित, तरुण, शूर, सैनिक-शिक्षा प्राप्त, दृढ़ अङ्गों वाले, अपने धर्म में निरत, नित्य स्वामी में भक्ति रखने वाले, एवं उनके शत्रुओं से द्वेष रखने वाले, शूद्र, क्षत्रिय, वैश्य, म्लेच्छ या सङ्कीर्ण जाति वाले हों उन्हें विजय चाहनेवाला राजा अपना सेनाध्यक्ष या सैनिक बनावे।

पञ्चानामथवा षण्णामधिपः पदगामिनाम्।
योग्यः स पत्तिपालः स्यात्त्रिंशतां गौल्मिकः स्मृतः ॥ १४१॥
शतानां तु शतानीकस्तथाऽनुशतिको वरः।
सेनानीर्लेखकश्चैते शतं प्रत्यधिपा इमे ॥ १४२॥
साहस्रिकस्तु संयोज्यस्तथा चायुतिको महान्।

**पत्ति (पैदल सेना) पाल आदिकों के अधिकार—**५ या ६ पैदल सिपाहियों का जो स्वामी होता है वह 'पत्तिपाल' ३० सिपाहियों का स्वामी 'गौल्मिक' १०० सिपाहियों का स्वामी 'शतानीक' कहलाता है, और श्रेष्ठ अनुशतक, सेनानी तथा लेखक ये सब सौ-सौ के ऊपर विशेष २ कार्यों के लिये अध्यक्ष बनाने चाहिए। और १००० सिपाहियों का स्वामी 'साहस्रिक' एवं १०००० सिपाहियों का स्वामी महान 'आयुतिक' बनाना चाहिये।

व्यूहाभ्यासं शिक्षयेद्यः सायंप्रातस्तु सैनिकान् ॥ १४३॥
जानाति स शतानीकः सुयोद्धुं युद्धभूमिकाम्।

७८ | शुक्रनीतिः

शतानीकादिकों के लक्षण—सायं-प्रातः सैनिकों को व्यूह-रचना का अभ्यास (कवायत या परेड) कराना और भली भांति युद्ध करने के लिये रणसज्जा (युद्ध योग्य सामग्री-वेषभूषा से सुसज्जित करना) का ज्ञान रखना, यह शतानीक का कर्त्तव्य है।

तथाविधोऽनुशतिकः शतानीकस्य साधकः ॥ १४४ ॥
जानाति युद्धसम्भारं कार्ययोग्यं च सैनिकम् ।

और जो इन्हीं गुणों से युक्त, शतानीक की सहायता करने वाला युद्धोपयोगी सामग्रियों का तथा कार्य योग्य सैनिकों का जानने वाला होता है वह 'अनुशतिक' कहलाता है। अर्थात् उक्त कार्यों का भार उसके ऊपर रहता है।

निदेशयति कार्याणि सेनानीर्यामिकांश्च सः ॥ १४५ ॥
परिवृत्तिं यामिकानां करोति स च पत्तिपः ।

जो प्रहरी (पहरा देने वाले) लोगों के लिये कार्य बताता है अर्थात् जिसके निर्देशानुसार सिपाही कार्य करते हैं वह (सेनानी) कहलाता है। और प्रहरी गणों का जो पहरा बदलता है वह 'पत्तिप' या 'पत्तिपाल' कहलाता है।

सावधानं यामिकानां विजानीयाच्च गुल्मपः ॥ १४६ ॥

जो प्रहरियों को अपने २ कामों में सतर्कता का निरीक्षण करता है वह 'गुल्मप' या 'गौल्मिक' कहलाता है।

सैनिकाः कति सन्त्येतैः कति प्राप्तं तु वेतनम् ।
प्राचीनाः के कुत्र गताश्चैतान्वेत्ति स लेखकः ॥ १४७ ॥
गजाश्वानां विंशतेश्चाधिपो नायकसंज्ञकः ।

जो सेना में कितने सैनिक हैं? और उन्होंने कितना वेतन पाया है? पुराने असमर्थ सैनिक कितने हैं? और कौन कहां २ गये हैं, इन सबों को जान कर लिखता है, वह 'लेखक' कहलाता है। और २० हाथियों एवं २० घोडों का अध्यक्ष 'नायक' कहलाता है।

उक्तसंज्ञान्स्वस्वचिह्नैर्लाञ्छितांश्च नियोजयेत् ॥ १४८ ॥

उपर्युक्त अधिकारियों को अपने २ चिह्नों से युक्त रहने का निर्देश—ऊपर जिनके नामों का निर्देश किया गया है उन पत्तिपाल आदियों को उनके जो २ चिह्न हों उन से युक्त करके कार्य करने का आदेश देना चाहिये।

अजाविगोमहिष्येणमृगाणामधिपाश्च ये ।
तद्वृद्धिपुष्टिकुशलास्तद्घासल्यानिपीडिताः ॥ १४९ ॥
तथाविधा गजोष्ट्रादेर्योध्यास्तत्सेवका अपि ।

बकरा, मेढ़ा, गौ, भैंस, एण (मृग विशेष), मृग, इनके जो अध्यक्ष हों

द्वितीयोऽध्यायः
७९

उन्हें उन (बकरा आदि) सब पशुओं की वृद्धि तथा पोषण करने में कुशल एवं उनके दुख से दुखी होने वाले होना चाहिये। इसी प्रकार से हाथी तथा ऊंट आदि के भी जो अध्यक्ष हों उन्हें भी हाथी, ऊँट आदि की सेवा करने वाला होना चाहिये। और ऐसे ही लोगों की नियुक्ति भी करनी चाहिये ।

युद्धप्रवृत्तिकुशलास्तित्तिरादेश्च पोषकाः ॥ १५० ॥
शुकादेः पाठकाः सम्यक्छ्येनादेः पातबोधकाः ।
तत्तद्हृदयविज्ञानकुशलाश्च सदा हि ते ॥ १५१ ॥

**तित्तिरादिपोषकों की योजना का निर्देश—**और इसी भांति युद्ध करने की प्रवृत्ति रखने वाले तीतर आदि पक्षियों का पालन करने वाले और सुग्गे आदि पक्षियों के भली भांति पढ़ाने वाले तथा बाज आदि पक्षियों के झपट्टा मारने की कला जानने वाले एवं उपर्युक्त पक्षियों के हृद्गत भावों के पहचानने में निपुण लोगों को सदा उन सबों का अध्यक्ष बनाना चाहिये ।

मानाकृतिप्रभावर्णजातिसाम्याच्च मौल्यवित् ।
रत्नानां स्वर्णरजतमुद्राणामधिपश्च सः ॥ १५२ ॥

**रत्नाध्यक्ष के लक्षण—**और रत्न, सुवर्ण, चाँदी, मुद्रा (सिक्का) के जो अध्यक्ष बनाये जांय, उन्हें रत्नादिकों के मान (तौल), आकार, चमक, रंग जाति और समानता को देखकर उनके मूल्य का जानकार होना चाहिये ।

दान्तस्तु सधनो यस्तु व्यवहारविशारदः ।
धनप्राणोऽतिकृपणः कोषाध्यक्षः स एव हि ॥ १५३ ॥

**कोषाध्यक्ष के लक्षण—**और जो विनम्र स्वभाव वाले, धनी तथा व्यवहार में चतुर, धन की प्राण के समान रक्षा करने वाले तथा अत्यन्त कृपण हों उन्हें 'कोषाध्यक्ष' पद पर नियुक्त करना चाहिये ।

देशभेदैर्जातिभेदैः स्थूलसूक्ष्मबलाबलं ।
कौशेयादेर्मानमूल्यवेत्ता वस्त्रस्य वस्त्रपः ॥ १५४ ॥

**वस्त्राधिपति के लक्षण—**और जो देश तथा जाति-सम्बन्धी विभिन्नता एवं मोटा, महीन, मजबूत, कमजोर जानकर परिमाण (तौल) और उचित मूल्य का निश्चय करनेवाला हो उसी को रेशमी आदि वस्त्रों का 'अध्यक्ष' बनाना चाहिये ।

कुटीकञ्चुकनेपथ्यमण्डपादेः परिक्रियाम् ।
प्रमाणतः सौधिकेन रञ्जनानि च वेत्ति यः ॥ १५५ ॥
तथा शय्यादिसन्धानं वितानादेर्नियोजनम् ।
वस्त्रादीनां च स प्रोक्तो वितानाद्यधिपः खलुः ॥ १५६ ॥

**वितानाद्यधिपके लक्षण—**जो वस्त्रों की कुटी (तम्बू), कञ्चुक (कवच

८०शुक्रनीतिः

या कुर्ता-कोट आदि ), नेपथ्य ( पर्दा आदि या वेष ), मण्डप ( वस्त्र निर्मित गृह आदि ) को नाप के अनुसार सीने तथा शय्या( विस्तार ) आदि बिछाना या सजाना, शामियाना आदि का ठीक से खड़ा करना और वस्त्रादियों को पहनाना भली भांति जानता हो उसे वितानादि का अध्यक्ष बनाना चाहिये।

जातिं तुलां च मूल्यं च सारं भोगं परिग्रहम् ।
संमार्जनं च धान्यानां विजानाति स धान्यपः ॥ १५७ ॥

**धान्यपति के लक्षण—**जो धान्यों की जाति, वजन, मूल्य, श्रेष्ठता, खाने का तरीका, पाने का उपाय, साफ करना इन सब विषयों को अच्छी तरह से जानता है, उसे 'धान्यप' धान्यों का अध्यक्ष बनाना चाहिये ।

धौताधौतविपाकज्ञो रससंयोगभेदवित् ।
क्रियासु कुशलो द्रव्यगुणवित्पाकनायकः ॥ १५८ ॥

**पाकाध्यक्ष के लक्षण—**जो पकाने का अन्न-धुला हुआ है या नहीं धुला हुआ है एवं परिपक्व हुआ है या नहीं इसका जानने वाला, तथा रसों ( कड़वा, कसैला, तीता, खट्टा, नमकीन, मीठा ) के संयोग से होने वाले भेदों का जान-कार है एवं पाकक्रिया ( रसोई बनाने ) में निपुण तथा द्रव्यों एवं उनके गुणों को जानने वाला हो उसे 'पाकनायक' ( रसोई बनाने वालों का अध्यक्ष ) बनाना चाहिये ।

फलपुष्पवृद्धिहेतुं रोपणं शोधनं तथा ।
पादपानां यथाकालं कर्तुं भूमिजलादिना ॥ १५९ ॥
तद्भेषजं च संवेत्ति ह्यारामाधिपतिश्च सः ।

**आरामाधिपति के लक्षण—**जो वृक्षों को समयानुसार मिट्टी (खाद) तथा जल देने आदि से उनके पुष्प तथा फल के बढ़ाने के साधन ( उपाय ), लगाना, संस्कार करना, और रोग लग जाने पर औषध ( दूर करने का उपाय ) करना भली भांति जानता हो उसे 'आरामाधिपति' ( बगीचों का अध्यक्ष ) बनाना चाहिये ।

प्रासादं परिखां दुर्गं प्राकारं प्रतिमां तथा ॥ १६० ॥
यन्त्राणि सेतुबन्धांश्च बापी कूपतडागकम् ।
तथा पुष्करिणीं कुण्डं जलाद्यूर्ध्वगतिक्रियाम् ॥ १६१ ॥
सुशिल्पशास्त्रतः सम्यक्सुरम्यं तु यथा भवेत् ।
कर्तुं जानाति यः सैव गृहाद्यधिपतिः स्मृतः ॥ १६२ ॥

**गृहाद्यधिपति के लक्षण—**जो सुन्दर शिल्प शास्त्र का ज्ञाता होने से तद-नुसार अत्यन्त सुन्दर जिस प्रकार से बन सके उस प्रकार से राजभवन, खाई, किला, परकोटा, मूर्ति, यन्त्र, पुल, बावड़ी, कूप, तालाब, पोखरी, कुण्ड, जल

द्वितीयोऽध्यायः
८१

को यन्त्रादि से ऊपर चढ़ाना, इन सबों को सुन्दर बनाने की क्रिया को जानता है उसी को गृहादियों का अध्यक्ष बनाना चाहिये ।

राजकार्योपयोग्यान् हि पदार्थान्वेत्ति तत्त्वतः ।
सञ्चिनोति यथाकाले सम्भाराधिप उच्यते ॥ १६३ ॥

जो यथार्थ रूप से राजा के कार्य में आने योग्य वस्तुओं को जानता है और उनका समयानुसार संग्रह करके रखता है वह 'सम्भाराधिप' पद के योग्य होता है ।

स्वधर्माचरणे दक्षो देवताराधने रतः ।
निःस्पृहः स च कर्तव्यो देवतुष्टिपत्तिः सदा ॥ १६४ ॥

**देवाध्यक्ष के लक्षण—**जो अपने धर्म के आचरण करने में चतुर, देवता की आराधना में निरत, स्वयं किसी वस्तु की इच्छा न रखनेवाला हो उसे 'देवपूजा का अध्यक्ष' अर्थात् पुजारियों के विभाग का स्वामी बनाना चाहिये ।

याचकं विमुखं नैव करोति नं च संग्रहम् ।
दानशीलश्च निर्लोभो गुणज्ञश्च निरालसः ॥ १६५ ॥
दयालुर्मृदुवाग्दान-पात्रविन्नति-तत्परः ।
नित्यमेभिर्गुणैर्युक्तो दानाध्यक्षः प्रकीर्तितः ॥ १६६ ॥

**दानाध्यक्ष के लक्षण—**जो याचकों को विमुख नहीं करता है और स्वयं संग्रह भी नहीं करता है एवं दानशील, लोभरहित, गुणज्ञ ( दूसरे के गुण को जानने वाला ), आलस्यरहित, दयालु, मधुरभाषी, दान देने योग्य व्यक्तियों को पहचानने वाला और विनम्र होता है वही व्यक्ति इन गुणों से सदा युक्त रहनेवाला होने से 'दानाध्यक्ष' पद के योग्य होता है ।

व्यवहारविदः प्राज्ञा वृत्तशीलगुणान्विताः ।
रिपौ मित्रे समा ये च धर्मज्ञाः सत्यवादिनः ॥ १६७ ॥
निरालसा जितक्रोधकामलोभाः प्रियंवदाः ।
सभ्याः सभासदः कार्या वृद्धाः सर्वासु जातिषु ॥ १६८ ॥

**सभासद् के लक्षण—**जो लोक-व्यवहार को जाननेवाले, विद्वान, सदाचार तथा सौजन्यादि एवं दया-उदारता आदि सद्गुणों से युक्त, शत्रु तथा मित्र में समभाव रखनेवाले, धर्मज्ञ, सत्यवादी, आलस्यरहित, क्रोध, काम तथा लोभ को जीतनेवाले ऐसे सभी जातियों के जो वृद्ध लोग हैं, उन्हें सभा का सभ्य ( मेम्बर ) बनाना चाहिये ।

सर्वभूतात्मतुल्यो यो निःस्पृहोऽतिथिपूजकः ।
दानशीलश्च यो नित्यं स वै सत्राधिपः स्मृतः ॥ १६६ ॥

**सत्राधिप के लक्षण—**जो सम्पूर्ण प्राणियों के साथ अपने समान व्यवहार

६ शु०

८२ | शुक्रनीतिः

करनेवाला, निस्पृह, अतिथियों का संमान करनेवाला, नित्य दानशील हो, उसे 'सत्राधिप' ( यज्ञ-विभाग का अध्यक्ष ) बनाना चाहिये ।

परोपकारनिरतः परमर्माप्रकाशकः ।
निर्मत्सरो गुणग्राही सद्भिद्यः स्यात् परीक्षकः ॥ १७० ॥

**परीक्षक के लक्षण—**जो परोपकार में निरत रहनेवाला, दूसरे के मर्म अर्थात् मर्म को विदीर्ण करनेवाले दोष को नहीं प्रकाशित करनेवाला, मत्सरता से शून्य ( दूसरे के शुभ में द्वेष न रखनेवाला ), गुणग्राही और जिस विषय की परीक्षा लेता हो उसको जाननेवाला हो उसे 'परीक्षक' ( परीक्षा लेनेवाला ) बनाना चाहिये ।

प्रजा नष्टा न हि भवेत्तथा दण्डविधायकः ।
नातिक्रूरो नातिमृदुः साहसाधिपतिश्च सः ॥ १७१ ॥

**साहसाधिप के लक्षण—**प्रजा जिससे नष्ट न हो जाय ऐसे दण्ड का विधान करनेवाला, अत्यन्त क्रूरता तथा मृदुता को नहीं करनेवाला जो होता है वही 'साहसाधिपति' ( चोर आदि का शासन करने के लिये अध्यक्ष फौजदारी ) पद के योग्य होता है ।

आधर्षकेभ्यश्चोरेभ्यो ह्यधिकारिगणात्तथा ।
प्रजासंरक्षणे दक्षो ग्रामपो मातृपितृवत् ॥ १७२ ॥

**ग्रामाधिप के लक्षण—**डाकू, चोर तथा राज्य के उच्छृङ्खल अधिकारी पुरुषों से माता-पिता की भांति जो अपनी प्रजा की रक्षा करने में निपुण होता है । वही 'ग्रामप' ( ग्रामपति ) पद के योग्य होता है ।

वृक्षान् संपुष्य यत्नेन फलं पुष्पं विचिन्वति ।
मालाकार इवात्यन्तं भागहारस्तथाविधः ॥ १७३ ॥

**कर वसूल करनेवाले के लक्षण—**जिस प्रकार से माली अत्यन्त यत्न से वृक्षों को बढ़ाकर उससे फल तथा पुष्प का संग्रह करता है उसी प्रकार से प्रजाओं से जो राजा का भाग ( कर = मालगुजारी ) ग्रहण करनेवाला हो वैसा 'भागहार' बनाना चाहिये ।

गणनाकुशलो यस्तु देशभाषाप्रभेदवित् ।
असन्दिग्धमगूढार्थं बिलिखेत्स च लेखकः ॥ १७४ ॥

**लेखक के लक्षण—**जो गणना ( गिनती ) करने में कुशल, देश की भाषाओं के भेदों को जाननेवाला, एवं सन्देहरहित तथा अर्थ समझने लायक स्पष्ट लिखनेवाला होता है, उसे 'लेखक' पद पर नियुक्त करना चाहिये ।

शस्त्रास्त्रकुशलो यस्तु दृढाङ्गश्च निरालसः ।
यथायोग्यं समाहूयात् प्रनम्रः प्रतिहारकः ॥ १७५ ॥

द्वितीयोऽध्यायः ८३

द्वारपाल के लक्षण—जो शस्त्र तथा अस्त्र चढ़ाने में निपुण, दृढ़ अङ्गों वाला, आलस्यरहित, एवं नम्रता के साथ योग्यतानुसार लोगों को पुकार कर राजा के पास ले जानेवाला हो उसे 'प्रतिहारक' (द्वारपाल) पद पर नियुक्त करना चाहिये।

यथा विक्रयिणां मूलधननाशो भवेन्नहि ।
तथा शुल्कं तु हरति शौल्किकः स उदाहृतः ॥ १७६ ॥

चुङ्गी लेनेवाले के लक्षण—बेचनेवालों का मूल धन में जिससे कमी न आये ऐसे शुल्क (चुङ्गी) को जो व्यापारियों से वसूल करनेवाला हो उसे 'शौल्किक' पद पर नियुक्त करे।

जपोपवास-नियम-कर्मध्यानरतः सदा ।
दान्तः क्षमो निःस्पृहश्च तपोनिष्ठः स उच्यते ॥ १७७ ॥

तपोनिष्ठ के लक्षण—जो सदा जप, उपवास, नियम (व्रतपालन), शास्त्रोक्त कर्म तथा ध्यान में रत रहनेवाला, इन्द्रियों का दमन करनेवाला, क्षमाशील, निःस्पृह रहनेवाला हो उसे 'तपोनिष्ठ' कहते हैं।

याचकेभ्यो ददात्यर्थं भार्यापुत्रादिकं त्वपि ।
न संगृह्णाति यत्किञ्चिद् दानशीलः स उच्यते ॥ १७८ ॥

दानशील के लक्षण—जो याचकों को मांगने पर अपना धन, स्त्री तथा पुत्रादि को भी दे डालता है और उस समय अपने पास कुछ नहीं बचाकर रख लेता है, वह 'दानशील' कहलाता है।

पठनं पाठनं तुक क्षमास्त्वभ्यासशालिनः ।
श्रुतिस्मृतिपुराणानां श्रुतज्ञास्ते प्रकीर्तिताः ॥ १७९ ॥

श्रुतज्ञ के लक्षण—जो श्रुति (वेद), स्मृति तथा पुराणों का अध्ययन (पढ़ना) तथा अध्यापन (पढ़ाना) करने में समर्थ तथा उन सबों का नित्य अभ्यास करनेवाले हैं उन्हें (श्रुतज्ञ) कहते हैं।

साहित्यशास्त्रनिपुणः संगीतज्ञश्च सुस्वरः ।
सर्गादिपञ्चकज्ञाता स वै पौराणिकः स्मृतः ॥ १८० ॥

पौराणिक के लक्षण—जो साहित्य शास्त्र में निपुण, सङ्गीत का जाननेवाला, सुन्दर स्वरवाला एवं सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर, वंशानुचरित इन पाँच विषयों का जाननेवाला हो वह 'पौराणिक' कहलाता है।

मीमांसातर्कवेदान्तशब्दशासनतत्परः ।
ऊङ्खान्बोधिधतुं शक्तस्तत्त्वतः शास्त्रविच्च सः ॥ १८१ ॥

शास्त्रविद् के लक्षण—जो मीमांसा, तर्क (न्याय), वेदान्त, शब्दशासन (व्याकरणादि शब्द शास्त्र) का जाननेवाला, उक्त विषयों में तर्क करने तथा

८४शुक्रनीतिः

यथार्थ रूप से उन्हें समझाने में समर्थ हो उसे 'शास्त्रविद्' कहते हैं ।

संहितां च तथा होरां गणितं वेत्ति तत्त्वतः ।
ज्योतिर्विच्च स विज्ञेयस्त्रिकालज्ञश्च यो भवेत् ॥ १८२ ॥

**ज्योतिर्विद् के लक्षण—**जो संहिता ( वाराही संहिता आदि ), होराशास्त्र ( पाराशर ), गणित ( ग्रहलाघवादि ) को यथार्थ रूप से जानता है एवं त्रिकालज्ञ ( भूत, भविष्य, वर्तमान का जानने वाला ) है वह 'ज्योतिर्विद्' कहलाता है ।

बीजानुपूर्व्या मन्त्राणां गुणान्दोषांश्च वेत्ति यः ।
मन्त्रानुष्ठानसम्पन्नो मान्त्रिकः सिद्धदैवतः ॥ १८३ ॥

**मान्त्रिक के लक्षण—**जो बीजों की आनुपूर्वी के साथ मन्त्रों के गुण तथा दोष को जानता है एवं मन्त्र का नित्य अनुष्ठान करने में लगा हुआ, देवता की सिद्धि प्राप्त करनेवाला होता है उसे 'मान्त्रिक' कहते हैं ।

हेतुलिङ्गौषधीभिर्यो व्याधीनां तत्त्वनिश्चयम् ।
साध्यासाध्यं विदित्वोपक्रमते स भिषक्स्मृतः ॥ १८४ ॥

**वैद्य के लक्षण—**जो हेतु ( कारण ), लिङ्ग ( लक्षण ) तथा औषध-ज्ञान द्वारा व्याधियों का यथार्थ निश्चय एवं साध्यता तथा असाध्यता जानकर चिकित्सा करता है उसे 'भिषक्' ( वैद्य ) कहते हैं ।

श्रुतिस्मृतीतरैर्मन्त्रानुष्ठानैर्देवतार्त्तनम् ।
कर्तुं हिततमं मत्वा यतते स च तान्त्रिकः ॥ १८५ ॥

**तान्त्रिक के लक्षण—**जो श्रुति तथा स्मृति से भिन्न पुराणादि में कहे हुए मन्त्रानुष्ठान द्वारा देवता का पूजन अत्यन्त हितकर समझकर उस पद्धति से यत्न करता है वह 'तान्त्रिक' कहलाता है ।

नपुंसकाः सत्यवाचो सुभूषाश्च प्रियंवदाः ।
सुकुलाश्च सुरूपाश्च योज्यास्त्वन्तःपुरे सदा ॥ १८६ ॥

**अन्तःपुर के योग्य पुरुष के लक्षण—**जो नपुंसक ( हिजड़े ), सत्य बोलने वाले, सुन्दर भूषण धारण करनेवाले, प्रियभाषी, अच्छे कुल में उत्पन्न तथा सुन्दर स्वरूपवाले हों, उन्हें सदा अन्तःपुर ( रनिवास ) के अन्दर में नियुक्त करे ।

अनन्याः स्वामिभक्ताश्च धर्मनिष्ठा दृढाङ्गकाः ।
अबाला मध्यवयसः सेवासु कुशलाः सदा ॥ १८७ ॥
सर्वं यद्यत्कार्यजातं नीचं वा कर्तुमुद्यताः ।
निदेशकारिणो राज्ञा कर्त्तव्याः परिचारकाः ॥ १८८ ॥

**परिचारक के लक्षण—**जो अनन्य भाव से स्वामी की भक्ति करनेवाले,