शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३७६
चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३७६
जीवन्नेव मृतः सोऽपि भुङ्क्ते राष्ट्रकृतं त्वघम् ।
जीवन-रक्षार्थ युद्ध से भाग जाने पर दोष का निर्देश— जो नराधम जीवन को रक्षार्थी होकर युद्ध से भाग जाता है वह जीता हुआ भी मृत्यु तुल्य ही रहता है और राज्य भर का किया हुआ सभी पाप अकेला भोगता है ।
मित्रं वा स्वामिनं त्यक्त्वा निर्गच्छति रणाच्च यः ॥ ३२९ ॥
सोऽन्ते नरकमाप्नोति सजीवो निन्द्यतेऽखिलैः ।
मित्र तथा स्वामी को छोड़ कर युद्धक्षेत्र से भाग आने पर दोष का निर्देश— और जो मित्र तथा स्वामी को छोड़कर लड़ाई से निवृत्त होकर भाग जाता है, वह जब तक जीवित रहता है तब तक सभी लोगों की निन्दा का पात्र बना रहता है तथा मरने पर नरक को प्राप्त होता है ।
मित्रमापद्गतं दृष्ट्वा सहायं न करोति यः ॥ ३३० ॥
अकीर्तिं लभते सोऽत्र मृतो नरकमृच्छति ।
मित्र की सहायता न करने से दोषभागी होने का निर्देश— जो अपने मित्र को आपत्ति में पड़ा हुआ देखकर भी सहायता नहीं करता है, वह इस लोक में अपयश को प्राप्त करता है और मरने के बाद नरक को प्राप्त करता है ।
विस्रम्भाच्छरणं प्राप्तं संत्यजति दुर्मतिः ॥ ३३१ ॥
स याति नरके घोरे यावदिन्द्राश्चतुर्दश ।
शरणागत को लौटा देने में घोर नरक-प्राप्ति का निर्देश— विश्वास करके शरण में रक्षार्थ आये हुये को जो दुष्टबुद्धि वाला मनुष्य लौटा देता है, वह १४ इन्द्र के बदलने तक घोर नरक में निवास करता है ।
सुदुर्वृत्तं यदा क्षत्रं नाशयेयुस्तु ब्राह्मणाः ॥ ३३२ ॥
युद्धं कृत्वापि शस्त्रास्त्रैर्न तदा पापभाजिनः ।
दुराचारी क्षत्रिय को मार डालने का निर्देश— यदि किसी अत्यन्त दुराचारी क्षत्रिय को ब्राह्मण लोग शस्त्रास्त्रों से युद्ध करके मार डालें तो वे पाप-भागी नहीं हो सकते हैं ।
हीनं यदा क्षत्रकुलं नीचैर्लोकैः प्रपीड्यते ॥ ३३३ ॥
तदापि ब्राह्मणा युद्धे नाशयेयुस्तु तान् द्रुतम् ।
जब क्षत्रिय-समाज को हीनबलवाला समझ कर नीच लोग पीडित करने करें तब भी ब्राह्मण लोग युद्ध में लड़कर उन सबों को शीघ्र नष्ट कर देवें ।
उत्तमं मान्त्रिकास्त्रेण नालिकास्त्रेण मध्यमम् ॥ ३३४ ॥
शस्त्रैः कनिष्ठं युद्धन्तु बाहुयुद्धं ततोऽधमम् ।
उत्तम, मध्यम, कनिष्ठ तथा अधम युद्ध के लक्षण— मन्त्र द्वारा प्रयुक्त अस्त्रों से होने वाले युद्ध को उत्तम, नालिकास्त्रों ( बन्दूक-तोप ) से होने वाले को
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मध्यम, शस्त्रों से होने वाले को कनिष्ठ और बाहु से होनेवाले युद्ध को अधम कहते हैं।
मन्त्रेरितमहाशक्तिबाणाद्यैः शत्रुनाशनम् ॥ ३३५ ॥
मान्त्रिकास्त्रेण तद्युद्धं सर्वयुद्धोत्तमं स्मृतम् ।
**सर्वोत्तम युद्ध के लक्षण—**जिस में मन्त्र से अभिमन्त्रित करके छोड़े हुये महाशक्तिशाली बाणादि द्वारा शत्रु का नाश किया जाता है, ऐसे मान्त्रिकास्त्र से होने वाले युद्ध को सब युद्धों में उत्तम कहा जाता है।
नालाग्निक्षूर्णसंयोगाल्लक्ष्ये गोलनिपातनम् ॥ ३३६ ॥
नालिकास्त्रेण तद्युद्धं महाह्रासकरं रिपोः ।
**नालिकास्त्र युद्ध का लक्षण—**जिसमें तोप या बन्दूक की नाल में बारूद भर कर आग लगाने के द्वारा लक्ष्यस्थान पर गोली या गोला छोड़ा जाता है, ऐसे नालिकास्त्र द्वारा होने वाले युद्ध को शत्रुओं के लिये महाह्रास (हानि) करने वाला माना जाता है।
कुन्तादिशस्त्रसङ्घातै रिपूणां नाशनं च यत् ॥ ३३७ ॥
शस्त्रयुद्धं तु तज्ज्ञेयं नालास्त्राऽभावतः सदा ।
**शस्त्रयुद्ध का लक्षण—**जिसमें सदा नालास्त्र का अभाव होने से केवल भाला आदि शस्त्र-समूहों के द्वारा शत्रुओं का नाश किया जाता है उसे शस्त्र-युद्ध समझना चाहिये।
कर्षणैः सन्धिमर्म्णां प्रतिलोमानुलोमतः ॥ ३३८ ॥
बन्धनैर्घातनं शत्रोर्युक्त्या तद् बाहुयुद्धकम् ।
**बाहुयुद्ध का लक्षण—**कौशल के साथ शत्रु के सन्धिस्थान तथा मर्म-स्थानों को पीड़ित करने से तथा उलटा तथा सीधे ढङ्ग से बाहुओं द्वारा बांधने से जहां पर आघात पहुँचाया जाता है, उसे 'बाहुयुद्ध' कहते हैं।
वामपाणिकचोत्पीडा भूमौ निष्पेषणं बलात् ॥ ३३९ ॥
मूर्ध्नि पादप्रहरणं जानुनोदरपीडनम् ।
मालूराकारया मुष्ट्या कपोले दृढताडनम् ॥ ३४० ॥
कफोणिपातोऽप्यसकृत्सर्वतस्तलताडनम् ।
जालेन युद्धे भ्रमणं नियुद्धं स्मृतमष्टधा ॥ ३४१ ॥
**बाहुयुद्ध के ८ प्रकारों का निर्देश—**बाहुयुद्ध आठ प्रकार का होता है। जैसे १-बायें हाथ से बालों को पकड़ना, २-जबरदस्ती भूमि में पटक कर रगड़ना, ३-सिर में पैर से प्रहार करना, ४-घुटने से पेट को दबाना, ५-बेल के समान दृढ मुष्ठी से कपोल में कठिन प्रहार करना, ६-बारंबार केहुनी को बलपूर्वक भूमि पर गिराना, ७-सभी प्रकार से चपेटा द्वारा प्रहार करना,